भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१३७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

बिल्वपत्रोंद्वारा श्रीपति भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह सातों द्वीपोंका स्वामी होता है। जो सदा कलिमें बिल्वपत्रोंसे देवताओंकी पूजा करते हैं, वे दस हजार अश्वमेध यज्ञोंका फल पाते हैं। पीपलके दलसे गिरे हुए जलसे देवता तथा ऋषि-मुनि पवित्र होते हैं। जो बिल्वपत्रसे ब्रह्मा, शिव तथा सूर्य आदिका पूजन करते हैं, वे अक्षय लोकोंमें जाते हैं। बिल्व-पत्रोंसे लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री तथा दुर्गाजीका पूजन करके मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं। बिल्वपत्रका महत्त्व तुलसीदलसे भी अधिक है, अतः यत्नपूर्वक उससे श्रीहरिका पूजन करना चाहिये। जो द्वादशी तथा रविवारको बिल्ववृक्षकी पूजा करते हैं, वे सैकड़ों ब्रह्महत्याओंके पापसे भी लिप्त नहीं होते हैं। कलियुगमें श्रीकृष्णका कीर्तन करनेसे मानव बीती हुई सात पीढ़ियों और आनेवाली चौदह पीढ़ियोंके सब मनुष्योंका उद्धार कर देता है।^१

श्रीमद्भागवतपुराणका एक-एक उत्तम श्लोक भी भगवान् श्रीकृष्णके लिये प्रीतिजनक है तथा पाठ करनेवालेको वह कोटि यज्ञोंका फल देनेवाला है। जो द्विज पूरे कार्तिकमासमें भगवान् श्रीकृष्णके सम्मुख बैठकर गीता-पाठ करते हैं, उनके सौ कोटि कल्पोंके पाप भी नष्ट हो जाते हैं।^२ कलियुगमें जो मनुष्य भक्तिभावसे गोमती-समुद्र-संगम तथा रुक्मिणीसहित श्रीकृष्णका दर्शन करते हैं, वे धन्य हैं। द्वारका जाते हुए मनुष्यकी यदि मार्गमें ही मृत्यु हो जाय तो पितरोंसहित उसकी परम धामसे पुनरावृत्ति नहीं होती है।^३ जो मनुष्य प्रतिदिन उत्तम भक्तिसे कृष्ण-कृष्णका कीर्तन करता है, वह अनायास ही सौ अश्वमेध यज्ञोंका फल पा लेता है।^४


द्वारका-माहात्म्य-खण्ड सम्पूर्ण


सं० स्कन्दपुराण सम्पूर्ण


१- अतीतान्सप्त पुरुषान् भविष्यांश्च चतुर्दश। नरस्तारयते सर्वान् कलौ कृष्णेति कीर्तनात् ॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० ४२। ११)

२- तथा भागवतस्योक्तं पुराणं श्लोकमुत्तमम् । कृष्णस्य प्रीतिजननं यज्ञकोटिफलप्रदम् ॥
तेषां विलीयते पापं कल्पकोटिशतैः कृतम् । गीतां पठन्ति कृष्णाग्रे कार्तिकं सकलं द्विजाः ॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० ४२। ३६-३७)

३- द्वारकां गच्छमानस्य विपत्तिर्भवते यदि । न तस्य पुनरावृत्तिः पितृभिः सह तत्पदात् ॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० ४५। २५)

४- कृष्ण कृष्णेति यो ब्रूयात् सद्भक्त्या प्रत्यहं नरः। हेलया सोऽश्वमेधानां शतानां लभते फलम् ॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० ४६। २७)