भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1390
  • प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३६१

चार प्रकारके पाप नष्ट हो जाते हैं। जो एकादशीके दिन वैष्णव-शास्त्रका उपदेश करता है, उसे मेरा भक्त जानना चाहिये। जिसे एकादशीके जागरणमें निद्रा नहीं आती और जो उत्साहपूर्वक नाचता एवं गाता है, वह मेरा विशेष भक्त है। मैं उसे उत्तम ज्ञान देता हूँ और भगवान् विष्णु मोक्ष प्रदान करते हैं। अतः मेरे भक्तको विशेषरूपसे जागरण करना चाहिये। जो भगवान् विष्णुसे वैर करते हैं, उन्हें पाखण्डी जानना चाहिये। जो एकादशीको जागरण करते और गाते हैं, उन्हें आधे निमेषमें अग्निष्टोम तथा अतिरात्र-यज्ञके समान फल प्राप्त होता है। जो रात्रि-जागरणमें बारंबार भगवान् विष्णुके मुखारविन्दका दर्शन करते हैं, उनको भी वही फल प्राप्त होता है। जो मानव द्वादशी तिथिको भगवान् विष्णुके आगे जागरण करते हैं, वे यमराजके पाशसे मुक्त हो जाते हैं। जो द्वादशीको जागरण करते समय गीता-शास्त्रसे मनोविनोद करते हैं, वे भी यमराजके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। जो प्राणत्याग हो जानेपर भी द्वादशीका जागरण नहीं छोड़ते, वे धन्य और पुण्यात्मा हैं। जिनके वंशके लोग एकादशीकी रातमें जागरण करते हैं, वे ही धन्य हैं। जिन्होंने एकादशीको जागरण किया है, उन्होंने यज्ञ, दान, गयाश्राद्ध और नित्य प्रयागस्नान कर लिया। उन्हें संन्यासियोंका पुण्य भी मिल गया और उनके द्वारा इष्टापूर्त कर्मका भी भलीभाँति पालन हो गया। षडानन! भगवान् विष्णुके भक्त जागरणसहित एकादशीव्रत करते हैं, इसलिये वे मुझे सदा ही विशेष प्रिय हैं। जिसने वर्द्धिनी एकादशीकी रातमें जागरण किया है, उसने पुनः प्राप्त होनेवाले शरीरको स्वयं ही भस्म कर दिया। जिसने त्रिस्पृशा एकादशीको रातमें जागरण किया है, वह भगवान् विष्णुके स्वरूपमें लीन हो जाता है। जिसने हरिबोधिनी एकादशीकी रातमें जागरण किया है, उसके स्थूल-सूक्ष्म सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो द्वादशीकी रातमें जागरण तथा ताल-स्वरके साथ संगीतका आयोजन करता है, उसे महान् पुण्यकी प्राप्ति होती है। जो एकादशीके दिन ऋषियोंद्वारा बनाये हुए दिव्य स्तोत्रोंसे ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदके वैष्णव मन्त्रोंसे, संस्कृत और प्राकृतके अन्य स्तोत्रोंसे तथा गीत, वाद्य आदिके द्वारा भगवान् विष्णुको सन्तुष्ट करता है, उसे भगवान् विष्णु भी परमानन्द प्रदान करते हैं। जो एकादशीकी रातमें भगवान् विष्णुके आगे वैष्णवभक्तोंके समीप गीता और विष्णुसहस्रनामका पाठ करता है, वह उस परमधाममें जाता है, जहाँ साक्षात् भगवान् नारायण विराजमान हैं।* पुण्यमय भागवत तथा स्कन्दपुराण भगवान् विष्णुको प्रिय है। मथुरा और ब्रजमें भगवान् विष्णुके बालचरित्रका जो वर्णन किया गया है, उसे जो एकादशीकी रातमें भगवान् केशवका पूजन करके पढ़ता है, उसका पुण्य कितना है, यह मैं भी नहीं जानता। कदाचित् भगवान् विष्णु जानते हों। बेटा! भगवान्‌के समीप गीत, नृत्य तथा स्तोत्रपाठ आदिसे जो फल होता है, वही कलिमें श्रीहरिके समीप जागरण करते समय विष्णुसहस्रनाम, गीता तथा श्रीमद्भागवतका पाठ करनेसे सहस्र गुना होकर मिलता है। जो श्रीहरिके समीप जागरण करते समय रातमें दीपक जलाता है, उसका पुण्य सौ कल्पोंमें भी नष्ट नहीं होता। जो जागरणकालमें मंजरीसहित तुलसीदलसे भक्तिपूर्वक श्रीहरिका पूजन करता है, उसका पुनः इस संसारमें जन्म नहीं होता। स्नान, चन्दन, लेप, धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल यह सब जागरणकालमें भगवान्‌को समर्पित किया जाय तो उससे अक्षय पुण्य होता है। कार्तिकेय! जो भक्त मेरा ध्यान


* यः पुनः पठते रात्रौ गीतां नामसहस्रकम्। द्वादश्यां पुरतो विष्णोर्वैष्णवानां समीपतः।
स गच्छेत्परमं स्थानं यत्र नारायणः स्वयम्॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० २८।४३-४४)