संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1360, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड * १३३१
व्याधियोंसे व्याकुल थे।
जगत्की यह विपरीत दशा देख बलिका चित्त व्याकुल हो उठा। वे अत्यन्त दुःखी हो ब्राह्मणोंके साथ बैठकर विचार करने लगे कि यह क्या है। बलिने पराभक्तिसे युक्त हो अपने गुरुको बुलाकर सभामें बैठाया और कुशल-समाचार पूछा और कहा—'गुरुदेव! यह सम्पूर्ण जगत् विपरीत दशाको प्राप्त हुआ है। इसका कारण बताइये।'
शुक्राचार्य बोले—राजन्! उत्पात-शान्तिके लिये ब्राह्मणों और क्षत्रियोंके साथ एक द्वादशवार्षिक यज्ञ करो, जिसमें सर्वस्वकी दक्षिणा दी जाती हो। ऋषि, ब्राह्मण, मुनि और ब्रह्मचारी जो दूर-दूर रहनेवाले हैं, वे सब इस महायज्ञमें पधारें। नगरसे पूर्व दिशामें यज्ञमण्डप बनाना चाहिये। जिसकी जैसी रुचि हो, वैसी वस्तु उसे दानमें देनी चाहिये।
'यही करूँगा' यह कहकर राजा बलि शीघ्र ही यज्ञ प्रारम्भ करनेको उद्यत हुए और यज्ञकर्ममें कुशल समस्त ब्राह्मणोंको बुलाकर बोले—'मुझे यज्ञकी दीक्षा लेकर सर्वस्वकी दक्षिणा देनी है। इसमें ब्राह्मणोंके याचना करनेपर उन्हें सदा सब कुछ देनेपर तत्पर रहना चाहिये। मैं किसीके याचना करनेपर अपने पुत्र, मित्र तथा इस शरीरको भी दे डालूँगा। इस यज्ञमें मुझे ब्राह्मणोंके लिये सदा दान करना चाहिये। किसीके मना करनेपर भी मुझे रुकना नहीं है। दान देनेका निश्चय मैंने पूर्णरूपसे कर लिया है। अनेक योजन विस्तृत दिव्य मण्डप बनवाकर उसमें सबको दान, भोजन और वस्त्र दिये जायँ।'
सप्तर्षिगण आकाशसे भूतलपर आये। सब देवता भी उपस्थित हुए। पृथ्वीपर जो श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, वे भी पधारे। क्षत्रिय, नट, नर्तक और याचक भी आये। वेदमन्त्रोंकी ध्वनिके साथ गीत और वाद्यका भी शब्द होने लगा। 'दीजिये, दीजिये' की याचनाका शब्द तीनों लोकोंको बधिर किये देता था। 'न दो या थोड़ा दो' की बात किसीके मुँहसे नहीं निकलती थी। जो जिस वस्तुको माँगता, उसे वही दी जाती थी। कोई ऐसा ब्राह्मण नहीं था, जो वहाँ बहुत याचना करे। स्वतः दिये जानेपर भी ब्राह्मणलोग भोजन और वस्त्रतक नहीं लेते थे। क्योंकि वे सब लोग राजा बलिके राज्यसे ही बहुत सन्तुष्ट थे। धन लेकर क्या करते।
इस प्रकार सर्वस्वकी दक्षिणासे युक्त वह महान् यज्ञ प्रारम्भ हुआ। वहाँ कोई नाचते, कोई गाते, कोई पाठ और स्तुति करते थे। ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, सूर्य, चन्द्र आदि देवता आहुतियों और मन्त्रोंसे अत्यन्त प्रसन्न किये गये। कुछ लोग यजमान राजा बलिकी प्रशंसा करते और कुछ लोग आचार्यकी। कोई होताके गुण गाता और कोई परिचारकके। दैत्य सब कुछ सुनते और राजा बलिके आगे जाकर कहते थे। बलि प्रसन्न होकर सबको मुँहमाँगी वस्तुएँ देते थे।
~~ ० ~~
देवर्षि नारदका वामनजीको मत्स्य आदि अवतारोंका वृत्तान्त सुनाना, नृसिंहावतार एवं प्रह्लादकी कथा
महादेवजी कहते हैं—एक समय देवर्षि नारद वामनजीके समीप गये और उनके वृत्तान्त पूछनेपर इस प्रकार बोले—'प्रभो! मैं स्वर्गलोकसे यहाँ आया हूँ। प्रतिदिन सूर्यके गमनागमन ब्रह्माका दिन पूरा होता है। दिनके अन्तमें रात होती है और ब्रह्माजीकी रात्रिमें सब देवताओंका नाश हो जाता है। फिर मर्त्यलोककी तो बात ही क्या कहूँ, जहाँ प्रतिदिन लोगोंकी मृत्यु होती है। आकाश धुएँसे आच्छादित हो गया है। सब देवता राजा बलिके घर गये हैं। सप्तर्षिगण तथा ब्राह्मण और ब्रह्मचारी भी वहीं पहुँचे हैं। हाहा, हूहू, तुम्बुरु, पर्वत, अप्सराएँ तथा गन्धर्वगण—