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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
१३६४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

ऋषियों और देवताओंकी द्वारका-यात्रा तथा भगवद्दर्शन एवं पूजन

प्रह्लादजी कहते हैं—द्वारकापुरी अपनी प्रभासे बाहरके गाढ़ अन्धकारका नाश कर देती है और भक्तोंको भयनाशक परमानन्दमय पद प्रदान करती है। पुण्यको बढ़ानेवाली द्वारकापुरी अपनी गगनचुम्बी ध्वजा-पताकाओं तथा दिव्य पुण्य प्रकाशसे गिरिराजके समान शोभा पाती है। पूर्वोक्त तीर्थयात्री महर्षियोंने द्वारकापुरीमें दूरसे ही चक्रविभूषित श्रीकृष्णमन्दिरका दर्शन करके छाता और खड़ाऊँ त्यागकर साष्टांग प्रणाम किया। वे दण्डकी भाँति पृथ्वीपर लोट गये। उनकी भक्ति बहुत बढ़ गयी और वे बार-बार धरतीपर लोटने लगे। कोई जय-जयकार और नमस्कारके साथ हरिनामकी गर्जना करने लगे। दूसरे लोग परमानन्दमें निमग्न हो स्तुति सुनाने लगे। सभी महर्षि तथा वहाँ प्रकट हुए सभी तीर्थ आनन्दके आँसू बहाते हुए प्रेमगद्गद वाणीमें भगवान्‌की स्तुति करने लगे।* उन सबको देखकर नारदजीने कहा—'तुमने सहस्रों जन्मोंमें सहस्रों पुण्यपुंजोंकी राशि संचित कर रखी थी, जिससे आज तुम्हें भगवान् श्रीकृष्णके मन्दिरका दर्शन हुआ है। भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन, द्वारका जानेकी बुद्धि और महादेवजीमें दृढ़ भक्ति—ये सब थोड़ी तपस्याके फल नहीं हैं। वे पूर्वज धन्य हैं, जिनके वंशज श्रीकृष्ण-दर्शनके लिये, उत्सवपूर्वक द्वारकाकी यात्रा करते हैं और वहाँ पहुँचकर अपने इष्टदेव श्रीहरिका दर्शन पाते हैं। सब मुनिलोग देखें, यह द्वारकापुरी तीनों लोकोंमें सुशोभित होती है। श्रीकृष्णप्रिया द्वारका इस पृथ्वीकी कीर्ति है, जहाँ गोमती, रुक्मिणीदेवी तथा स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण विराज रहे हैं। जिसके सम्बन्धसे यह पृथ्वी स्वर्गसे भी अधिक शोभा पाती है, वह पवित्र द्वारकापुरी अपने दिव्य तेजसे सुशोभित है।'

नारदजीका यह वचन सुनकर और द्वारकाके माहात्म्यको अपनी आँखों देखकर ऋषि और देवता आगे चले। वे सब ओर गीत, वाद्य, नृत्य और पताका आदिके द्वारा उत्सव मनाते हुए नाना प्रकारके स्तोत्र पढ़कर द्वारकाप्रिय श्रीकृष्णकी स्तुति कर रहे थे। हरिनामके उच्च घोषके साथ उनकी गर्जना सुनकर प्रसन्न हुए नारदजीने उन सबका एक व्यूह बनाया। इस प्रकार आगे बढ़ते हुए वे सब लोग गोमतीके तटपर आये। सबने गोमतीको प्रणाम किया और गोमतीकी महिमा देखकर नारदजीने कहा—'ये ही वे गोमतीदेवी हैं, जिनकी तीनों लोकोंमें ख्याति है। इनके जलमें किया हुआ एक बारका स्नान ब्रह्मविद्यासे स्पर्धा रखता है। गोमती ब्रह्मज्ञानके समान है। यह सब तीर्थोंमें उत्तम है। मनुष्य ब्रह्मज्ञानसे मुक्त होते हैं और वह ब्रह्मज्ञान गोमतीमें स्नान करनेसे सुलभ होता है। अथवा श्रीकृष्णके समीप गोमतीमें स्नान करनेमात्रसे सबकी मुक्ति हो जाती है।'

ऐसा कहकर नारदजीने हरिप्रिया द्वारकाको प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'द्वारके! ये सब ऋषि और महर्षि तुम्हें बार-बार प्रणाम करते हैं। इन सबको देखो। ये सब गान, वाद्य और नृत्यके द्वारा प्रसन्न होकर श्रीहरिनामका कीर्तन कर रहे हैं। देवि! तुम सबसे श्रेष्ठ हो; क्योंकि साक्षात् भगवान् विष्णु तुम्हारा कभी त्याग नहीं करते हैं। हमें देवेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन कराओ।'

उनके ऐसा कहनेपर द्वारकादेवी प्रत्यक्ष प्रकट हुईं और हर्षसे विह्वल होकर बोलीं—'देवताओ! देखो, देखो; ये भगवान् द्वारकानाथ विराज रहे हैं।' उस समय देवताओंने पश्चिमाभिमुख श्रीकृष्णका


* जयशब्दैर्नमःशब्दैर्गर्जन्तो हरिनामभिः। ततोऽन्ये च स्तुवन्ति स्म परमानन्दसम्प्लुताः॥
आनन्दांश्च प्रमुञ्चन्तः प्रेम्णा गद्गदया गिरा। स्तुवन्ति ऋषयः सर्वे तीर्थादीनि च सर्वशः॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० ३३। ११-१२)

  • प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * | १३६५ ---|---

दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया और प्रसन्न होकर गीत, वाद्य तथा नृत्य किया। जय-जयकार और नमस्कार शब्दके साथ हरिनामकी गर्जना की। बारंबार श्रीकृष्णका दर्शन करके सबने भक्तिभावसे अनेक बार उठ-उठकर साष्टांग प्रणाम किया और—'हे कृष्ण! हे कृष्ण! जय कृष्ण!' ऐसा कहा। श्रीकृष्णके दर्शनसे उन सब सिद्धोंको उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई। गोमतीके जलमें और समुद्रके अन्तर्गत चक्रतीर्थके जलमें उन सबने स्नान करके श्रीकृष्णके दर्शनकी लालसा प्रकट की थी। तदनन्तर श्रीकृष्णके मुखारविन्दका दर्शन पाकर वे सभी परमानन्दमें डूब गये। नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहाने लगे। उन्हें अपने-आपकी भी सुधि नहीं रही। तत्पश्चात् कमलके आसनपर बैठे हुए बलराम और श्रीकृष्णका दर्शन करके उन सबने उन्हें पंचामृतसे तथा त्रिलोकीके सभी तीर्थोंके जलसे स्नान कराया। सनकादि योगियोंने भी उनका पूजन किया। नारदादि महर्षियोंने परम श्रद्धा-भक्तिसे पृथक्-पृथक् दिव्य वस्त्र, दिव्य गन्ध और दिव्य अनुलेपनोंसे पूजन किया। तुलसीदलसे श्रीकृष्णकी पूजा की। पृथक्-पृथक् दिव्य धूप देकर कपूरकी आरती उतारी। भाँति-भाँतिके कर्पूरवासित पवित्र पदार्थोंद्वारा नैवेद्य लगाया। कर्पूरमिश्रित ताम्बूल निवेदन किया। प्रिय वस्तुएँ भेंट कीं। मंगलमय स्तोत्रोंद्वारा स्तुति की तथा चवँर और व्यजन आदि डुलाकर महाविष्णुकी आराधना पूरी की। तत्पश्चात् ब्रह्मपुत्रोंने भगवान् श्रीकृष्णके आगे गीत गाये, बाजे बजाये और नृत्य किया। इतनेमें ही वहाँ भगवान् विष्णुके पार्षद प्रकट हो गये। देवताओं तथा ऋषियोंने उन पार्षदोंको प्रणाम किया। इसके बाद बड़े भैया बलरामसहित श्रीकृष्णको मस्तक झुकाया। तदनन्तर पुष्पांजलि देते हुए कहा—'देवि द्वारके! तुम सब तीर्थोंकी महारानी और अधीश्वरी हो।' ऐसा कहकर उन सबने द्वारकापुरीको प्रणाम किया।

