संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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मारे। दाता हो, परंतु कुपात्रके यहाँ धनकी वर्षा न करे। धृष्ट होकर रहे, किंतु निष्ठुर न हो। दुष्टोंसे सन्धि और भाई-बन्धुओंसे विरोध न करे। दुष्ट पुरुषसे गुप्तचरका काम न ले। किसीको सताकर अपना स्वार्थ सिद्ध न करे। अर्थको समझे। जहाँ आपत्तिमें पड़ा हो, वहाँ अपने गुणोंका बखान न करे। साधु पुरुषोंसे विरोध न करे। असाधु पुरुषोंका आश्रय न ले। अच्छी तरह जाँच-पड़ताल किये बिना किसीको दण्ड न दे। गुप्त मन्त्रणाको प्रकाशित न करे। लोभी पुरुषोंको दान न दे। अपकारियोंपर विश्वास न करे। स्त्रीको अत्यन्त गुप्त रखे। बलवान् राजा दूसरोंके अपराध क्षमा करे। स्त्रीका अत्यन्त सेवन न करे। प्रिय तथा हितकर भोजन करे, अहितकर नहीं। जो चोर न हो, ऐसे मनुष्यका सत्कार करे। निष्कपट भावसे गुरुकी सेवा करे। देवताकी पूजा दिखावेके लिये न करे। अनिन्दित लक्ष्मीकी इच्छा करे। स्वार्थ त्यागकर सेवा करे। कार्यदक्ष तथा समयका ज्ञाता हो। बातचीत करते हुए भोजन न करे। किसीपर अनुग्रह करते हुए उसपर आक्षेप न करे। समझ-बूझकर प्रहार करे, शत्रुओंको मारकर शेष न रहने दे। अकस्मात् क्रोध न करे। अपराधियोंके प्रति भी मृदु व्यवहार करे। इस प्रकार आचरण करनेसे राज्य सुस्थिर होता है। यदि कल्याण चाहते हो तो योगके द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करो। तपस्या, स्वाध्याय, दान, तीर्थयात्रा तथा आश्रमवास—ये सब आत्मज्ञानकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं। तुम्हें संसारकी ओरसे वैराग्य रखना और ब्राह्मणोंका पूजन करना चाहिये। नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान तथा भगवान् नारायणका चिन्तन करना चाहिये। राजन्! मैं प्रसंगवश यहाँ आ गया था, अब जाता हूँ।
यों कहकर नारदजी चले गये। तत्पश्चात् दैत्योंको अपशकुन दिखायी देने लगे। रातको सियारिनें उनके नगरमें प्रवेश करके विकृत स्वरमें रोती थीं। दूषित शब्द करनेवाले कौए दिन-रात नगरमें आते-जाते थे। भयंकर विषवाले काले साँप घरोंमें घूमते थे। कौए, गीध, और बगले पागल-से होकर नगरके ऊपर मँडराते थे। स्त्रियों, गौओं और हिरनियोंके गर्भ उलटे पैदा होते थे। गौओंके दूधमें घी नहीं निकलता था। तिलमें तेल नहीं होता था। देशवासी मनुष्य प्रतिदिन आपसमें लड़ते थे। मेघ कुपित होकर असमयमें अधिक जलकी वर्षा करते थे। बादल बहुत गरजते और ओलोंकी वर्षा करते थे। भूकम्प होता और दिशाओंमें आग लगती थी। गाँवोंमें उल्लुओंके शब्द गूँजते रहते थे और झुंड-के-झुंड कुत्ते एकत्र होकर मुँह ऊँचे करके रातभर रोया करते थे। राजा बलिके राज्यका विनाश आ पहुँचा था। दिनमें पुच्छलतारेका उदय होता। सूर्यमण्डल कीलोंसे घिरा हुआ दिखायी देता। आकाश घड़ोंसे व्याप्त होनेके कारण उसमें चन्द्रमाका प्रकाश नहीं प्रतीत होता था। रोहिणी नक्षत्रका वेध हुआ, जो प्रलयकालमें हुआ करता था। दिनमें तारे गिने जाते थे। भूमि, स्त्री, गाय और मृगियोंमें बीजोंका उलट-फेर होने लगा। मन्त्रीलोग गुप्त मन्त्रणामें सम्मिलित होकर फिर फूट जाते थे। उस समय घीकी आहुति देनेपर भी आग प्रज्वलित नहीं होती थी। प्रचण्ड आँधी चलती थी। बवंडरसे वृक्ष जोर-जोरसे झूमते थे। सेनाओंमें ध्वजाएँ जलती थीं। आकाश धूलसे धूसरित हो जाता था। ये तथा और भी बहुत-से उत्पात राजा बलिके यहाँ होने लगे। वामनजीका अवतार हो जानेपर दैत्योंके घरमें भयंकर विवाद और स्वप्नदर्शन होता था। जब दैत्यराज बलि कवच धारण करके यात्रा करते, तब सेनासहित उनके सामने ऐसे-ऐसे अपशकुन उपस्थित होते थे, जिनके होनेपर यात्रा करनेवाला पुरुष अपने घरको कुशलपूर्वक नहीं लौटता। जब वे घरपर रहते तथा राज्य करते, तब उनके शरीरको सुख नहीं मिलता। सब अंग टूटता और सिरमें दर्द होने लगता। वे ज्वरग्रस्त होनेके कारण न सुखसे सोते, न खाते और न पीते ही थे। लोग रातको भोजन नहीं करते। क्योंकि सब प्रकारकी