भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1396

* प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य *

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समस्त प्राणियोंको जो गति प्राप्त होती है, वह ऊर्ध्वरेता मुनियोंको भी दुर्लभ है। द्वारका सब क्षेत्रों और तीर्थोंसे उत्तम कही गयी है। द्वारकामें जो होम, जप, दान और तप किये जाते हैं, वे सब भगवान् श्रीकृष्णके समीप कोटिगुने एवं अक्षय होते हैं। जो द्वारकावासी श्रेष्ठ पुरुषोंकी निन्दा करते हैं, वे श्रीकृष्णकी कृपासे वंचित हो दुःखके घोर समुद्रमें गिरते हैं। अतः द्वारकावासी मनुष्य सदा सबके लिये पूजनीय हैं। द्वारकामें दी हुई अणुमात्र वस्तु भी अक्षय फल देनेवाली होती है। जो मनुष्य द्वारकामें अन्नदान करता है, उसके दानजनित उत्तम फलका वर्णन करनेमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी समर्थ नहीं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अन्त्यज तथा स्त्री जो भी द्वारकामें भक्तिपूर्वक निवास करते हैं, वे विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होते हैं। द्वारकावासीका दर्शन और स्पर्श करके भी मनुष्य बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त हो स्वर्गलोकमें निवास करते हैं। द्वारकाका माहात्म्य सबसे श्रेष्ठ है। वहाँकी पवित्र धूलि भी पापियोंको मोक्ष देनेवाली है।

विप्रवरो! जिस दिन बृहस्पति सिंह राशिपर आते हैं, उस तिथिको द्वारकामें कुशावर्तसे लेकर गोमती-समुद्र संगमतक कहीं भी गोमतीमें किया हुआ स्नान बारह गोदावरी स्नानके समान फल देनेवाला है। जो दूसरेको भी द्वारका भेजता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। 'द्वारका जाओ, द्वारका जाओ' ऐसा कहकर जो वहाँ जानेके लिये प्रेरणा करता है, उसके दर्शनसे ही मनुष्य पापमुक्त हो जाते हैं। जो मनुष्य द्वारकाकी ओर मुँह करके 'द्वारका, द्वारका' का कीर्तन करता है, वह भगवान् कृष्णकी कृपासे निश्चय ही मोक्षका भागी होता है। द्वारका, पुण्यमयी गोमती, रुक्मिणीदेवी तथा भगवान् श्रीकृष्णका जो लोग प्रतिदिन स्मरण करते हैं, वे द्वारकाके पुण्य-फलके भागी होते हैं। जो सहस्रों योजन दूर रहकर भी अपनी बुद्धिमें ऐसे विचार लाता है कि 'मैं द्वारका जाऊँगा और द्वारकानाथजीका दर्शन करूँगा' उसका मुँह देखनेसे महापातकी मनुष्य भी मुक्त हो जाते हैं। समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाले श्रीकृष्णभक्त धन्य हैं, समस्त लोकोंके लिये वन्दनीय हैं। भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे जो पुण्य होता है, उसका वर्णन सर्वज्ञ विद्वान् तथा शेषनाग भी नहीं कर सकते। श्रीकृष्ण-दर्शनके पुण्यफलका कभी अन्त नहीं होता। इस लोकमें जो बड़े-बड़े पापी हैं, वे भी द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करके सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। जिन भगवान् श्रीकृष्णके सामीप्यसे गोमतीका जड जल भी ब्रह्मविद्यासे स्पर्धा रखता है, स्नानमात्रसे ही बड़े-बड़े पापोंको भस्म कर डालता है, जिनके क्षेत्रकी चक्रचिह्नित शिलाएँ भी सबको मोक्ष देनेवाली हैं, मगध आदि देशोंमें भी पूजित होनेपर जहाँकी चक्रचिह्नित शिलाएँ मुक्ति देती हैं, जिनके क्षेत्रकी पवित्र धूलि सब पापियोंको मोक्ष देनेमें समर्थ है तथा जिनके क्षेत्रमें जानेके लिये विचार करना भी पातकोंका नाश कर देता है; उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी पुरी द्वारकाके दर्शनसे पाप नष्ट होता है; ऐसा कहनेसे उनकी क्या स्तुति होती है। द्वारका जाते हुए जो मनुष्य श्रीकृष्ण-दर्शनकी महिमाका वर्णन करता है, उसके पुण्यकी संख्या बताना शेषनाग-जैसे विद्वानोंके लिये भी असम्भव है। जहाँ श्रीकृष्ण-दर्शनकी महिमा बतानेसे भी पाप नष्ट हो जाता है, वहाँ साक्षात् श्रीकृष्णके दर्शनसे कितना पुण्य होता है—इसकी गणना कौन करेगा। संसारमें वे मनुष्य धन्य हैं, जो हर्षोल्लासमें भरकर भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करते हैं। जब दर्शनकी ऐसी महिमा है, तब उनके स्पर्शसे तथा दुग्ध आदिके द्वारा उनके स्नान-पूजन आदि करनेसे जो पुण्य होता है, उसे कौन बता सकता है। रातके चौथे पहरमें दुग्धका स्नान उत्तम है। पूजा, आरती, नैवेद्य, ताम्बूल, नमस्कार, गीत, वाद्य और नृत्य—ये श्रीकृष्णको प्रिय हैं। जो एकादशीको भगवान् श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये गीत और नृत्य करते हैं, वे भगवान् श्रीकृष्णके प्रिय भक्त हैं। जो