भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1393, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1393
१३६४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

ऋषियों और देवताओंकी द्वारका-यात्रा तथा भगवद्दर्शन एवं पूजन

प्रह्लादजी कहते हैं—द्वारकापुरी अपनी प्रभासे बाहरके गाढ़ अन्धकारका नाश कर देती है और भक्तोंको भयनाशक परमानन्दमय पद प्रदान करती है। पुण्यको बढ़ानेवाली द्वारकापुरी अपनी गगनचुम्बी ध्वजा-पताकाओं तथा दिव्य पुण्य प्रकाशसे गिरिराजके समान शोभा पाती है। पूर्वोक्त तीर्थयात्री महर्षियोंने द्वारकापुरीमें दूरसे ही चक्रविभूषित श्रीकृष्णमन्दिरका दर्शन करके छाता और खड़ाऊँ त्यागकर साष्टांग प्रणाम किया। वे दण्डकी भाँति पृथ्वीपर लोट गये। उनकी भक्ति बहुत बढ़ गयी और वे बार-बार धरतीपर लोटने लगे। कोई जय-जयकार और नमस्कारके साथ हरिनामकी गर्जना करने लगे। दूसरे लोग परमानन्दमें निमग्न हो स्तुति सुनाने लगे। सभी महर्षि तथा वहाँ प्रकट हुए सभी तीर्थ आनन्दके आँसू बहाते हुए प्रेमगद्गद वाणीमें भगवान्‌की स्तुति करने लगे।* उन सबको देखकर नारदजीने कहा—'तुमने सहस्रों जन्मोंमें सहस्रों पुण्यपुंजोंकी राशि संचित कर रखी थी, जिससे आज तुम्हें भगवान् श्रीकृष्णके मन्दिरका दर्शन हुआ है। भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन, द्वारका जानेकी बुद्धि और महादेवजीमें दृढ़ भक्ति—ये सब थोड़ी तपस्याके फल नहीं हैं। वे पूर्वज धन्य हैं, जिनके वंशज श्रीकृष्ण-दर्शनके लिये, उत्सवपूर्वक द्वारकाकी यात्रा करते हैं और वहाँ पहुँचकर अपने इष्टदेव श्रीहरिका दर्शन पाते हैं। सब मुनिलोग देखें, यह द्वारकापुरी तीनों लोकोंमें सुशोभित होती है। श्रीकृष्णप्रिया द्वारका इस पृथ्वीकी कीर्ति है, जहाँ गोमती, रुक्मिणीदेवी तथा स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण विराज रहे हैं। जिसके सम्बन्धसे यह पृथ्वी स्वर्गसे भी अधिक शोभा पाती है, वह पवित्र द्वारकापुरी अपने दिव्य तेजसे सुशोभित है।'

नारदजीका यह वचन सुनकर और द्वारकाके माहात्म्यको अपनी आँखों देखकर ऋषि और देवता आगे चले। वे सब ओर गीत, वाद्य, नृत्य और पताका आदिके द्वारा उत्सव मनाते हुए नाना प्रकारके स्तोत्र पढ़कर द्वारकाप्रिय श्रीकृष्णकी स्तुति कर रहे थे। हरिनामके उच्च घोषके साथ उनकी गर्जना सुनकर प्रसन्न हुए नारदजीने उन सबका एक व्यूह बनाया। इस प्रकार आगे बढ़ते हुए वे सब लोग गोमतीके तटपर आये। सबने गोमतीको प्रणाम किया और गोमतीकी महिमा देखकर नारदजीने कहा—'ये ही वे गोमतीदेवी हैं, जिनकी तीनों लोकोंमें ख्याति है। इनके जलमें किया हुआ एक बारका स्नान ब्रह्मविद्यासे स्पर्धा रखता है। गोमती ब्रह्मज्ञानके समान है। यह सब तीर्थोंमें उत्तम है। मनुष्य ब्रह्मज्ञानसे मुक्त होते हैं और वह ब्रह्मज्ञान गोमतीमें स्नान करनेसे सुलभ होता है। अथवा श्रीकृष्णके समीप गोमतीमें स्नान करनेमात्रसे सबकी मुक्ति हो जाती है।'

ऐसा कहकर नारदजीने हरिप्रिया द्वारकाको प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'द्वारके! ये सब ऋषि और महर्षि तुम्हें बार-बार प्रणाम करते हैं। इन सबको देखो। ये सब गान, वाद्य और नृत्यके द्वारा प्रसन्न होकर श्रीहरिनामका कीर्तन कर रहे हैं। देवि! तुम सबसे श्रेष्ठ हो; क्योंकि साक्षात् भगवान् विष्णु तुम्हारा कभी त्याग नहीं करते हैं। हमें देवेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन कराओ।'

उनके ऐसा कहनेपर द्वारकादेवी प्रत्यक्ष प्रकट हुईं और हर्षसे विह्वल होकर बोलीं—'देवताओ! देखो, देखो; ये भगवान् द्वारकानाथ विराज रहे हैं।' उस समय देवताओंने पश्चिमाभिमुख श्रीकृष्णका


* जयशब्दैर्नमःशब्दैर्गर्जन्तो हरिनामभिः। ततोऽन्ये च स्तुवन्ति स्म परमानन्दसम्प्लुताः॥
आनन्दांश्च प्रमुञ्चन्तः प्रेम्णा गद्गदया गिरा। स्तुवन्ति ऋषयः सर्वे तीर्थादीनि च सर्वशः॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० ३३। ११-१२)

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