संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१३३२
* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
ये सब लोग राजा बलिके भवनमें गये हैं। बलि उत्पातकी शान्तिके लिये यज्ञ करते हैं। मैं भी उन्हींके यहाँ यज्ञ देखनेके लिये जाना चाहता हूँ। सुना है, राजा बलि एक कम एक सहस्र यज्ञ कर चुके हैं। उस एकके भी पूरा हो जानेपर सम्पूर्ण लोकोंपर दैत्योंका अधिकार हो जायगा। वहाँ यह प्रतिज्ञा करके यज्ञ आरम्भ किया गया है कि ब्राह्मणोंको जिसकी जो इच्छा होगी, वही वस्तु दी जायगी। बलिका कहना है कि 'किसीके मना करनेपर भी ब्राह्मणको मुँहमाँगी वस्तु अवश्य दी जायगी। मेरी बात सत्य होगी। मैं अपने सेवकों, प्यारे पुत्रों, सम्पूर्ण राज्य तथा अपने-आपको भी माँगनेपर दे दूँगा। मेरा यज्ञ व्यर्थ न होने पाये। उनकी इस अहंकारपूर्ण बातसे मेरे सिरमें दर्द होने लगा है। भला, इस प्रकार प्रतिज्ञा करके कैसे यह यज्ञ पूर्ण होगा? आप ही उस यज्ञके विध्वंसमें कारण होंगे, यह जानकर मैं आपके पास आया हूँ। आप इस समय ऐसी चेष्टा करें, जिससे वह यज्ञ पूरा न हो।'
वामनजीने कहा—महर्षे ! मुझे यह बताओ कि मैं कौन हूँ? मेरी क्या शक्ति है? मैं किस कारणसे यज्ञकी पूर्तिमें विघ्न उपस्थित करूँगा? जब इस यज्ञमें सब देवता पधारे हैं, सभी ऋषि और ब्राह्मणलोक भी सम्मिलित हुए हैं, तब यह व्यर्थ कैसे होगा?
नारदजी बोले—प्रभो ! एक समय ब्रह्माजीने भगवान् विष्णुसे कहा—'हरे! वेदोंके बिना मैं सृष्टि कैसे करूँगा? वेद नष्ट हो गये हैं, उनको मैं नहीं जानता। क्या वे किसी स्थानपर स्थित हैं या नीचे चले गये हैं? मुझमें जलके भीतर जानेकी शक्ति नहीं है। आपको दस अवतार धारण करके सृष्टिकी रक्षा करनी चाहिये। अतः आप जलचर मत्स्य हों और शीघ्र ही वेदोंको ढूँढ़ लाकर मुझे देनेकी कृपा करें।' उनके यों कहनेपर श्रीहरिने जलमें मत्स्यरूप धारण किया और वेदोंको लाकर ब्रह्माजीको लौटा दिया। तत्पश्चात् किसी समय ब्रह्माजीने पुनः प्रार्थना की—'प्रभो! आप कच्छपरूप ग्रहण करके मन्दराचलको पीठपर धारण करें। समुद्र-मन्थनसे प्रकट होकर लक्ष्मीजी आपका वरण करेंगी।' ब्रह्माजीके यों कहनेपर आप श्रीहरिने कच्छपरूप धारण किया। समुद्र-मन्थनके समय आपका वह अद्भुत चरित्र मैंने अपनी आँखों देखा। तदनन्तर एकार्णवके जलमें डूबकर जब पृथ्वी रसातलको चली गयी और कहीं दिखायी न दी, तब ब्रह्माजीसे प्रेरित होकर आपने महावराहका रूप धारण किया और नीचे जाकर अपनी दाढ़ोंके अग्रभागपर पृथ्वीको उठाया; फिर जलके ऊपर ले आकर पृथ्वीको यथास्थान रख दिया। वह आपका परम मनोहर तृतीय अवतार था, जिसके द्वारा आपने पर्वतोंसहित पृथ्वीको स्थापित किया। अब आपके अत्यन्त भयंकर नृसिंह-अवतारकी, जो चौथा है, कथा कहता हूँ। अदितिके पुत्र आदित्य (देवता) कहलाते हैं और दितिके पुत्र दैत्य। पूर्वकालमें दितिके दो महाबली पुत्र हुए थे। एकका नाम हिरण्यकशिपु था और दूसरेका हिरण्याक्ष। स्वर्गलोकमें देवता रहते थे और पातालमें दैत्यों तथा दानवोंका राज्य था। हिरण्यकशिपु रसातलमें राज्य करता था। देवताओं और दानवोंने मिलकर मनुके पुत्रोंको पृथ्वीके राज्यपर स्थापित किया था। हिरण्यकशिपुने यह व्यवस्था तोड़ दी और उसने युद्धमें इन्द्रको परास्त करके सात द्वीपोंवाली पृथ्वी तथा अमरावतीपुरीको भी अपने अधिकारमें कर लिया। सब भोगोंपर अधिकार करके वह असुर अपने पुत्र और पौत्रोंके साथ राज्य भोगने लगा। उसने तपस्याके द्वारा ब्रह्माजीको संतुष्ट किया और ब्रह्माजीने उसे मुँहमाँगा वर देनेको स्वीकार किया। उस दैत्यने इस प्रकार वर माँगा—'सुरश्रेष्ठ ! मुझे अमरत्व प्रदान कीजिये। देवताओं और मनुष्योंसे किसी प्रकार भी मेरी मृत्यु न हो। यदि मृत्यु हो ही तो ऐसे पुरुषसे हो, जिसका स्वरूप कुछ सिंहका और कुछ मनुष्यका हो, जो समूची पृथ्वीको धारण
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करनेवाला हो। उसके थपेड़ोंसे विदीर्ण होकर मैं पृथ्वीपर मृत्युको प्राप्त होऊँ।'
'एवमस्तु' कहकर ब्रह्माजी चले गये। दैत्यराज हिरण्यकशिपु भी अपने स्थानको गया। कुछ काल व्यतीत हो जानेपर उसके मनमें देवताओंके प्रति बड़ा भारी वैर हुआ। वह सोचने लगा—'देवता मेरा क्या कर लेंगे। विष्णुसे मेरा क्या प्रयोजन है तथा रुद्र भी मेरा क्या बिगाड़ लेंगे। समस्त यज्ञोंद्वारा सदा मेरी ही आराधना होनी चाहिये।' उस दैत्यका बर्ताव तो ऐसा था, परंतु उसके पुत्र प्रह्लाद श्रीहरिकी स्तुति करते थे। जिनसे उसकी मृत्यु होनेवाली थी, उन्हीं भगवान् विष्णुका वे चिन्तन करने लगे। जब उन्हें दूसरी बातें पढ़ायी जाती थीं, तब भी वे 'हरि हरि'का ही कीर्तन करते थे। 'जो चार भुजाओंसे सुशोभित, शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले, पीताम्बरधारी, कौस्तुभमणिसे उद्भासित तथा सम्पूर्ण जगत्के एकमात्र स्वामी हैं, जो स्मरण करनेमात्रसे ही मोक्ष देते हैं, उन भगवान् विष्णुका मैं सदा स्मरण करता हूँ'—उनकी इस बातसे दैत्य कुपित हो उठा और दूसरे दैत्योंसे बोला—'मेरे इस दुष्ट पुत्रको तुमलोग हाथी, सर्प, जल और अग्निद्वारा मार डालो।'
प्रह्लाद बोले—दैत्यराज! हाथीमें भी विष्णु हैं, सर्पमें भी विष्णु हैं, जलमें भी विष्णु हैं और स्थलमें भी विष्णु हैं। तुममें और मुझमें भी वे ही विराजमान हैं। विष्णुके बिना यह दैत्योंका समुदाय भी नहीं है।
सदा प्रह्लादको मारनेकी चेष्टा की जाती थी, तो भी उनकी मृत्यु नहीं होती थी। यह देख हिरण्यकशिपुकी छाती क्रोधाग्निसे जलती रहती थी। तब उसने पुत्रको स्वयं ही दण्ड देनेके लिये उसके मुँहपर तलवार तान दी और कठोर वचनोंसे डाँटते हुए उसे मार डालनेका उद्योग किया। वह बोला—'अरे बालक! तुझे धिक्कार है। तू नारायणकी स्तुति करता है, बार-बार मेरे शत्रुके गुण गाता है; अतः इस श्रेष्ठ तलवारसे मैं अभी तेरा सिर उड़ाये देता हूँ। मैं ही विष्णु, मैं ही ब्रह्मा, मैं ही रुद्र, इन्द्र और वरदाता प्रभु हूँ। तू अपने पिताको छोड़कर दूसरेकी स्तुति क्यों करता है।'
बालक प्रह्लाद जब पिताकी इच्छाके अनुसार नहीं पढ़ सके और अपने पिताकी स्तुति भी नहीं कर सके, तब गुरुजीने छड़ीसे मारकर प्रह्लादको पुनः पढ़ाना प्रारम्भ किया।
प्रह्लाद बोले—जिन सर्वव्यापी श्रीहरिने चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंको उत्पन्न किया, बढ़ाया और फिर सबका शमन किया है, उन्हींकी मैं स्तुति करता हूँ। वे ही श्रीविष्णु मुझपर प्रसन्न हों। ब्रह्माजी भी विष्णु हैं। शिव भी विष्णु ही हैं। इन्द्र, वायु, यम और अग्नि भी विष्णु हैं। प्रकृति आदि चौबीस तत्त्व और उनके साक्षी पचीसवें पुरुष भी विष्णु ही हैं। वे ही पिताजीके, गुरुजीके तथा मेरे शरीरमें भी स्थित हैं। यह जाननेपर भी कोई मरणधर्मा प्राणी श्रीहरिके सिवा दूसरे नीच मनुष्योंकी स्तुति कैसे कर सकता है।
गुरुजीने कहा—शिष्य! यह तो बता, मनुष्योंमें नीच कौन है?
