संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1394, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * | १३६५ ---|---
दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया और प्रसन्न होकर गीत, वाद्य तथा नृत्य किया। जय-जयकार और नमस्कार शब्दके साथ हरिनामकी गर्जना की। बारंबार श्रीकृष्णका दर्शन करके सबने भक्तिभावसे अनेक बार उठ-उठकर साष्टांग प्रणाम किया और—'हे कृष्ण! हे कृष्ण! जय कृष्ण!' ऐसा कहा। श्रीकृष्णके दर्शनसे उन सब सिद्धोंको उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई। गोमतीके जलमें और समुद्रके अन्तर्गत चक्रतीर्थके जलमें उन सबने स्नान करके श्रीकृष्णके दर्शनकी लालसा प्रकट की थी। तदनन्तर श्रीकृष्णके मुखारविन्दका दर्शन पाकर वे सभी परमानन्दमें डूब गये। नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहाने लगे। उन्हें अपने-आपकी भी सुधि नहीं रही। तत्पश्चात् कमलके आसनपर बैठे हुए बलराम और श्रीकृष्णका दर्शन करके उन सबने उन्हें पंचामृतसे तथा त्रिलोकीके सभी तीर्थोंके जलसे स्नान कराया। सनकादि योगियोंने भी उनका पूजन किया। नारदादि महर्षियोंने परम श्रद्धा-भक्तिसे पृथक्-पृथक् दिव्य वस्त्र, दिव्य गन्ध और दिव्य अनुलेपनोंसे पूजन किया। तुलसीदलसे श्रीकृष्णकी पूजा की। पृथक्-पृथक् दिव्य धूप देकर कपूरकी आरती उतारी। भाँति-भाँतिके कर्पूरवासित पवित्र पदार्थोंद्वारा नैवेद्य लगाया। कर्पूरमिश्रित ताम्बूल निवेदन किया। प्रिय वस्तुएँ भेंट कीं। मंगलमय स्तोत्रोंद्वारा स्तुति की तथा चवँर और व्यजन आदि डुलाकर महाविष्णुकी आराधना पूरी की। तत्पश्चात् ब्रह्मपुत्रोंने भगवान् श्रीकृष्णके आगे गीत गाये, बाजे बजाये और नृत्य किया। इतनेमें ही वहाँ भगवान् विष्णुके पार्षद प्रकट हो गये। देवताओं तथा ऋषियोंने उन पार्षदोंको प्रणाम किया। इसके बाद बड़े भैया बलरामसहित श्रीकृष्णको मस्तक झुकाया। तदनन्तर पुष्पांजलि देते हुए कहा—'देवि द्वारके! तुम सब तीर्थोंकी महारानी और अधीश्वरी हो।' ऐसा कहकर उन सबने द्वारकापुरीको प्रणाम किया।
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दिलीप-वसिष्ठ-संवाद, द्वारकासे लौटे हुए यात्रीके दर्शनसे राक्षसके वज्रलेप पापका नाश
प्रह्लादजी कहते हैं—मुनीश्वरो! द्वारकापुरीका ऐसा ही अद्भुत माहात्म्य है। वह बड़े-बड़े पापोंको जलानेवाला है और महान् पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है। द्वारकाकी यात्रा अत्यन्त भयंकर पापराशिके दाहका स्थान है। जब बृहस्पति सिंह राशिपर स्थित हों, उस समय जो द्वारकाकी यात्रा करते हैं, उनके चरणोंकी धूलिका स्पर्श करके पापी मनुष्य भी स्वर्गलोकमें चले जाते हैं। गोमतीके जलसे पवित्र होकर श्रीकृष्णके मुखारविन्दका दर्शन करनेवाले उन पुण्यात्माओंके दर्शनसे सौ जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है—इस विषयमें राजा दिलीप और महर्षि वसिष्ठका संवाद बड़ा ही आश्चर्यजनक है।
दिलीपने पूछा—विप्रवर! काशीमें किया हुआ पाप वज्रलेप होता है। वह भयंकर वज्रलेप जहाँ नष्ट हो जाय, और सब प्रकारके महापुण्य जहाँ प्राप्त हों, वह ऐसा कौन-सा क्षेत्र है। यह बतानेकी कृपा करें। जहाँ जानेपर पापरूपी बीज अंकुरित नहीं होते, उस पुण्यक्षेत्रका वर्णन कीजिये।
वसिष्ठजीने कहा—काशीमें मोक्षधर्मको जाननेवाला कोई त्रिदण्डी संन्यासी रहता था। वह एक दिन एकाग्रचित्त हो दशाश्वमेध घाटपर गायत्रीका जप कर रहा था। उसी समय वहाँ कोई गजगामिनी युवती आयी और गंगाके तटपर अपने वस्त्र रखकर जलमें क्रीड़ा करने लगी। संन्यासी उस तरुणीको देखकर कामदेवके वशीभूत हो गया। उस कुलटाने भी मन-ही-मन उस तरुण संन्यासीसे मिलनेका संकल्प किया। वे