संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1400, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३७१
द्वारका-माहात्म्यके पाठकी महिमा, वैष्णव-सेवाका महत्त्व, नीलका निषेध, वृक्ष काटनेसे हानि, उसे लगानेका फल, आक, बिल्वपत्र, आँवला एवं तुलसी-रोपणका महत्त्व तथा द्वारका-माहात्म्यका उपसंहार
प्रह्लादजी कहते हैं—मनुष्य जब द्वारका जानेमें समर्थ न हो तब घरपर ही द्वारका-माहात्म्यका पाठ करे। वैष्णवभक्तोंको इस माहात्म्यको सुनावे और भक्त पुरुष इसे भक्तिभावसे सुने। विशेषतः द्वादशी तिथिको इस माहात्म्यका पाठ अवश्य करना चाहिये। ऐसा करनेसे वह घरमें रहकर भी द्वारका-सेवनका पुण्य पा लेता है। इहलोक और परलोकमें उसे मनोवांछित फलकी प्राप्ति होती है। भगवान् जनार्दन सदैव उसके योगक्षेमका निर्वाह करते हैं। वह पापरहित होता है। उसके कुलमें कोई भी नरकगामी अथवा प्रेत नहीं होता। जो भगवान् श्रीकृष्णके समीप द्वारका-माहात्म्यका पाठ करता है, श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी तथा द्वादशीका व्रत करता तथा रातमें जागता है, उसके दर्शन, कीर्तन, स्मरण तथा स्पर्शसे करोड़ों तीर्थोंका फल प्राप्त होता है। उसके स्मरणसे दस हजार जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है। जिसके घरमें यह भागवतशास्त्र सदा विद्यमान रहता है, उसकी इस संसारमें पुनरावृत्ति नहीं होती है। वैष्णवके प्रसन्न होनेपर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं; अतः विष्णुकी प्रसन्नताके लिये वैष्णवको अवश्य प्रसन्न करे। जो पुण्यक्षेत्रमें नील बोता और मूली खाता है, नीली कर्म करता तथा रस बेंचता है, उसे पुण्यकी प्राप्ति नहीं होती है। वह पापका भागी होता है। सैकड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी वह पुण्यका भागी नहीं होता है। जो मनुष्य किसी वैदिक कर्मके प्राप्त हुए बिना ही पीपलकी लकड़ी काटता है, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है। मदारके वृक्षमें एक बार कुल्हाड़ी मारनेपर मनुष्य कई मन्वन्तरोंतक रौरव नरककी पीड़ा भोगता है। जो नीमका वृक्ष काटता है, वह कोढ़ी होता है। उसके किये हुए पूजन, व्रत एवं दानको भगवान् सूर्य नहीं ग्रहण करते हैं। जो अमावास्याको वनस्पतियोंका छेदन करता है, उसे द्वादशीका पुण्य नहीं मिलता और एक-एक पत्र, पुष्प तथा फलके बदलेमें ब्रह्महत्याका पाप लगता है। वह मनुष्य सात कल्पोंतक यमलोकमें निवास करता है। उसके किसी भी कार्यमें उन्नति नहीं होती है। जो मनुष्य आकका पेड़ लगाता और उसकी रक्षा करता है, वह सात कल्पोंतक भगवान् सूर्यनारायणके समीप वास करता है। एक लाख देववृक्ष लगानेसे जो फल होता है, वही एक पीपलका पेड़ लगानेसे प्राप्त हो जाता है। आँवला और तुलसी लगानेका भी ऐसा ही फल मिलता है। जो देवताओं, पितरों, मनुष्यों (सनकादिकों) तथा अतिथियोंका तर्पण एवं पूजन करते हुए वर्द्धिनी द्वादशीका व्रत करता है, वह परम पदको प्राप्त होता है। कलिकालमें प्रातःकाल उठकर द्वारकाका कीर्तन करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो निश्चय ही स्वर्गलोकमें जाता है।
जो भगवान्के भक्तोंसे वैर रखते और एकादशी व्रत नहीं करते हैं, उन्हें यमदूत ले जाते हैं। जो वैष्णवोंको गोपीचन्दनकी मृत्तिका देते हैं, उन्हें त्रिपुण्ड्रधारी महात्मा पुरुषोंके समान पुण्यफलकी प्राप्ति होती है। जो प्रातःकाल उठकर 'द्वारके! द्वारके!' ऐसा पुकारता है, वह द्वारकानामका नित्य कीर्तन करनेसे द्वारका-वासका फल पाता है। जो श्रीनामसे अंकित