प्रह्लादजीने कहा—पुत्र-जन्म आदिके समय, मृत्युके समय तथा शुभ अवसरोंमें जिसके मुखसे 'हरि' इन दो अक्षरोंका उच्चारण नहीं होता, वही मनुष्योंमें अधम है। भय, राजकुलसे समागम, युद्ध, व्याधि, स्त्रीसंग, विपत्ति, यात्रा तथा मृत्युके समय जो इस पृथ्वीपर रहते हुए श्रीहरिको भूलकर माता-पिताका स्मरण करते हैं, वे मूर्ख मानव मनुष्योंमें अधम हैं। मेरे तो न माता है, न पिता है, न स्वजन है, न सेवक है; श्रीहरिके बिना मेरा कोई नहीं है। आपको जो उचित जान पड़े, वह बर्ताव कीजिये।
इस तरहकी बातोंसे दैत्यको बड़ा क्रोध हुआ और वह मारनेके लिये समीप आया। इतनेमें ही प्रह्लादकी माताने आकर पुत्रको आँचलसे ढक लिया और उसके भाई, स्वजन तथा बहिन—ये सभी आकर कहने लगे—'भैया! तू 'हरि, हरि' मत बोल। मैं तेरी माता हूँ। यह बहिन है, ये भाई
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हैं तथा ये स्वजन लोग हैं। हम सब तुम्हारे पिताका सम्मान करते हैं; इसीलिये हम बहुत दिनोंतक यहाँ जीवित रह सकते हैं। (अतः तुम्हें भी इनका आदर करना चाहिये)।'
प्रह्लाद बोले—प्रकृति मेरी माता है। बुद्धि मेरी बहिन है। जिसको मैं कहा जाता है, वह अहंकार है। पंचतन्मात्राओंके समुदाय मेरे सहोदर भाई हैं, जो मेरे साथ ही जाते हैं। इनको उत्पन्न करनेवाला जो पचीसवाँ पुरुष है, वही मेरा पिता है। परमात्मा श्रीहरि ही अन्तर्यामी इस शरीरमें स्थित हैं। यदि उनका सम्मान किया जाय तो वे हृदयमें दर्शन देते हैं। उनका चरण ही अणिमा आदि आठों सिद्धियोंका स्थान है। आपलोगोंके लिये राज्य ही अभीष्ट वस्तु है; परंतु जहाँ भगवान् विष्णुका पूजन (आदर) नहीं होता, वह राज्य मुझे तिनकेके समान प्रतीत होता है। ब्रह्मा, रुद्र, अनल आदिके रूपमें जिनका प्रत्यक्ष दर्शन होता है, जो बिना किसी आधारके ही सर्वत्र विचरते हैं, वे ही भगवान् विष्णु हैं। ये जो आकाशमें स्थित और ध्रुवसे बँधे हुए सम्पूर्ण ग्रह दृष्टिगोचर होते हैं, वे सब भगवान् विष्णुके ही वचनसे पृथ्वीपर नहीं गिरते। फिर प्रलयकालमें वे ही सबका विनाश करते हैं। ऐसा विचार करके मुझे आप लोगोंसे मृत्युका भय नहीं है।
प्रह्लादकी यह बात पूरी होते ही उनके पिताने उन्हें लात मारकर कहा—'कहाँ है तेरा हरि? पहले मैं उसीको मारता हूँ। उसके बाद 'हरि, हरि'की रट लगानेवाले तुझ दुष्टका भी वध कर डालूँगा।'
प्रह्लादने कहा—पृथ्वी आदि पाँचों भूत भगवान् विष्णुके ही स्वरूप हैं। वे ही स्थल और जलमें हैं। अधिक कहनेसे क्या लाभ, यह सम्पूर्ण जगत् विष्णुमय ही है। तृण, काष्ठ, गृह, क्षेत्र, द्रव्य और देह—सबमें श्रीहरि स्थित हैं। वे ज्ञानयोगसे जाने जाते हैं, इस चर्मचक्षुसे नहीं देखे जाते। भगवान् विष्णु सब सुनते हैं, सब जानते हैं और सब कुछ करते हैं।
प्रह्लादके यों कहनेपर हिरण्यकशिपु सहसा सिंहासन छोड़कर खड़ा हो गया। उसने दृढ़तापूर्वक कमर कस ली और म्यानसे चमचमाती हुई तलवार खींचकर प्रह्लादको थप्पड़ मारकर कहा—'अब तू अपने विष्णुका स्मरण कर ले। मैं अभी उज्ज्वल कुण्डलोंसे सुशोभित तेरा मस्तक पृथ्वीपर गिरा दूँगा, जैसे वृक्षसे पका फल गिराया जाता है। यदि जीवित रहना चाहता है तो इस खम्भेसे अपने विष्णुको निकालकर दिखा।'
प्रह्लादजी भय छोड़कर पद्मासन लगा धरतीपर बैठ गये और कंधा नीचे करके श्वासको ऊपर रोककर हृदयमें भगवान् श्रीहरिका ध्यान करते हुए मरनेके लिये तैयार हो गये। प्रभो! उस समय मैंने एक आश्चर्यकी बात देखी—आकाशसे फूलोंकी एक माला नीचे आयी और स्वयं ही प्रह्लादजीके गलेमें पड़ गयी। इतनेमें ही खम्भेसे एक भयंकर आवाज हुई, जिसे सुनकर सब लोग क्षुब्ध हो गये और मन-ही-मन सोचने लगे, 'क्या यह पृथ्वी पातालमें धँस जायगी अथवा क्या स्वर्गलोक टूटकर पृथ्वीपर गिर पड़ेगा अथवा प्रह्लादका सिर इस दैत्यके खड्गसे कटकर पृथ्वीपर तो नहीं गिर जायगा?' इसी समय खम्भेसे बड़ा भयानक सिंहनाद हुआ। उस शब्दसे मूर्च्छित होकर सब दैत्य पृथ्वीपर गिर पड़े। हिरण्यकशिपुके हाथसे ढाल और तलवार भी गिर गयी। वह सोचने लगा, 'यह क्या है?' जब सिर ऊँचा करके वह देखने लगा, तब भगवान् विष्णुपर उसकी दृष्टि पड़ी। नीचेसे मनुष्यकी आकृति और ऊपरसे भयंकर सिंहका स्वरूप! दाढ़ोंके कारण विकराल मुख, मानो वे आकाशको चाट लेंगे। शरीर तेजसे प्रज्वलित हो रहा था। मुखसे भयानक कटकटकी ध्वनि हो रही थी, मानो गरजता हुआ बादल मूर्तिमान् हो गया हो। गर्दनके बाल ऊपरकी ओर उठे हुए थे। देवता और दैत्य सबके लिये उनकी ओर देखना कठिन था। उन्हें देखकर वह दैत्य पुनः पृथ्वीपर गिर पड़ा। नृसिंहजीने उसके बाल पकड़कर आकाशमें सौ बार उसे घुमाया और पृथ्वीपर पटक दिया, परंतु ब्रह्माजीके वरके प्रभावसे उस दैत्यकी मृत्यु
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नहीं हुई। तब भगवान्ने हिरण्यकशिपुको घुटनोंपर सुलाकर उसकी छाती चीर डाली। देवता जय-जयकार करने लगे। चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें शान्ति छा गयी।
हिरण्यकशिपुकी मृत्युके पश्चात् विष्णुभक्त प्रह्लादजी दैत्योंके राजा बनाये गये। उन्होंने बहुत वर्षोंतक भूमण्डलका राज्य किया। उनके अनेक पुत्र हुए, जिनमें विरोचन ज्येष्ठ थे। विरोचनसे बलिके जन्म हुआ। बलिके उत्पन्न होनेके पश्चात् विरोचनने एकान्तमें योग-साधन करके श्रीहरिके तत्त्वका ज्ञान प्राप्त किया और राज्य त्यागकर वे पर्वतशिखरपर चले गये। श्रीहरिने उनके शरीरको कल्पान्तस्थायी कर दिया। तदनन्तर ‘हममेंसे कौन राजा होगा?' इस प्रश्नको लेकर दैत्यों और दानवोंमें बड़ा विवाद हुआ। तब प्रह्लादजीने आकर एक व्यवस्था की। उन्होंने कहा—'जो समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, दीर्घायु, अतिशय बलवान्, यज्ञशील, सदा आनन्दयुक्त, अधिक पुत्रोंवाला तथा अत्यन्त दुर्जय हो, जो देवताओंके साथ अकारण युद्ध न करे और भगवान् विष्णुको सर्वोपरि, अजेय शक्तिके रूपमें जाने, जिसकी संग्राममें मृत्यु न हो, जो सर्वस्व दक्षिणामें दे देनेवाला हो, अपनी बात कभी व्यर्थ न होने देता हो तथा सब पुत्रोंमें जो अपनी स्वाभाविक श्रीके द्वारा अधिक शोभा पाता हो, उस व्यक्तिको जब गुरुदेव शुक्राचार्य राज्यपदपर अभिषिक्त कर दें, तब वही सब दैत्योंका राजा हो। राजा होने योग्य कौन है—इसके निर्णयमें गुरुदेव ही प्रमाण हैं।' यों कहकर प्रह्लादजी चले गये। तदनन्तर दैत्य दानव एकमत होकर उस व्यवस्थाका पालन करने लगे। शुक्राचार्यजीने राजा बलिको ही गुणोंमें अधिक देखकर तथा प्रह्लादके सभी गुण बलिमें विद्यमान हैं—यों समझकर उन्हींको दैत्योंका राजा बनाया।
वामनजी! मुझे युद्ध देखनेके लिये बड़ी उत्कण्ठा रहती है। ब्राह्मणको युद्ध करते देख मुझे बड़ा हर्ष होता है। आप भी ब्राह्मणके रूपमें प्रकट हुए हैं; अतः बताइये, कब युद्ध करेंगे?
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वामनजीका बलिसे तीन पग भूमि ग्रहण करना तथा गंगा और वामनस्थलीकी महिमा, प्रभासखण्डका उपसंहार
वामनजीने हँसकर कहा—ठीक है, ठीक है। तुम्हारी इच्छा पूरी होगी। फिर मैं जमदग्निनन्दन परशुरामके रूपमें प्रकट होकर भगवान् शिवको गुरु बनाऊँगा और बहुत-से क्षत्रियोंके साथ कार्तवीर्य अर्जुनका वध करूँगा। आगे चलकर महाबली रावण लंकाका राजा होगा। वह अपने अत्याचारोंके कारण जब तीनों लोकोंके लिये कण्टकरूप कहा जाने लगेगा, तब मैं दशरथ और कौसल्याका पुत्र 'राम' होकर भाइयोंके साथ अवतार लूँगा। विश्वामित्रजीके यज्ञमण्डपमें जाऊँगा। ताड़काको मारकर सुबाहुको यमलोक पठाऊँगा। इस प्रकार यज्ञ पूर्ण करके सीताके स्वयंवरमें जाऊँगा और शंकरजीका धनुष भंग करके सीताके साथ विवाह करूँगा। तत्पश्चात् अयोध्याका राज्य छोड़कर चौदह वर्षोंके लिये वनमें चला जाऊँगा। वहाँ पहले मुझे सीता-हरणका दुःख प्राप्त होगा। इससे भी पहले मैं लक्ष्मणद्वारा राक्षसी शूर्पणखाकी नाक और कान कटवा दूँगा। फिर चौदह हजार राक्षसोंसहित खर, दूषण तथा त्रिशिराका वध करूँगा। मृगरूपधारी मारीच राक्षसको मौतके घाट उतारूँगा। तदनन्तर रावणद्वारा मेरी पत्नी सीताका अपहरण होगा। सीताकी रक्षाके लिये प्राण दे देनेवाले जटायुका दाह-संस्कार करके सुग्रीवसे मित्रता जोडूंगा। बालिको मारकर नल आदि वानरोंके सहयोगसे समुद्रपर पुल बाँधूँगा। लंकापर घेरा डाल दूँगा और सब राक्षसोंका संहार करूँगा। विभीषणको लंकाका राज्य दूँगा, फिर अयोध्या आकर वहाँका अकण्टक राज्य
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भोगकर काल और दुर्वासाके अद्भुत चरित्रद्वारा प्रेरित हो पुत्रको राज्य दे भाइयोंके साथ सशरीर परमधामको जाऊँगा। द्वापर आनेपर जब बहुत-से असुर-भावापन्न क्षत्रियोंके भारसे आक्रान्त हो यह पृथ्वी रसातल जानेको उद्यत हो जायगी, तब मैं उसकी दुर्दशा नहीं देख सकूँगा। मथुराके राजा कंसको मारकर शिशुपालको भी परास्त करूँगा और समस्त असुरोंका संहार करके पृथ्वीका भार उतारूँगा। कलियुग आनेपर थोड़े जलवाले बादल होंगे, गौएँ बहुत कम दूध देंगी, दूधमें घी और मनुष्योंमें सत्यका अभाव होगा, लोकमें चोरोंका उपद्रव बढ़ जायगा, सब लोग रोगसे पीड़ित होंगे और किसीको अपना रक्षक नहीं पायेंगे। उस समय मैं बुद्धरूपमें अवतार लूँगा। उसके बाद जब नदियाँ क्षीण हो छोटी हो जायँगी, उनकी धारा पीछेकी ओर बहने लगेगी तथा कार्तिकमें ही वे सूख जायँगी, एकादशी और शिवरात्रिका व्रत बंद हो जायगा, उस समय कलियुगमें ऐसे-ऐसे बर्ताव होंगे, जो पहलेके तीन युगोंमें कभी नहीं हुए थे। बेटा माता-पिताको त्यागकर पत्नीकी सेवामें लग जायगा; न कोई गुरु होगा; न सेवक, कोई किसीकी सेवा नहीं करेगा। कलियुग इस पृथ्वीपर ज्यों-ज्यों अपने रोगका विस्तार करता जायगा; त्यों-त्यों सब लोग एकाकार होते जायँगे। सब कुछ म्लेच्छोंद्वारा दूषित होगा। लोग स्नान और सन्ध्या छोड़ देंगे। उस समय मैं कल्कि नाम विख्यात ब्राह्मण होऊँगा और म्लेच्छोंका संहार करके याज्ञवल्क्यजीको पुरोहित बनाकर म्लेच्छवधका प्रायश्चित्त करनेके लिये यज्ञ करूँगा। नारदजी ! इस प्रकार जो मेरे अवतार होंगे, उनमें युद्धका अवसर आयेगा। इस समय देवतालोग राजा बलिके साथ युद्ध नहीं करेंगे। दैत्यराज बलि मेरा यजन करते हैं; वे महात्मा पुरुष हैं, अतः मेरे द्वारा मारनेयोग्य नहीं हैं। उन्होंने महान् यज्ञका प्रारम्भ करके सर्वस्व-दानका नियम ग्रहण किया है।
