भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1386

* प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३५७

वे हरिद्वार, प्रयाग, गया, कुरुक्षेत्र, पुष्कर, प्रभास, श्रीस्थल और शुक्लतीर्थके सेवनका तथा सहस्रों चान्द्रायणव्रतका फल पाते हैं। द्वारकापुरी धन्य है, जहाँ गोमती नदी बहती है और जहाँ रुक्मिणीवल्लभ श्रीकृष्ण निवास करते हैं। जो कलिकालमें पापसे मोहित होकर गोमतीके जलमें स्नान नहीं करते, उनके पापबन्धनका नाश कैसे होगा। श्रीकृष्णने कलिकालके लिये गोमती नदीको स्वर्गलोककी सीढ़ी बनाया है। वह मनुष्योंके मनको आनन्द देनेवाली तथा स्नानमात्रसे मोक्ष प्रदान करनेवाली है। राजन्! जहाँ गोमतीके जलसे मिला हुआ समुद्र जाग रहा है, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण विराजमान हैं और जहाँ पूजन करनेपर मोक्ष देनेवाली चक्रांकित शिलाएँ उपलब्ध होती हैं, वहाँ चलो। जहाँकी मिट्टी भी चक्रसे चिह्नित होकर कलियुगमें पापका नाश करनेके लिये स्थित है, जो पुरी दैत्य, दानव, राक्षस तथा देवताओंको भी शरण देनेवाली है, जिसे देवकीनन्दन श्रीकृष्ण कलिकालमें कभी नहीं छोड़ते हैं, उस द्वारकापुरीका कौन सेवन नहीं करेगा? जो मनुष्य द्वारकामें श्रीकृष्णचन्द्रजीके मुखारविन्दका तीनों समय दर्शन करते हैं, उनकी करोड़ों कल्पोंमें भी पुनरावृत्ति नहीं होती। जो विधवा स्त्री द्वारकामें निवास करती है, वह परम पदको प्राप्त होती है। जो द्वारकापुरीको नहीं गया, वह इस संसारमें पुत्र लेकर भी क्या करेगा?

श्रीकृष्णकी द्वारकापुरीमें जाकर जो तुलसीदलोंसे उनकी पूजा करता है, उसने जन्मका फल पा लिया और पितरोंको तार दिया। जो श्रीकृष्णके श्रीविग्रहसे उतारी हुई प्रसाद-स्वरूपा तुलसीमाला धारण करता है, वह एक-एक पत्तेमें दस अश्वमेध यज्ञोंका फल पाता है। जिसके मस्तकपर तुलसीके काष्ठकी माला शोभा देती है, उस मानवके शरीरमें साक्षात् श्रीहरि विराजमान होते हैं। जो कलियुगमें तुलसीकाष्ठमालासे विभूषित होकर पुण्यकर्म करता है तथा देवताओं और पितरोंका पूजन करता है उसका वह सत्कर्म कोटिगुना हो जाता है। तुलसीकाष्ठकी माला देखकर यमराजके दूत दूर भागते हैं, जैसे आँधीसे उड़ाये हुए पत्ते दूर हो जाते हैं। जिसके घरमें तुलसीका काष्ठ तथा उसकी सूखी या हरी पत्ती रहती है, उसके घरमें कहींसे पापका संक्रमण नहीं होता। जो तुलसीमालासे भूषित होता है, उसके हृदयमें भगवान् श्रीकृष्णके प्रति अविचल भक्ति होती है तथा उसे इहलोक और परलोकमें भय नहीं प्राप्त होते। उसके दुःस्वप्न, अपशकुन और शत्रुभयका निवारण हो जाता है। बोधिनी, शयनी, त्रिस्पृशा तथा पक्षवर्द्धिनी एकादशी अवश्य करनी चाहिये। अष्टमीके भी जयन्ती, विजया और जया आदि कई भेद हैं। वह सब पापोंका नाश करनेवाली तथा श्रीकृष्णको अत्यन्त प्रिय है।


शंखोद्धारतीर्थकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—महाभारतमें कौरवसेनाके मारे जाने और समस्त योद्धाओंके नष्ट हो जानेपर अर्जुन भक्तिभावसे श्रीकृष्णके समीप गये और उनकी परिक्रमा तथा प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले—'भगवन्! शंखोद्धारतीर्थका फल बताइये।'

श्रीभगवान् बोले—महाबाहो! जो मनुष्य घरमें रहकर भी शंखोद्धारतीर्थका स्मरण करते हैं, उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती। जो शंखोद्धारतीर्थमें जाकर मन-ही-मन भगवान् शंखधरका स्मरण करते हैं, वे विष्णुलोकमें निवास पाते हैं। जो शंखोद्धारतीर्थका दर्शन करता है, वह स्वर्गलोकको जाता है। अर्जुन! यदि शंखोद्धारकी यात्रा करनेवाला मनुष्य मार्गमें ही मर जाय और शंखोद्धारका दर्शन न कर सके तो वह भी मुझे वैसा ही प्रिय