भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1354
  • प्रभासखण्ड * १३२५

है। यहीं बार-बार पुरुष गिरते हैं। अतः जिस दान और तपस्याके अनुष्ठानसे मनुष्य निर्मल स्वर्गलोकको पाता है, उसका उपदेश कीजिये।'

भद्र बोले-राजेन्द्र ! जो अपने भीतर विराजमान सच्चिदानन्दघन परमात्माको नहीं देखते, उनके लिये बाह्य तीर्थ जलसे भरे हुए जलाशयमात्र हैं और देवता पत्थर एवं मिट्टीकी मूर्तिमात्र हैं। यदि परमात्मतत्त्वका ज्ञान है, तभी तीर्थों और देवताओंके चिन्मय स्वरूपका दर्शन होता है। इस भूतलपर अनेक तीर्थ हैं, बहुत-से पुण्यमय देवमन्दिर हैं, बहुतेरी पुण्यसलिला पवित्र नदियाँ तथा पावन जलवाले समुद्र हैं। यह पृथ्वी स्थान-स्थानमें पग-पगपर बहुत पुण्य देनेवाली है। कृष्ण, विष्णु, हृषीकेश, शंखी, गदी, चतुर्भुज, महाबाहु, प्रभासवासी, दैत्यसूदन, वाराह, वामन, नरसिंह, बल, अर्जुन, श्रीराम, परशुराम, बलराम, पुरुषोत्तम, पुण्डरीकाक्ष, गदापाणि, राघव, शत्रुदमन, गोविन्द, जय, भूधर, जनार्दन, सुरेश, श्रीधर, हरि, योगीश्वर, कपिलेश्वरनाथ, श्वेतद्वीपपति, बदरिकाश्रमवासी नर-नारायण, पद्मनाभ, सुनाभ, हयग्रीव, द्विजनाथ, धरानाथ, शार्ङ्गपाणि, दामोदर, जगन्नाथ तथा सर्वपापहारी हरि—ये ही देवाधिदेव श्रीविष्णुके स्थान हैं। इनमेंसे जहाँ भी मनुष्य जाते हैं, वहीं सब पातकोंसे मुक्त हो जाते हैं। गंगा, यमुना, गोदावरी, शतद्रु, विन्ध्या, पयोधा, वरदा, चर्मण्वती, सरयू, गण्डकी, चन्द्रभागा, विपाशा, तथा शोणा—ये और दूसरी भी बहुत-सी सरिताएँ पुण्यमयी हैं। हिमवान् पर्वत भी पुण्य तीर्थ है। इन सबके नामोंका उच्चारण करनेमात्रसे समस्त पाप रसातलको चले जाते हैं। अगहनमें कान्यकुब्ज तीर्थमें निवास करके स्त्री और पुरुष शोकमुक्त होते हैं तथा स्वर्गलोकमें जाते हैं। यदि पौषमासकी पूर्णमासीको अर्बुदाचल (आबू)-में निवास करे तो मनुष्य पितरोंके साथ अरबों वर्षोंतक स्वर्गलोकमें आनन्द भोगता है। यदि गयामें माघमासकी पूर्णिमाको मनुष्य पितरोंका श्राद्ध करे तो वह भगवान् विष्णुके परमधाममें जाता है। जो फाल्गुनकी पूर्णिमाको एक रात हिमालयपर निवास करता है, वह श्रीहरिके उत्तम लोकमें जाता है। जो मनीषी पुरुष चैत्रकी पूर्णिमाको प्रभासक्षेत्रमें श्राद्ध करते हैं, वे अपने कुलमें उत्पन्न हुए पुरुषोंके साथ इस मर्त्यलोकमें जन्म नहीं लेते—मुक्त हो जाते हैं। जो वैशाखकी पूर्णिमाको अवन्तीपुरीके जलप्रिय तीर्थमें जल पीते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो ज्येष्ठकी पूर्णिमाको त्रिकूपमें श्राद्ध करते हैं, वे वैकुण्ठमें जाते हैं। श्रावणकी अमावास्या तथा पूर्णिमाको पूर्वसागरमें स्नान, दान, तप और श्राद्ध करनेवाला पुरुष शोकमुक्त हो जाता है। जो भाद्रपदमासमें प्रभासमें शशिभूषणका पूजन करता है, वह देवस्वरूप हो जाता है। जो आश्विनमासमें चन्द्रभागाके तटपर श्राद्ध और स्नान करता है, वह स्वर्गलोकमें निवास पाता है। जो अष्टाक्षर मन्त्र (ॐ नमो नारायणाय)-का जप करते हुए चार भुजाधारी नारायणका ध्यान करता है, वह वैकुण्ठधाममें जाता है। सब महीनोंमें कार्तिक श्रेष्ठ है, कार्तिकमें भी भीष्मपंचक श्रेष्ठ है, उसमें भी दामोदर-तीर्थके जलमें द्वादशी तिथिका स्नान और भी श्रेष्ठ है। दामोदरमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। दामोदर-तीर्थमें जिनकी जहाँ कहीं भी मृत्यु हो गयी है, वे श्रीहरिके श्रीविग्रहमें निवास करते हैं, संसारमें कभी जन्म नहीं लेते। सोमनाथके समीप उदयान्त नामक महान् पर्वत है; उसके पश्चिम भागमें रैवत पर्वत है, जहाँ कांचनशेखरा नदी बहती है। उस पर्वतमें लाल, सफेद, नील और कृष्ण धातुएँ हैं। उसमें कुछ पत्थर हाथीके समान आकारवाले हैं और दूसरे सुवर्णके सदृश हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा शूद्रोंके सेवक उस पर्वतका सदा सेवन करते हैं। बहुत-से पक्षी वहाँ चहकते रहते हैं। पशु-पक्षी, सर्प तथा कीट, पतंग आदि जो भी जीव वहाँ कालवश मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे उत्तम विमानपर आरूढ़ हो