यों कहकर वामनजी नगरमें गये और एक घरसे दूसरे घरको देखते हुए प्रतिदिन ब्राह्मणोंके घरोंपर भिक्षा माँगने लगे। वे प्रतिदिन स्नान और वेदाध्ययन करते और द्विजोंके घरोंमें भिक्षा एवं भोजन पाते थे। चौराहोंपर तथा सुन्दर मन्दिरोंमें ठहरते थे। वहाँ बहुत लोग उन्हें घेरे रहते थे। उनके कंधे मोटे और ठोढ़ी बड़ी थी। वे सिर हिला-हिलाकर ताल दे-दे नाचते और अत्यन्त मनोहर स्वरमें गाते थे। ब्राह्मणोंकी सभाओंमें वे चारों वेदोंका उच्चारण करते थे। वामनजीका स्वरूप बड़ा सुन्दर था। दैत्यों तथा ब्राह्मणोंके बालक उन्हें दिन-रात घेरे रहते थे। वे सब ब्रह्मचारी वामनको यज्ञमण्डपमें ले गये और बोले—'तुम अपनी कुटी बनानेके लिये कोई स्थान राजा बलिसे माँग लो। विद्वान् ब्राह्मणका इस नगरमें सदा आदर किया जाता है।' सब मनुष्य उनसे अनुरोध करने लगे—'वामनजी ! आप सदा दैत्यराज बलिके नगरमें निवास करें।' 'बहुत अच्छा' कहकर वामनजीने यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया। उस समय मण्डपके द्वारपर बड़ा कोलाहल हुआ। वामनजी अनेक ब्राह्मणोंके साथ वहाँ खड़े होकर वेदमन्त्रोंका उच्चारण करने लगे। वेदमन्त्रोंका वह महान् घोष समूचे मण्डपमें छा गया। पहलेसे भीतर गये हुए दैत्यों ने दैत्यराज बलिको सूचित किया—'देव! एक वामन ब्रह्मचारी यज्ञमें आपका दर्शन करनेके लिये आये हैं। आप उन्हें भीतर ले आनेके लिये द्वारपालको आज्ञा दें।'
एक मुखसे चारों वेदोंके उच्चारणकी ध्वनि सुनकर राजा बलिको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे द्वारपालसे बोले—"इन्हें आदरपूर्वक भीतर ले आओ, मैं इनकी पूजा करूँगा और इन्हें जिस वस्तुकी इच्छा होगी, वही दूँगा। मुझे वे बातें याद हैं, जो गुरुजीने सिखायी थीं—'कोई वेदमय पात्र होता है, कोई तपोमय। जो भी पात्र तुम्हारे पास आवेगा, वही तुम्हें तार देगा।' यज्ञ आरम्भ होनेपर मुझे सत्पात्रके लिये अवश्य दक्षिणा देनी चाहिये।"
बलिकी यह बात सुनकर गुरु शुक्राचार्यने उन्हें रोका और कहा—'राजन् ! वामनको भीतर
- प्रभासखण्ड * १३३७
न बुलाओ, सब ब्राह्मणोंका पूजन यज्ञमण्डपके द्वारपर ही करना चाहिये। दीन, अन्ध, कृपण, बधिर, वामन, कुब्ज तथा रोगी—ये सब द्वारपर ही पूजनेयोग्य हैं। आप द्वारपर ही जाकर सोने, चाँदी और वस्त्रोंसे वामनका सत्कार करें। चार पुरुषोंका जन्म व्यर्थ है और सोलह प्रकारके दान भी व्यर्थ हैं—जिनके पुत्र नहीं है, जो धर्मसे बहिष्कृत हैं, जो दूसरेके घर भोजन करते हैं तथा जो परायी स्त्रियोंमें आसक्त हैं। इन चार प्रकारके मनुष्योंका जन्म व्यर्थ माना गया है। अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको अन्यायोपार्जित धनका दान नहीं करना चाहिये। जो ब्राह्मण नहीं हैं, जिनका विवाह नहीं हुआ है, जो पतित हैं, सन्ध्याहीन हैं, चोर हैं, जो गुरुको प्रसन्न नहीं रख सकते, पिता-माताकी सेवासे विमुख हैं, ब्राह्मणोंमें अधम हैं, शूद्र स्त्रीसे संपर्क रखते हैं, वेद-विक्रेता, कृतघ्न, ग्रामपुरोहित (अथवा गाँव-गाँव भीख माँगनेवाले) हैं, जिन्हें स्त्रीने वशीभूत कर रखा है, जो साँप पकड़नेवाले हैं तथा दूसरोंकी निन्दामें रत रहते हैं, उन सबको दिया हुआ दान व्यर्थ होता है।'
राजा बलिने कहा—गुरुदेव! आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। जो कोई भी वेदोंका स्वाध्याय करता है, वह ब्राह्मण मेरे लिये विष्णुके समान आदरणीय है। घरपर श्रोत्रिय ब्राह्मणके आनेपर उसके सत्कारमें विलम्ब नहीं करना चाहिये। उठकर उसका स्वागत करे, मीठे वचन बोले और चरण धोकर यथाशक्ति उसे भोजन दे। यही गृहस्थका धर्म है। यदि वामनजी मेरे यज्ञमण्डपसे बिना पूजा प्राप्त किये ही लौट जायँगे तो सर्वस्व दक्षिणाके संकल्पसे किया जानेवाला यह सम्पूर्ण यज्ञ व्यर्थ हो जायगा।
यह बातचीत हो ही रही थी कि वामनजी दैत्यराज बलिके समीप बुलाकर लाये गये। उनका पिंगल शरीर तेजसे सूर्यकी भाँति प्रज्वलित हो रहा था। विष्णुस्वरूप वामनजीको आते देख राजा बलि उठकर उनके सम्मुख गये और प्रणाम करके आगे खड़े हो इस प्रकार बोले—'मैं धन्य हूँ, जिसके यज्ञमें विष्णुके समान ब्राह्मणका शुभागमन हुआ है।' यों कहकर बलि उन्हें मध्यवेदीके समीप ले गये। उन्हें बैठनेको आसन दिया। पाद्य, आचमनीय और अर्घ्य अर्पण किया। चन्दन, धूप और गन्ध आदिके द्वारा उनकी पूजा करके सामने खड़े हो उन्हें मधुपर्क और गौ निवेदन की। वामनजीने मधुपर्कको सूँघकर गायको प्रणाम किया। बलिने कहा—'विप्रवर! आपका स्वागत है।' वामनजी बोले—'राजन्! तुम्हारा कल्याण हो; मैं याचक होकर आया हूँ, मुझे दान दो।' बलिने कहा—'प्रभो! बताइये, आपको क्या दिया जाय?' वामन बोले—'दैत्यराज! भूमि दो।' बलिने कहा—'प्रभो! कितनी भूमि दूँ?' वामन बोले—'राजन्! मुझे कुटी बनानेके लिये तीन पग भूमि दीजिये।' बलिने कहा—'मैंने आपको तीन पग भूमि दी।' वामन बोले—'मैंने तुम्हारा यह दान ग्रहण किया।'
इसी बीचमें शुक्राचार्य बोल उठे—'इन्हें दान न दो। ये सनातन विष्णु हैं।' तब बलिने कहा—'गुरुदेव! यदि ऐसी बात है तो इनसे बढ़कर दानका उत्तम पात्र और कौन हो सकता है।' यों कहकर बलिने सव्यभावसे दाहिने हाथमें कुश और अक्षत लिये; परंतु गुरुजीने न तो संकल्प पढ़ा और न वामनके हाथमें जल ही गिरवाया। यह देख सारे ऋषि, होता, सभासद, बहुत-से ब्राह्मण, दैत्य तथा राजाके स्त्री-पुत्र और बन्धु-बान्धव आश्चर्यचकित हो उठे और कहने लगे—'दत्तम्' (दिया) तथा 'गृहीतम्' (लिया) यह वाणीद्वारा दोनों ओरसे कह दिये जानेपर भी गुरुजी संकल्पके लिये जल क्यों नहीं छोड़ते हैं। वामनजीके हाथमें कल्याणके निमित्त ही जल दिया जाना चाहिये। वाणीद्वारा जो दान दे दिया गया, उसे क्रियाद्वारा निष्पन्न क्यों नहीं किया जाता? गुरुजी यजमानको नरकमें घसीट रहे हैं।
यह सब सुनकर शुक्राचार्यने कहा—'राजन्! ये वामन साक्षात् विष्णु हैं। दैवयोगसे तुम्हें देखनेके लिये आये हैं। पता नहीं दान लेकर
१३३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
ये तुम्हारा प्रिय करेंगे या अप्रिय।' तब बलिने कहा—'गुरुदेव! मेरी बात सुनिये। मैं इन्द्र हूँ, साक्षात् भगवान् विष्णु ही ब्राह्मण हैं और देनेयोग्य द्रव्य सूर्यदेवताका स्वरूप है। जब साक्षात् विष्णु ही यहाँ उपस्थित हैं, तब उनकी प्रीतिके लिये मुझे यह दान क्यों नहीं देना चाहिये?' यों कहकर बलिने वामनके हाथमें संकल्पका जल दे दिया। तब वामनजी चतुर्भुज रूप धारण करके बढ़ने लगे। उनके बढ़ते हुए स्वरूपको देखकर ब्राह्मण, ऋषि और देवता उनकी स्तुति करने लगे—'देव! आपकी जय हो; अनन्त! आपकी जय हो; सर्वव्यापी विष्णुदेव! आपकी जय हो; अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो; मत्स्यरूपधारी हरे! आपकी जय हो; कूर्मावतार! आपकी जय हो। पृथ्वीको उठानेवाले वाराह! आपको नमस्कार है। नरसिंह! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। जमदग्निनन्दन परशुराम! आपको नमस्कार है। लक्ष्मणसहित श्रीराम! आपकी जय हो। कृष्ण! जगन्नाथ! देवकीनन्दन! आपकी जय हो। बुद्ध और कल्कि को मैं प्रणाम करता हूँ।'
इस प्रकार सब नर-नारी भगवान्की स्तुति करते थे। देवर्षि नारद और सनकादि योगी भी उनके गुण गाते थे। भगवान् विष्णुने दो ही पगोंमें समस्त ब्रह्माण्डको माप लिया, तीसरेके लिये स्थान न रहा। उस समय देवता, दानव, मनुष्य, गन्धर्व, नाग तथा राक्षसों ने भी भगवान् विष्णुके चरणोंका पूजन और उनका स्तवन किया। गन्धर्वोंने उनके गुण गाये। भगवान् जब अपने चरणको समेटने लगे, उस समय उसके आघातसे ब्रह्माण्ड फूट गया और उससे बाहरका जल वहाँ प्रकट हो गया। वही जल भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई गंगा है। जो ब्रह्माण्डके शिरोभागसे निकली है। गंगा देवी त्रिभुवनको पवित्र करनेवाली हैं। साक्षात् भगवान् शंकरने अपने मस्तकपर उन्हें धारण किया है। वे स्वर्गलोकमें स्वर्धुनीके नामसे पूजित होती हैं और भूलोकमें आनेपर 'गां (भूमिं) गता' इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'गंगा' कहलाती हैं तथा जब वे पातालमें आयीं तब त्रिपथगाके नामसे प्रसिद्ध हुईं। गंगाजीके स्मरणमात्रसे सब पापोंका नाश हो जाता है। उनके दर्शनसे सम्पूर्ण अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। उनके जलमें स्नान करनेमात्रसे सात जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। जो गंगाजीमें स्नान करके देवी, विष्णु तथा शिवकी पूजा करता है, वह इन्द्रलोकको लाँघकर श्रीविष्णुके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। श्रीविष्णुके चरणोदकरूप गंगाका जल पीकर, उसमें स्नान करके तथा उसे प्रणाम करके मन और इन्द्रियोंका पूर्ण संयम रखनेवाला पुरुष मोक्षको प्राप्त होता है। एकादशीको उपवास करके मनुष्य मुक्ति पाते हैं। जो शुद्ध भावसे युक्त हो परमात्मचिन्तनमें स्थित होते हैं, जनसमुदायके स्थानोंसे विरक्त रहते हैं, वे संसार-बन्धनका उच्छेद करके परम गतिको प्राप्त होते हैं।
महादेवजी कहते हैं—देवि! प्रतिज्ञाकी पूर्ति न कर सकनेके कारण वामनजीने जो बलिका निग्रह किया, उससे देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। तत्पश्चात् भगवान्ने राजा बलिपर अनुग्रह किया और उन्हें पाताललोकमें भेजकर स्वयं वामनस्थलीमें निवास करनेका विचार किया। वहाँ उन्होंने पंचाग्नि-साधन किया और 'वामनपुरी' बसायी। विश्वकर्माद्वारा बनायी हुई वह पुरी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दी गयी। वह पुरी भद्रा नदीके किनारे स्थित है। मधुमतीमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं। वृद्ध प्रभासमें उन सबका विस्तार बताया गया है। भगवान् विष्णु वामनस्थलीमें स्थित हुए। राजा बलि पाताललोकमें रहने लगे, मधुमतीमें सब कामनाओं और फलोंके दाता भगवान् माधव विराजमान हैं। पार्वती! इस प्रकार मैंने तुमसे बारह योजन विस्तृत प्रभासक्षेत्रका वर्णन किया, जो स्मरण करनेमात्रसे सब सिद्धियोंको देनेवाला है।
~~ ० ~~ प्रभासखण्ड सम्पूर्ण ~~ ० ~~
* प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३३९
श्रीद्वारका-माहात्म्य
भगवान्के परमधाम पधारनेपर महर्षियोंका ब्रह्माजीकी आज्ञासे प्रह्लादजीके समीप जाना और प्रश्न करना
श्रीशौनकजीने पूछा—सूतजी! अनेक प्रकारके पाखण्डोंसे भरे हुए इस भयंकर कलिकालमें हम भगवान् मधुसूदनको किस प्रकार प्राप्त कर सकेंगे?
