भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1397
१३६८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भलीभाँति पूजित होनेपर श्रीकृष्णकी झाँकी करते हैं, वे महान् पुण्यको प्राप्त होते हैं। श्रीकृष्णकी महापूजा करनेवालेको अनन्त पुण्य होता है। संसारमें वे मनुष्य धन्य हैं, जो सदा श्रीकृष्णदेवका दर्शन, स्पर्श, पूजन, स्तुति और नमस्कार करते हैं। जो मनुष्य द्वारकामें काष्ट या प्रस्तरकी प्रतिमा स्थापित करता है, उसने मानो तीनों लोकोंकी स्थापना कर ली। वह भगवान् विष्णुके समान होता है और तीनों लोकोंका साम्राज्य प्राप्त करता है।

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द्वारकामें श्रीकृष्णदर्शनकी महिमा, एकादशीव्रतके भेद, चक्रचिह्नित शिलाओंकी विशेष संज्ञा तथा भयनिवारणके उपाय

प्रह्लादजी कहते हैं—जो मन-ही-मन द्वारका जानेकी भावना करते हैं, उनके दस हजार जन्मोंके संचित पूर्वपाप नष्ट हो जाते हैं। जिस देहधारीके मनमें श्रीकृष्णके दर्शनका विचार उत्पन्न होता है, उसका मुख देखकर पापके सैकड़ों टुकड़े हो जाते हैं। जो परम सुन्दर श्रीकृष्णपुरीकी यात्रा करके गोमती-समुद्र-संगमपर पिण्डदान करते हैं, वे अपने पितरोंका उद्धार कर देते हैं। वैशाख शुक्ला द्वादशीको जो भगवान् श्रीकृष्णके समीप जागरण करता है, वह उनके मुखारविन्दका दर्शन करके पितरोंसहित मुक्त हो जाता है। जो श्रीकृष्णकी लीलाभूमिमें जानेकी मनसे इच्छा करते हैं, उनके अस्थिगत पापको भी प्रेतराज यम धो डालते हैं। जीव जबतक कलियुगमें द्वारकापुरीका दर्शन नहीं करता, तभीतक उसके शरीरमें अत्यन्त भयंकर पाप डेरा डाले रहते हैं। जो श्रवण और द्वादशीके योगमें गोमती-समुद्र-संगममें स्नान करके श्रीकृष्णके मुखचन्द्रका दर्शन करता है, वह मानव मोक्षको प्राप्त होता है। जिस किसी भी मासकी द्वादशी तिथिको श्रीकृष्णकी लीला-नगरी द्वारकाका दर्शन करके मनुष्य संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है। कलियुगमें बिना पिण्डदान किये भी गोमतीके जलमात्रसे पितरोंकी तृप्ति हो जाती है। चक्रतीर्थका ऐसा ही प्रभाव है। जिसने द्वारकामें जाकर श्रीकृष्णके मुखारविन्दका दर्शन कर लिया है, वह न तो प्रेत होता है और न उसे नरकका कष्ट भोगना पड़ता है। जो घरमें रहकर भी प्रतिदिन कलिकालमें श्रीकृष्णपुरीका स्मरण करते हैं, उनके पाप नष्ट हो जाते हैं। महाभाग! कलिकालके समान दूसरा कोई युग नहीं है; क्योंकि उसमें भगवान् विष्णुके स्मरण और कीर्तनसे मनुष्य परमपद प्राप्त कर लेता है। जो कलियुगमें नित्यप्रति 'कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण' का उच्चारण करेगा, उसे प्रतिदिन दस हजार यज्ञों और करोड़ों तीर्थोंका पुण्य प्राप्त होगा। जो मनुष्य नित्य 'कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण' का जप करता है, कलियुगमें श्रीकृष्णके ऊपर उसका प्रेम निरन्तर बढ़ता है।*

रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, मित्रविन्दा, कालिन्दी, भद्रा, नाग्नजिती तथा लक्ष्मणा—श्रीकृष्णकी इन आठों प्रियतमा पत्नियोंका भी वहाँ भलीभाँति पूजन करना चाहिये। जो नियम और व्रतोंसे तथा गीत, वाद्य, दीपदान तथा जागरण आदिके द्वारा उन सबकी विधिपूर्वक पूजा करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको पाता है और उसके ऊपर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते


* नास्ति नास्ति महाभाग कलिकालसमं युगम्। स्मरणात् कीर्तनाद् विष्णोः प्राप्यते परमं पदम्॥
कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति कलौ वक्ष्यति प्रत्यहम्। नित्यं यज्ञायुतं पुण्यं तीर्थकोटिसमुद्भवम्॥
कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति नित्यं जपति यो जनः। तस्य प्रीतिः कलौ नित्यं कृष्णस्योपरि वर्द्धते॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० ३८। ४४-४६)