संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1388, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * । १३५९
और यमुनाके जलमें स्नान करते हैं। जो पश्चिम दिशाकी ओर मुँह करके स्नान करते और दोनों हाथ जोड़कर द्वारकापुरीका स्मरण करते हैं, उन्हें कोटिगुना फल होता है। कलियुगमें जो मानव द्वारकापुरीका चिन्तन करते हैं वे दस हजार कपिला गौओंके दानका पुण्य पाते हैं। राजन्! मैं मार्कण्डेय सात कल्पकी बातोंका स्मरण करनेवाला हूँ। कलियुगमें द्वारकापुरीके समान अथवा इससे बढ़कर दूसरी कोई पुरी नहीं है। कलियुगमें जो मनुष्य द्वारकापुरीको जाता है, वह पग-पगपर एक हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञोंका फल पाता है। नृपश्रेष्ठ! कलियुगमें द्वारकाकी यात्रा करते हुए जिन मनुष्योंका चित्त विचलित नहीं होता, उनका जीवन सफल है। जिसने गोमतीके तटपर भगवान् श्रीकृष्णके समीप पिण्डान किया है, उसी पुत्रसे माता पुत्रवती है और पितर पुत्रवान् है। गोपीचन्दनका तिलक करके मनुष्य यदि इस पृथ्वीपर भ्रमण करता है, तो उससे वह समूचा देश पवित्र हो जाता है। फिर जहाँ वह स्वयं स्थित है, उसके लिये तो कहना ही क्या है। जो द्वारकामें उत्पन्न हुई श्रीकृष्णसेवित तुलसीको अपने मस्तकपर धारण करता है, वह स्वर्गलोकका स्वामी होता है। भगवान् विष्णुको विजया एकादशी तिथि, गंगाजल, काशीपुरी, तुलसी, आँवलेका फल, भागवत शास्त्र, रामायण, द्वारकापुरी, चमेलीका फूल, एकादशीकी रातमें जागरण तथा कीर्तन और गायन—ये अधिक प्रिय हैं।* कलिकालमें जिसके घरमें सदा गोपीचन्दनकी मृत्तिका विद्यमान है वहाँ श्रीकृष्णसहित द्वारकापुरी स्थित है। कृतघ्न, गोघाती तथा समस्त पापोंका आचरण करनेवाला मनुष्य भी गोपीचन्दनके सम्पर्कसे तत्काल पवित्र हो जाता है। जो किसी वैष्णवको गोपीचन्दनका एक टुकड़ा देता है, वह अपने कुलका उद्धार करता है। जिसके मन्दिरमें द्वारकाकी तुलसी है, उससे यमराज भी डरते हैं। द्वारकाकी मृत्तिका, तुलसी तथा श्रीकृष्णका कीर्तन सौ करोड़ यज्ञोंसे भी अधिक पुण्यदायक बताया गया है। मैंने सब शास्त्रों और पुराणोंका बार-बार अवलोकन करके देख लिया, मुझे द्वारकाके समान दूसरी कोई पुरी नहीं दिखायी दी। जिसने द्वारकाकी यात्रा और श्रीकृष्णका कीर्तन किया है, उसने हजारों तीर्थोंमें स्नान और करोड़ों यज्ञोंका यजन कर लिया है। जिन मनुष्योंने द्वारकापुरीमें जाकर श्रीकृष्णके मुखारविन्दका दर्शन नहीं किया, वे मानव पंगु हैं, जन्मके ही अन्धे हैं। जिन्होंने द्वारकापुरीमें जाकर एकादशीकी रात्रिमें भक्तिपूर्वक जागरण और नृत्य किया है, वे कृतार्थ और धन्य हैं। जो श्रीकृष्णपुरी द्वारकामें जाकर गोमतीके तटपर पिण्डदान और यथाशक्ति दान करता है, उसके पितर तृप्त हो जाते हैं। जो द्वारकापुरीमें गया है, उस मनुष्यको सौ जन्मोंतक प्रेत और पिशाचकी योनि नहीं मिलती। जो मनुष्य वैशाखमासमें हिंडोलेपर बैठे हुए श्रीकृष्णका दर्शन करते हैं, उनके पुत्र, पौत्र, प्रपितामह, श्वशुर, दास, भृत्य और पशु भी भगवान् विष्णुके साथ क्रीड़ा करते हैं। जो मानव कलिकालमें श्रीकृष्णके समीप द्वादशीको उपवास करते हैं, उनमें तथा श्रीकृष्णमें मैं कोई अन्तर नहीं देखता। श्रीकृष्णके समीप द्वादशी तिथिके समान कोई दिन नहीं है। श्रीकृष्णके निकट सभी तिथियाँ युगादि तिथियोंके समान पुण्यदायिनी होती हैं। कलियुगमें अधिक पुण्यात्मा पुरुषोंको द्वारकापुरीका सेवन करना चाहिये। कलिमें श्रीकृष्णकी कृपाके बिना कोई द्वारकापुरीमें नहीं जा सकता। श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये शिव आदि देवता सदा द्वारकापुरी जाते हैं। जो 'कृष्ण-कृष्ण' का कीर्तन करता है,
* दैत्यारेर्भगवत्तिथिश्च विजया नीरं च गाङ्गोद्भवं नित्यं काशिपुरी तथैव तुलसी धात्रीफलं वल्लभम्।
शास्त्रं भागवतं तथा च दयितं रामायणं द्वारका पुष्पं मालतिसम्भवं सुदयितं गीतं कृतं जागरम्॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० २७। २८)