सूतजीने कहा—महर्षियो! दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी महाराज जब परमधामको चले गये, उसके दीर्घकालके पश्चात् द्वापरमें जब दुष्ट राजाओंके भारसे यह पृथ्वी पीड़ित होने लगी, उस समय साक्षात् भगवान् विष्णु देवताओंका कार्य सिद्ध करने एवं पृथ्वीका भार उतारनेके लिये वसुदेवजीके कुलमें अवतीर्ण हुए। फिर वे नन्दके व्रजमें गये। वहाँ उनके द्वारा पूतनाका नाश हुआ। तृणावर्त मारा गया। दहीसे भरा हुआ छकड़ा उलट दिया गया। कालियनागका दमन और प्रलम्बासुरका संहार हुआ। तत्पश्चात् श्रीकृष्णने अपने हाथसे गोवर्धन पर्वतको उठाकर इन्द्रके कोपसे गोकुलकी रक्षा की। उनका गौओंके इन्द्रपदपर अभिषेक हुआ और इन्द्रका अहंकार दूर किया गया। फिर भगवान्ने रासक्रीड़ा की। उसके बाद केशी दानव मारा गया। फिर वे अक्रूरके कहनेसे मथुरापुरीमें गये। वहाँ भी श्रीकृष्णने कुबलयापीड हाथी और मल्लराज चाणूरको मौतके घाट उतारा। दैत्योंके स्वामी भोजराज कंसको भी मार गिराया। उग्रसेनको मथुराका राजा बनाया। जरासन्धकी असंख्य भयंकर सेनाका संहार किया। युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें शिशुपालका भी वध किया। उसके बाद महाभारत-युद्ध आरम्भ होकर समाप्त हो गया। इस प्रकार पृथ्वीका बहुत बड़ा भार उतर गया। तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण समस्त यदुवंशियोंको तीर्थयात्राके लिये प्रभासक्षेत्रमें ले आये। वहाँ उनमें परस्पर कलह आरम्भ हो गया और उस महाभयंकर कलहाग्निमें समस्त यादववंश जलकर भस्म हो गया। तब भगवान् विष्णु वहीं अस्त्र-शस्त्रोंका त्याग करके अश्वत्थ वृक्षकी जड़का सहारा लेकर भूमिपर जा बैठे। इतनेहीमें एक बहेलियेने बाण मारा और उनके चरणमें घाव हो गया। इसे ही निमित्त बनाकर भगवान् श्रीकृष्ण परमधामको चले गये। इसके बाद अर्जुन द्वारकामें आये और यदुकुलकी स्त्रियों तथा बालकोंको लेकर जब बाहर निकले, तब समुद्रने सब ओरसे यदुपुरीको डुबो दिया। श्रीहरिके मन्दिरका निर्माण कराकर वज्र इन्द्रप्रस्थ चले गये। इस प्रकार द्वापर बीत गया और महाभयानक कलिकाल आ पहुँचा। सद्धर्म क्षीण होने लगा। अधर्म प्रबल हो गया। वेदवादका बहिष्कार होने लगा। वर्ण और आश्रमधर्मका ह्रास हुआ तथा धर्मका एक ही चरण शेष रह गया। जब ऐसी अवस्था प्राप्त हुई, तब समस्त वनवासी महर्षि परस्पर मिलकर मन्त्रणा करने लगे। उस मन्त्रणामें गर्ग, च्यवन, गालव, असित, देवल, धौम्य तथा उद्दालक आदि अनेक महर्षि सम्मिलित थे। वे आपसमें इस प्रकार बोले—'अहो! देखो तो सही, पृथ्वीपर प्रत्येक दिशामें कलियुगका साम्राज्य हो गया है। सब ओर लुटेरों और डाकुओंसे प्रजाको बड़ा कष्ट हो रहा है। सत्य और सरलता आदि सद्गुणोंका त्याग करके प्रायः लोग पापमें प्रवृत्त हो रहे हैं। ऐसी दशामें हमें भगवान् विष्णुकी प्राप्ति कैसे होगी? भवसागरमें पड़े हुए हमलोगोंका
| १३४० | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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कौन उद्धार करेगा? भगवान् पुण्डरीकाक्षके बिना इस कलियुगमें हम कैसे रहेंगे?'
इस प्रकार जब वे तपस्वी महर्षि दुखी एवं चिन्तित हो रहे थे, उस समय महर्षि उद्दालकने उन सबसे कहा—'मुनिवरो! हमलोग शीघ्र ही ब्रह्मलोकमें चलें और ब्रह्माजीसे पूछें, कलियुगमें भगवान् विष्णुकी स्थिति कहाँ है? क्योंकि कलिकालमें भगवान्के बिना संसारमें कौन रहेगा।'
उनकी बात सुनकर सब महर्षियोंने एक स्वरसे 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा' कहकर ब्रह्माजीके निकट प्रस्थान किया। वहाँ ब्रह्माजीका दर्शन करके उनके चरणोंमें प्रणाम किया और इस प्रकार स्तुति की—'कमलोद्भव! आपको नमस्कार है। अक्षय! अविनाशी! चतुरानन! आपको नमस्कार है। संसारकी सृष्टि करनेवाले! आपको नमस्कार है। पितामह! आपको नमस्कार है।'
मुनियोंके इस प्रकार स्तवन करनेपर ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए। फिर पाद्य और अर्घ्यसे उन मुनिवरोंका सत्कार करके उन्होंने पूछा—'पुत्रो! तुम्हारे आगमनका क्या प्रयोजन है? तुम लोगोंके पुत्र, शिष्य, अग्नि और भाई-बन्धु तो कुशलसे हैं न?'
ऋषियोंने पूछा—भगवन्! आपके प्रसादसे सर्वत्र कुशल है। आप सम्पूर्ण देवताओंके गुरु हैं। आपका दर्शन पाकर हमें तपस्याका सम्पूर्ण फल मिल गया। अब हम अपने आनेका कारण बतलाते हैं। सत्ययुग आदि तीन युग व्यतीत हो गये। अब भयंकर कलियुग प्राप्त हुआ है। इस समय पृथ्वीपर भगवान् विष्णु कहाँ हैं? जिनका दर्शन करके हम बन्धनरहित हो परम मुक्ति प्राप्त कर सकें।
ब्रह्माजीने कहा—तुमलोग पाताललोकमें जाओ और वहाँ दैत्योंमें श्रेष्ठ प्रह्लादजीसे पूछो। उन्हें कलियुगमें भगवान्के रहनेके स्थानका पता होगा। वे तुमसे सब कुछ बता देंगे।
ब्रह्माजीकी बात सुनकर उन तपस्वी महात्माओंने उन्हें प्रणाम किया और प्रह्लादजीकी प्रशंसा करते हुए वे दैत्यराजके नगरमें गये। उन्हें दूरसे ही आते देख राजा बलि और प्रह्लादजीने उठकर उनकी अगवानी की और पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क एवं गौ देकर उनका यथावत् पूजन किया। तत्पश्चात् प्रसन्न चित्तसे हाथ जोड़कर कहा—'महाभाग महात्माओ! आपका स्वागत है। आजका प्रभात हमारे लिये बड़ा उत्तम था, जो कि आपका दर्शन प्राप्त हुआ। कहिये, मैं आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ?'
इस प्रकार दैत्यराज प्रह्लादके द्वारा सत्कार किये जानेपर वे महर्षि बोले—'भगवान्के प्रिय भक्त प्रह्लादजी! आप इस भवसागरसे हमारे रक्षक होइये। इस भयंकर कलिकालमें भगवान् विष्णुके बिना हमलोग कैसे रह सकेंगे। इस युगमें अधर्मने सनातन धर्मपर विजय पायी है। झूठने सत्यको तथा शूद्रोंने ब्राह्मणोंको परास्त किया है। राजाका रूप धारण करके आये हुए म्लेच्छ ब्राह्मणोंको सता रहे हैं। वर्णाश्रम-धर्मका ह्रास हो गया है। वेदोक्त मार्ग लुप्त होता जा रहा है। ऐसे समयमें भगवान् विष्णु कहाँ हैं? जहाँ ज्ञान, ध्यान और इन्द्रियनिग्रहके बिना भी भगवान्की प्राप्ति हो, उस गूढ़ स्थानका पता हमें बताइये। दैत्यराज! आप हमारे सुहृद् हैं, मार्गदर्शक हैं, अतः कृपा करके बताइये, भगवान् विष्णु कहाँ विराज रहे हैं?'
इस प्रकार उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके पूछनेपर दैत्यराज प्रह्लादने उन्हें मस्तक झुकाया और देवताओंसहित ब्रह्माजी एवं परमात्माको नमस्कार करके उत्तर देना आरम्भ किया।
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- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य *
१३४१
द्वारकाकी महिमा, वहाँकी यात्रा और उसमें योग देनेका माहात्म्य, गोमती और चक्रतीर्थकी उत्पत्ति एवं महिमा, सनकादिकोंपर भगवान्की कृपा
श्रीप्रह्लादजी बोले— महर्षियो! आप सम्पूर्ण देवताओं, दैत्यों, दानवों तथा राक्षसोंके भी पूजनीय हैं। आप पूजनीय महापुरुषोंकी आज्ञा तथा भगवान् विष्णुके प्रसादसे मैं भगवान्के स्थानका परिचय देता हूँ—पश्चिम समुद्रके तटपर जो कुशस्थलीपुरी है, जिसका निर्माण पहले राजा कुशके द्वारा हुआ है, जहाँ गोमती नदी बहती है और समुद्रमें मिली है, वही द्वारावतीपुरी कहलाती है। उसे आनर्ता भी कहते हैं। उसीमें सोलह कलाओं तथा बारह मूर्तियोंसे युक्त विश्वात्मा भगवान् विष्णु निवास करते हैं। जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। वही परम धाम है, वही परमपद है। वह द्वारकापुरी धन्य है, जहाँ शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले चतुर्भुज श्रीकृष्ण विद्यमान हैं। वहाँ जानेसे कलिकालके मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर लेंगे। जहाँ गोमती नदी बहती हैं, जहाँ भगवान् विष्णुकी त्रिविक्रम मूर्ति है, उस द्वारकापुरीमें जाकर चक्रतीर्थमें स्नान करनेवाले मनुष्य मोक्ष प्राप्त करेंगे। जब भगवान् श्रीकृष्ण प्रभासक्षेत्रमें परमधामको पधारे, तब कलासहित वे उस त्रिविक्रम मूर्तिमें स्थित हुए, अतः ब्राह्मणो! इस कलिकालमें भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकाके सिवा अन्यत्र नहीं मिल सकते। यदि आपको श्रीकृष्णसे मिलनेकी इच्छा हो तो शीघ्र वहीं जाइये।
ऋषि बोले— भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ तथा उत्तम मार्ग दिखानेवाले प्रह्लादजी! आपको धन्यवाद है। आज हमने आपके द्वारा उस रहस्यको जान लिया, जिसे आपके सिवा दूसरा कोई नहीं जानता है। अब यह बताइये कि द्वारकापुरीमें जानेसे क्या फल होता है? वहाँ श्रीकृष्ण-दर्शनसे किस फलकी प्राप्ति होती है? द्वारकामें कौन-कौनसे तीर्थ और देवता हैं।
प्रह्लादजीने कहा— ब्राह्मणो! जब मनुष्य द्वारका जानेका विचार मनमें लाता है, उसी समय उसके पितर नरकसे मुक्त हो हर्षके गीत गाने लगते हैं। मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णके मार्गमें जितने पग आगे चलता है, उसे पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। जो मानव श्रीकृष्णपुरीकी यात्राके लिये दूसरोंको प्रेरणा देता है, वह निःसन्देह विष्णुधाममें जाता है। जो द्वारका अथवा मथुरा जानेवाले मनुष्यको धन देता है, वह भगवद्धाममें आनन्दक्रीड़ा करता है। उस मार्गमें थके हुए शरीरवाले मनुष्यको जो सवारी देता है, वह मनुष्य हंसयुक्त विमानसे स्वर्गमें जाता है। जो यात्रामें जाते हुए भूखे पुरुषको मध्याह्नकालमें अन्न देता है, वह गयाश्राद्धसे होनेवाले पुण्यको पाता है। वहाँ पितरोंकी अक्षय तृप्ति होती है। जो द्वारका जानेवाले यात्रीको पहननेके लिये जूते देता है, वह मानव भगवान् श्रीकृष्णके प्रसादसे हाथीपर बैठकर चलता है। जो द्वारका जानेवालेके मार्गमें विघ्न खड़ा करता है, वह मूढ एक कल्पतक रौरव नरकमें डूबा रहता है। जो द्वारकाके मार्गमें टिके हुए पुरुषको कमण्डलु देता है, उसे एक हजार पौंसला चलानेका फल होता है। जो उस तीर्थके मार्गमें जाते हुए पुरुषसे भगवान् विष्णुकी कथा-वार्ता एवं संगीत सुनता है अथवा उसे दान देता है, उससे बढ़कर धन्य मनुष्य कोई नहीं है। द्वारकामें देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णका मन्दिर कैलास-शिखरके समान ऊँचा और श्वेत बादलोंकी भाँति उज्ज्वल है। जो उसका दर्शन करता है, वह मनुष्योंमें श्रेष्ठ है। दूरसे ही फहराती हुई ध्वजा-पताकाके साथ भगवन्मन्दिरका सुवर्णमय कलश देखकर जो सवारीको त्याग देता और धरतीपर लोटकर उसे प्रणाम करता है, उसके पंचसूनाजनित पाप,
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अन्यान्य, भयंकर पाप, मार्गमें पैरोंसे दबकर मरे हुए कृमि-कीट और पतंग आदिके वधसे होनेवाले, परान्न-भोजन, परकीय जलपान तथा स्पर्शसे होनेवाले पाप—ये सभी उस भगवत्क्षेत्रके दर्शनसे नष्ट हो जाते हैं। द्वारकाके यात्रीको चाहिये कि वह मार्गमें विष्णुसहस्रनाम, भीष्मस्तवराज अथवा गजेन्द्रमोक्षका पाठ करते हुए धीरे-धीरे चले। भगवान्के अनेक अवतारोंकी लीला-कथाका गान करते हुए सदा हर्षमें भरा रहे और पवित्रभावसे यात्रा करे। पहले बिना पैर धोये ही भगवान् गणेशको नमस्कार करे। इससे सब विघ्नोंका नाश होता है। जो पहले बड़े भैया बलरामजीको प्रणाम करके नीलकमलदलके समान श्याम वर्णवाले देवकीनन्दन श्रीकृष्णको प्रणाम करता है, वह उनके दर्शनमात्रसे बाल, कुमार तथा युवावस्थामें किये हुए समस्त पापोंका नाश कर देता है। इतना ही नहीं, सहस्रों जन्मोंके मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए उसके जितने भी पाप हैं, सब नष्ट हो जाते हैं। एक हजार भार सुवर्णदान करनेसे जो फल मिलता है, उससे कोटि गुना फल द्वारकामें श्रीकृष्णके मुखका दर्शन करनेसे मिल जाता है। कमलके समान नेत्रोंवाले देवेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण तथा द्वारकाकी रक्षा करनेवाले महर्षि दुर्वासाजीको गरुड़सहित प्रणाम करके द्वारकापुरीके उत्तम द्वारपर आवे।
तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण ही जिसके आश्रय हैं, उस गोमती नदीके समीप जाय। उसका दर्शनमात्र करके मनुष्य सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। गोमतीका जल पापराशि और अमंगलका विनाश करनेवाला तथा मनुष्योंकी सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। उसे प्रणाम करना चाहिये। वह महापापोंका क्षय करनेवाला, जिनकी कहीं भी गति नहीं है, उन्हें सद्गति देनेवाला तथा परम शीतल है। मनुष्यके सब पुण्य जब सहायक होते हैं, तभी उसे गोमतीका जल प्राप्त होता है।
ऋषियोंने पूछा—दैत्यराज ! यह गोमती कौन है और इसे कौन लाया है?