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दिलीप-वसिष्ठ-संवाद, द्वारकासे लौटे हुए यात्रीके दर्शनसे राक्षसके वज्रलेप पापका नाश

प्रह्लादजी कहते हैं—मुनीश्वरो! द्वारकापुरीका ऐसा ही अद्भुत माहात्म्य है। वह बड़े-बड़े पापोंको जलानेवाला है और महान् पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है। द्वारकाकी यात्रा अत्यन्त भयंकर पापराशिके दाहका स्थान है। जब बृहस्पति सिंह राशिपर स्थित हों, उस समय जो द्वारकाकी यात्रा करते हैं, उनके चरणोंकी धूलिका स्पर्श करके पापी मनुष्य भी स्वर्गलोकमें चले जाते हैं। गोमतीके जलसे पवित्र होकर श्रीकृष्णके मुखारविन्दका दर्शन करनेवाले उन पुण्यात्माओंके दर्शनसे सौ जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है—इस विषयमें राजा दिलीप और महर्षि वसिष्ठका संवाद बड़ा ही आश्चर्यजनक है।

दिलीपने पूछा—विप्रवर! काशीमें किया हुआ पाप वज्रलेप होता है। वह भयंकर वज्रलेप जहाँ नष्ट हो जाय, और सब प्रकारके महापुण्य जहाँ प्राप्त हों, वह ऐसा कौन-सा क्षेत्र है। यह बतानेकी कृपा करें। जहाँ जानेपर पापरूपी बीज अंकुरित नहीं होते, उस पुण्यक्षेत्रका वर्णन कीजिये।

वसिष्ठजीने कहा—काशीमें मोक्षधर्मको जाननेवाला कोई त्रिदण्डी संन्यासी रहता था। वह एक दिन एकाग्रचित्त हो दशाश्वमेध घाटपर गायत्रीका जप कर रहा था। उसी समय वहाँ कोई गजगामिनी युवती आयी और गंगाके तटपर अपने वस्त्र रखकर जलमें क्रीड़ा करने लगी। संन्यासी उस तरुणीको देखकर कामदेवके वशीभूत हो गया। उस कुलटाने भी मन-ही-मन उस तरुण संन्यासीसे मिलनेका संकल्प किया। वे

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दोनों पापाचारके द्वारा एक दूसरेसे मिले। तरुणीने संन्यासीका मन मोह लिया था; अतः वह उसीके पीछे-पीछे लगा रहा। उसकी प्रसन्नताके लिये वह न्याय अथवा अन्यायसे भी धनकी याचना करने लगा। काशीमें रहकर वह चाण्डालसे भी दान लेता था। उसने स्नान छोड़ दिया। अपवित्र रहने लगा और पापमें प्रवृत्त होकर रातमें चोरी भी करने लगा। एक दिन वह दुराचारी यति मांस लानेकी इच्छासे वनमें गया। वहाँ उसकी दृष्टि एक चाण्डाल-कन्यापर पड़ी, जिसके नेत्र उस युवकको उन्मत्त बना देनेवाले थे। वह बड़ी ही सुन्दरी थी। उसका अतिशय सौन्दर्य देखकर उसने निर्जन वनमें उस चाण्डालीके साथ समागम किया। उसके साथ भोजन भी किया और उसीके घरमें उसकी मृत्यु हुई। पापात्मा और सर्वभक्षी होकर भी वह काशीके प्रभावसे नरकमें नहीं पड़ा; परन्तु उसके द्वारा अत्यन्त भयानक वज्रलेप पाप हुआ था, इसलिये क्रूर योनियोंमें उसका जन्म हुआ। पहले भेड़िया, फिर क्रमशः व्याघ्र, सिंह, कुत्ता, सियार और सूअर हुआ। इस प्रकार दस हजार युगोंमें भी उसका वह पाप नष्ट नहीं हुआ। तदनन्तर वह राक्षस हुआ और अनेक प्रकारके प्राणियोंका भक्षण करते हुए विन्ध्यपर्वतपर आकर रहने लगा। इसी समय एक अद्भुत घटना घटी। एक मनुष्य द्वारका और श्रीकृष्णचन्द्रके सुन्दर मुखारविन्दका दर्शन करके लौट रहा था। वह गोमतीके जलमें स्नान करके पवित्र हो चुका था। धीरे-धीरे जब वह विन्ध्याचलपर आया तो वह क्रूरकर्मी राक्षस उसे खानेके लिये उसके पास गया; परन्तु वह तीर्थयात्री तनिक भी भयभीत न हुआ। उसके दर्शनमात्रसे राक्षसका भयंकर वज्रलेप पाप क्षणभरमें जलकर भस्म हो गया और वह पुण्यके प्रकाशसे शोभा पाने लगा। तदनन्तर उसने उस पथिकके चरणोंमें श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और विस्मित होकर कहा—'अहो! आपके दर्शनमात्रसे मेरा यह भयंकर राक्षसभाव नष्ट हो गया और मुझे उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई। भद्रपुरुष! आप कहाँसे आये हैं और आपका ऐसा प्रभाव क्यों है?'

