संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
ये सब लोग राजा बलिके भवनमें गये हैं। बलि उत्पातकी शान्तिके लिये यज्ञ करते हैं। मैं भी उन्हींके यहाँ यज्ञ देखनेके लिये जाना चाहता हूँ। सुना है, राजा बलि एक कम एक सहस्र यज्ञ कर चुके हैं। उस एकके भी पूरा हो जानेपर सम्पूर्ण लोकोंपर दैत्योंका अधिकार हो जायगा। वहाँ यह प्रतिज्ञा करके यज्ञ आरम्भ किया गया है कि ब्राह्मणोंको जिसकी जो इच्छा होगी, वही वस्तु दी जायगी। बलिका कहना है कि 'किसीके मना करनेपर भी ब्राह्मणको मुँहमाँगी वस्तु अवश्य दी जायगी। मेरी बात सत्य होगी। मैं अपने सेवकों, प्यारे पुत्रों, सम्पूर्ण राज्य तथा अपने-आपको भी माँगनेपर दे दूँगा। मेरा यज्ञ व्यर्थ न होने पाये। उनकी इस अहंकारपूर्ण बातसे मेरे सिरमें दर्द होने लगा है। भला, इस प्रकार प्रतिज्ञा करके कैसे यह यज्ञ पूर्ण होगा? आप ही उस यज्ञके विध्वंसमें कारण होंगे, यह जानकर मैं आपके पास आया हूँ। आप इस समय ऐसी चेष्टा करें, जिससे वह यज्ञ पूरा न हो।'
वामनजीने कहा—महर्षे ! मुझे यह बताओ कि मैं कौन हूँ? मेरी क्या शक्ति है? मैं किस कारणसे यज्ञकी पूर्तिमें विघ्न उपस्थित करूँगा? जब इस यज्ञमें सब देवता पधारे हैं, सभी ऋषि और ब्राह्मणलोक भी सम्मिलित हुए हैं, तब यह व्यर्थ कैसे होगा?
नारदजी बोले—प्रभो ! एक समय ब्रह्माजीने भगवान् विष्णुसे कहा—'हरे! वेदोंके बिना मैं सृष्टि कैसे करूँगा? वेद नष्ट हो गये हैं, उनको मैं नहीं जानता। क्या वे किसी स्थानपर स्थित हैं या नीचे चले गये हैं? मुझमें जलके भीतर जानेकी शक्ति नहीं है। आपको दस अवतार धारण करके सृष्टिकी रक्षा करनी चाहिये। अतः आप जलचर मत्स्य हों और शीघ्र ही वेदोंको ढूँढ़ लाकर मुझे देनेकी कृपा करें।' उनके यों कहनेपर श्रीहरिने जलमें मत्स्यरूप धारण किया और वेदोंको लाकर ब्रह्माजीको लौटा दिया। तत्पश्चात् किसी समय ब्रह्माजीने पुनः प्रार्थना की—'प्रभो! आप कच्छपरूप ग्रहण करके मन्दराचलको पीठपर धारण करें। समुद्र-मन्थनसे प्रकट होकर लक्ष्मीजी आपका वरण करेंगी।' ब्रह्माजीके यों कहनेपर आप श्रीहरिने कच्छपरूप धारण किया। समुद्र-मन्थनके समय आपका वह अद्भुत चरित्र मैंने अपनी आँखों देखा। तदनन्तर एकार्णवके जलमें डूबकर जब पृथ्वी रसातलको चली गयी और कहीं दिखायी न दी, तब ब्रह्माजीसे प्रेरित होकर आपने महावराहका रूप धारण किया और नीचे जाकर अपनी दाढ़ोंके अग्रभागपर पृथ्वीको उठाया; फिर जलके ऊपर ले आकर पृथ्वीको यथास्थान रख दिया। वह आपका परम मनोहर तृतीय अवतार था, जिसके द्वारा आपने पर्वतोंसहित पृथ्वीको स्थापित किया। अब आपके अत्यन्त भयंकर नृसिंह-अवतारकी, जो चौथा है, कथा कहता हूँ। अदितिके पुत्र आदित्य (देवता) कहलाते हैं और दितिके पुत्र दैत्य। पूर्वकालमें दितिके दो महाबली पुत्र हुए थे। एकका नाम हिरण्यकशिपु था और दूसरेका हिरण्याक्ष। स्वर्गलोकमें देवता रहते थे और पातालमें दैत्यों तथा दानवोंका राज्य था। हिरण्यकशिपु रसातलमें राज्य करता था। देवताओं और दानवोंने मिलकर मनुके पुत्रोंको पृथ्वीके राज्यपर स्थापित किया था। हिरण्यकशिपुने यह व्यवस्था तोड़ दी और उसने युद्धमें इन्द्रको परास्त करके सात द्वीपोंवाली पृथ्वी तथा अमरावतीपुरीको भी अपने अधिकारमें कर लिया। सब भोगोंपर अधिकार करके वह असुर अपने पुत्र और पौत्रोंके साथ राज्य भोगने लगा। उसने तपस्याके द्वारा ब्रह्माजीको संतुष्ट किया और ब्रह्माजीने उसे मुँहमाँगा वर देनेको स्वीकार किया। उस दैत्यने इस प्रकार वर माँगा—'सुरश्रेष्ठ ! मुझे अमरत्व प्रदान कीजिये। देवताओं और मनुष्योंसे किसी प्रकार भी मेरी मृत्यु न हो। यदि मृत्यु हो ही तो ऐसे पुरुषसे हो, जिसका स्वरूप कुछ सिंहका और कुछ मनुष्यका हो, जो समूची पृथ्वीको धारण