प्रह्लादजीने कहा—प्राचीनकालमें जब एकार्णवके जलमें समस्त स्थावर-जंगम जगत्का नाश हो गया था, उस समय भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। भगवान्ने आज्ञा दी—'ब्रह्मन्! नाना प्रकारकी प्रजाकी सृष्टि कीजिये।' 'बहुत अच्छा' कहकर ब्रह्माजीने सृष्टिमें मन लगाया। उन्होंने अपने मनसे सनक, सनन्दन आदि कुमारोंको जन्म दिया और कहा—'पुत्रो! प्रजा उत्पन्न करो।' ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर सनक आदि महात्मा हाथ जोड़कर बोले—'भगवन्! प्रजापते! हम भगवत्स्वरूपका दर्शन करना चाहते हैं, अतः हम बन्धनमें नहीं पड़ेंगे। इस दुर्गम सृष्टिके चक्रमें नहीं फँसेंगे।' ऐसा कहकर सनकादि कुमार वहाँसे चल दिये। पश्चिम दिशामें समुद्रके तटपर आकर वे भगवान्के तेजोमय स्वरूपका दर्शन पानेकी इच्छासे उन्हींमें मन लगाकर उत्तम तपस्यामें संलग्न हो गये। बहुत वर्षोंके पश्चात् धरणीधर भगवान् विष्णु प्रसन्न हो समुद्रके जलका भेदन करके उनके सामने प्रकट हुए। उनका वह तेजोमय स्वरूप सूर्यके समान दुर्दर्श था। करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी तथा सहस्रों धारवाले सुदर्शन चक्रमय स्वरूपका दर्शन करके ब्रह्माजीके पुत्र सनकादि बड़े विस्मित हुए। वे भगवान्के उस उत्तम आयुधकी ओर देखते रह गये। उन्हें आश्चर्यमें पड़ा हुआ देख आकाशवाणी हुई—'ब्रह्मपुत्रो! भगवान् विष्णु शीघ्र ही प्रकट होंगे। भगवान्की पूजाके लिये शीघ्र अर्घ्य प्रदान करो। यह उन्हीं भगवान् जगन्नाथका आयुध है। इसके लिये भी शीघ्र अर्घ्य दो।'
आकाशवाणीका यह कथन सुनकर उन सब महर्षियोंने सुदर्शनकी स्तुति की। वे बोले—'ज्योतिर्मय सुदर्शन! तुम्हें नमस्कार है। हरिवल्लभ! तुम्हें नमस्कार है। सहस्र अरोंवाले सुदर्शनचक्र! तुम अविनाशी हो, तुम्हें नमस्कार है। सूर्यस्वरूप! तुम्हें नमस्कार है। ब्रह्मरूप! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारा प्रहार कभी व्यर्थ नहीं होता।
- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३४३
तुम्हें नमस्कार है। चक्ररूप! तुम्हें बार-बार नमस्कार है।'
इस प्रकार स्तुति करके उन्होंने फूल और अक्षत आदिसे भगवान्के प्रिय आयुध सुदर्शनका पूजन और प्रणाम किया। तत्पश्चात् भगवान्के दर्शनके लिये उत्सुक होकर सनकादिकोंने मन-ही-मन अपने पिता ब्रह्माजीका स्मरण किया। उनका अभिप्राय जानकर ब्रह्माजीने गंगाजीसे कहा—'सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगे! तुम भगवान्की सेवाके लिये भूतलपर जाओ। 'गो' अर्थात् इस दिव्य लोकमें तुम मुझे विशेष अभिमत हो, इसलिये पृथ्वीपर तुम्हारा नाम गोमती होगा। जैसे पिताके साथ पुत्री जाती है, उसी प्रकार तुम वसिष्ठजीके पीछे-पीछे पृथ्वीपर जाओ और वसिष्ठजीकी पुत्री होकर रहो।' 'बहुत अच्छा' कहकर गंगादेवी पश्चिम समुद्रकी ओर चलीं। आगे-आगे वसिष्ठजी और पीछे-पीछे गंगा। वसिष्ठजीके साथ गंगाजीको पश्चिम समुद्रकी ओर जाती देख सब लोगोंने नमस्कार किया। जहाँ सनकादि मुनि थे, वहीं गंगाजी प्रकट हुईं। उन महाभाग मुनियोंने दिव्य सुगन्धित माला, चन्दन, धूप आदिसे उनकी पूजा करके उनके ऊपर अक्षत और फूल बिखेरे। भगवान्के लक्ष्मीसेवित चतुर्भुजरूपका दर्शन करनेकी इच्छावाली सर्वलोकपावनी महाभागा गंगाजीकी उन सबने बड़ी प्रशंसा की और साधुवाद दिया। वसिष्ठजीको देखकर सब ब्राह्मण उठकर खड़े हो गये और बोले—'महर्षे! आप इस श्रेष्ठ नदीको यहाँ ले आये हैं, इसलिये यह लोकमें आपकी पुत्रीरूपसे विख्यात होगी। 'गो' अर्थात् स्वर्गसे इस स्थानपर आकर यह मतिस्वरूपा मानी गयी है, इसलिये लोकमें गोमती नामसे उसकी प्रसिद्धि हुई है। इसके दर्शनमात्रसे मनुष्य मोक्षको प्राप्त होंगे। फिर यहाँ स्नान-दान आदि करके वे श्रीहरिके धाममें जायँगे, इसके विषयमें कहना ही क्या।' सनकादि योगीश्वरोंने गोमतीको अर्घ्य देकर पुरुषसूक्तके मन्त्रोंसे शेषशायी भगवान् श्रीहरिका स्तवन किया। इस प्रकार स्तुति करते हुए उनके समक्ष साक्षात् भगवान् विष्णु प्रकट हुए। उन्होंने पीले रंगका रेशमी वस्त्र पहन रखा था। गलेमें वनमाला शोभा दे रही थी। दिव्य माला तथा दिव्य अनुलेपनसे उनके श्रीअंगोंकी बड़ी शोभा हो रही थी। वे दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थे। शेषनागकी शय्यापर पौढ़े हुए थे। उन्होंने हाथोंमें अनेकों दिव्य आयुध धारण कर रखे थे। उनके मस्तकपर किरीट-मुकुट जगमगा रहा था और कानोंमें मकराकृत कुण्डल चमचम कर रहे थे। भक्तोंको अभय देनेवाले कमनीय विग्रह महाबाहु श्रीहरिका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित था। उनके मुखपर शाश्वत प्रसन्नता छायी हुई थी। श्रीविग्रहकी कान्ति श्याम थी। चार भुजाओंसे शोभायमान वे भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीके द्वारा चरणसंवाहनजनित आनन्दमें मग्न होकर अतिशय मनोहर प्रतीत होते थे। उन्हें देखकर सनकादि मुनि बड़े प्रसन्न हुए और वैदिक विष्णुसूक्तके मन्त्रोंसे आनन्दस्वरूप श्रीविष्णुकी स्तुति करने लगे। उनके इस प्रकार स्तवन करनेपर दीनोंपर दया करनेवाले श्रीहरि प्रसन्नचित्त होकर इस प्रकार बोले—'ब्रह्मकुमारो! मैं तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ; अतः तुम्हें मनोवांछित वर दूँगा। तुम मेरी मायासे निर्लिप्त रहकर नित्य ज्ञानसम्पन्न होओगे। ब्राह्मणो! तुमने मोक्षकी अभिलाषा लेकर मुझ जलशायी विष्णुको प्रसन्न किया है; इसलिये यह मेरा श्रेष्ठ तीर्थ सदा मोक्षदायक होगा। तुमपर अनुग्रह करनेके लिये यहाँ पहले सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ है; अतः उस चक्रके नामपर यह तीर्थ चक्रतीर्थ कहलायगा। यहाँ महासागरमें मेरा भी नियमित रूपसे निवास होगा। जो मानव किसी अन्य प्रसंगसे भी यहाँ चक्रतीर्थमें स्नान करते हैं, उन्हें मुक्ति हाथ लग जाती है। विप्रवरो! आपलोग भी सदा यहाँ निवास करें।'
भगवान्का यह वचन सुनकर सनकादि
| १३४४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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महात्माओंके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने भगवान्को अर्घ्य दे गोमतीके जलसे उनके चरण पखारे और उन चरणोंको मस्तकपर धारण किया। इस प्रकार श्रीहरिके चरणोंका प्रक्षालन करके महाभयहारिणी गोमती महासागरमें मिल गयीं। तदनन्तर सनकादि महात्माओंको अभीष्ट वरदान दे श्रीहरि वहीं अन्तर्धान हो गये और ब्रह्मपुत्र सनकादि एकाग्रचित्त हो उसी तीर्थमें रहने लगे। इस प्रकार वहाँ गोमतीका प्रादुर्भाव हुआ और वह समुद्रमें जा मिली। पहले जिनका नाम गंगा सुना गया था, वे ही द्वारकामें सागरगामिनी गोमती कहलायीं।
### गोमतीमें स्नान और भगवत्पूजनकी महिमा
**ऋषि बोले—** दैत्यप्रवर महाभाग प्रह्लादजी! आपको अनेकशः धन्यवाद है; क्योंकि आपने इस कलियुगमें हमें भगवान् श्रीहरिका दर्शन कराया है। जहाँ गोमती नदी बहती है, उस स्थानपर हमें अवश्य जाना चाहिये; क्योंकि वहाँ भगवान् श्रीहरि चक्रतीर्थका निरीक्षण करते हुए सदा निवास करते हैं। महामते! अब गोमतीमें स्नान तथा भगवान् श्रीकृष्णके पूजनकी विधिका वर्णन कीजिये।
**प्रह्लादजीने कहा—** गोमतीके तटपर जाकर पहले उसे साष्टांग प्रणाम करे; फिर हाथ-पैर धोकर दोनों हाथोंमें कुशा ले तथा अक्षत और फल आदि संग्रह करके संयमपूर्वक पूर्वाभिमुख होकर बैठे और विधिवत् अर्घ्य दे। अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है—
> ब्रह्मलोकात्समायाते वशिष्ठतनये शुभे।
> सर्वपापविशुद्ध्यर्थं ददाम्यर्घ्यं च गोमति॥
> वशिष्ठदुहितर्देवि शक्तिज्येष्ठे यशस्विनि।
> त्रैलोक्यवन्दिते देवि पापं मे हर गोमति॥
'ब्रह्मलोकसे आयी हुई वसिष्ठकी पुत्री गोमती! मैं तुम्हें सब पापोंसे शुद्ध होनेके लिये अर्घ्य देता हूँ। वसिष्ठतनये! तुम्हारी शक्ति बहुत बड़ी है। सुयशसे सुशोभित होनेवाली त्रिभुवनवन्दिता गोमती देवी! मेरे पाप हर लो।'
इस मन्त्रका उच्चारण करके हाथमें मिट्टी लेकर मन-ही-मन भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करे—
> अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे।
> उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना॥
> मृत्तिके हर मे पापं यन्मया पूर्वसञ्चितम्।
> त्वया हतेन पापेन सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
'अश्व, रथ तथा भगवान् विष्णुके द्वारा आक्रान्त होनेवाली वसुन्धरे! तुम्हें सैकड़ों भुजाओंवाले वराहरूपधारी भगवान् विष्णुने जलके ऊपर उठाया है। मृत्तिके! मेरे पूर्वसंचित पाप हर लो। तुम्हारे द्वारा पापके नष्ट कर दिये जानेपर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।'
