भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1392
* प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य *१३६३
पैर और मन भलीभाँति वशमें होते हैं, उसीको उत्तम यशकी प्राप्ति होती है और उसे ही तीर्थका निश्चित फल प्राप्त होता है। यात्रीके पास धन हो तो वह दूसरेका अन्न और दूसरेकी रसोई अवश्य त्याग दे। धन न होनेपर भोजनमात्र दूसरोंसे ले लिया जाय तो उसमें कोई दोष नहीं है। द्वारकाके मार्गपर चलनेवाले मनुष्योंको परस्पर भक्तिभाव बढ़ानेवाली भगवान् विष्णुकी कथा सुननी चाहिये और प्रसन्नतापूर्वक श्रीहरिके नामोंका कीर्तन करना चाहिये। वैदिक मन्त्रोंका जप करना भी उचित है। आगमोक्त और पुराणोक्त स्तोत्र भगवान्की अत्यन्त प्रसन्नता बढ़ानेवाले होते हैं; अतः उनका भी पाठ करना चाहिये*।'<br><br> नारदजीके इस प्रकार कहनेपर सब महर्षि बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके मार्गपर जाते समय सब कुछ उसी प्रकार किया। कोई भगवान् विष्णुकी लोकविख्यात कथाएँ सुनते थे, जिनके श्रवण करनेमात्रसे भगवान् हृदयमें आकर बस जाते हैं। कुछ महर्षि महान् पुण्यदायक तथा कलिमें सबको पवित्र करनेवाले भगवन्नामोंका कीर्तन करते थे। कुछ मुनियोंने दिव्य पुराणसंहिताका पाठ किया, जो भगवान् विष्णुकी मंगलमयी महिमाको प्रकाशित करती है। भगवान्के जो सद्गुण हैं, उन्होंने पूर्वकालमें लीलावतार धारण करके जो पराक्रमपूर्ण लीलाएँ की हैं, उन्हींको कुछ लोग प्रसन्नतापूर्वक सुनते थे। कुछ मंगलमय महात्मा पुरुष आनन्दमें मग्न हो नेत्रोंसे प्रेमाश्रु बहाते हुए बड़ी भक्तिसे भगवान् वासुदेवकी लीला-कथा सुनाया करते थे। कुछ लोग प्राचीन मुनियोंद्वारा वर्णित भगवच्चरित्रोंका गान करते थे। दूसरे महात्माआदि-अन्तरहित देवेश्वर भगवान् विष्णुका भक्तिभावसे चिन्तन ही करते रहते थे। कुछ मुनि मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर बड़ी प्रसन्नताके साथ भगवान्के वैदिक, पौराणिक तथा वैष्णवशास्त्रोक्त स्तोत्रोंका पाठ करते थे। दूसरे महर्षि भगवान्के पापहारी नामोंका कीर्तन करते थे। कोई शतनाम, कोई सहस्रनाम और कोई लक्षनाम जपते थे। कुछ मुनि प्रसन्न होकर लौकिक भाषामें गाये हुए हरिनामोंका गान करते थे। कुछ लोग अपने शरीरकी सुधि भूलकर सब ओर भगवान्के सुन्दर रूपोंका साक्षात्कार करते थे। वे जो कुछ देखते और जो कुछ सुनते थे, वह सब उन्हें चतुर्भुज विष्णुरूप प्रतीत होता था। कोई गाने-बजाने और करतालकी ध्वनिके साथ उत्सव करते चलते थे। कोई गाते, कोई नाचते और कोई नृत्य एवं तालके अनुसार बाजे बजाते थे। सब लोग एक साथ मिलकर एक स्वरसे हरिनामकी गर्जना करते थे। परमानन्दमें निमग्न होकर वे परस्पर हँसते थे। गीत और नृत्यके साथ श्रीहरिका उत्सव मनाते थे और भगवान् विष्णुमें मन लगाकर वैष्णवमन्त्रोंका जप करते थे। ऐसे महात्माओंको देखकर पापी भी शुद्ध हो जाता है। जिसे ऐसे वैष्णव महात्माओंका दर्शन होता है, उससे बढ़कर धन्य पुरुष तीनों लोकोंमें कोई नहीं है। द्वारकाके मार्गमें नृत्य और कीर्तन करके प्रसन्न होनेवाले सभी पुरुषोंको उनके चरणोंमें लगे हुए धूलि-कणकी संख्याके बराबर अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। द्वारकाके यात्रीको पग-पगपर उसकी पग-धूलिकी संख्याके अनुसार सहस्रों यज्ञोंका पुण्य प्राप्त होता है।

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* यस्य हस्तौ च पादौ च मनो यस्य सुसंयतम् ।तस्य चैव पराकीर्तिर्भवेत्तीर्थफलं ध्रुवम् ॥
परान्नं परपाकं च सति वित्ते त्यजेद् ध्रुवम् ।न दोषोऽसति वित्तेऽस्य तावन्मात्र प्रतिग्रहे ॥
श्रोतव्या सत्कथा विष्णोर्नामसङ्कीर्तनं मुदा ।द्वारकापथि गच्छद्भिरन्योन्यं भक्तिवर्द्धनम् ॥
जप्तव्यं वैदिकं जाप्यं स्तोत्रमागामिकं तथा ।पौराणिकं च यत्स्तोत्रं विष्णोः सुप्रीतिहेतवे ॥

(स्क० पु०, द्वा० मा० ३२। ३१-३४)