संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1358, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* प्रभासखण्ड *
१३२९
कुलीन, वेदज्ञ, क्रोधरहित, स्नानशील तथा अपने देशके अनुकूल सदाचारमें तत्पर गृहस्थ ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। श्राद्धके एक दिन पहले निष्काम, लोभरहित एवं नीरोग ब्राह्मणोंको निमन्त्रण देना चाहिये; किंतु गाँवभरकी पुरोहिती करते हों, उनको नहीं। उन निमन्त्रित ब्राह्मणोंके आगे विधिपूर्वक पिण्डदान करना चाहिये। बिना श्रद्धाके किया हुआ श्राद्ध दूसरेके किये हुएके समान निष्फल होता है। अतः क्रोध त्यागकर श्रद्धापूर्वक श्राद्धका अनुष्ठान करना चाहिये। श्राद्धकर्ममें बलिवैश्वदेवके अन्तमें वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, पथिक एवं तीर्थसेवी अतिथिका सत्कार करना चाहिये। गृहस्थोंको चाहिये कि वे अपनी शक्तिके अनुसार संन्यासियोंका सदा ही पूजन करें।
राजा बलिके राज्यकी प्रशंसा, नारदजीका बलिको राजाके कर्तव्यका उपदेश, उत्पात-शान्तिके लिये बलिके द्वारा यज्ञका प्रारम्भ
महाबलवान् भगवान् नृसिंहने हिरण्यकशिपुको मारकर त्रिलोकीका राज्य इन्द्रको दे दिया। हिरण्यकशिपुके कुलमें बलि पैदा हुए। वे बड़े बलवान् थे। उन्होंने इस पृथ्वीका एकछत्र शासन किया। उनके राज्यमें सारी पृथ्वी बिना जोते-बोये ही अन्न पैदा करती और हरी-भरी खेतीसे सुशोभित होती थी। वृक्षोंमें सुगन्धित पुष्प और रसीले फल लगते थे। वृक्षोंमें तनेके ऊपरतककी डालियोंमें फल लगते थे। उनके पत्ते-पत्तेमें मधु भरा रहता था। सभी ब्राह्मण चारों वेदोंके ज्ञाता होते थे। क्षत्रिय युद्धकलामें कुशल, वैश्य गोसेवापरायण तथा शूद्र द्विजमात्रकी सेवामें तत्पर होते थे। सब लोग दरिद्रता, दुःख और अकालमृत्युके भयसे मुक्त हो दीर्घजीवी होते थे। रातमें प्रत्येक भूभागमें दीपकोंका इतना प्रकाश होता कि रात्रि भी दिनके समान जान पड़ती थी। जैसे देवता देवलोकमें सुखपूर्वक विहार करते हैं, उसी प्रकार मनुष्य भूलोकमें सानन्द विचरण करते थे। पृथ्वी स्वर्गरूप हो गयी थी और वहीं राजा बलि राज्य करते थे। देवताओं और दानवोंमें परस्पर युद्ध नहीं होता था।
एक समयकी बात है नारदजी राजा बलिके भवनमें पधारे। बलिने उन्हें आसन, पाद्य और अर्घ्य देकर उनका पूजन किया, फिर सब दैत्य और दानव बैठे। उस समय शुक्राचार्यसहित बलिने नारदजीसे कहा—'देवर्षे ! यह राज्य, यह पत्नी, ये मेरे पुत्र और मैं बलि सब आपकी सेवामें प्रस्तुत हैं। इनमें जिससे आपका जो कार्य हो, उसे कहिये।'
नारदजीने कहा—राजन् ! जो ब्राह्मण यजमानकी भक्तिसे ही सन्तुष्ट हो जाते हैं, वे 'भूमिदेव' कहे गये हैं। तुमने मेरा भलीभाँति पूजन किया, इससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। मुझे धनसे कोई प्रयोजन नहीं है। मैं तुम्हारे राज्यसे, तुम्हारे, यज्ञ, दान और व्रतोंसे परम सन्तुष्ट हूँ। बले ! मैं देखता हूँ, देवताओंद्वारा तुम्हारा कुछ अप्रिय कार्य किया गया है। तुमसे भलीभाँति पूजित होनेपर भी देवराज इन्द्र सन्तुष्ट नहीं हो रहे हैं। मैंने सुना है, देवताओंके प्रयत्नसे भूतलपर तुम्हारे राज्यका उच्छेद होगा। यह सुनकर तुम्हें जो उचित प्रतीत हो, वह शीघ्र करो।
राजा बलिने पूछा—प्रभो ! राजा किन गुणोंसे राज्य करता है, यह बताइये। दान सत्पात्रको देना चाहिये या अपात्रको?
नारदजीने कहा—जो राजा छत्तीस गुणोंसे सम्पन्न होकर राज्य करता है, वही राज्यका फल पाता है। राजा पापरहित हो सब धर्मोंका प्रेमपूर्वक अनुष्ठान करते हुए आस्तिक बना रहे। गुप्तरूपसे अर्थका साधन करे, कामनाओंको त्याग दे और उद्दण्डतासे दूर रहे। प्रिय वचन बोले, किंतु कभी दीन न हो। शूरवीर होकर रहे, परंतु डींग न