ऐसा कहकर उस मृत्तिकाको सब अंगोंमें लगावे और विधिपूर्वक स्नान करे। स्नानके समय **'आपो अस्मान्०'** इत्यादि वैदिक मन्त्रका भी उच्चारण करना चाहिये। सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमें स्नान करनेसे जो पुण्य होता है, वही श्रीकृष्णके समीप गोमतीमें स्नान करनेमात्रसे प्राप्त हो जाता है। अतः उत्तम भक्तिभावसे गोमतीमें स्नान करके यथोचित कर्म करे। देवताओं, पितरों और मनुष्योंका तर्पण करे। जो रौरव नरकमें स्थित हैं अथवा कीटयोनिमें पड़े हैं, वे सब पितर गोमतीका जल देनेसे निस्सन्देह मुक्त हो जाते हैं। अक्षत और कुशके बिना ही बिना भावनाके भी गोमतीका जलमात्र अर्पण करनेसे गया-श्राद्धका फल होता है।
इस प्रकार तर्पण करनेके पश्चात् तीर्थवासी वेदज्ञ ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे और विश्वेदेव आदिके पूजनपूर्वक पितरोंका श्राद्ध करे। सुवर्ण
- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३४५
और रजतकी दक्षिणा दे। सोनेके सींग और चाँदीके खुरोंसे विभूषित रत्नमय पुच्छ और ताम्रमय पृष्ठभागवाली दुग्धयुक्त सवत्सा गौकी वस्त्र और आभूषणोंद्वारा पूजा करके भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे सप्तधान्यसहित उस गौका दान करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको सीमाके बाहरतक पहुँचाकर जितेन्द्रिय एवं पवित्र पुरुषों, दीनों, अन्धों और कृपणोंको अपनी शक्तिके अनुसार दान दे। गोमती नदी, गोमयस्नान, गोदान, गोपीचन्दन तथा गोपीनाथका दर्शन—ये पाँच गकार दुर्लभ हैं।* इसलिये मनुष्यको गोमतीके तटपर गोदान अवश्य करना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। जो पूर्वकर्मोंके फलसे स्थावर (वृक्ष आदि)-की योनिमें चले गये हैं, ऐसे पितर, पितृकुलके हों या मातृकुलके, वे सभी कलियुगमें गोमतीके दर्शनसे मोक्षको प्राप्त होते हैं। गोमतीके तटपर श्राद्ध करनेसे निश्चय ही अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। प्रयागमें गंगा-स्नान करनेसे जो पुण्य होता है, उसे गोमतीके तटपर श्राद्ध करनेवाला पुरुष प्राप्त कर लेता है। उसके तीनों कुलोंके पितर विष्णुलोकमें जाते हैं तथा सहस्रों जन्मोंका किया हुआ पाप नष्ट हो जाता है। गोमतीके दर्शनसे मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए सभी पाप विलीन हो जाते हैं। भयभीत प्राणीको अभयदान देनेसे मनुष्य जिस पुण्यको पाता है, उसीको गोमतीके जलमें स्नान करके मनुष्य पा लेता है; इतना ही नहीं, वह पैतृक ऋणसे मुक्त एवं कृतकृत्य हो जाता है। मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए समस्त पाप गोमतीके जलका सम्पर्क होते ही नष्ट हो जाते हैं। गोमतीमें स्नान करनेवाला पुरुष सुन्दर वनमाला, चार भुजा तथा दिव्य गन्ध और अनुलेपनसे युक्त होकर उस विष्णुधाममें जाता है, जहाँसे पुनः लौटकर इस संसारमें नहीं आना पड़ता।
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चक्रतीर्थ तथा रुक्मिणीह्रदका माहात्म्य
प्रह्लादजी कहते हैं—विप्रवरो! यहाँसे चक्रतीर्थयुक्त समुद्रके समीप जाय, जहाँ मोक्ष देनेवाली चक्रांकित शिलाएँ देखी जाती हैं। जो प्रतिदिन भाव-भक्तिके साथ भगवान् जगन्नाथ श्रीकृष्णका पूजन करते हैं और सदा अपलक नेत्रोंसे उनका दर्शन करते रहते हैं, वे धन्य हैं। साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने जिसे निरन्तर अपनी दृष्टिसे देखकर पालन किया है, वह श्रीहरिका सर्वपापनाशक चक्रतीर्थ सबसे श्रेष्ठ है। किसी दूसरे प्रसंगसे भी जिसका दर्शन कर लेनेपर मनुष्य पापमुक्त हो जाता है, वह चक्रतीर्थ सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ और पावन है। वहाँ जाकर प्रसन्नतापूर्वक हाथ-पैर धोकर आचमन करनेके पश्चात् साष्टांग प्रणाम करे। फिर पंचरत्नयुक्त अर्घ्यपात्र लेकर उसमें फूल, अक्षत, गन्ध, फल और चन्दन आदि मिलाकर अर्घ्य तैयार करे और फिर उसे हाथमें लेकर पश्चिम या समुद्रकी ओर मुँह करके निम्नांकित मन्त्र पढ़े—
ॐ नमो विष्णुरूपाय विष्णोश्चक्राय ते नमः। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं सर्वकामप्रदो भव॥
'ॐविष्णुस्वरूप तुम विष्णुचक्रको बार-बार नमस्कार है। मेरा दिया हुआ अर्घ्य स्वीकार करो और मेरे सम्पूर्ण मनोरथोंके दाता बनो।'
इस प्रकार अर्घ्य देकर समुद्रमें स्नान करे। फिर तीर्थकी भीगी हुई मिट्टी हाथमें ले उसे मस्तकपर धारण करके प्रणवका उच्चारण करते हुए पुनः स्नान करे। तदनन्तर क्रमशः देवता, ऋषि, मनुष्य तथा पितरोंका तर्पण करके भक्तिभावसे श्रीविष्णु और शिवका पूजन करे। भलीभाँति विधिपूर्वक किये हुए सहस्रों अश्वमेध यज्ञोंसे
* गोमती गोमयस्नानं गोदानं गोपिचन्दनम्। दर्शनं गोपिनाथस्य गकाराः पञ्च दुर्लभाः ॥ (स्क० पु०, द्वा० मा० ६। २३-२४)
१३४६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
जो फल प्राप्त होता है, वही चक्रतीर्थमें स्नान करनेमात्रसे मिल जाता है। चक्रतीर्थसे निकली हुई चक्रांकित शिला मनुष्योंद्वारा सदा पूजनेयोग्य है। उसके पूजनसे भगवान् विष्णुका सामीप्य प्राप्त होता है। मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए समस्त पाप वहाँ स्नानमात्रसे नष्ट हो जाते हैं।
वहाँसे सुप्रसिद्ध सात कुण्डोंके समीप जाय, जो सब पापोंका नाश करनेवाले तथा ऋद्धि और बुद्धिको बढ़ानेवाले हैं। कलियुगमें उनकी रुक्मिणीह्रदके नामसे प्रसिद्धि होगी। भृगुजीसे सेवित होनेके कारण उसे भृगुतीर्थ भी कहते हैं। वहाँ जाकर प्रसन्नतापूर्वक हाथ-पैर धोये और आचमन करके इन्द्रियसंयमपूर्वक पूर्वाभिमुख हो कुश, फल, फूल, अक्षत और रजत आदिसे युक्त भरा हुआ अर्घ्यपात्र लेकर मस्तकसे लगाकर इस प्रकार कहे—'मैं सब पापोंके नाश तथा रुक्मिणीजीकी प्रसन्नताके लिये रुक्मिणीह्रदनामक इस तीर्थको भक्तिपूर्वक अर्घ्य देता हूँ।' ऐसा कहकर अर्घ्य दे और सिरपर मार्जन करके स्नान करे। फिर देवता, ऋषि, मनुष्य और पितरोंका तर्पण करके ब्राह्मणोंको बुलाकर भक्तिभावसे श्राद्ध करे। फिर सुवर्ण और रजतकी दक्षिणा दे। विशेषतः रसीले फल अर्पण करने चाहिये। ब्राह्मणदम्पतिको मिष्टान्न भोजन करावे। पितृपंक्ति तथा अन्यान्य स्त्रियोंका यथाशक्ति कंचुकि और लाल वस्त्रोंके द्वारा पूजन करे। 'रुक्मिणी प्रीयताम्—रुक्मिणीदेवी प्रसन्न हों' ऐसा कहकर वह पूजन आदि कर्म रुक्मिणीदेवीको समर्पित करना चाहिये। ऐसा करनेपर मनुष्य कृतकृत्य होता, सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करता और विष्णुलोकमें जाता है। जो रुक्मिणीकुण्डमें स्नान करता है, वह शक्तिहीन तथा याचक नहीं होता। उसे संसारचक्रमें भटकना नहीं पड़ता। वह दुःख, शोक,पाप तथा महान् भयसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।
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विष्णुपदोद्भवतीर्थकी महिमा, उद्धवजीका ब्रजमें आगमन, उनके साथ गोपियोंकी बातचीत, गोपियोंका द्वारकागमन तथा मयसरोवरकी महिमा
**प्रह्लादजी कहते हैं—**विप्रवरो! वहाँसे विष्णुपदोद्भव तीर्थमें जाय, जिसके दर्शनमात्रसे गंगास्नानका फल मिलता है तथा जिसके स्मरण और कीर्तनसे सब पापोंका नाश हो जाता है। भगवान् श्रीकृष्णने रुक्मिणीजीके लिये जिस गंगाजीको प्रकट किया था, वही विष्णुपदा कहलाती हैं। उसमें आचमन करनेमात्रसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। श्रीविष्णुके चरणसे प्रकट हुई है, इसलिये वह वैष्णवी नामसे भी प्रसिद्ध है। वहाँ जाकर विधिपूर्वक अर्घ्य हाथमें लेकर निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करे—
नमस्ये त्वां भगवति विष्णुपदतलोद्भवे।
गृहाणार्घ्यमिदं देवि गङ्गे त्वं हरिणा सह॥
'भगवान् विष्णुके चरणतलसे प्रकट हुई भगवती गंगे! मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। देवि! तुम श्रीहरिके साथ मेरा यह अर्घ्य स्वीकार करो।'
ऐसा कहकर अर्घ्य दे। फिर हाथसे तीर्थकी मृत्तिका लेकर मस्तकमें लगाये और इन्द्रियोंको अपने वशमें रखते हुए पूर्वाभिमुख हो स्नान करे। स्नानके बाद देवताओं और पितरोंका तर्पण करे। फिर ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करके श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करे। सोना-चाँदी दक्षिणामें दे। अपनी शक्तिके अनुसार दीनों, अन्धों और कृपणोंको भी दान दे।
तत्पश्चात् गोप्रचार या गोपीसरोवर तीर्थमें जाय, जहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करके मनुष्य गोदानका फल पाता है। जहाँ जगदीश्वर श्रीकृष्ण श्रावण मासमें देवताओंसहित स्नान करते हैं, वहाँ द्वादशीको चटाई देनेका विधान है।
- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * | १३४७ ---|---
ऋषियोंने पूछा—दैत्यराज! वहाँ गोप्रचार तीर्थ कैसे हुआ? जिसमें साक्षात् भगवान् जनार्दन स्नान करते हैं?
