भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1398, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1398
  • प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३६९

हैं। जो कलिमें प्रतिदिन जागते और सोते समय 'कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण' का कीर्तन करता है, वह श्रीकृष्णस्वरूप हो जाता है।* चन्द्रमामें उष्णता नहीं होती, अग्निमें शीतलता नहीं होती तथा एकादशीको उपवास करनेवाले वैष्णव भक्तोंमें पाप नहीं होता है। जब पूरे दिन-रात एकादशी हो और दूसरे दिन द्वादशीमें भी एकादशी पड़ गयी हो तो उसको उन्मीलिनी कहते हैं। वह तिथियोंमें उत्तम तिथि मानी गयी है। जो बंजुलीके दिन-रात्रिमें जागरण करते हैं, उन्हें आधे मुहूर्तमें दस हजार यज्ञोंका पुण्य होता है। यदि सम्पूर्ण दिन-रात द्वादशी होकर दूसरे दिन त्रयोदशीमें भी द्वादशी बढ़ गयी हो तो उसे बंजुली कहते हैं। वह कलियुगमें अत्यन्त दुर्लभ है। जो उन्मीलिनीमें जागरण करते हैं, उन्हें आधे पलमें कोटि गोदानका पुण्य प्राप्त होता है। पूरे दिन-रात एकादशी होकर यदि प्रतिदिन अमावस्या या पूर्णिमातक तिथि बढ़ती रहे तो उसे पक्षवर्द्धिनी एकादशी कहते हैं। उस एकादशीको जो जागरण करते हैं, उन्हें चौथाई पलमें ही कोटि गोदानका फल मिलता है। घरमें भी एकादशी करनेवालोंके लिये यह फल बतलाया गया है; फिर जो भगवान् विष्णुके समीप व्रत और जागरण करते हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है? कलियुग आनेपर द्वारकामें जो इस व्रतका अनुष्ठान करते हैं, उन्हें कोटिगुना फल होता है, द्वारकामें एक चक्रसे चिह्नित शिलाकी सुदर्शन संज्ञा है। सुदर्शनशिलाका पूजन करनेपर वह मोक्षरूप फल देनेवाली होती है। जिस शिलापर दो चक्रके चिह्न हों, वह लक्ष्मीनारायणका स्वरूप है। वे लक्ष्मीनारायण भोग और मोक्ष दोनों फलोंको देनेवाले हैं। तीन चक्रसे चिह्नित शिलाका नाम अच्युत है। अच्युतजी इन्द्रपद देनेवाले हैं। चार चक्रोंसे चिह्नित शिलाको जनार्दन कहते हैं, जनार्दनजी शत्रुनाशक तथा लक्ष्मीप्रद हैं। पाँच चिह्नोंसे चिह्नित शिलाकी वासुदेव संज्ञा है। वासुदेवजी जन्म-मृत्यु और जराका नाश करनेवाले हैं। छः चिह्नोंसे युक्त शिलाखण्डको प्रद्युम्न कहते हैं। वे उपासकको धन और कान्ति देते हैं। सात चिह्नोंसे युक्त होनेपर उसकी बलदेव संज्ञा होती है। बलदेवजी गोत्र और कीर्ति बढ़ानेवाले हैं। आठ चिह्नोंसे युक्त शिलाखण्ड पुरुषोत्तम है। भगवान् पुरुषोत्तम भक्तिभावसे पूजित होनेपर मनोवांछित फल देते हैं। नौ चिह्नसे युक्त होनेपर उसे नवव्यूह कहते हैं। यह देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। नवव्यूह भी सब कुछ दे सकते हैं। दस चिह्नोंसे युक्त शिलाखण्डोंको दशावतार संज्ञा है। उससे राज्यकी प्राप्ति होती है। एकादश चिह्नोंसे युक्त शिलाखण्ड अनिरुद्ध है, जो ऐश्वर्य प्रदान करता है। बारह चक्रोंसे युक्त शिलाको द्वादशात्मा कहते हैं। वह निर्वाण प्रदान करती है। इससे अधिक चिह्न होनेपर अनन्त संज्ञा होती है। भगवान् अनन्त भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। श्रीकृष्णके चक्रसे चिह्नित जो कोई भी प्रस्तर वहाँ उपलब्ध होते हैं, उनके स्पर्शमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए जितने भी ब्रह्महत्या आदि पाप हैं, वे सब चक्रचिह्नित शिलाके पूजनसे नष्ट हो जाते हैं। जो एक वर्षतक चक्रांकित शिलाकी पूजा, दर्शन और स्पर्श करते हैं, वे पापी रहे हों तो भी अविनाशी विष्णुमें प्रवेश करते हैं। मृत्युकाल प्राप्त होनेपर जो अपने वक्षपर चक्रचिह्नित शिला धारण करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। गोमतीचक्रसे चिह्नित शिला यदि छातीपर रखी हुई हो तो यमराजके दूत भयके मारे समीप नहीं आते और वह मनुष्य वैकुण्ठलोकमें जाता है। भगवान् श्रीकृष्णकी बाललीलाओं,


* कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति नित्यं जाग्रत् स्वपंश्च यः। कीर्तयेत्तु कलौ चैव कृष्णरूपी भवेद्धि सः॥ (स्क० पु०, द्वा० मा० ३९ । १)