राक्षसकी यह बात सुनकर यात्रीने प्रसन्नचित्त होकर कहा—'राक्षस! मैं द्वारकापुरीका दर्शन करके आया हूँ। मुझमें वज्रलेप-जैसे पापको हर लेनेवाला प्रभाव भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे प्रकट हुआ है।' उसके ऐसा कहनेपर राक्षसने भक्तिभावसे उसे प्रणाम किया और उसकी परिक्रमा करके वह द्वारकापुरीको चला गया। वहाँ गोमतीके जलमें अपना शरीर त्यागकर उसने वैकुण्ठधाम प्राप्त किया। उस समय देवेश्वर तथा गन्धर्वगण फूलोंकी वर्षा करते हुए उसकी स्तुति कर रहे थे।

वसिष्ठजीके मुखसे यह कथा सुनकर राजा दिलीपका चित्त प्रसन्न हो गया। वे देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णकी द्वारकापुरीका दर्शन करनेके लिये गये और आदरपूर्वक देवमन्दिरमें श्रीकृष्णका दर्शन करके परम सिद्धिको प्राप्त हुए।


द्वारकापुरी तथा श्रीकृष्ण-दर्शनका माहात्म्य

प्रह्लादजी कहते हैं—ब्रह्मा और शिव आदि भी जिनके चरणारविन्दोंकी वन्दना करते हैं, वे भगवान् श्रीकृष्ण जहाँ निवास करते हैं, वह द्वारकापुरी सब कुछ देनेवाली तथा सर्वज्ञ है। द्वारकाके प्रभावसे कीट, पतंग, पशु, पक्षी तथा सर्प आदि योनियोंमें पड़े हुए समस्त पापी भी मुक्त हो जाते हैं*। फिर जो प्रतिदिन द्वारकामें रहते और जितेन्द्रिय होकर भगवान् श्रीकृष्णकी सेवामें उत्साहपूर्वक लगे होते हैं, उन मनुष्योंकी मुक्तिके विषयमें क्या कहना है। द्वारकामें रहनेवाले


* अपि कीटपतङ्गाद्याः पशवोऽथ सरीसृपाः। विमुक्ताः पापिनः सर्वे द्वारकायाः प्रभावतः॥ (स्क० पु०, द्वा० मा० ३७।७)

* प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य *

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समस्त प्राणियोंको जो गति प्राप्त होती है, वह ऊर्ध्वरेता मुनियोंको भी दुर्लभ है। द्वारका सब क्षेत्रों और तीर्थोंसे उत्तम कही गयी है। द्वारकामें जो होम, जप, दान और तप किये जाते हैं, वे सब भगवान् श्रीकृष्णके समीप कोटिगुने एवं अक्षय होते हैं। जो द्वारकावासी श्रेष्ठ पुरुषोंकी निन्दा करते हैं, वे श्रीकृष्णकी कृपासे वंचित हो दुःखके घोर समुद्रमें गिरते हैं। अतः द्वारकावासी मनुष्य सदा सबके लिये पूजनीय हैं। द्वारकामें दी हुई अणुमात्र वस्तु भी अक्षय फल देनेवाली होती है। जो मनुष्य द्वारकामें अन्नदान करता है, उसके दानजनित उत्तम फलका वर्णन करनेमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी समर्थ नहीं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अन्त्यज तथा स्त्री जो भी द्वारकामें भक्तिपूर्वक निवास करते हैं, वे विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होते हैं। द्वारकावासीका दर्शन और स्पर्श करके भी मनुष्य बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त हो स्वर्गलोकमें निवास करते हैं। द्वारकाका माहात्म्य सबसे श्रेष्ठ है। वहाँकी पवित्र धूलि भी पापियोंको मोक्ष देनेवाली है।

विप्रवरो! जिस दिन बृहस्पति सिंह राशिपर आते हैं, उस तिथिको द्वारकामें कुशावर्तसे लेकर गोमती-समुद्र संगमतक कहीं भी गोमतीमें किया हुआ स्नान बारह गोदावरी स्नानके समान फल देनेवाला है। जो दूसरेको भी द्वारका भेजता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। 'द्वारका जाओ, द्वारका जाओ' ऐसा कहकर जो वहाँ जानेके लिये प्रेरणा करता है, उसके दर्शनसे ही मनुष्य पापमुक्त हो जाते हैं। जो मनुष्य द्वारकाकी ओर मुँह करके 'द्वारका, द्वारका' का कीर्तन करता है, वह भगवान् कृष्णकी कृपासे निश्चय ही मोक्षका भागी होता है। द्वारका, पुण्यमयी गोमती, रुक्मिणीदेवी तथा भगवान् श्रीकृष्णका जो लोग प्रतिदिन स्मरण करते हैं, वे द्वारकाके पुण्य-फलके भागी होते हैं। जो सहस्रों योजन दूर रहकर भी अपनी बुद्धिमें ऐसे विचार लाता है कि 'मैं द्वारका जाऊँगा और द्वारकानाथजीका दर्शन करूँगा' उसका मुँह देखनेसे महापातकी मनुष्य भी मुक्त हो जाते हैं। समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाले श्रीकृष्णभक्त धन्य हैं, समस्त लोकोंके लिये वन्दनीय हैं। भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे जो पुण्य होता है, उसका वर्णन सर्वज्ञ विद्वान् तथा शेषनाग भी नहीं कर सकते। श्रीकृष्ण-दर्शनके पुण्यफलका कभी अन्त नहीं होता। इस लोकमें जो बड़े-बड़े पापी हैं, वे भी द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करके सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। जिन भगवान् श्रीकृष्णके सामीप्यसे गोमतीका जड जल भी ब्रह्मविद्यासे स्पर्धा रखता है, स्नानमात्रसे ही बड़े-बड़े पापोंको भस्म कर डालता है, जिनके क्षेत्रकी चक्रचिह्नित शिलाएँ भी सबको मोक्ष देनेवाली हैं, मगध आदि देशोंमें भी पूजित होनेपर जहाँकी चक्रचिह्नित शिलाएँ मुक्ति देती हैं, जिनके क्षेत्रकी पवित्र धूलि सब पापियोंको मोक्ष देनेमें समर्थ है तथा जिनके क्षेत्रमें जानेके लिये विचार करना भी पातकोंका नाश कर देता है; उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी पुरी द्वारकाके दर्शनसे पाप नष्ट होता है; ऐसा कहनेसे उनकी क्या स्तुति होती है। द्वारका जाते हुए जो मनुष्य श्रीकृष्ण-दर्शनकी महिमाका वर्णन करता है, उसके पुण्यकी संख्या बताना शेषनाग-जैसे विद्वानोंके लिये भी असम्भव है। जहाँ श्रीकृष्ण-दर्शनकी महिमा बतानेसे भी पाप नष्ट हो जाता है, वहाँ साक्षात् श्रीकृष्णके दर्शनसे कितना पुण्य होता है—इसकी गणना कौन करेगा। संसारमें वे मनुष्य धन्य हैं, जो हर्षोल्लासमें भरकर भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करते हैं। जब दर्शनकी ऐसी महिमा है, तब उनके स्पर्शसे तथा दुग्ध आदिके द्वारा उनके स्नान-पूजन आदि करनेसे जो पुण्य होता है, उसे कौन बता सकता है। रातके चौथे पहरमें दुग्धका स्नान उत्तम है। पूजा, आरती, नैवेद्य, ताम्बूल, नमस्कार, गीत, वाद्य और नृत्य—ये श्रीकृष्णको प्रिय हैं। जो एकादशीको भगवान् श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये गीत और नृत्य करते हैं, वे भगवान् श्रीकृष्णके प्रिय भक्त हैं। जो

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भलीभाँति पूजित होनेपर श्रीकृष्णकी झाँकी करते हैं, वे महान् पुण्यको प्राप्त होते हैं। श्रीकृष्णकी महापूजा करनेवालेको अनन्त पुण्य होता है। संसारमें वे मनुष्य धन्य हैं, जो सदा श्रीकृष्णदेवका दर्शन, स्पर्श, पूजन, स्तुति और नमस्कार करते हैं। जो मनुष्य द्वारकामें काष्ट या प्रस्तरकी प्रतिमा स्थापित करता है, उसने मानो तीनों लोकोंकी स्थापना कर ली। वह भगवान् विष्णुके समान होता है और तीनों लोकोंका साम्राज्य प्राप्त करता है।