प्रह्लादजीने कहा—अमित तेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा भोजराज कंसके मारे जानेपर जब उग्रसेन मथुरापुरीके राजा हुए, उस समय गोकुलप्रिय श्रीकृष्णने अपने सुहृद् गोपों तथा गोपीजनोंका प्रिय करनेके लिये उद्धवजीको गोकुलमें भेजा। उद्धवजी गोविन्दको नमस्कार करके उन्हींके समान वेष-भूषा तथा वस्त्रालंकार धारण करके नन्दगाँवकी ओर चले। सन्ध्याकालमें श्रीकृष्णके प्रिय सखा उद्धवजीको अपने घर आया देख पुत्रवत्सला माता यशोदाने अच्छे-अच्छे वस्त्र और आभूषण देकर उनका सत्कार किया। जब उद्धवजी भोजन करके विश्राम कर चुके, तब पुत्रस्नेहमयी यशोदा तथा नन्दबाबाने अपने नेत्रोंमें आँसू भरकर श्रीकृष्णका कुशल-समाचार पूछा—'उद्धवजी! बताओ तो सही, हमारे दोनों पुत्र श्रीकृष्ण-बलराम कुशलसे तो हैं न? क्या श्रीकृष्ण अपने साथी ग्वाल-बालोंको कभी याद करते हैं? क्या मथुरानाथ गोविन्द कभी गोकुलमें भी पधारेंगे? क्या हमारा लाला कन्हैया इस गोकुलका शोकसमुद्रसे उद्धार करेगा?' ऐसा कहकर पुत्रस्नेहके वशीभूत यशोदा मैया और नन्दबाबा—दोनों दीनभावसे फूट-फूटकर रोने लगे। उनके नेत्रोंसे अश्रुधारा बह रही थी। उद्धवने देखा, ये दोनों विरहकी अन्तिम सीमातक पहुँच गये हैं। अब इनके प्राण रहेंगे या नहीं, यह संशय उपस्थित हो गया है। तब उन्होंने श्रीकृष्णके स्नेहयुक्त मधुर सन्देश सुनाकर उन दोनोंको जीवनदान दिया। उद्धवजी बोले—'श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने अपने बड़े भैया बलरामजीके साथ आप दोनोंको नमस्कार कहलाया है। कुशल-मंगल पूछा है और वे दोनों भाई भी कुशलसे हैं। जगदीश्वर श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ शीघ्र ही यहाँ आवेंगे और आपलोगोंका हित-साधन करेंगे।'
इस प्रकार श्रीकृष्णके सन्देश-वाक्योंसे नन्द और यशोदाको सान्त्वना देकर उनके द्वारा सम्मानित हो उद्धवजी शय्यापर सुखपूर्वक सोये। प्रातःकाल गोपियाँ नन्दबाबाके द्वारपर रथ खड़ा देख अत्यन्त विस्मित हुईं। उनके मनमें सन्देह हुआ, श्रीकृष्ण तो नहीं आ गये? अतः वे परस्पर पूछने लगीं, 'नन्दरायजीके घरमें सूर्यके समान तेजस्वी रथसे ये श्रीकृष्णकी-सी वेष-भूषा धारण किये कौन आये हैं?' इस प्रकार जिज्ञासा करती हुई समस्त ब्रजसुन्दरियाँ परस्पर मिलकर एकान्त स्थानमें गयीं और शोकसे दुर्बल हो उद्धवजीको वहीं बुलाकर श्रीकृष्णका सन्देश पूछने लगीं—'तुम कहाँसे आये हो? और किसलिये यहाँ पधारे हो?' इतना कहते-कहते वे शोकसे विह्वल एवं मूर्च्छित हो गयीं और उद्धवजीकी ओर देखती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ीं।
श्रीकृष्ण-प्रेम-परवश गोपीजनोंकी यह अवस्था देखकर उद्धवजीने उन्हें श्रवण-सुखद वचनोंद्वारा आश्वासन देते हुए कहा—'गोपियो! भगवान् श्रीकृष्णकी भी यही दशा है। वे दिन-रात तुम्हारी ही याद करके निरन्तर दुःखी रहते हैं।' उद्धवजीकी यह बात सुनकर ललिता प्रणयकोपसे मूर्च्छित-सी होकर आँखें लाल किये रोती हुई बोलीं—'श्यामसन्दर झूठे हैं। मर्यादा भंग करनेवाले और क्रूर हैं। क्रूर मनुष्य ही उन्हें प्रिय हैं। कृतज्ञता तो उनमें छू भी नहीं गयी है। उद्धवजी! आप उनकी कोई चर्चा हमारे आगे न कीजिये।'
श्यामला बोली—सखियो! तुमलोग उनकी बात चलाती ही क्यों हो? छोड़ो श्रीकृष्णकी चर्चा, कोई दूसरी बातें करो।
धन्याने कहा—पुरुषार्थहीन लक्ष्मीपतिके इन दूत महोदयको कौन यहाँ बुला लाया है? श्रीकृष्णका साथ करनेसे कोई लाभ नहीं है।
विशाखा बोली—जिनके कुल और शीलका कोई पता नहीं है, उन्हें पापका भय क्या होगा? उनके जन्म-कर्मकी ख्याति तो स्त्रीवधसे ही प्रारम्भ हुई है।
| १३४८ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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श्रीराधाजीने कहा— सखियो ! जिन्हें प्राणियोंका वध करनेमें पापका कोई भय नहीं होता, उन्हें स्त्री-वध करनेमें क्या शंका हो सकती है?
**शैव्या बोली—**महाभाग उद्धवजी ! सच बताइये, नागरी स्त्रियोंसे घिरे हुए यदुवंशशिरोमणि श्रीकृष्ण क्या कभी हमलोगोंका भी स्मरण करते हैं?
**पद्माने कहा—**उद्धवजी ! नागरीजनोंके प्रियतम तथा कमल-दलके सदृश विशाल नेत्रोंवाले श्रीकृष्ण यहाँ कब पधारेंगे?
**भद्रा बोली—**हा कृष्ण! हा गोपप्रवर! हा गोपीजनवल्लभ! महाबाहो ! हम गोपियोंका संसार-सागरसे उद्धार करो।
इस प्रकार नाना प्रकारकी बातें कह-कहकर ब्रजयुवतियाँ विलाप करने लगीं! वे श्रीकृष्णकी एक-एक लीला याद करके फूट-फूटकर रोने लगीं। उनका वह रोना सुनकर भक्ति और स्नेहमें डूबे हुए उद्धवजीको बड़ा विस्मय हुआ और वे उन गोपियोंकी सराहना करने लगे—'अहो ! ब्रह्मा, महादेवजी, देवता तथा महर्षि भी जिस भावतक नहीं पहुँच सकते, वहाँ इन गोपियोंकी पहुँच हो चुकी है। ब्रजकी ये समस्त सुन्दरियाँ धन्य हैं। इन सबका जन्म, जीवन तथा यौवन-धन सफल हो गया, क्योंकि भगवान् श्यामसुन्दरमें इनकी भक्ति अविचल है।'
**गोपियाँ बोलीं—**उद्धवजी ! आप हमें गोविन्दका दर्शन करा दें। प्यारे श्यामसुन्दरसे मिला दें। जहाँ श्रीकृष्ण रहते हैं, वहीं हमको भी ले चलें।
गोपांगनाओंकी यह बात और विलाप सुनकर उद्धवजी स्नेहसे विह्वल हो गये और 'बहुत अच्छा' कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया। तदनन्तर श्रीकृष्णदर्शनके लिये लालायित रहनेवाली समस्त ब्रजांगनाएँ बड़ी प्रसन्नताके साथ उद्धवजीके पीछे-पीछे चलीं। वे मार्गमें उनकी बाललीलाके प्रिय गीत गाती जा रही थीं। यदुपुरीके समीप पहुँचकर उन्होंने वहाँके उद्यानों और वन-श्रेणियोंको देखा। तब वे परस्पर कहने लगीं—'यहाँ हमें अपने प्यारे कमलनयन नन्दनन्दनका दर्शन होगा।' द्वारकामें जाने और लक्ष्मीपतिका चिन्तन करनेसे गोपियाँ समस्त पापोंसे मुक्त हो गयीं, उनके सारे बन्धन टूट गये। धीरे-धीरे वे मयसरोवरके तटपर आयीं। वहाँ उद्धवजीने उनके चरणोंमें प्रणाम करके कहा—'देवियो! तुमलोग यहीं ठहरो। महाबाहु श्रीकृष्ण यहीं आवेंगे और तुम सब लोगोंका हित करेंगे।'
**गोपियोंने पूछा—**उद्धवजी ! खिले हुए कमलों, कह्लारों, कुमुदों और उत्पलोंसे जिसकी विचित्र शोभा हो रही है और जहाँ सारस किलोल करते हैं, ऐसा यह सरोवर किसका है?
**उद्धवजीने कहा—**माया जाननेवाला महादैत्य मय तीनों लोकोंमें विख्यात है। उसीने यह सुन्दर सरोवर बनाया है; अतः उसीके नामसे यह मयसरोवर कहलाता है।
**गोपियाँ बोलीं—**अच्छा, उद्धवजी! आप शीघ्र जाइये और प्यारे श्यामसुन्दरको बुला लाइये। वे ही हमारे नयनोंमें आनन्दकी सृष्टि करते हैं। उन्हींसे हमारे तीनों तापोंका नाश होता है; अतः शीघ्र उनका दर्शन कराइये।
यह सुनकर उद्धवजी गये और भगवान् श्रीकृष्णको शीघ्र बुला लाये। गोपियोंने देखा, देवकीनन्दन आ रहे हैं। उनका श्रीअंग वनमालासे विभूषित है। मस्तकपर किरीटमुकुट जगमगा रहा है। कानोंमें मकराकार कुण्डल चमचम कर रहे हैं। वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न शोभा पा रहा है। उनकी बड़ी-बड़ी भुजाएँ हैं। उन्होंने रेशमी पीताम्बर पहन रखा है। तीनों लोकोंमें सबसे अधिक सुन्दर और सबका मन मोह लेनेवाले अपने प्रियतम श्यामसुन्दरको दीर्घकालके बाद देखकर श्रीकृष्णप्रिया गोपियाँ प्रेमावेशसे मूर्च्छित हो गयीं। कुछ देरके बाद जब वे सचेत हुईं, तब इस प्रकार विलाप करने लगीं—'हा नाथ! हा प्राणवल्लभ! हा स्वामिन्! हा ब्रजेश्वर! हा मनमोहन ! बचपनमें जिन्होंने तुम्हारा लालन-
- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३४९
| पालन किया, जिनके साथ तुमने क्रीडाएँ कीं, उनको भी तुमने त्याग दिया। निर्दयी! बताओ तो सही, हमपर इतने रुष्ट कैसे हो गये? हम जानती हैं, तुममें न धर्म है न सौहार्द, न मैत्री है और न सत्यवादिता, तुम तो पिता-माताका भी परित्याग करनेवाले हो। तुम्हें कैसे सद्गति प्राप्त होगी? प्राणवल्लभ! भक्तजनोंका परित्याग सब शास्त्रोंमें निन्दित बताया गया है। वीर! हमें वनमें छोड़ते समय तुमने उन शास्त्र-वचनोंपर भी दृष्टिपात नहीं किया?'<br><br>गोपियोंका यह विलाप सुनकर सबके आन्तरिक भावोंको जाननेवाले भगवान् श्रीकृष्णने यह जान लिया कि सब गोपियाँ अनन्यभावसे मेरी शरणमें आयी हैं; अतः व्रजेश्वरने उन सबको सान्त्वना देते हुए कहा—'देवियो! तुमसे मेरा कभी वियोग नहीं है। मैं समस्त प्राणियोंके हृदयमें सदा सामान्यरूपसे निवास करता हूँ। मैं ही सबकी उत्पत्तिका कारण हूँ। मुझसे ही इन्द्र आदि देवता प्रकट हुए हैं। आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुद्गण, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, आद्याशक्ति, महर्षि, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, सत्त्व, रज, तम, काम, क्रोध, लोभ, मद और अहंकार—इन सबकी प्रवृत्ति मुझसे ही होती है। ऐसा जानकर तुम मनमें शोक न करो। सब प्राणियोंके भीतर मुझे सदा ही स्थित जानकर अन्तर्यामीरूपसे मेरा चिन्तन करो। इससे सब प्रकारके पाप-तापसे मुक्त हो जाओगी।'<br><br>श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर गोपियोंके सब बन्धन कट गये। उनके संशय और क्लेश नष्ट हो गये। वे भगवद्दर्शनजनित आनन्दमें डूब गयीं। श्रीकृष्णके दर्शनसे उनका अन्तःकरण अत्यन्त निर्मल हो गया। वे इस प्रकार बोलीं—'गोविन्द! आज हमारा जन्म सफल हो गया। आज हमारे नेत्र सार्थक हो गये। क्योंकि आज दीर्घकालके बाद हमारी आँखें नागरीजनवल्लभ गोविन्दका दर्शन कर रही हैं। पुण्यहीन स्त्रियोंको पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका दर्शन नहीं होता। मधुसूदन! यद्यपि | आपने युक्ति तथा अर्थयुक्त वचनोंसे हमें ज्ञानका उपदेश दिया है तथापि हमारे हृदयसे माया नहीं निकलती।'