भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1353, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1353

१३२४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

गया है। भादोंमासके कृष्णपक्षमें षष्ठी तिथिको यदि मंगलवार, रोहिणी नक्षत्र तथा व्यतीपात योग हो तो वह कपिला-षष्ठी कही जाती है। उस दिन कपिलक्षेत्रमें, अर्कस्थलमें तथा शुभ कपिलासंगममें मिट्टी और तिलोंके द्वारा स्नान करके सन्ध्या-वन्दन एवं जपके पश्चात् मनुष्य रक्तचन्दनमिश्रित जल एवं कनेरके फूलसे भगवान् सूर्यको अर्घ्य दे। अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है—

नमस्त्रैलोक्यनाथाय उद्भासितजगत्त्रय।
तेजोरश्मे नमस्तुभ्यं गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥

‘त्रिलोकीनाथ भगवान् सूर्यको नमस्कार है। तीनों लोकोंको प्रकाशित करनेवाले तेजोरश्मे! आपको नमस्कार है। बार-बार नमस्कार है। यह अर्घ्य ग्रहण कीजिये।’

तत्पश्चात् सूर्यदेवकी परिक्रमा करके कपिलेश्वरजीकी पूजा करे।

कपिलेश्वरसे ईशान तथा उत्तर दिशामें जरद्गवके द्वारा स्थापित जरद्गवेश्वरलिंग है। वहीं देवनदी अंशुमती बहती है। उसमें विधिपूर्वक स्नान करके जो पिण्डदान देता है, वह सौ कोटिसे भी अधिक वर्षोंतक पितरोंको तृप्त रखता है। चन्दन, पुष्प, पंचामृत तथा गुग्गुलकी धूपसे जरद्गवेश्वरकी पूजा करनी चाहिये। उन्हें दण्डवत्-प्रणाम तथा उनकी स्तुति भी करनी चाहिये। उनके समीप नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंद्वारा ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। वहाँ एक ब्राह्मणको भोजन करानेसे कोटि ब्राह्मण-भोजन करानेका पुण्य होता है।

जरद्गवसे पूर्वदिशामें एक सौ अस्सी धनुषकी दूरीपर हाटकेश्वरलिंग है। वहीं दमयन्तीके पति राजा नलने नलेश्वर शिवकी स्थापना की है। उसका दर्शन और विधिपूर्वक पूजन करके मनुष्य कलिदोषसे छुटकारा पाता और युद्धमें विजयी होता है।


राजा गज और भद्रमुनिका संवाद, विभिन्न तीर्थोंकी महिमा और दामोदर-माहात्म्य

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! स्वर्गकी इच्छा रखनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जिनके देवदुर्लभ दिव्य जलका सेवन करते हैं, उन गंगाजीके मुनिजनसेवित परममनोहर पवित्र तटपर गज नामके एक बलवान् राजा राज-काज छोड़कर स्नानके लिये आये। उनकी सती-साध्वी पतिव्रता पत्नी भी उनके साथ वहाँ आयी। दोनों दम्पति गंगाजीके किनारे रहने लगे। इस प्रकार वहाँ रहते हुए उनके दस हजार वर्ष बीत गये। तदनन्तर महायशस्वी भद्रमुनि जप-होमपरायण अनेक ब्राह्मणोंके साथ वहाँ आये। उन्होंने गंगाजीमें स्नान करके अपने शरीरका मल नष्ट किया, फिर समस्त भूत-प्राणियोंकी तृप्तिके लिये जल देकर भगवान् जनार्दनकी पूजा की। फिर ज्यों ही वे नदीके तटपर डेरा डालने लगे, त्यों ही उनकी दृष्टि राजा गजपर पड़ी। राजाने भी उन सबको देखा और आगे जाकर कहा—‘पूजनीय महर्षियो! आपलोग मेरे घर पधारें। मेरी यशस्विनी पत्नी संगताके हाथसे पूजा ग्रहण करके जहाँ आपकी इच्छा हो, उस पुण्य पथपर जाइयेगा।’

राजाके इस प्रकार अनुरोध करनेपर वे महर्षि उनके भवनमें पधारे। उनको विचित्र आसन देकर राजाने उनके आगे हाथ जोड़े और भद्र मुनिसे कहा—‘मुने! यह पृथ्वी धन-धान्यसे परिपूर्ण है, नगरी, पुरी, पर्वत, समुद्र, सरिता, सरोवर, ग्राम, गोकुल, श्रेष्ठ मनुष्य, रत्न तथा आकर आदिसे सुशोभित है। भोगमें आसक्त होकर परम ज्ञानसे विमुख रहनेवाले पुरुषोंके लिये इसका त्याग कठिन है। भोग-सम्पन्न पृथ्वी ही महाभयानक संसारमें पुनरावृत्ति करानेवाली

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