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द्वारकामें श्रीकृष्णदर्शनकी महिमा, एकादशीव्रतके भेद, चक्रचिह्नित शिलाओंकी विशेष संज्ञा तथा भयनिवारणके उपाय

प्रह्लादजी कहते हैं—जो मन-ही-मन द्वारका जानेकी भावना करते हैं, उनके दस हजार जन्मोंके संचित पूर्वपाप नष्ट हो जाते हैं। जिस देहधारीके मनमें श्रीकृष्णके दर्शनका विचार उत्पन्न होता है, उसका मुख देखकर पापके सैकड़ों टुकड़े हो जाते हैं। जो परम सुन्दर श्रीकृष्णपुरीकी यात्रा करके गोमती-समुद्र-संगमपर पिण्डदान करते हैं, वे अपने पितरोंका उद्धार कर देते हैं। वैशाख शुक्ला द्वादशीको जो भगवान् श्रीकृष्णके समीप जागरण करता है, वह उनके मुखारविन्दका दर्शन करके पितरोंसहित मुक्त हो जाता है। जो श्रीकृष्णकी लीलाभूमिमें जानेकी मनसे इच्छा करते हैं, उनके अस्थिगत पापको भी प्रेतराज यम धो डालते हैं। जीव जबतक कलियुगमें द्वारकापुरीका दर्शन नहीं करता, तभीतक उसके शरीरमें अत्यन्त भयंकर पाप डेरा डाले रहते हैं। जो श्रवण और द्वादशीके योगमें गोमती-समुद्र-संगममें स्नान करके श्रीकृष्णके मुखचन्द्रका दर्शन करता है, वह मानव मोक्षको प्राप्त होता है। जिस किसी भी मासकी द्वादशी तिथिको श्रीकृष्णकी लीला-नगरी द्वारकाका दर्शन करके मनुष्य संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है। कलियुगमें बिना पिण्डदान किये भी गोमतीके जलमात्रसे पितरोंकी तृप्ति हो जाती है। चक्रतीर्थका ऐसा ही प्रभाव है। जिसने द्वारकामें जाकर श्रीकृष्णके मुखारविन्दका दर्शन कर लिया है, वह न तो प्रेत होता है और न उसे नरकका कष्ट भोगना पड़ता है। जो घरमें रहकर भी प्रतिदिन कलिकालमें श्रीकृष्णपुरीका स्मरण करते हैं, उनके पाप नष्ट हो जाते हैं। महाभाग! कलिकालके समान दूसरा कोई युग नहीं है; क्योंकि उसमें भगवान् विष्णुके स्मरण और कीर्तनसे मनुष्य परमपद प्राप्त कर लेता है। जो कलियुगमें नित्यप्रति 'कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण' का उच्चारण करेगा, उसे प्रतिदिन दस हजार यज्ञों और करोड़ों तीर्थोंका पुण्य प्राप्त होगा। जो मनुष्य नित्य 'कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण' का जप करता है, कलियुगमें श्रीकृष्णके ऊपर उसका प्रेम निरन्तर बढ़ता है।*

रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, मित्रविन्दा, कालिन्दी, भद्रा, नाग्नजिती तथा लक्ष्मणा—श्रीकृष्णकी इन आठों प्रियतमा पत्नियोंका भी वहाँ भलीभाँति पूजन करना चाहिये। जो नियम और व्रतोंसे तथा गीत, वाद्य, दीपदान तथा जागरण आदिके द्वारा उन सबकी विधिपूर्वक पूजा करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको पाता है और उसके ऊपर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते


* नास्ति नास्ति महाभाग कलिकालसमं युगम्। स्मरणात् कीर्तनाद् विष्णोः प्राप्यते परमं पदम्॥
कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति कलौ वक्ष्यति प्रत्यहम्। नित्यं यज्ञायुतं पुण्यं तीर्थकोटिसमुद्भवम्॥
कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति नित्यं जपति यो जनः। तस्य प्रीतिः कलौ नित्यं कृष्णस्योपरि वर्द्धते॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० ३८। ४४-४६)

  • प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३६९

हैं। जो कलिमें प्रतिदिन जागते और सोते समय 'कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण' का कीर्तन करता है, वह श्रीकृष्णस्वरूप हो जाता है।* चन्द्रमामें उष्णता नहीं होती, अग्निमें शीतलता नहीं होती तथा एकादशीको उपवास करनेवाले वैष्णव भक्तोंमें पाप नहीं होता है। जब पूरे दिन-रात एकादशी हो और दूसरे दिन द्वादशीमें भी एकादशी पड़ गयी हो तो उसको उन्मीलिनी कहते हैं। वह तिथियोंमें उत्तम तिथि मानी गयी है। जो बंजुलीके दिन-रात्रिमें जागरण करते हैं, उन्हें आधे मुहूर्तमें दस हजार यज्ञोंका पुण्य होता है। यदि सम्पूर्ण दिन-रात द्वादशी होकर दूसरे दिन त्रयोदशीमें भी द्वादशी बढ़ गयी हो तो उसे बंजुली कहते हैं। वह कलियुगमें अत्यन्त दुर्लभ है। जो उन्मीलिनीमें जागरण करते हैं, उन्हें आधे पलमें कोटि गोदानका पुण्य प्राप्त होता है। पूरे दिन-रात एकादशी होकर यदि प्रतिदिन अमावस्या या पूर्णिमातक तिथि बढ़ती रहे तो उसे पक्षवर्द्धिनी एकादशी कहते हैं। उस एकादशीको जो जागरण करते हैं, उन्हें चौथाई पलमें ही कोटि गोदानका फल मिलता है। घरमें भी एकादशी करनेवालोंके लिये यह फल बतलाया गया है; फिर जो भगवान् विष्णुके समीप व्रत और जागरण करते हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है? कलियुग आनेपर द्वारकामें जो इस व्रतका अनुष्ठान करते हैं, उन्हें कोटिगुना फल होता है, द्वारकामें एक चक्रसे चिह्नित शिलाकी सुदर्शन संज्ञा है। सुदर्शनशिलाका पूजन करनेपर वह मोक्षरूप फल देनेवाली होती है। जिस शिलापर दो चक्रके चिह्न हों, वह लक्ष्मीनारायणका स्वरूप है। वे लक्ष्मीनारायण भोग और मोक्ष दोनों फलोंको देनेवाले हैं। तीन चक्रसे चिह्नित शिलाका नाम अच्युत है। अच्युतजी इन्द्रपद देनेवाले हैं। चार चक्रोंसे चिह्नित शिलाको जनार्दन कहते हैं, जनार्दनजी शत्रुनाशक तथा लक्ष्मीप्रद हैं। पाँच चिह्नोंसे चिह्नित शिलाकी वासुदेव संज्ञा है। वासुदेवजी जन्म-मृत्यु और जराका नाश करनेवाले हैं। छः चिह्नोंसे युक्त शिलाखण्डको प्रद्युम्न कहते हैं। वे उपासकको धन और कान्ति देते हैं। सात चिह्नोंसे युक्त होनेपर उसकी बलदेव संज्ञा होती है। बलदेवजी गोत्र और कीर्ति बढ़ानेवाले हैं। आठ चिह्नोंसे युक्त शिलाखण्ड पुरुषोत्तम है। भगवान् पुरुषोत्तम भक्तिभावसे पूजित होनेपर मनोवांछित फल देते हैं। नौ चिह्नसे युक्त होनेपर उसे नवव्यूह कहते हैं। यह देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। नवव्यूह भी सब कुछ दे सकते हैं। दस चिह्नोंसे युक्त शिलाखण्डोंको दशावतार संज्ञा है। उससे राज्यकी प्राप्ति होती है। एकादश चिह्नोंसे युक्त शिलाखण्ड अनिरुद्ध है, जो ऐश्वर्य प्रदान करता है। बारह चक्रोंसे युक्त शिलाको द्वादशात्मा कहते हैं। वह निर्वाण प्रदान करती है। इससे अधिक चिह्न होनेपर अनन्त संज्ञा होती है। भगवान् अनन्त भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। श्रीकृष्णके चक्रसे चिह्नित जो कोई भी प्रस्तर वहाँ उपलब्ध होते हैं, उनके स्पर्शमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए जितने भी ब्रह्महत्या आदि पाप हैं, वे सब चक्रचिह्नित शिलाके पूजनसे नष्ट हो जाते हैं। जो एक वर्षतक चक्रांकित शिलाकी पूजा, दर्शन और स्पर्श करते हैं, वे पापी रहे हों तो भी अविनाशी विष्णुमें प्रवेश करते हैं। मृत्युकाल प्राप्त होनेपर जो अपने वक्षपर चक्रचिह्नित शिला धारण करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। गोमतीचक्रसे चिह्नित शिला यदि छातीपर रखी हुई हो तो यमराजके दूत भयके मारे समीप नहीं आते और वह मनुष्य वैकुण्ठलोकमें जाता है। भगवान् श्रीकृष्णकी बाललीलाओं,


* कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति नित्यं जाग्रत् स्वपंश्च यः। कीर्तयेत्तु कलौ चैव कृष्णरूपी भवेद्धि सः॥ (स्क० पु०, द्वा० मा० ३९ । १)

१३७०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

गोकुलमें की हुई क्रीडाओं, गोपीजनोंके साथ की हुई क्रीडाओं तथा श्रीकृष्णावतारकी अन्य लीलाओंको भी बार-बार सुनना चाहिये। उत्कण्ठित होकर नृत्य और गान करना चाहिये तथा कमलनयन श्रीकृष्णके मुखारविन्दका बार-बार दर्शन करना चाहिये। बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे जो फल मिलता है, उसको मनुष्य श्रीकृष्णके समीप आधे दिनमें प्राप्त कर लेता है। भगवान् श्रीकृष्णमें मन लगाकर मनुष्य जिस फलको पाता है, उसका हजारवाँ अंश भी दूसरे किसी कर्मसे नहीं पा सकता है। जो राग-द्वेषकी आगमें जल रहे हैं और अज्ञानमय विषयोंमें आसक्त हैं, ऐसे मनुष्योंको स्वस्थ करनेके लिये वैष्णवधर्म चिकित्सारूप है। कोरे तर्क और युक्तिपर टिके हुए मतवादोंकी कुदृष्टिसे अज्ञानान्धकारमें पड़कर जो लोग अन्धे हो रहे हैं, उनके लिये यह वैष्णव-शास्त्र दीपकका काम देता है। विद्वानोंको इसका सदैव मनन करना चाहिये। जहाँ श्रीहरिके समक्ष रात्रिमें जागरण किया जाता है, उसे ब्रह्मावर्तके समान ऋषिदेश और मध्यदेश जानना चाहिये। जो मानव कलियुगमें द्वारकाका माहात्म्य सुनता है या दूसरोंमें सुननेका भाव उत्पन्न करता है, उसे सौ यज्ञोंका फल मिलता है। जिसके घरमें द्वारकाकी मृत्तिका मौजूद है तथा जिसके ललाटमें गोपीचन्दनका तिलक लगा है; उसके घरको लक्ष्मीदेवी कभी नहीं छोड़ती हैं। वहाँ ग्रहों, रोगों तथा राक्षसोंकी बाधा भी नहीं होती है। पिशाच, कूष्माण्ड और प्रेत भी वहाँ उपद्रव नहीं करते हैं। उस घरमें अग्नि, चोर, शत्रु तथा सींगवाले पशुओंसे भी भय नहीं प्राप्त होता है। दैव, भूत, रोग, व्याधि तथा दरिद्रताका कष्ट भी वहाँ नहीं आता है। बिजली और उल्कापातका भी भय वहाँ नहीं रहता है।

जहाँ बंजुली द्वादशीके दिन रात्रिमें जागरण, भागवतके एक या चौथाई श्लोकका पाठ, वैष्णवशास्त्रका पठन, भगवद्भक्तका दर्शन, विष्णुकी रथयात्राका उत्सव, अश्वत्थवृक्षका दर्शन, विष्णु-भक्तका सत्कार और शालग्रामशिलाका पूजन किया जाता है, जहाँ भगवान्के चरणोदकका पान, नैवेद्यका भक्षण, तुलसी-पूजन, एकादशी-व्रतका अनुष्ठान, हेमन्त-ऋतुमें जलवास, ग्रीष्म-ऋतुमें त्रिस्पृशाको उपवास, धातूव्रत और अश्वत्थव्रतका पालन किया जाता है; जहाँ उन्मीलिनी, पक्षवर्द्धिनी, श्रावण (भाद्रपद)-मासकी रोहिणीयुक्त जयन्तीसंज्ञक अष्टमी, द्वादशी तथा प्रबोधिनी आदि एकादशियोंके व्रतका अनुष्ठान और रम्भाव्रत आदिका आचरण—ये सब पुण्यकर्म किये जाते हैं, वहाँ भी पूर्वोक्त भय नहीं आते हैं। जो प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक श्रीहरिके समीप भागवतशास्त्रका श्रवण या पाठ करता है, दशमीको केवल रातमें ही भोजन करता है, द्वादशीको शक्ति रहते पराये अन्नका भोजन नहीं करता, रातमें जागता है, शक्तिके अनुसार दान देता है तथा यथाशक्ति भगवान्की विशेष पूजा करता-कराता है तथा जो द्वादशीको गंगाकी मिट्टी या गोपीचन्दनका तिलक लगाता है, वह भी पूर्वोक्त सभी भयोंसे छुटकारा पा जाता है। भगवान् विष्णुका कथन है कि ‘जो मेरा तथा रुद्र, आदित्य और यमका भक्त है, उसे मैं श्रेष्ठ भागवत मानता हूँ। जिन्हें मेरे भक्त प्रिय हैं, उनपर मैं सदैव संतुष्ट रहता हूँ। कलियुग आनेपर मैं सदा द्वारकापुरीमें वास करता हूँ। जो मुझे प्रसन्न करना चाहता है, वह कलिकालमें परम सुन्दर द्वारकापुरीमें जाकर मेरा दर्शन करे।’


