संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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दोनों पापाचारके द्वारा एक दूसरेसे मिले। तरुणीने संन्यासीका मन मोह लिया था; अतः वह उसीके पीछे-पीछे लगा रहा। उसकी प्रसन्नताके लिये वह न्याय अथवा अन्यायसे भी धनकी याचना करने लगा। काशीमें रहकर वह चाण्डालसे भी दान लेता था। उसने स्नान छोड़ दिया। अपवित्र रहने लगा और पापमें प्रवृत्त होकर रातमें चोरी भी करने लगा। एक दिन वह दुराचारी यति मांस लानेकी इच्छासे वनमें गया। वहाँ उसकी दृष्टि एक चाण्डाल-कन्यापर पड़ी, जिसके नेत्र उस युवकको उन्मत्त बना देनेवाले थे। वह बड़ी ही सुन्दरी थी। उसका अतिशय सौन्दर्य देखकर उसने निर्जन वनमें उस चाण्डालीके साथ समागम किया। उसके साथ भोजन भी किया और उसीके घरमें उसकी मृत्यु हुई। पापात्मा और सर्वभक्षी होकर भी वह काशीके प्रभावसे नरकमें नहीं पड़ा; परन्तु उसके द्वारा अत्यन्त भयानक वज्रलेप पाप हुआ था, इसलिये क्रूर योनियोंमें उसका जन्म हुआ। पहले भेड़िया, फिर क्रमशः व्याघ्र, सिंह, कुत्ता, सियार और सूअर हुआ। इस प्रकार दस हजार युगोंमें भी उसका वह पाप नष्ट नहीं हुआ। तदनन्तर वह राक्षस हुआ और अनेक प्रकारके प्राणियोंका भक्षण करते हुए विन्ध्यपर्वतपर आकर रहने लगा। इसी समय एक अद्भुत घटना घटी। एक मनुष्य द्वारका और श्रीकृष्णचन्द्रके सुन्दर मुखारविन्दका दर्शन करके लौट रहा था। वह गोमतीके जलमें स्नान करके पवित्र हो चुका था। धीरे-धीरे जब वह विन्ध्याचलपर आया तो वह क्रूरकर्मी राक्षस उसे खानेके लिये उसके पास गया; परन्तु वह तीर्थयात्री तनिक भी भयभीत न हुआ। उसके दर्शनमात्रसे राक्षसका भयंकर वज्रलेप पाप क्षणभरमें जलकर भस्म हो गया और वह पुण्यके प्रकाशसे शोभा पाने लगा। तदनन्तर उसने उस पथिकके चरणोंमें श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और विस्मित होकर कहा—'अहो! आपके दर्शनमात्रसे मेरा यह भयंकर राक्षसभाव नष्ट हो गया और मुझे उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई। भद्रपुरुष! आप कहाँसे आये हैं और आपका ऐसा प्रभाव क्यों है?'
राक्षसकी यह बात सुनकर यात्रीने प्रसन्नचित्त होकर कहा—'राक्षस! मैं द्वारकापुरीका दर्शन करके आया हूँ। मुझमें वज्रलेप-जैसे पापको हर लेनेवाला प्रभाव भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे प्रकट हुआ है।' उसके ऐसा कहनेपर राक्षसने भक्तिभावसे उसे प्रणाम किया और उसकी परिक्रमा करके वह द्वारकापुरीको चला गया। वहाँ गोमतीके जलमें अपना शरीर त्यागकर उसने वैकुण्ठधाम प्राप्त किया। उस समय देवेश्वर तथा गन्धर्वगण फूलोंकी वर्षा करते हुए उसकी स्तुति कर रहे थे।
वसिष्ठजीके मुखसे यह कथा सुनकर राजा दिलीपका चित्त प्रसन्न हो गया। वे देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णकी द्वारकापुरीका दर्शन करनेके लिये गये और आदरपूर्वक देवमन्दिरमें श्रीकृष्णका दर्शन करके परम सिद्धिको प्राप्त हुए।
द्वारकापुरी तथा श्रीकृष्ण-दर्शनका माहात्म्य
प्रह्लादजी कहते हैं—ब्रह्मा और शिव आदि भी जिनके चरणारविन्दोंकी वन्दना करते हैं, वे भगवान् श्रीकृष्ण जहाँ निवास करते हैं, वह द्वारकापुरी सब कुछ देनेवाली तथा सर्वज्ञ है। द्वारकाके प्रभावसे कीट, पतंग, पशु, पक्षी तथा सर्प आदि योनियोंमें पड़े हुए समस्त पापी भी मुक्त हो जाते हैं*। फिर जो प्रतिदिन द्वारकामें रहते और जितेन्द्रिय होकर भगवान् श्रीकृष्णकी सेवामें उत्साहपूर्वक लगे होते हैं, उन मनुष्योंकी मुक्तिके विषयमें क्या कहना है। द्वारकामें रहनेवाले
* अपि कीटपतङ्गाद्याः पशवोऽथ सरीसृपाः। विमुक्ताः पापिनः सर्वे द्वारकायाः प्रभावतः॥ (स्क० पु०, द्वा० मा० ३७।७)