संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1352, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड * । १३२३
तदनन्तर उन विशुद्ध चित्तवाले महर्षिके प्रसादसे वे निषाद उनकी बात पूरी होते ही मत्स्योंसहित स्वर्गलोकमें चले गये। मछलियों और मछलीमारोंको इस प्रकार स्वर्गलोकमें जाते देख मन्त्रियों और सेवकोंसहित राजा नाभाग विस्मित होकर बोले—'कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको सदैव संतोकी सेवा करनी चाहिये। साधु पुरुष पुण्यतीर्थोंके जलके समान होते हैं। इस लोकमें यदि क्षणभर भी उनकी उपासना की जाय तो वह निष्फल नहीं होती। संतोंके साथ बैठना चाहिये। संतोंके साथ उत्तम कथा-वार्ता करनी चाहिये। जिस सभामें संत बैठे हों, वहाँ बैठना चाहिये। दुष्ट पुरुषोंके साथ कुछ भी नहीं करना चाहिये। संत समागमसे ही ये मत्स्य और मल्लाह पुण्यात्मा मनुष्योंकी भाँति स्वर्गलोकमें चले गये।'
तदनन्तर मुनिवर आपस्तम्ब और महामुनि लोमश राजा नाभागको नाना प्रकारके अभीष्ट वर माँगनेके लिये प्रेरित करने लगे। तब राजाने अत्यन्त दुर्लभ धर्मबुद्धिको वरण किया, अर्थात् यह वर माँगा कि मेरी बुद्धि सदा धर्ममें ही लगी रहे। वे दोनों मुनि 'तथास्तु' कहकर प्रसन्नतापूर्वक राजाकी प्रशंसा करते हुए बोले—'राजेन्द्र ! तुम धन्य हो, जो तुम्हारी बुद्धि धर्ममें लगी है। मनुष्यमात्रके लिये धर्म अत्यन्त दुर्लभ है। विशेषतः राजाओंके लिये तो वह परम दुर्लभ है। यदि राजा मदोन्मत्त होकर स्वधर्मका परित्याग न करे तो संसारमें उससे श्रेष्ठ कौन पुरुष होगा। राजाओंको सदा जन्म लेना पड़ता है—यह ध्रुव है। उन्हें सदा मोह होता—यह भी ध्रुव है और मोहसे नरककी प्राप्ति भी ध्रुव है। अतएव बुद्धिमान् पुरुष राज्यकी निन्दा करते हैं। विषय-लोलुप मनुष्य राज्यको अधिक महत्त्व देते हैं; किंतु मनीषी मानव उसीको नरकके समान देखते हैं, अतः महाराज ! यदि तुम अपने लिये सनातन गति चाहते हो तो कभी मद न करना; क्योंकि वह लोक-परलोक दोनोंका नाश करनेवाला है।'
यों कहकर वें दोनों महात्मा अपने-अपने आश्रमको चले गये। नाभागने भी वर पाकर प्रसन्नतापूर्वक नगरमें प्रवेश किया। पार्वती ! इस प्रकार देविका नदीका प्रभाव बताया गया। मुनीश्वर आपस्तम्बने वहाँ शिवलिंगकी स्थापना की। वे निषादोंके जालमें पड़े थे, इसलिये उनके द्वारा स्थापित शिवलिंगका नाम जालेश्वर हुआ। चैत्र शुक्ला त्रयोदशीको जो वहाँ पितरोंके लिये पिण्डदान करता है, उसके उस श्राद्धका कभी अन्त नहीं होता।
चन्द्रेश्वर, कपिलेश्वर तथा नलेश्वरकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—पार्वती ! आशापुर विघ्नराजके स्थानसे दक्षिण एवं नैर्ऋत्यकोणमें थोड़ी ही दूरपर एक पापहारक चन्द्रेशलिंग है। वहीं अमृतकुण्ड और कुलकुण्ड भी हैं। जो उन कुण्डोंमें स्नान करके चन्द्रेश्वरकी पूजा करेगा, वह सहस्र वर्षोंतक तपस्या करनेका फल पायेगा। वहीं चन्द्रतड़ाग है, जिसका विस्तार सोलह धनुषका है।
वहाँसे परम उत्तम कपिलेश्वरलिंगका दर्शन करनेके लिये जाय। वह स्थान शशिभूषणसे पूर्व, कोटितीर्थसे पश्चिम, जरद्गवसे दक्षिण तथा समुद्रसे उत्तर है। यह कपिलक्षेत्र पुण्यहीन पुरुषोंके लिये दुर्लभ है। पूर्वकालमें महर्षि कपिलने वहाँ महेश्वरकी स्थापना करके दस हजार वर्षोंसे अधिक कालतक बड़ी भारी तपस्या की थी। उनके द्वारा वहाँ कपिलधारा नामकी दिव्य महानदी लायी गयी है। समुद्रमें आज भी उसका दर्शन होता है। जो कपिला नदीमें नहाकर कपिला गायका दान करता है, वह कोटि गोदानके फलका भागी होता है। यह सभी पापोंका एकमात्र प्रायश्चित्त बताया