  • प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३७१

द्वारका-माहात्म्यके पाठकी महिमा, वैष्णव-सेवाका महत्त्व, नीलका निषेध, वृक्ष काटनेसे हानि, उसे लगानेका फल, आक, बिल्वपत्र, आँवला एवं तुलसी-रोपणका महत्त्व तथा द्वारका-माहात्म्यका उपसंहार

प्रह्लादजी कहते हैं—मनुष्य जब द्वारका जानेमें समर्थ न हो तब घरपर ही द्वारका-माहात्म्यका पाठ करे। वैष्णवभक्तोंको इस माहात्म्यको सुनावे और भक्त पुरुष इसे भक्तिभावसे सुने। विशेषतः द्वादशी तिथिको इस माहात्म्यका पाठ अवश्य करना चाहिये। ऐसा करनेसे वह घरमें रहकर भी द्वारका-सेवनका पुण्य पा लेता है। इहलोक और परलोकमें उसे मनोवांछित फलकी प्राप्ति होती है। भगवान् जनार्दन सदैव उसके योगक्षेमका निर्वाह करते हैं। वह पापरहित होता है। उसके कुलमें कोई भी नरकगामी अथवा प्रेत नहीं होता। जो भगवान् श्रीकृष्णके समीप द्वारका-माहात्म्यका पाठ करता है, श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी तथा द्वादशीका व्रत करता तथा रातमें जागता है, उसके दर्शन, कीर्तन, स्मरण तथा स्पर्शसे करोड़ों तीर्थोंका फल प्राप्त होता है। उसके स्मरणसे दस हजार जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है। जिसके घरमें यह भागवतशास्त्र सदा विद्यमान रहता है, उसकी इस संसारमें पुनरावृत्ति नहीं होती है। वैष्णवके प्रसन्न होनेपर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं; अतः विष्णुकी प्रसन्नताके लिये वैष्णवको अवश्य प्रसन्न करे। जो पुण्यक्षेत्रमें नील बोता और मूली खाता है, नीली कर्म करता तथा रस बेंचता है, उसे पुण्यकी प्राप्ति नहीं होती है। वह पापका भागी होता है। सैकड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी वह पुण्यका भागी नहीं होता है। जो मनुष्य किसी वैदिक कर्मके प्राप्त हुए बिना ही पीपलकी लकड़ी काटता है, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है। मदारके वृक्षमें एक बार कुल्हाड़ी मारनेपर मनुष्य कई मन्वन्तरोंतक रौरव नरककी पीड़ा भोगता है। जो नीमका वृक्ष काटता है, वह कोढ़ी होता है। उसके किये हुए पूजन, व्रत एवं दानको भगवान् सूर्य नहीं ग्रहण करते हैं। जो अमावास्याको वनस्पतियोंका छेदन करता है, उसे द्वादशीका पुण्य नहीं मिलता और एक-एक पत्र, पुष्प तथा फलके बदलेमें ब्रह्महत्याका पाप लगता है। वह मनुष्य सात कल्पोंतक यमलोकमें निवास करता है। उसके किसी भी कार्यमें उन्नति नहीं होती है। जो मनुष्य आकका पेड़ लगाता और उसकी रक्षा करता है, वह सात कल्पोंतक भगवान् सूर्यनारायणके समीप वास करता है। एक लाख देववृक्ष लगानेसे जो फल होता है, वही एक पीपलका पेड़ लगानेसे प्राप्त हो जाता है। आँवला और तुलसी लगानेका भी ऐसा ही फल मिलता है। जो देवताओं, पितरों, मनुष्यों (सनकादिकों) तथा अतिथियोंका तर्पण एवं पूजन करते हुए वर्द्धिनी द्वादशीका व्रत करता है, वह परम पदको प्राप्त होता है। कलिकालमें प्रातःकाल उठकर द्वारकाका कीर्तन करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो निश्चय ही स्वर्गलोकमें जाता है।

जो भगवान्‌के भक्तोंसे वैर रखते और एकादशी व्रत नहीं करते हैं, उन्हें यमदूत ले जाते हैं। जो वैष्णवोंको गोपीचन्दनकी मृत्तिका देते हैं, उन्हें त्रिपुण्ड्रधारी महात्मा पुरुषोंके समान पुण्यफलकी प्राप्ति होती है। जो प्रातःकाल उठकर 'द्वारके! द्वारके!' ऐसा पुकारता है, वह द्वारकानामका नित्य कीर्तन करनेसे द्वारका-वासका फल पाता है। जो श्रीनामसे अंकित

१३७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

बिल्वपत्रोंद्वारा श्रीपति भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह सातों द्वीपोंका स्वामी होता है। जो सदा कलिमें बिल्वपत्रोंसे देवताओंकी पूजा करते हैं, वे दस हजार अश्वमेध यज्ञोंका फल पाते हैं। पीपलके दलसे गिरे हुए जलसे देवता तथा ऋषि-मुनि पवित्र होते हैं। जो बिल्वपत्रसे ब्रह्मा, शिव तथा सूर्य आदिका पूजन करते हैं, वे अक्षय लोकोंमें जाते हैं। बिल्व-पत्रोंसे लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री तथा दुर्गाजीका पूजन करके मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं। बिल्वपत्रका महत्त्व तुलसीदलसे भी अधिक है, अतः यत्नपूर्वक उससे श्रीहरिका पूजन करना चाहिये। जो द्वादशी तथा रविवारको बिल्ववृक्षकी पूजा करते हैं, वे सैकड़ों ब्रह्महत्याओंके पापसे भी लिप्त नहीं होते हैं। कलियुगमें श्रीकृष्णका कीर्तन करनेसे मानव बीती हुई सात पीढ़ियों और आनेवाली चौदह पीढ़ियोंके सब मनुष्योंका उद्धार कर देता है।^१

श्रीमद्भागवतपुराणका एक-एक उत्तम श्लोक भी भगवान् श्रीकृष्णके लिये प्रीतिजनक है तथा पाठ करनेवालेको वह कोटि यज्ञोंका फल देनेवाला है। जो द्विज पूरे कार्तिकमासमें भगवान् श्रीकृष्णके सम्मुख बैठकर गीता-पाठ करते हैं, उनके सौ कोटि कल्पोंके पाप भी नष्ट हो जाते हैं।^२ कलियुगमें जो मनुष्य भक्तिभावसे गोमती-समुद्र-संगम तथा रुक्मिणीसहित श्रीकृष्णका दर्शन करते हैं, वे धन्य हैं। द्वारका जाते हुए मनुष्यकी यदि मार्गमें ही मृत्यु हो जाय तो पितरोंसहित उसकी परम धामसे पुनरावृत्ति नहीं होती है।^३ जो मनुष्य प्रतिदिन उत्तम भक्तिसे कृष्ण-कृष्णका कीर्तन करता है, वह अनायास ही सौ अश्वमेध यज्ञोंका फल पा लेता है।^४


