संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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भगवान् विष्णुके धामको जाते हैं। उपर्युक्त नदी धरती फोड़कर पातालसे आयी है। इन्द्रने भी स्वर्गसे यहाँ आकर उत्तम यज्ञ किया और अतिशय उत्तम पद पाकर व्याधिहीन स्वर्गलोककी उपलब्धि की। कार्तिकमें राजा बलिने भी वहाँ आकर बहुत-से दान दिये हैं। हरिश्चन्द्र, शिबि, नल, नहुष, नाभाग तथा अम्बरीष आदिने भी वहाँ दुष्कर कर्म किये हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके वस्त्र, छत्र तथा रसमिश्रित अन्न दान करके वे विष्णुलोकमें गये, जहाँसे फिर इस मर्त्यलोकमें पुनरावृत्ति नहीं होती। जो उस तीर्थमें ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक पत्र, पुष्प, फल और जल दान करता है, वह जलशायी भगवान् श्रीहरिको प्राप्त होता है। जो भूखसे पीड़ित मनुष्यके लिये वहाँ एक पसर या मुट्ठीभर भी अन्न देता है, वह श्रेष्ठ विमानपर चढ़कर चन्द्रलोकसे भी ऊपर जाता है। दामोदरके आगे एक मासतक उपवास करनेपर मनुष्य दामोदरनगर (वैकुण्ठधाम)-को जाता है, जहाँसे फिर नहीं लौटता। जो दामोदरके आगे पाँच पत्थरका मन्दिर बनवाता है, वह भगवान् श्रीहरिके धाममें जाता है। जो स्त्री भगवान्का सुन्दर मन्दिर बनवाती है, वह विष्णुधामको जाती है। जो एक हजार पत्थरोंका बहुत सुन्दर मन्दिर बनवाता है, वह परब्रह्मको प्राप्त होता है। जो दामोदर-मन्दिरपर पचरंगी ध्वजा फहराता है, वह उसके तन्तुओंके बराबर दिव्य वर्षोंतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। वहाँसे दो कोसपर वस्त्रपथ नामक उत्तम क्षेत्र है, जिसका दर्शन करनेसे सब पाप नष्ट हो जाते हैं और पुनरावृत्तिरहित परम धामकी प्राप्ति होती है। स्त्री या पुरुष, जो भी संसारबन्धनका नाश करनेवाले शिवका पूजन करते हैं, वे शिवलोकमें पूजित होते हैं।
भद्रकी यह बात सुनकर राजा गज कार्तिककी पूर्णिमाका तीर्थकृत्य करनेके लिये ऋग्, यजु और सामवेदके ज्ञाता ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणों, क्षात्रधर्मपरायण क्षत्रियों, दानपरायण वैश्यों तथा सेवाकुशल शूद्रोंको साथ लेकर उस तीर्थमें आये और अनेक प्रकारके दान दे अग्निमें होम करके अग्निष्टोम तथा अश्वमेध आदि यज्ञोंका अनुष्ठान किया। उस तीर्थमें कितने ही पुरुष गायत्री-मन्त्रका जप करते और कुछ लोग मन-ही-मन सावित्री एवं सरस्वतीका ध्यान करते थे। कितने ही ब्राह्मण ब्रह्माजीके द्वारा संकलित पवित्र वैदिक सूक्तोंका पाठ करते और दूसरे लोग द्वादशाक्षर (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्रका जप करते थे। सब शास्त्रोंको देखकर और बार-बार उनपर विचार करके एकमात्र यही सिद्धान्त स्थिर किया गया है कि सदा भगवान् नारायणका ध्यान करना चाहिये।^१ महादेवजीके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो गिरते हुएकी रक्षा करे। चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रह बार-बार जाकर लौट आते हैं, परंतु द्वादशाक्षर मन्त्रका चिन्तन करनेवाले भक्तजन आज भी नहीं लौटते।^२ जिसने 'हरि' इन दो अक्षरोंका एक बार भी उच्चारण कर लिया, उसने मोक्षधामतक पहुँचनेके लिये मानो कमर कस ली है।^३ एकभक्त व्रत, नक्तव्रत, अयाचितव्रत और उपवासव्रत—ये तथा और भी जो व्रत हैं, उनका भगवान् दामोदरके आगे अनुष्ठान करके मनुष्य कृतकृत्य हो जाते हैं। राजा गज ऋषियोंके साथ वहाँ बैठे हुए वार्तालाप कर ही रहे थे कि इतनेमें वहाँ सहस्रों विमान आ गये। वे पत्नी तथा देशवासियोंसहित विमानपर आरूढ़ हो अनामय पदको प्राप्त हुए। जो मानव सदा इस प्रसंगको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर विष्णुधामको जाता है।
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१- आलोक्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः। इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा॥ (स्क० पु०, प्र० ख० ३१७। १४)
२- गत्वा गत्वा निवर्तन्ते चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः। अद्यापि न निवर्तन्ते द्वादशाक्षरचिन्तकाः॥ (स्क० पु०, प्र० ख० ३१७। १६)
३- सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम्। बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति॥ (स्क० पु०, प्र० ख० ३१७। १८)