भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1356

* प्रभासखण्ड * । १३२७

तीर्थमें पूजन, श्राद्ध और दानकी महिमा; गृहस्थके लिये आचरणीय शिष्टाचार, दान एवं श्राद्धका उपदेश

सारस्वत मुनि कहते हैं—जो गंगाजल, मधु, घृत, कुंकुम, अगर, चन्दन, गुग्गल, बिल्वपत्र, गूमका फूल आदि आवश्यक वस्तुओंका भार कंधेपर रखकर पैदल तीर्थयात्रा करता है और तीर्थमें स्नान करके शिव, विष्णु तथा ब्रह्माजीका दर्शन करता एवं उन्हें पूजा चढ़ाता है, वह सब बन्धनोंसे मुक्त हो प्रलयकालपर्यन्त भगवान् शिवका पार्षद बना रहता है। जो स्त्री, पुत्र, मित्र, भाई तथा सज्जन पुरुषोंके साथ तीर्थयात्रा करता है तथा तीर्थमें वहाँके प्रधान देवताका चिन्तन करता है, वह उत्तम गतिको पाता है। सुन्दर देवमूर्तिका निर्माण करके उसे रथपर स्थापित करे। फिर चन्दन, अगर, कपूर, कुंकुम, भाँति-भाँतिके पुष्प, धूप, दीप, गीत, नृत्य और वाद्य आदिके द्वारा उसकी पूजा करे। जो यों करता है, वह जन्मभरके पापोंको भस्म करके तेजोमय, सर्वव्यापी तथा विश्वकी उत्पत्ति करनेवाले भगवान् पुराणपुरुषका दर्शन करता और मुक्त हो जाता है। तीर्थमें स्नान करके सन्ध्यावन्दन, श्राद्ध-तर्पण आदि करनेके विषयमें ब्राह्मणकी आज्ञा लेनी चाहिये और उसकी बात माननी चाहिये। तदनन्तर दर्भ, तिल और हविष्यान्नका श्रद्धापूर्वक प्रयोग करना चाहिये। तीर्थमें अगस्त्य, भृंगराज एवं कमलके पुष्प, कपूर, अगर, चन्दन, कुंकुम और तुलसीदल आदिको संकल्पपूर्वक चढ़ानेपर अनन्त पुण्यकी प्राप्ति होती है। तीर्थभूमिमें ताम्बूल, फल, नैवेद्य, तिल, कुशा और जलके साथ बिल्वके बराबर पिण्ड देना चाहिये। अमावास्या, पूर्णिमा, माता-पिताकी निधन-तिथि, गजच्छाया और त्रयोदशी तिथिको एवं श्राद्धयोग्य द्रव्य और श्रेष्ठ ब्राह्मण प्राप्त होनेपर पितरोंके ऋणसे मुक्त होनेके लिये घरपर श्राद्ध करना चाहिये। सागरगामिनी नदीके तटपर श्राद्ध किया जाय तो घरसे सौगुना अधिक फल होता है। मनुष्य यदि प्रभास, पुष्कर, गया, पिण्डतारक प्रयाग, गोमती, भव तथा दामोदरके सम्मुख एवं नर्मदा आदि तीर्थोंमें श्राद्ध करे तो उसके पितर सब पापोंसे मुक्त हो उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं और श्राद्धकर्ता भी उत्तम सन्तान पाकर तथा उत्तम भोग भोगकर अन्तमें दिव्य विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकको जाता है।

काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद आदि, माया, मात्सर्य, चुगली, अविवेक, अविचार, अहंकार, स्वच्छन्दता, चपलता, लोलुपता, अन्यायसाधन, आयास, प्रमाद, द्रोह, दुस्साहस, आलस्य, दीर्घसूत्रता, परस्त्रीगमन, अत्यधिक आहार, सर्वथा आहारका त्याग, शोक तथा चोरी इत्यादि दोषोंको त्यागकर जो घरमें सदाचारपूर्वक रहता है, वह मनुष्य इस भूमिका, देशका तथा नगरका भूषण है। वह श्रीमान्, विद्वान् तथा कुलीन है और वही सब पुरुषोंसे श्रेष्ठ है। काम आदिके कारण कोई भी घरमें दोषोंका त्याग नहीं कर पाता। जिसने दोषोंका परित्याग कर दिया है, उसीके द्वारा स्नान, सन्ध्या, जप, होम, श्राद्ध-तर्पण तथा देवपूजा आदि सत्कर्म सम्पन्न होते हैं। प्रयाग, कुरुक्षेत्र, सरस्वती नदी, समुद्र, गया, रुद्रपद, नर-नारायणका आश्रम, प्रभास, पुष्कर, कृष्ण-गोमती, पिण्डतारक, वस्त्रापथ, पुण्यगिरि, दामोदर, भीमेश्वरी, नर्मदा, स्कन्दतीर्थ, रामेश्वर आदि, उज्जयिनी, महाकाल, काशी, कलिंग और मथुरा—इन तीर्थोंकी मनुष्य यदि एक बार भी यात्रा कर लेता है तो वह ब्रह्महत्या आदि समस्त दोषोंसे मुक्त हो जाता है। गंगा आदि नदियाँ जो समुद्रमें मिली हैं, उनमें पग-पगपर पुण्यकी निधिरूप अनेक तीर्थ हैं, जिनके स्मरणमात्रसे ही सब पापोंका नाश हो जाता है। कामभोगमें आसक्त चित्तवाले जो मूढ़ मानव स्त्रियोंमें रमते रहते हैं,