द्वारका-माहात्म्य-खण्ड सम्पूर्ण


सं० स्कन्दपुराण सम्पूर्ण


१- अतीतान्सप्त पुरुषान् भविष्यांश्च चतुर्दश। नरस्तारयते सर्वान् कलौ कृष्णेति कीर्तनात् ॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० ४२। ११)

२- तथा भागवतस्योक्तं पुराणं श्लोकमुत्तमम् । कृष्णस्य प्रीतिजननं यज्ञकोटिफलप्रदम् ॥
तेषां विलीयते पापं कल्पकोटिशतैः कृतम् । गीतां पठन्ति कृष्णाग्रे कार्तिकं सकलं द्विजाः ॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० ४२। ३६-३७)

३- द्वारकां गच्छमानस्य विपत्तिर्भवते यदि । न तस्य पुनरावृत्तिः पितृभिः सह तत्पदात् ॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० ४५। २५)

४- कृष्ण कृष्णेति यो ब्रूयात् सद्भक्त्या प्रत्यहं नरः। हेलया सोऽश्वमेधानां शतानां लभते फलम् ॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० ४६। २७)

गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित पुराण-साहित्य

श्रीमद्भागवतमहापुराण, व्याख्यासहित (कोड 26, 27) ग्रन्थाकार—श्रीमद्भागवत भारतीय वाङ्मयका मुकुटमणि है। भगवान् शुकदेवद्वारा महाराज परीक्षित्को सुनाया गया भक्तिमार्गका तो मानो सोपान ही है। इसके प्रत्येक श्लोकमें श्रीकृष्ण-प्रेमकी सुगन्धि है। यह सम्पूर्ण ग्रन्थरत्न मूलके साथ हिन्दी-अनुवाद, पूजन-विधि, भागवत-माहात्म्य, आरती, पाठके विभिन्न प्रयोगोंके साथ दो खण्डोंमें उपलब्ध है। पत्राकारकी तरह बेड़िया (कोड 1951, 1552) सचित्र, सजिल्द, (कोड 1552, 1553) गुजराती, (कोड 1678, 1735) सानुवाद, मराठी, (कोड 1739, 1740), कन्नड़, (कोड 1577, 1744) बँग्ला, (कोड 1966, 1967, 1968) तमिल, (कोड 1831, 1832) ओड़िआ, (कोड 1975, 1976) तेलुगु, (कोड 564, 565) अंग्रेजी-अनुवाद, (कोड 25) केवल हिन्दी बृहदाकार, बड़े टाइपमें, (कोड 1945) (वि० सं०) केवल हिन्दी (कोड 1930) केवल हिन्दी, (कोड 1608) केवल गुजराती, (कोड 29) मूल, मोटा टाइप, संस्कृत, ग्रन्थाकार (कोड 1573) मूल, मोटा टाइप, तेलुगु, ग्रन्थाकार (कोड 124) मूल मझला आकार, (कोड 1855) विशिष्ट सं० मूल, मझला संस्कृतमें भी।

संक्षिप्त शिवपुराण, मोटा टाइप (कोड 789) ग्रन्थाकार—इस पुराणमें परात्पर ब्रह्म शिवके कल्याणकारी स्वरूपका तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा और उपासनाका विस्तृत वर्णन है। सचित्र, सजिल्द, विशिष्ट संस्करण (कोड 1468) हिन्दी एवं (कोड 1286) गुजरातीमें भी उपलब्ध।

संक्षिप्त पद्मपुराण (कोड 44) ग्रन्थाकार—इस पुराणमें भगवान् विष्णुकी विस्तृत महिमाके साथ, भगवान् श्रीराम तथा श्रीकृष्णके चरित्र, विभिन्न तीर्थोंका माहात्म्य, शालग्रामका स्वरूप, तुलसी-महिमा, गीता माहात्म्य, विष्णुसहस्रनाम, उपासना-विधि तथा विभिन्न व्रतोंका सुन्दर वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।

संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण (कोड 539) ग्रन्थाकार—भगवतीकी विस्तृत महिमाका परिचय देनेवाले इस पुराणमें दुर्गासप्तशतीकी कथा एवं माहात्म्य, हरिश्चन्द्रकी कथा, मदालसा-चरित्र, अत्रि-अनसूयाकी कथा, दत्तात्रेय-चरित्र आदि अनेक सुन्दर कथाओंका विस्तृत वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।

श्रीविष्णुपुराण, अनुवादसहित (कोड 48) ग्रन्थाकार—इसके प्रतिपाद्य भगवान् विष्णु हैं, जो सृष्टिके आदिकारण, नित्य, अक्षय, अव्यय तथा एकरस हैं। इसमें आकाश आदि भूतोंका परिमाण, समुद्र, सूर्य आदिका परिमाण, पर्वत, देवतादिकी उत्पत्ति, मन्वन्तर, कल्प-विभाग, सम्पूर्ण धर्म एवं देवर्षि तथा राजर्षियोंके चरित्रका विशद वर्णन है। सचित्र, सजिल्द (कोड 1364) केवल हिन्दी अनुवादमें भी उपलब्ध।

संक्षिप्त नारदपुराण (कोड 1183) ग्रन्थाकार—इसमें सदाचार-महिमा, वर्णाश्रम धर्म, भक्ति तथा भक्तके लक्षण, देवपूजन, तीर्थ-माहात्म्य, दान-धर्मके माहात्म्य और भगवान् विष्णुकी महिमाके साथ अनेक भक्तिपरक उपाख्यानोंका विस्तृत वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

संक्षिप्त स्कन्दपुराण (कोड 279) ग्रन्थाकार—यह पुराण कलेवरकी दृष्टिसे सबसे बड़ा है तथा इसमें लौकिक और पारलौकिक ज्ञानके अनन्त उपदेश भरे हैं। इसमें भगवान् शिवकी महिमा, सती-चरित्र, शिव-पार्वती-विवाह, कार्तिकेय-जन्म, तारकासुर-वध एवं धर्म, सदाचार, योग, ज्ञान तथा भक्तिके सुन्दर विवेचनके साथ-साथ अनेक साधु-महात्माओंके सुन्दर चरित्र पिरोये गये हैं। सचित्र, सजिल्द।

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण (कोड 1111) ग्रन्थाकार—इस पुराणमें सृष्टिकी उत्पत्ति, पृथुका पावन चरित्र, सूर्य एवं चन्द्रवंशका वर्णन, श्रीकृष्णचरित्र, कल्पान्तजीवी मार्कण्डेय मुनिका चरित्र, तीर्थोंका माहात्म्य एवं अनेक भक्तिपरक आख्यानोंकी सुन्दर चर्चा की गयी है। सचित्र, सजिल्द।

संक्षिप्त गरुडपुराण—(कोड 1189) ग्रन्थाकार—इस पुराणके अधिष्ठातृ देव भगवान् विष्णु हैं। इसमें ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, सदाचार, निष्काम कर्मकी महिमाके साथ यज्ञ, दान, तप, तीर्थ आदि शुभ कर्मोंमें सर्व-साधारणको प्रवृत्त करनेके लिये अनेक लौकिक एवं पारलौकिक फलोंका वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

