भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1385, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1385

१३५६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

काले अगुरुसे श्रीकृष्णको धूप देते हैं, वे श्रीकृष्णका सारूप्य प्राप्त करते हैं। घी, गुग्गुल तथा सुगन्धित पदार्थके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णको धूप देकर मनुष्य सदा कल्याणमय पदको प्राप्त होता है। जो श्रीकृष्णको अगुरु धूप देता है, वह सब पातकोंका त्याग करके अत्यन्त सुन्दर रूप पाता है। जो श्रीकृष्णमन्दिरके द्वारपर प्रतिदिन दीपमाला जगाता है, वह सातों द्वीपोंसे युक्त पृथ्वीका सम्राट् होता है। जो श्रीकृष्णके आगे सुगन्धित नैवेद्य निवेदन करता है, उसके पितर कल्पपर्यन्त नित्य तृप्त रहते हैं। जो कपूर और सुपारीके साथ ताम्बूल निवेदन करता है, उसे देवपदकी प्राप्ति होती है। जो भगवान् श्रीकृष्णके आगे जलसे भरा हुआ कलश और कमण्डलु निवेदन करता है, उसके पितर एक कल्पतक जल पीनेकी इच्छा नहीं रखते। जो भगवान् श्रीकृष्णको मनोहर फल भेंट करता है, उसके उत्तम मनोरथ कल्पपर्यन्त सफल होते रहते हैं। जो देवदेव श्रीकृष्णकी परिक्रमा करता है, उसके कुलमें किसीको यमलोकका दण्ड नहीं भोगना पड़ता। जो श्रीकृष्णके मन्दिरमें सुन्दर पुष्प-मण्डप बनाता है, वह कोटि-कोटि पुष्पक विमानोंद्वारा दिव्यलोकमें क्रीड़ा करता है। जो श्वेत चँवरकी हवा देकर श्रीकृष्णको प्रसन्न करता है, देवेश्वर श्रीकृष्ण उसके मस्तकको अपने मुँहसे चूमते हैं। जो श्रीकृष्णके मन्दिरको केलेके खंभोंसे सुशोभित करता है, उसका स्वागत देवराज स्वयं करते हैं। जो मनुष्य श्रीकृष्ण-मन्दिरको ध्वजा-पताकाओंसे सजाता है, वह सदा सूर्यलोकमें निवास करता है। जो श्रीकृष्ण-मन्दिरके ऊपर ध्वजारोपण करता है, उसका ब्रह्मलोकमें निवास होता है। जो देवदेव श्रीकृष्णके आँगनको स्वस्तिकोंसे विभूषित करता है, वह तीनों लोकोंमें क्रीड़ा करता है। जो मानव शंखमें जल लेकर भगवान् श्रीकृष्णके ऊपर घुमाता है, वह पूरे कल्पभर क्षीरसागरमें भगवान् विष्णुके समीप निवास करता है। जो विष्णुसहस्रनाम अथवा अन्य स्तोत्रोंका पाठ करते हुए भगवान् श्रीकृष्णकी परिक्रमा करता है, उसे पग-पगपर सातों द्वीपोंवाली पृथ्वीकी परिक्रमाका पुण्य प्राप्त होता है। जो उन्हें साष्टांग प्रणाम करता है, उसे दस हजार अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। जो मीठे स्वरवाले उत्तम गीतोंसे भगवान् श्रीकृष्णको सन्तुष्ट करता है, उसे सामवेदके पाठका फल प्राप्त होता है। जो प्रसन्नचित्त होकर भक्तिभावसे श्रीकृष्णके सम्मुख नृत्य करता है, वह अपने समस्त पापोंको भस्म कर देता है। जो श्रीकृष्णके समीप आकर भक्तिभावसे स्वस्तिवाचन करता है, उसे एक-एक अक्षरमें सौ कपिला-दानका पुण्य मिलता है। जो ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदकी वाणीसे श्रीकृष्णको सन्तुष्ट करते हैं, उन्हें ब्रह्मलोकका निवास प्राप्त होता है। जो योगी पुरुष श्रीकृष्णके समीप योग-शास्त्र और वेदान्तका पाठ करते हैं, वे सूर्यमण्डलको भेदकर भगवान् विष्णुके धाममें जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता, विष्णुसहस्रनाम, भीष्मस्तवराज, अनुस्मृति और गजेन्द्रमोक्ष—ये पाँचों स्तोत्र श्रीकृष्णको अत्यन्त दुर्लभ प्रतीत होते हैं—बहुत प्रिय लगते हैं*। श्रीकृष्णके समीप जो श्रीमद्भागवतका पाठ करता है, वह योगियोंके साथ क्रीड़ा करता है। जो वहाँ रामायण, महाभारत और पुराणोंका पाठ करता है, उसे मोक्ष प्राप्त होता है। जो गोमतीके जलमें स्नान करके पवित्र हो श्रीकृष्णके मुखारविन्दका दर्शन करते हैं, उनके दर्शनसे सौ वर्षोंका पातक नष्ट हो जाता है। संसारमें वे मनुष्य धन्य हैं, जो कलियुगमें द्वारकापुरी जाकर गोमती और समुद्रके संगममें देवताओं और पितरोंका तर्पण करते हैं;


* योगशास्त्राणि वेदान्तान् योगिनः कृष्णसन्निधौ। पठन्ति रविबिम्बं तु भित्त्वा यान्ति लयं हरेः॥
गीता नामसहस्रं तु स्तवराजस्त्वनुस्मृतिः। गजेन्द्रमोक्षणं चापि कृष्णस्यातीव दुर्लभम्॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० २३। ७९-८०)

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