संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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है, जैसी कि लक्ष्मी हैं। मनुष्यको अपने घरमें रहते हुए भी शंखोद्धारतीर्थ और शंखधारी भगवान् विष्णुका स्मरण करना चाहिये। करोड़ों सूर्यग्रहणोंके समय सरस्वतीतीर्थमें जो फल होता है, वही आधे पलमें शंखोद्धारतीर्थके दर्शनसे हो जाता है। जो मनुष्य शंखोद्धारतीर्थमें स्नान करके शंखधारी श्रीहरिका दर्शन करता है, उसके पुण्यकी कोई संख्या नहीं है। मनुष्य तभीतक संसारमें तथा पापपूर्ण नरकमें भटकते हैं जबतक कलिमलनाशक शंखोद्धार-तीर्थका दर्शन नहीं करते। शंखोधारतीर्थमें स्नान करके मनुष्य फिर जन्म नहीं लेता। शंखोद्धारतीर्थके समान मोक्षदायक तीर्थ प्रायः नहीं देखा जाता। साढ़े तीन करोड़ तीर्थ कहे गये हैं। शंखोद्धारमें उन सभी तीर्थोंका फल प्राप्त होता है। जिसका मन श्रीकृष्णमें नहीं लगता है और जो शंखोद्धारतीर्थका दर्शन नहीं करता है, उसके स्वर्गवासी पितर भी उसे भयंकर शाप देते हैं। जो शंखोद्धारतीर्थमें रहकर अन्नदान करता है, उसने रुक्मिणीपतिकी प्रसन्नतासे स्वयं ही मुक्ति प्राप्त कर ली। अन्नदानके समान दूसरा कोई दान न हुआ है न होगा। इसलिये प्रयत्नपूर्वक अन्नदान करना चाहिये।
कुन्तीनन्दन! जो तुलसीदलसे मेरी पूजा करता है, उससे इन्द्रदेव भी भयभीत होते हैं। जो किसी भी कारणसे श्रीकृष्णका एकादशी व्रत कर लेते हैं, वे धन्य हैं। मृत्युके पश्चात् उन्हें चतुर्भुज भगवान् विष्णु प्राप्त होते हैं। द्वारका समुद्रके जलमें सब ओरसे दुर्जय है और उसके मध्यभागमें पापनाशक शंखदेव निवास करते हैं। जो मनुष्य शंखोद्धारमें स्नान करके विधिपूर्वक श्राद्ध करते हैं, वे अपने पितरोंका उद्धार करके उत्तम लोकको जाते हैं। भगवान् शंखधारीको नमस्कार और उनका पूजन करके मानव उस निर्मल लोकमें जाता है, जहाँ शोकका अत्यन्त अभाव है। भगवान् शंखधरका दर्शन करके मरणधर्मा मनुष्य अनेक जन्मोंके घोर पापोंसे मुक्त तथा कृतकृत्य हो जाता है। भगवान् शंख उसे मनोवांछित फल देते हैं।
द्वारकापुरी, गोपीचन्दन तथा गोमतीका माहात्म्य
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! कलिकालमें मथुरा, द्वारका और अयोध्या—ये तीन पुरियाँ भगवान्को अत्यन्त प्रिय तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देनेवाली हैं। मथुरामें यमुना, द्वारकामें गोमती तथा अयोध्यामें सरयू नदी है, जो सेवन करनेपर मोक्षदायिनी होती है। अयोध्यामें श्रीहरिका, द्वारकामें श्रीकृष्णका और मथुरामें केशवका स्मरण करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है। संसारमें मथुरापुरी धन्य है, जहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु प्रकट हुए हैं। द्वारकापुरी सफल है, जहाँ रहकर श्रीहरिने अनेक प्रकारकी लीलाएँ की हैं और सब कामनाओंको देनेवाली अयोध्यापुरी धन्यातिधन्य है, जिसका स्वयं धर्मज्ञ भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने पालन किया है। अयोध्याके स्वामी भगवान् श्रीरामका, मथुरावासी केशवका तथा द्वारकानिवासी परम सुन्दर श्रीकृष्णका प्रेमसे कीर्तन करे। कीर्तन करनेसे मथुरा, स्मरण करनेसे द्वारकापुरी और यात्रा करनेसे अयोध्यापुरी पुण्यदायिनी होती है। इन तीनोंके द्वारा विशुद्ध पदकी प्राप्ति होती है। श्रीकृष्ण, ब्रह्माजी, श्रीविष्णु तथा द्वारकापुरीका श्रवण अथवा दर्शन करके मनुष्य जन्मके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। अयोध्या, मथुरा और द्वारकापुरी श्रवण अथवा दर्शनकी अभिलाषा करनेपर कल्पभरके पापका नाश कर देती है। कलियुगमें जो श्रीकृष्ण, विष्णु और हरिका स्मरण करता तथा द्वादशीको रातमें भगवान्के समीप जागता है, उसे दस हजार अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। कलिकालमें वे मनुष्य धन्य हैं, जो सरयू, गोमती