संक्षिप्त भविष्यपुराण—(कोड 584) ग्रन्थाकार—यह पुराण विषय-वस्तु एवं वर्णन-शैलीकी दृष्टिसे अत्यन्त उच्च कोटिका है। इसमें धर्म, सदाचार, नीति, उपदेश, अनेक आख्यान, व्रत, तीर्थ, दान, ज्योतिष एवं आयुर्वेदशास्त्रके विषयोंका अद्भुत संग्रह है। वेताल-विक्रम-संवादके रूपमें कथा-प्रबन्ध इसमें अत्यन्त रमणीय है। इसके अतिरिक्त इसमें नित्यकर्म, सामुद्रिक शास्त्र, शान्ति तथा पौष्टिक कर्मका भी वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।

संक्षिप्त श्रीवराहपुराण (कोड 1361) ग्रन्थाकार—इस पुराणमें भगवान् श्रीहरिके वराह-अवतारकी मुख्य कथाके साथ-साथ अनेक तीर्थ, व्रत, यज्ञ, दान आदिका विस्तृत वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण (कोड 631) ग्रन्थाकार—इस पुराणमें चार खण्ड हैं—ब्रह्मखण्ड, प्रकृतिखण्ड, श्रीकृष्णजन्मखण्ड और गणेशखण्ड। इसमें भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओंका विस्तृत वर्णन, अनेक रोचक एवं रहस्यमयी कथाएँ, श्रीराधाकी गोलोक-लीला तथा अवतार-लीलाका सुन्दर विवेचन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

वामनपुराण, अनुवादसहित (कोड 1432) ग्रन्थाकार—यह पुराण मुख्यरूपसे त्रिविक्रम भगवान् विष्णुके दिव्य माहात्म्यका व्याख्याता है। इसमें भगवान् वामन, नर-नारायण, भगवती दुर्गाके उत्तम चरित्रके साथ-साथ भक्त प्रह्लाद तथा श्रीदामा आदि भक्तोंके बड़े रम्य आख्यान हैं। सचित्र, सजिल्द।

अग्निपुराण, केवल हिन्दी-अनुवाद (कोड 1362) ग्रन्थाकार—इसमें परा-अपरा विद्याओंका वर्णन, महाभारतके सभी पर्वोंकी संक्षिप्त कथा, रामायणकी संक्षिप्त कथा, मत्स्य, कूर्म आदि अवतारोंकी कथाएँ, वास्तु-पूजा, विभिन्न देवताओंके मन्त्र आदि अनेक उपयोगी विषयोंका अत्यन्त सुन्दर प्रतिपादन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

मत्स्यमहापुराण, अनुवादसहित (कोड 557)—यह पुराण मत्स्यावतारके रूपमें भगवान् विष्णुकी लीलाओंका सुन्दर परिचायक है। इसमें मत्स्यावतारकी कथा, सृष्टि-वर्णन, मन्वन्तर तथा पितृवंश-वर्णन, ययाति-चरित्र, राजनीति, यात्राकाल, स्वप्नशास्त्र, शकुन-शास्त्र आदि अनेक विषयोंका सरल वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

कूर्मपुराण, अनुवादसहित (कोड 1131)—इस पुराणमें भगवान्के कूर्मावतारकी कथाके साथ-साथ सृष्टि वर्णन, वर्ण, आश्रम और उनके कर्तव्यका वर्णन, युगधर्म, मोक्षके साधन, तीर्थ-माहात्म्य, २८ व्यासोंकी कथाएँ, ईश्वर-गीता, व्यास-गीता आदि विविध विषयोंका अत्यन्त सुन्दर प्रतिपादन किया गया है। विभिन्न दृष्टियोंसे इस पुराणका पठन-पाठन सबके लिये कल्याणकारी है। सचित्र, सजिल्द।

संक्षिप्त श्रीमद्देवीभागवत-मोटा टाइप (कोड 1133) ग्रन्थाकार—यह पुराण परम पवित्र वेदकी प्रसिद्ध श्रुतियोंके अर्थसे अनुमोदित, अखिल शास्त्रोंके रहस्यका स्रोत तथा आगमोंमें अपना प्रसिद्ध स्थान रखता है। यह सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, वंशानुकीर्ति, मन्वन्तर आदि पाँचों लक्षणोंसे पूर्ण है। पराम्बा भगवतीके पवित्र आख्यानोंसे युक्त इस पुराणका पठन-पाठन तथा अनुष्ठान भक्तोंके त्रितापोंका शमन करनेवाला तथा सिद्धियोंका प्रदाता है। सचित्र, सजिल्द (कोड 1897, 1898) अनुवादसहित (कोड 1326) गुजराती।

नरसिंहपुराण, अनुवादसहित (कोड 1113) ग्रन्थाकार—इस पुराणमें दशावतारकी कथाएँ एवं सात काण्डोंमें भगवान् श्रीरामके पावन चरित्रके साथ-साथ सदाचार, राजनीति, वर्णधर्म, आश्रम-धर्म, योग-साधना आदिका सुन्दर विवेचन किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें भगवान् नरसिंहकी विस्तृत महिमा, अनेक कल्याणप्रद उपाख्यानोंका वर्णन, भौगोलिक वर्णन, सूर्य-चन्द्रादिसे उत्पन्न राजवंशोंका वर्णन तथा अनेक स्तुतियोंका उल्लेख है। सचित्र, सजिल्द।

महाभारत-खिलभाग हरिवंशपुराण, अनुवादसहित (कोड 38) ग्रन्थाकार— हरिवंशपुराण वेदार्थ-प्रकाशक महाभारत ग्रन्थका अन्तिम पर्व है। पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे हरिवंशपुराणके श्रवणकी परम्परा भारतवर्षमें चिरकालसे प्रचलित है। भगवान् श्रीकृष्णसे सम्बन्धित अगणित कथाएँ इसमें ऐसी हैं, जो अन्यत्र दुर्लभ हैं। धार्मिक जन-सामान्यके कल्याणार्थ इसके अन्तमें सन्तानगोपाल-मन्त्र, अनुष्ठान-विधि, सन्तान-गोपाल-यन्त्र तथा संतान-गोपालस्तोत्र भी संगृहीत हैं। सचित्र, सजिल्द। (कोड 1589) केवल हिन्दीमें भी।

महाभागवत [ देवीपुराण ], अनुवादसहित (कोड 1610) ग्रन्थाकार—इस पुराणमें मुख्य रूपसे भगवती महाशक्तिके माहात्म्य एवं उनके विभिन्न चरित्रोंका विस्तृत वर्णन है। इसमें मूल प्रकृति भगवतीके गङ्गा, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती, तुलसी आदि रूपोंमें विवर्तित होनेके मनोरम आख्यान हैं। सचित्र, सजिल्द।

लिङ्गमहापुराण, अनुवादसहित (कोड 1985) संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी टीका—यह पुराण भगवान् शिवकी उपासना एवं महिमाका विस्तृत परिचायक है। इसमें शैवदर्शन, पाशुपतयोग, लिङ्ग-स्वरूप, लिङ्ग-माहात्म्य, लिङ्गार्चन एवं योगाचार्यों तथा शिव भक्तोंकी कथाओंका सरस वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।

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