भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1357, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1357

१३२८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

उनकी यह विपरीत धारणा है कि सुन्दरी स्त्रियोंका शरीर अपने अपवित्र शरीरसे कोई भिन्न वस्तु है। वे मुक्ति-मार्गसे भ्रष्ट होकर पशुयोनिमें जन्म लेते हैं। जो मानव पुष्ट शरीर और नीरोग युवावस्था पाकर गंगा आदि तीर्थोंमें नहीं जाते, वे ज्ञानशून्य खल जीते-जी भी मरे हुएके समान हैं। पहले शुभ और अशुभ कर्मोंका बन्धन काटकर फिर कल्याणमय मोक्ष पानेकी इच्छा करे। यदि ऐसा न हो सके तो मनुष्योंको सदा शुभ कर्म ही करना चाहिये। प्रतिदिन उठकर स्नान करे। उसके बाद भगवान् विष्णु और शिवकी पूजामें संलग्न हो। सदा सच बोले। सबका हित करे। अपनी शक्तिके अनुसार दान दे। परनिन्दासे डरे। परायी स्त्रियोंसे दूर रहे। सुवर्णकी चोरी, पृथ्वीका अपहरण और ब्राह्मणके धनका त्याग करे। ब्राह्मण, स्त्री, राजा, बालक, वृद्ध, तपस्वी, पिता-माता तथा गुरुजन—इनका मनसे भी कभी अप्रिय न करे। देश-कालका ज्ञान तथा पात्र और अपात्रका विवेक रखना चाहिये। गृहस्थ पुरुष याचकोंको छाया, तृण, अन्न, वस्त्र, मट्ठा, अग्नि, ईंधन, काँजी, औषध और शाक दे। एकादशी, पूर्णिमा, चतुर्दशी, अष्टमी, अमावास्या, व्यतीपात, संक्रान्ति, ग्रहण, वैधृति, पिता-माताकी निधन-तिथि, युगादि-तिथि और मन्वादि तिथिको अपने घरमें श्राद्ध, दान एवं कीर्तन आदिका उत्सव मनाना चाहिये। अथवा उक्त तिथियोंको तीर्थमें जाना चाहिये; क्योंकि वहाँ घरसे सौ गुना फल होता है। गृहस्थ पुरुष इन्द्रियोंको वशमें करे। मदिरा पीना और जूआ खेलना छोड़ दे। विवादमें जाना और युद्ध करना यत्नपूर्वक त्याग दे। स्नान, दान, जप, होम, देवपूजन और ब्राह्मणभोजन आदि पुण्यकर्म यदि उक्त तिथियोंमें विधिपूर्वक किये जायें तो वे सब अक्षय होते हैं। किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको एक भी गौ अवश्य दान करे, जो वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित, दूध देनेवाली, बछड़ेवाली और तरुणी (नयी) हो। जो एक भी गाय ब्राह्मणको दान करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जब यमदूत किसी पुरुषको बाँधकर उसे यमलोकके मार्गसे ले जाते हैं, उस समय दानमें दी हुई नन्दा गौ वहाँ आकर उसे अपने पुत्रकी भाँति देखती है और यमदूतोंको अपने हुंकारसे जीतकर दाताको साथ ले शिवलोकमें पहुँचा देती है। यदि अपने आहारमेंसे चौथाई भाग सिद्धान्न निकालकर दान किया जाता है तो दाता पुरुष निश्चय ही ध्रुवलोकमें जाता है। यदि प्रतिदिन अपने आहारके बराबर अन्न गौओंको गोग्रासके रूपमें दिया जाता है, उसे देनेवाला पुरुष शिवलोकमें जाता है। ओखली, चक्की, चूल्हा और झाडू आदिके द्वारा जो पाप बन जाता है, उस पापको गृहस्थ पुरुष प्रतिदिन भिक्षा देकर धोता है। एक ग्रास अन्नकी भिक्षा होती है। जहाँ उतनी भिक्षा प्रतिदिन दी जाती है, उसी घरको घर समझना चाहिये। दूसरा घर श्मशान-सा दिखायी देता है। घर, अन्न, जल सिद्धान्न, छाता, जूता, कमण्डलु, अँगूठी और वस्त्र दान करके मनुष्य स्वर्गमें जाता है। जो थके हुएको सवारी देता, प्यासेको पानी पिलाता और भूखसे पीड़ित मनुष्यको अन्न देता है, वह विमानद्वारा स्वर्गलोकमें जाता है। अपनी शक्तिके अनुसार सदा घृतयुक्त भोजन देना चाहिये; क्योंकि प्राण अन्नमय है, अतः उसे पाकर प्राणी सन्तुष्ट होते हैं। संसारमें भूखकी पीड़ा ही सबसे बड़ी पीड़ा है। उसकी दवा है अन्न। अन्नसे ही वह पीड़ा शान्त होती है। इसलिये अन्नदान उत्तम है। अन्न, वस्त्र, फल, जल, मट्ठा, शाक, घृत, मधु, पत्र, पुष्प, जूता, गुदड़ी, छड़ी, कमण्डलु, छाता, पात्र, विद्या, पुस्तक, देवपूजा, कन्या, कुश, यज्ञोपवीत, बीज, ओषधि, गृह, रत्न, क्षेत्र, यज्ञपात्र, योगपट्ट, पादुका, काला मृगचर्म, बुद्धिदान, धर्मोपदेश तथा धर्मकथा—इन सबके द्वारा सदैव दान करते रहना चाहिये। उससे महान् कल्याण होता है और दाता सब पापोंका नाश करके शिवलोकमें जाता है। श्राद्धमें

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