संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1363, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३३४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
हैं तथा ये स्वजन लोग हैं। हम सब तुम्हारे पिताका सम्मान करते हैं; इसीलिये हम बहुत दिनोंतक यहाँ जीवित रह सकते हैं। (अतः तुम्हें भी इनका आदर करना चाहिये)।'
प्रह्लाद बोले—प्रकृति मेरी माता है। बुद्धि मेरी बहिन है। जिसको मैं कहा जाता है, वह अहंकार है। पंचतन्मात्राओंके समुदाय मेरे सहोदर भाई हैं, जो मेरे साथ ही जाते हैं। इनको उत्पन्न करनेवाला जो पचीसवाँ पुरुष है, वही मेरा पिता है। परमात्मा श्रीहरि ही अन्तर्यामी इस शरीरमें स्थित हैं। यदि उनका सम्मान किया जाय तो वे हृदयमें दर्शन देते हैं। उनका चरण ही अणिमा आदि आठों सिद्धियोंका स्थान है। आपलोगोंके लिये राज्य ही अभीष्ट वस्तु है; परंतु जहाँ भगवान् विष्णुका पूजन (आदर) नहीं होता, वह राज्य मुझे तिनकेके समान प्रतीत होता है। ब्रह्मा, रुद्र, अनल आदिके रूपमें जिनका प्रत्यक्ष दर्शन होता है, जो बिना किसी आधारके ही सर्वत्र विचरते हैं, वे ही भगवान् विष्णु हैं। ये जो आकाशमें स्थित और ध्रुवसे बँधे हुए सम्पूर्ण ग्रह दृष्टिगोचर होते हैं, वे सब भगवान् विष्णुके ही वचनसे पृथ्वीपर नहीं गिरते। फिर प्रलयकालमें वे ही सबका विनाश करते हैं। ऐसा विचार करके मुझे आप लोगोंसे मृत्युका भय नहीं है।
प्रह्लादकी यह बात पूरी होते ही उनके पिताने उन्हें लात मारकर कहा—'कहाँ है तेरा हरि? पहले मैं उसीको मारता हूँ। उसके बाद 'हरि, हरि'की रट लगानेवाले तुझ दुष्टका भी वध कर डालूँगा।'
प्रह्लादने कहा—पृथ्वी आदि पाँचों भूत भगवान् विष्णुके ही स्वरूप हैं। वे ही स्थल और जलमें हैं। अधिक कहनेसे क्या लाभ, यह सम्पूर्ण जगत् विष्णुमय ही है। तृण, काष्ठ, गृह, क्षेत्र, द्रव्य और देह—सबमें श्रीहरि स्थित हैं। वे ज्ञानयोगसे जाने जाते हैं, इस चर्मचक्षुसे नहीं देखे जाते। भगवान् विष्णु सब सुनते हैं, सब जानते हैं और सब कुछ करते हैं।
प्रह्लादके यों कहनेपर हिरण्यकशिपु सहसा सिंहासन छोड़कर खड़ा हो गया। उसने दृढ़तापूर्वक कमर कस ली और म्यानसे चमचमाती हुई तलवार खींचकर प्रह्लादको थप्पड़ मारकर कहा—'अब तू अपने विष्णुका स्मरण कर ले। मैं अभी उज्ज्वल कुण्डलोंसे सुशोभित तेरा मस्तक पृथ्वीपर गिरा दूँगा, जैसे वृक्षसे पका फल गिराया जाता है। यदि जीवित रहना चाहता है तो इस खम्भेसे अपने विष्णुको निकालकर दिखा।'
प्रह्लादजी भय छोड़कर पद्मासन लगा धरतीपर बैठ गये और कंधा नीचे करके श्वासको ऊपर रोककर हृदयमें भगवान् श्रीहरिका ध्यान करते हुए मरनेके लिये तैयार हो गये। प्रभो! उस समय मैंने एक आश्चर्यकी बात देखी—आकाशसे फूलोंकी एक माला नीचे आयी और स्वयं ही प्रह्लादजीके गलेमें पड़ गयी। इतनेमें ही खम्भेसे एक भयंकर आवाज हुई, जिसे सुनकर सब लोग क्षुब्ध हो गये और मन-ही-मन सोचने लगे, 'क्या यह पृथ्वी पातालमें धँस जायगी अथवा क्या स्वर्गलोक टूटकर पृथ्वीपर गिर पड़ेगा अथवा प्रह्लादका सिर इस दैत्यके खड्गसे कटकर पृथ्वीपर तो नहीं गिर जायगा?' इसी समय खम्भेसे बड़ा भयानक सिंहनाद हुआ। उस शब्दसे मूर्च्छित होकर सब दैत्य पृथ्वीपर गिर पड़े। हिरण्यकशिपुके हाथसे ढाल और तलवार भी गिर गयी। वह सोचने लगा, 'यह क्या है?' जब सिर ऊँचा करके वह देखने लगा, तब भगवान् विष्णुपर उसकी दृष्टि पड़ी। नीचेसे मनुष्यकी आकृति और ऊपरसे भयंकर सिंहका स्वरूप! दाढ़ोंके कारण विकराल मुख, मानो वे आकाशको चाट लेंगे। शरीर तेजसे प्रज्वलित हो रहा था। मुखसे भयानक कटकटकी ध्वनि हो रही थी, मानो गरजता हुआ बादल मूर्तिमान् हो गया हो। गर्दनके बाल ऊपरकी ओर उठे हुए थे। देवता और दैत्य सबके लिये उनकी ओर देखना कठिन था। उन्हें देखकर वह दैत्य पुनः पृथ्वीपर गिर पड़ा। नृसिंहजीने उसके बाल पकड़कर आकाशमें सौ बार उसे घुमाया और पृथ्वीपर पटक दिया, परंतु ब्रह्माजीके वरके प्रभावसे उस दैत्यकी मृत्यु