भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1389
१३६०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

उसका जीवन सफल है, उसकी चेष्टा सफल है और उसीकी वाणी सफल है। द्वारकापुरीमें अपने पुत्रको देखकर नरकसे छूटे हुए पितर स्वर्गमें स्थित होकर हँसते, गाते और उछलते हैं। मनुष्योंका जो गुप्त पातक है, उसे गोमती अपना स्मरण और कीर्तन करनेसे भी नष्ट कर देती है, फिर उसकी स्तुति की जाय, तब तो कहना ही क्या है? जो कलिकालमें वर्द्धिनी एकादशीको उपवास करते हैं, वे दुर्लभ हैं। द्वारका, गया और वर्द्धिनी एकादशी—इन तीनोंका पुण्यफल एक-सा बताया गया है। वर्द्धिनी एकादशी सबसे बढ़कर है। क्योंकि उस दिन उपवास करके द्वादशीको पारण करनेपर भगवान् विष्णुका परम पद अनायास ही प्राप्त हो जाता है। वर्द्धिनी एकादशीको उपवास करनेसे घरमें ही तीर्थसेवन, तपस्याका अनुष्ठान और मोक्ष प्राप्त हो जाते हैं। वर्द्धिनी एकादशी, द्वारकापुरी, गंगा, गया, गोविन्दजीका दर्शन, गोमती, गोकुल, गीता और गोपीचन्दन—ये दुर्लभ हैं।<sup></sup>

जो मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णमें मन लगाकर इस प्रसंगको सुनता है, वह एक हजार अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। जो एकादशीकी रातमें जागरण करते समय भगवान् केशवके इस माहात्म्यको सुनेंगे, वे सब पापोंसे मुक्त हो वैकुण्ठधामको जायँगे। जो मानव इसे प्रतिदिन भक्तिपूर्वक पढ़ेंगे अथवा सुनेंगे, वे तुलादानका फल पावेंगे, एकादशीको जो थोड़ा भी दान किया जाता है, वह कोटिगुना होता है, ऐसा जानना चाहिये।


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एकादशीकी रात्रिमें श्रीहरिके समीप जागरणका माहात्म्य

मार्कण्डेयजी कहते हैं—जिन्होंने पिताकी आज्ञासे समस्त राज्यको वस्त्रमें लगे हुए तिनकेके समान त्याग दिया और अनुपम धर्मका ही संबल लेकर भयंकर वनको प्रस्थान किया, 'मुझे वनवास दे दिया गया' यह समाचार सुनकर बलवान् होते हुए भी जिनके मनमें क्रोध आदि विकार नहीं उत्पन्न हुए, वे विभीषणकी पीड़ा दूर करनेवाले श्रीराम-नामसे प्रसिद्ध भगवान् विष्णु आपलोगोंकी रक्षा करें।<sup></sup>

एक समयकी बात है, सब धर्मोंके ज्ञाता, वेद और शास्त्रोंके अर्थज्ञानमें पारंगत, सबके हृदयमें रमण करनेवाले श्रीविष्णुके तत्त्वको जाननेवाले तथा भगवत्परायण प्रह्लादजी जब सुखपूर्वक बैठे हुए थे, उस समय उनके समीप स्वधर्मका पालन करनेवाले महर्षि कुछ पूछनेके लिये आये। वे बोले—'प्रह्लादजी! आप कोई ऐसा साधन बताइये, जिससे ज्ञान, ध्यान और इन्द्रियनिग्रहके बिना ही अनायास भगवान् विष्णुका परम पद प्राप्त हो जाता है।'

उनके ऐसा कहनेपर सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये उद्यत रहनेवाले विष्णुभक्त महाभाग प्रह्लादजीने संक्षेपसे इस प्रकार कहा—'महर्षियो! जो अठारह पुराणोंका सारसे भी सारतर तत्त्व है, जिसे कार्तिकेयजीके पूछनेपर भगवान् शंकरने उन्हें बताया था, उसका वर्णन करता हूँ, सुनिये।

महादेवजी कार्तिकेयसे बोले—जो कलिमें एकादशीकी रातमें जागरण करते समय वैष्णवशास्त्रका पाठ करता है, उसके कोटि जन्मोंके किये हुए


१- वर्द्धिनी द्वारका गङ्गा गया गोविन्ददर्शनम्। गोमती गोकुलं गीता दुर्लभं गोपिचन्दनम्॥
(स्क० पु०, ब्रा० मा० २७।६३)
२- राज्यं येन पटान्तलग्नतृणवत् त्यक्तं गुरोराज्ञया पाथेयं परिगृह्य धर्ममतुलं घोरं वनं प्रस्थितः।
श्रुत्वाप्याऽऽत्मविवासनं च बलवान् यो नागतो विक्रियां पायाद्वः स विभीषणार्तिहरणो रामाभिधानो हरिः॥
(स्क० पु०, ब्रा० मा० २८।१)