भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1399
१३७०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

गोकुलमें की हुई क्रीडाओं, गोपीजनोंके साथ की हुई क्रीडाओं तथा श्रीकृष्णावतारकी अन्य लीलाओंको भी बार-बार सुनना चाहिये। उत्कण्ठित होकर नृत्य और गान करना चाहिये तथा कमलनयन श्रीकृष्णके मुखारविन्दका बार-बार दर्शन करना चाहिये। बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे जो फल मिलता है, उसको मनुष्य श्रीकृष्णके समीप आधे दिनमें प्राप्त कर लेता है। भगवान् श्रीकृष्णमें मन लगाकर मनुष्य जिस फलको पाता है, उसका हजारवाँ अंश भी दूसरे किसी कर्मसे नहीं पा सकता है। जो राग-द्वेषकी आगमें जल रहे हैं और अज्ञानमय विषयोंमें आसक्त हैं, ऐसे मनुष्योंको स्वस्थ करनेके लिये वैष्णवधर्म चिकित्सारूप है। कोरे तर्क और युक्तिपर टिके हुए मतवादोंकी कुदृष्टिसे अज्ञानान्धकारमें पड़कर जो लोग अन्धे हो रहे हैं, उनके लिये यह वैष्णव-शास्त्र दीपकका काम देता है। विद्वानोंको इसका सदैव मनन करना चाहिये। जहाँ श्रीहरिके समक्ष रात्रिमें जागरण किया जाता है, उसे ब्रह्मावर्तके समान ऋषिदेश और मध्यदेश जानना चाहिये। जो मानव कलियुगमें द्वारकाका माहात्म्य सुनता है या दूसरोंमें सुननेका भाव उत्पन्न करता है, उसे सौ यज्ञोंका फल मिलता है। जिसके घरमें द्वारकाकी मृत्तिका मौजूद है तथा जिसके ललाटमें गोपीचन्दनका तिलक लगा है; उसके घरको लक्ष्मीदेवी कभी नहीं छोड़ती हैं। वहाँ ग्रहों, रोगों तथा राक्षसोंकी बाधा भी नहीं होती है। पिशाच, कूष्माण्ड और प्रेत भी वहाँ उपद्रव नहीं करते हैं। उस घरमें अग्नि, चोर, शत्रु तथा सींगवाले पशुओंसे भी भय नहीं प्राप्त होता है। दैव, भूत, रोग, व्याधि तथा दरिद्रताका कष्ट भी वहाँ नहीं आता है। बिजली और उल्कापातका भी भय वहाँ नहीं रहता है।

जहाँ बंजुली द्वादशीके दिन रात्रिमें जागरण, भागवतके एक या चौथाई श्लोकका पाठ, वैष्णवशास्त्रका पठन, भगवद्भक्तका दर्शन, विष्णुकी रथयात्राका उत्सव, अश्वत्थवृक्षका दर्शन, विष्णु-भक्तका सत्कार और शालग्रामशिलाका पूजन किया जाता है, जहाँ भगवान्के चरणोदकका पान, नैवेद्यका भक्षण, तुलसी-पूजन, एकादशी-व्रतका अनुष्ठान, हेमन्त-ऋतुमें जलवास, ग्रीष्म-ऋतुमें त्रिस्पृशाको उपवास, धातूव्रत और अश्वत्थव्रतका पालन किया जाता है; जहाँ उन्मीलिनी, पक्षवर्द्धिनी, श्रावण (भाद्रपद)-मासकी रोहिणीयुक्त जयन्तीसंज्ञक अष्टमी, द्वादशी तथा प्रबोधिनी आदि एकादशियोंके व्रतका अनुष्ठान और रम्भाव्रत आदिका आचरण—ये सब पुण्यकर्म किये जाते हैं, वहाँ भी पूर्वोक्त भय नहीं आते हैं। जो प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक श्रीहरिके समीप भागवतशास्त्रका श्रवण या पाठ करता है, दशमीको केवल रातमें ही भोजन करता है, द्वादशीको शक्ति रहते पराये अन्नका भोजन नहीं करता, रातमें जागता है, शक्तिके अनुसार दान देता है तथा यथाशक्ति भगवान्की विशेष पूजा करता-कराता है तथा जो द्वादशीको गंगाकी मिट्टी या गोपीचन्दनका तिलक लगाता है, वह भी पूर्वोक्त सभी भयोंसे छुटकारा पा जाता है। भगवान् विष्णुका कथन है कि ‘जो मेरा तथा रुद्र, आदित्य और यमका भक्त है, उसे मैं श्रेष्ठ भागवत मानता हूँ। जिन्हें मेरे भक्त प्रिय हैं, उनपर मैं सदैव संतुष्ट रहता हूँ। कलियुग आनेपर मैं सदा द्वारकापुरीमें वास करता हूँ। जो मुझे प्रसन्न करना चाहता है, वह कलिकालमें परम सुन्दर द्वारकापुरीमें जाकर मेरा दर्शन करे।’