भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1384, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1384
* प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य *१३५५

विष्णुने इस पुराणसंहिताका संकलन किया है। उन्होंने कृपापूर्वक महात्मा प्रह्लादको इसका उपदेश किया। दैत्यराज प्रह्लादने ऋषियोंके पूछनेपर उनसे इसका वर्णन किया। जो मानव भक्तिपूर्वक इसको सुनता अथवा पढ़ता है, वह सम्पूर्ण मनोरथोंको पाता और विष्णुलोकमें जाता है। इस विषयमें महात्मा मार्कण्डेय तथा राजा इन्द्रद्युम्नका संवाद भी हुआ है, जिसे बताया जाता है।

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द्वारकापुरी तथा वहाँ श्रीकृष्णके दर्शन-पूजनका माहात्म्य तथा तुलसीकी महिमा

मार्कण्डेयजी बोले—इन्द्रद्युम्न! कलियुगमें जो मानव श्रीकृष्णका माहात्म्य सुनते और पढ़ते हैं, उनका यमलोकमें निवास नहीं होता। जिन्हें सदा श्रीकृष्णकी कथा प्राणोंसे भी प्रिय है, उसके लिये इस लोक और परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है। कलियुगमें यदि चाण्डाल भी द्वारकापुरीमें निवास करता है, तो वह यतियोंकी गति पाता है। जो द्वारकापुरीकी यात्रा करता है, उसे मार्गमें प्रतिदिन कुरुक्षेत्र-सेवनका फल प्राप्त होता है। कलियुगमें जिनकी बुद्धि द्वारकाकी यात्रा और श्रीकृष्णका दर्शन करनेमें संलग्न होती है, वे मानव धन्य हैं और उनका वह मनोरथ भी धन्य है। जिन्होंने कोटि अयुत पापोंका नाश करनेवाले श्रीकृष्ण-मुखारविन्दका दर्शन किया है, वे धन्य हैं, कृतकृत्य हैं, वन्दनीय हैं और सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाले हैं। जो मानव श्रीकृष्णके मस्तकपर दूधसे स्नान कराते हैं, उन्हें सौ अश्वमेध यज्ञोंका पुण्य प्राप्त होता है। जो मनुष्य निष्कामभावसे श्रीकृष्णको स्नान कराता है, वह मोक्ष पाता है। जो स्नानसे भीगे हुए श्रीकृष्णविग्रहको वस्त्रसे पोंछता है, उसका जन्मभरका पाप नष्ट हो जाता है। जो जगदीश्वर श्रीकृष्णको स्नान कराकर उन्हें फूलोंकी माला पहनाता है, जो उनके स्नानकालमें शंख बजाता है, अथवा सहस्रनामोंका पाठ करता है, उसे एक-एक अक्षरपर कपिला गौके दानका फल प्राप्त होता है। गीता, गजेन्द्रमोक्ष, भीष्मस्तवराज तथा महर्षियोंद्वारा रचित अन्यान्य स्तोत्रोंके पाठका भी यही फल है। भगवान् उनके समीप आते और उनकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करते हैं। जो श्रीकृष्णके स्नानकालमें नृत्य और गान करता है, ताली बजाता और जय-जयकार करता है, वह योनि-यन्त्रसे निकलनेकी (जन्म लेनेकी) पीड़ासे छुटकारा पा जाता है। जो मानव कलियुगमें श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन करता है, वह पितरोंसहित वैकुण्ठधाममें निवास करता है। जो भाँति-भाँतिके कोमल वस्त्रोंसे पूजा करके माधवको धूप निवेदन करता है, वह विष्णुधाममें निवास करता है। जो भक्तिपूर्वक सुवर्ण, रत्न एवं मणियोंके आभूषणोंसे श्रीकृष्णका शृंगार करते हैं, उन्हें वह उत्तम फल प्राप्त होता है, जो इन्द्र, शिव, ब्रह्मा तथा मुनियोंको भी ज्ञात नहीं। जो मानव कोमल तुलसीदलोंसे और शुद्ध वस्त्रोंसे देवकीनन्दन श्रीकृष्णकी पूजा करता है, उसे यज्ञकर्ताओं, दानवीरों, तीर्थसेवियों, मातृभक्तों तथा वेधरहित द्वादशी तिथिको भगवान् विष्णुके आगे जागरण, नृत्य, गान और वैष्णवशास्त्रका पाठ करनेवाले भक्तोंको प्राप्त होनेवाला फल मिलता है। तुलसीमालासे पूजित होकर रुक्मिणीवल्लभ श्रीकृष्ण पूर्वोक्त सभी फल प्रदान करते हैं। जैसे लक्ष्मी भगवान् विष्णुको प्रिय हैं, उसी प्रकार उनसे भी अधिक तुलसी उन्हें प्रिय हैं। कलियुगमें जहाँ-कहीं भी तुलसीकी मालासे भगवान् विष्णुका पूजन होता है, वहाँ द्वारकाका समग्र पुण्य प्राप्त होता है। 'श्रीकृष्ण शरणं मम' (श्रीकृष्ण मेरे आश्रय हैं) यह आठ अक्षरोंवाला मन्त्र श्रीकृष्णकी कृपा प्राप्त करानेवाला है। जो कलियुगमें कपूरसहित

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