<br><br>श्रीकृष्णने कहा—इस सरोवरके दर्शन और स्पर्शसे तुम सम्पूर्ण बन्धनोंसे मुक्त हो गयी हो। अब इसमें स्नान कर लेनेसे तुम्हारी सम्पूर्ण कामनाएँ पूरी हो जायेंगी।<br><br>गोपियाँ बोलीं—जगन्नाथ! आपने इस सरोवरका अद्भुत प्रभाव बतलाया है। अब इसमें स्नान करनेकी क्या विधि है, वह विस्तारपूर्वक कहिये।<br><br>श्रीकृष्णने कहा—गोपियो! इस सरोवरपर मेरे साथ तुम्हारा मिलन हुआ है, अतः यहाँ मेरे ही साथ तुम्हें नियमपूर्वक स्नान करना चाहिये। जो श्रावण शुक्ला द्वादशीको संयम, नियम एवं पवित्रतासे रहकर भक्तिपूर्वक इस सरोवरमें स्नान करके पितरोंका तर्पण करेगा और मेरे तथा पितरोंके उद्देश्यसे यथाशक्ति दान देगा, वह पितरोंसहित विष्णुधामको प्राप्त होगा। मयतीर्थके पास जाकर दोनों हाथोंमें कुश और फल ले निम्नांकित मन्त्रसे अर्घ्य दे—<br><br>गृहान्धकूपे पतितं मायापाशशतैर्वृतम्।<br>मामुद्धर महीनाथ गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥<br><br>'महीनाथ! मैं घरके अन्धकूपमें पड़ा हूँ। मायाके सैकड़ों बन्धनोंमें बँधा हूँ। मेरा उद्धार करो। यह अर्घ्य लो। तुम्हें नमस्कार है।'<br><br>इस प्रकार अर्घ्य दे भक्तिपूर्वक स्नान करे। भक्तिभावसे पितरोंका तर्पण और श्राद्ध करे। सोने और चाँदीकी दक्षिणा दे। शक्कर मिलाया हुआ खीर, मधु आदि अर्पण करे। मुझे तुमलोगोंका यहाँ दर्शन हुआ है; अतः मुझे सदा इस जलाशयमें आना और रहना चाहिये। प्यारी गोपियो! जो इस मयसरोवरमें स्नान करता है, उसे गंगास्नानका फल और अक्षय वैकुण्ठधाम प्राप्त होते हैं। उसके तीनों कुलोंके पितर मुक्त हो जाते हैं। वह स्वयं भी पुत्र-पौत्रसे युक्त तथा धन-धान्यसे सम्पन्न होता है। जीवनभर सुख भोगकर अन्तमें श्रीहरिके धामको जाता है। |
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१३५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
गोपी-सरोवरका निर्माण और उसकी महिमाका वर्णन
प्रह्लादजी कहते हैं—श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर गोपियोंके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उस मयसरोवरमें स्नान करके वे समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो गयीं। श्यामसुन्दर श्रीकृष्णके दर्शनसे उनके हृदयमें असीम आनन्द हुआ था। उन्होंने माधवसे मधुर वाणीमें कहा—'भगवन्! दैत्योंमें श्रेष्ठ मय धन्य है, जिसके बनाये हुए सरोवरमें सम्पूर्ण देवताओंके साथ जगदीश्वर निवास करें। प्रभो! यदि आप हम पर प्रसन्न हैं और हम आपके कृपापात्र हैं तो हमारे लिये भी एक तीर्थका निर्माण कराइये। जहाँ रहकर आपके नामोंका कीर्तन, आपका दर्शन तथा निरन्तर आपके स्वरूपका ध्यान करनेसे हम परम गतिको प्राप्त हों।'
श्रीकृष्णने कहा—साध्वी गोपियो! तुम मेरी आत्मीयजन हो; अतः तुम्हारा प्रिय कार्य अवश्य करूँगा। तुम सदैव मेरे अनुग्रहकी पात्र हो; क्योंकि मैं सदा भक्तिके वशीभूत रहता हूँ।
ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने गोपियोंके हितके लिये मयसरोवरके समीप एक-दूसरे सरोवरका निर्माण कराया। उसमें अगाध जल था। कमलके पत्ते उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उस सरोवरका जल बड़ा ही स्वच्छ था। हंस, सारस और चक्रवाक आदि पक्षी उसे सुशोभित करते थे। कुमुद, उत्पल, कह्लार और पद्मखण्ड उस सरोवरके श्रृंगार थे। उसके तटपर मुख्य-मुख्य ब्राह्मण, सिद्ध और विद्याधर आकर रहने लगे। यदुकुलकी स्त्रियाँ, बालक और उस जनपदके लोग दिन-रात वहाँ भरे रहते थे। उस सरोवरको देखकर श्रीकृष्णने कहा—'गोपियो! मयसरोवरके समीप सज्जनोंके मनकी भाँति स्वच्छ जलसे भरे हुए इस सरोवरको देखो। यह तुम्हारे ही लिये तैयार कराया गया है। तुम्हारे नामसे ही इसकी ख्याति होगी। तुम्हें और मुझे गोवाचक शब्द अभीष्ट है; अतः गौके नामपर लोकमें यह तीर्थ गोप्रचार नामसे प्रसिद्ध होगा। मैंने तुम सब गोपियोंका प्रिय करनेकी इच्छासे इस सरोवरका निर्माण किया है; इसलिये यह गोपीसरोवरके नामसे भी विख्यात होगा। तुमलोग मेरे प्रति विशेष भक्तिके कारण यहाँ आयी हो, अतः तुम्हें जो अभीष्ट हो या तुम्हारे मनमें जो कुछ भी हो, वह माँगो।'
गोपियाँ बोलीं—माधव! आप प्रसन्नतापूर्वक इस सरोवरमें निवास करें। जहाँ आप हैं वहीं दान, व्रत, नियम, ॐकार, वषट्कार, स्वाहाकार, स्वधाकार, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्गलोक, महर्लोक, जन, तप और सत्यलोक सबकी स्थिति है। देवता, असुर और मनुष्योंसहित यह सम्पूर्ण जगत् श्रीकृष्णमय ही है। तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली गंगा आपका चरणोदक ही तो हैं। आपके वक्षःस्थलमें लक्ष्मी और मुखमें सरस्वती देवीका वास है। जगदीश्वर! आप यहाँ अपने सर्वभूतमय स्वरूपसे स्नान करें। महाबाहो! यहाँकी यात्रा करनेसे जो फल होता हो, उसका वर्णन कीजिये।
श्रीकृष्णने कहा—गोपियो! सुनो—सदाचारी, शुद्ध, निर्धन, परोपकारी एवं कुटुम्बी ब्राह्मणको आवश्यक सामग्री, बछड़ा, वस्त्र, आभूषण तथा शास्त्रोक्त दक्षिणासे युक्त गाय दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह सब इस गोपी-तीर्थमें स्नान करनेमात्रसे मिल जाता है। जो मनुष्य अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे स्तुति करते हुए मेरे विग्रहके साथ गाते-बजाते गोपी-सरोवरकी यात्रा करते हैं, उन्हें कभी माताके गर्भकी यातना नहीं भोगनी पड़ती। वे समस्त मनोरथोंको पाते और विष्णुलोकको जाते हैं। गोपीसरोवरमें निम्नांकित मन्त्रसे श्रद्धापूर्वक अर्घ्य देकर स्नान करना चाहिये—
अर्घ्य-मन्त्र
नमस्ते गोपरूपाय विष्णवे परमात्मने।
गोप्रचार जगन्नाथ गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥
- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * | १३५१ ---|---
'गोपरूपधारी परमात्मा विष्णुको नमस्कार है। गोप्रचार! जगन्नाथ! यह अर्घ्य ग्रहण करो। तुम्हें नमस्कार है।'
इस प्रकार विधिपूर्वक अर्घ्य दे हाथसे तीर्थकी मिट्टी लेकर मस्तकमें लगावे और श्रद्धापूर्वक स्नान करके देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करे। फिर एकाग्रचित्त हो भक्तिभावसे श्राद्ध करे और शास्त्रमें बताये अनुसार सुवर्ण तथा रजतकी दक्षिणा दे। ऐसा करनेसे मनुष्य उत्तम गतिको पाता है। उसके तीनों कुलोंके पितर उत्तम लोकमें जाते हैं। श्राद्धकर्ता पुरुष यदि पुत्रकी इच्छा रखनेवाला हो तो वह मनके अनुकूल पुत्र पाता है। जो गोपीसरोवरमें स्नान करता है, वह स्वर्ग और मोक्ष आदि जिस-जिस वस्तुको चाहता है, सब कुछ पा लेता है। जबतक जगत् रहेगा, तबतक यह सरोवर भी रहेगा और जबतक सरोवर रहेगा, तबतक तुम्हारी कीर्ति भी स्थिर रहेगी। मनुष्यलोकमें जबतक कीर्ति बनी रहती है, तबतक उसका स्वर्गलोकमें रहना निश्चित है। इसमें स्नान करके निष्पाप हुए समस्त प्राणी परम गतिको प्राप्त होंगे। भाद्रपदमास आनेपर जलसे भरे हुए पवित्र गोपीसरोवरमें नियमपूर्वक स्नान करना होगा। तुमलोग कान्तभावसे अथवा ब्रह्मभावसे मुझ परमेश्वरका चिन्तन करते हुए परम उत्तम गतिको प्राप्त होओगी।
इस प्रकार भगवान्की आज्ञा पाकर उन गोपकन्याओंने उन्हें नमस्कार किया और वे जैसे आयी थीं, वैसे ही चली गयीं। इस प्रकार गोपियोंको विदा करके उद्धवसहित श्रीकृष्ण अपने घरको गये।
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ब्रह्मकुण्ड, चन्द्रसरोवर, इन्द्रसरोवर, महादेवसरोवर, गौरीसरोवर, वरुणसरोवर तथा पंचनदतीर्थका माहात्म्य
प्रह्लादजी कहते हैं—द्वारकामें बहुत-से आश्चर्यजनक तीर्थ हैं, जो घोर कलियुग प्राप्त होनेपर समुद्रमें विलीन हो जाते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण पृथ्वीका भार उतारकर और साधु पुरुषोंको सन्मार्गमें स्थापित करके जब बड़े-बूढ़े वृष्णिवंशियोंके साथ द्वारका चले आये, तब उनके दर्शनके लिये सम्पूर्ण देवताओंके साथ इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर, सूर्य तथा चन्द्रमा वहाँ आये और श्रीकृष्णसे मिलकर अपना कार्य सिद्ध कर लेनेके पश्चात् ब्रह्माजीने अपने नामसे वहाँ एक तीर्थ निर्माण किया, जो ब्रह्मकुण्ड कहलाया। वह सब पापोंका नाश करनेवाला तीर्थ है। ब्रह्मकुण्डके तटपर उन्होंने सूर्यनारायणकी स्थापना की। लोकपितामह ब्रह्माजी सम्पूर्ण देवताओंके मूल हैं, अतः उनके द्वारा स्थापित उस तीर्थको मूल स्थान कहते हैं। उस ब्रह्मतीर्थको देखकर चन्द्रमाने भी अपने नामसे एक तड़ाग बनाया, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। उस तेजस्वी तीर्थको देखकर सब देवता बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने लोकस्रष्टा ब्रह्माजीसे कहा—'जो यहाँ स्नान करके पितरोंका तर्पण करेगा तथा जो माघशुक्ला सप्तमीको देवेश्वर मूलस्थानका पूजन करेगा, वह सब पापोंसे मुक्त हो धन-धान्यसे सम्पन्न होगा।'
ब्रह्माजीने उस सरोवरके तटपर एक शिवलिंगको भी स्थापित किया; फिर महाभाग इन्द्रने भी परम सुन्दर सरोवर बनाकर वहाँ इन्द्रेश्वर लिंगकी स्थापना की। वहाँ स्नान करके मनुष्य इन्द्रपद पाता है; अतः वह भूतलपर इन्द्रपदके नामसे प्रसिद्ध है। उसका दर्शन करके मनुष्य सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। अष्टमी और चतुर्दशीको इन्द्रपद तीर्थमें स्नान करके जो इन्द्रेश्वरकी पूजा करता है, वह मोक्ष पाता है। जब सूर्य मकर राशिपर स्थित हों, उस समय उत्तरायणकी संक्रान्तिके अवसरपर तथा विशेषतः शिवरात्रिको पार्वतीसहित इन्द्रेश्वरकी पूजा करके