संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1362, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड * | १३३३ ---|---
करनेवाला हो। उसके थपेड़ोंसे विदीर्ण होकर मैं पृथ्वीपर मृत्युको प्राप्त होऊँ।'
'एवमस्तु' कहकर ब्रह्माजी चले गये। दैत्यराज हिरण्यकशिपु भी अपने स्थानको गया। कुछ काल व्यतीत हो जानेपर उसके मनमें देवताओंके प्रति बड़ा भारी वैर हुआ। वह सोचने लगा—'देवता मेरा क्या कर लेंगे। विष्णुसे मेरा क्या प्रयोजन है तथा रुद्र भी मेरा क्या बिगाड़ लेंगे। समस्त यज्ञोंद्वारा सदा मेरी ही आराधना होनी चाहिये।' उस दैत्यका बर्ताव तो ऐसा था, परंतु उसके पुत्र प्रह्लाद श्रीहरिकी स्तुति करते थे। जिनसे उसकी मृत्यु होनेवाली थी, उन्हीं भगवान् विष्णुका वे चिन्तन करने लगे। जब उन्हें दूसरी बातें पढ़ायी जाती थीं, तब भी वे 'हरि हरि'का ही कीर्तन करते थे। 'जो चार भुजाओंसे सुशोभित, शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले, पीताम्बरधारी, कौस्तुभमणिसे उद्भासित तथा सम्पूर्ण जगत्के एकमात्र स्वामी हैं, जो स्मरण करनेमात्रसे ही मोक्ष देते हैं, उन भगवान् विष्णुका मैं सदा स्मरण करता हूँ'—उनकी इस बातसे दैत्य कुपित हो उठा और दूसरे दैत्योंसे बोला—'मेरे इस दुष्ट पुत्रको तुमलोग हाथी, सर्प, जल और अग्निद्वारा मार डालो।'
प्रह्लाद बोले—दैत्यराज! हाथीमें भी विष्णु हैं, सर्पमें भी विष्णु हैं, जलमें भी विष्णु हैं और स्थलमें भी विष्णु हैं। तुममें और मुझमें भी वे ही विराजमान हैं। विष्णुके बिना यह दैत्योंका समुदाय भी नहीं है।
सदा प्रह्लादको मारनेकी चेष्टा की जाती थी, तो भी उनकी मृत्यु नहीं होती थी। यह देख हिरण्यकशिपुकी छाती क्रोधाग्निसे जलती रहती थी। तब उसने पुत्रको स्वयं ही दण्ड देनेके लिये उसके मुँहपर तलवार तान दी और कठोर वचनोंसे डाँटते हुए उसे मार डालनेका उद्योग किया। वह बोला—'अरे बालक! तुझे धिक्कार है। तू नारायणकी स्तुति करता है, बार-बार मेरे शत्रुके गुण गाता है; अतः इस श्रेष्ठ तलवारसे मैं अभी तेरा सिर उड़ाये देता हूँ। मैं ही विष्णु, मैं ही ब्रह्मा, मैं ही रुद्र, इन्द्र और वरदाता प्रभु हूँ। तू अपने पिताको छोड़कर दूसरेकी स्तुति क्यों करता है।'
बालक प्रह्लाद जब पिताकी इच्छाके अनुसार नहीं पढ़ सके और अपने पिताकी स्तुति भी नहीं कर सके, तब गुरुजीने छड़ीसे मारकर प्रह्लादको पुनः पढ़ाना प्रारम्भ किया।
प्रह्लाद बोले—जिन सर्वव्यापी श्रीहरिने चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंको उत्पन्न किया, बढ़ाया और फिर सबका शमन किया है, उन्हींकी मैं स्तुति करता हूँ। वे ही श्रीविष्णु मुझपर प्रसन्न हों। ब्रह्माजी भी विष्णु हैं। शिव भी विष्णु ही हैं। इन्द्र, वायु, यम और अग्नि भी विष्णु हैं। प्रकृति आदि चौबीस तत्त्व और उनके साक्षी पचीसवें पुरुष भी विष्णु ही हैं। वे ही पिताजीके, गुरुजीके तथा मेरे शरीरमें भी स्थित हैं। यह जाननेपर भी कोई मरणधर्मा प्राणी श्रीहरिके सिवा दूसरे नीच मनुष्योंकी स्तुति कैसे कर सकता है।
गुरुजीने कहा—शिष्य! यह तो बता, मनुष्योंमें नीच कौन है?
प्रह्लादजीने कहा—पुत्र-जन्म आदिके समय, मृत्युके समय तथा शुभ अवसरोंमें जिसके मुखसे 'हरि' इन दो अक्षरोंका उच्चारण नहीं होता, वही मनुष्योंमें अधम है। भय, राजकुलसे समागम, युद्ध, व्याधि, स्त्रीसंग, विपत्ति, यात्रा तथा मृत्युके समय जो इस पृथ्वीपर रहते हुए श्रीहरिको भूलकर माता-पिताका स्मरण करते हैं, वे मूर्ख मानव मनुष्योंमें अधम हैं। मेरे तो न माता है, न पिता है, न स्वजन है, न सेवक है; श्रीहरिके बिना मेरा कोई नहीं है। आपको जो उचित जान पड़े, वह बर्ताव कीजिये।
इस तरहकी बातोंसे दैत्यको बड़ा क्रोध हुआ और वह मारनेके लिये समीप आया। इतनेमें ही प्रह्लादकी माताने आकर पुत्रको आँचलसे ढक लिया और उसके भाई, स्वजन तथा बहिन—ये सभी आकर कहने लगे—'भैया! तू 'हरि, हरि' मत बोल। मैं तेरी माता हूँ। यह बहिन है, ये भाई