भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1391

१३६२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करना चाहता है, वह एकादशीकी रात्रिमें श्रीहरिके समीप भक्तिपूर्वक जागरण करे। एकादशीके दिन जो लोग जागरण करते हैं उनके शरीरमें इन्द्र आदि देवता आकर स्थित होते हैं। जो जागरणकालमें महाभारतका पाठ करते हैं, वे उस परमधाममें जाते हैं जहाँ संन्यासी-महात्मा जाया करते हैं। जो उस समय श्रीरामचन्द्रजीका चरित्र, दशकण्ठ-वध पढ़ते हैं, वे योगवेत्ताओंकी गतिको प्राप्त होते हैं। जिन्होंने श्रीहरिके समीप जागरण किया है, उन्होंने चारों वेदोंका स्वाध्याय, देवताओंका पूजन, यज्ञोंका अनुष्ठान तथा सब तीर्थोंमें स्नान कर लिया। श्रीकृष्णसे बढ़कर कोई देवता नहीं है। उनके दिनसे बढ़कर दूसरा कोई दिन नहीं है और एकादशी व्रतके समान दूसरा कोई व्रत नहीं है। जहाँ भागवत शास्त्र है, भगवान् विष्णुके लिये जहाँ जागरण किया जाता है और जहाँ शालग्रामशिला स्थित होती है, वहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु उपस्थित होते हैं।

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द्वारका-यात्राकी विधि एवं महिमा

प्रह्लादजी कहते हैं—एक समय देवर्षि नारदजीने महर्षियोंसे इस प्रकार कहा—‘द्वारकाकी यात्रा करनेवाले श्रद्धालु मनुष्यको चाहिये कि पहले दिन तेल, उबटन लगाकर स्नान करके वैष्णवोंका पूजन करे और अपनी शक्तिके अनुसार उन्हें भोजन कराये। तदनन्तर भावनाद्वारा भगवान् महाविष्णुसे आज्ञा लेकर पक्वान्न भोजन करे और प्रसन्नतापूर्वक द्वारका तथा श्रीकृष्णका चिन्तन करते हुए रातमें पृथ्वीपर शयन करे। प्रातःकाल पवित्र हो स्नान करके जगदीश्वरकी पूजा, परिक्रमा और नमस्कार करे। तत्पश्चात् महाविष्णुकी आज्ञा लेकर कुलके बड़े-बूढ़े पुरुषों, ब्राह्मणों तथा वैष्णवजनोंसे मिले। गन्ध और ताम्बूलसे उनका अर्चन करे और उनके आगे महान् उत्सव मनावे। तदनन्तर गाने-बजाने और स्तुति-पाठके द्वारा द्वारकापुरीके लिये प्रसन्नतापूर्वक यात्रा प्रारम्भ करे। द्वारका जानेवाले पुरुषको शान्त, जितेन्द्रिय, पवित्र, ब्रह्मचारी तथा भूमिशायी होना चाहिये। मार्गमें एकाग्रचित्त होकर विष्णुसहस्रनाम आदि स्तोत्र, पुराण-पाठ और वैदिक सूक्तोंका पठन करना चाहिये। स्वयं प्रसन्न रहकर दूसरोंसे सदा प्रिय वचन बोले। सबको सम्मान दे। दूसरोंकी थकावट दूर करनेका प्रयत्न करे। द्वारका जानेवाले वृद्ध और असमर्थ पुरुषोंको जल दे। उन्हें सुखपूर्वक ठहरनेकी व्यवस्था करे और उन्हें सवारी भी दिलानेकी चेष्टा करे। मनमें दयाभाव रखते हुए उन सबकी सेवा करे। अपने पास धन हो तो मनुष्य उन यात्रियोंको अन्न और वस्त्र आदि भी दे। भगवान् श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये यह सब कुछ करे। इससे महान् पुण्यकी प्राप्ति होती है। उस समय अपनी शक्तिके अनुसार थोड़ा-सा भी दिया जाय तो वह कोटिगुना होकर फलता है। जो भक्तिभावसे मार्गमें श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये यात्रीको एक ग्रास अन्न भी देता है, उसके द्वारा मानो सात द्वीपोंवाली पृथ्वी दे दी गयी। उसके पुण्यका कभी अन्त नहीं होता। द्वारकाके क्षेत्रमें श्रीकृष्णके समीप एक ब्राह्मणको भोजन करानेपर दस राजसूय-यज्ञका फल मिलता है, जिन्होंने द्वारका जानेवाले यात्रियोंको अन्नदान किया है, उन्होंने लाखों बार गया-श्राद्ध कर लिया। अपने पास विभव हो तो जूता, खड़ाऊँ, छाता, कम्बल, अन्न, जल, वस्त्र तथा पात्र दान करे। महाविष्णुकी प्रसन्नताके लिये जो कुछ भी दान किया जाता है, वह सब मनोरथोंकी सिद्धि करनेवाला होता है। मनस्वी पुरुषोंको आदरपूर्वक भगवान् विष्णुकी आराधना करनी चाहिये। तीर्थयात्रीको परायी निन्दा कदापि नहीं करनी चाहिये। जिसके हाथ,