संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * प्रभासखण्ड * | १२९३ |
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| शूद्रजातिके हैं। जो क्षयाहके दिन श्रद्धापूर्वक पिताका श्राद्ध नहीं करता, वह मनुष्य द्विज होनेपर भी शूद्रके ही समान है। जो ब्राह्मण मृतक-श्राद्ध, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, गजच्छाया* और सूतकमें भोजन करता है, उसके साथ शूद्रोचित बर्ताव करे। ब्रह्मचारी, संन्यासी, शिल्पी तथा यज्ञदीक्षित पुरुषको एवं यज्ञ, विवाह तथा सत्रमें कभी सूतक नहीं लगता। शिल्पी, नट, दूत और सूदखोर ब्राह्मणोंके साथ शूद्रोचित बर्ताव करना चाहिये। जो निषिद्ध कर्मोंमें संलग्न, पाखण्डी, दुष्कर्मी और पापाचारी हो, वह ब्राह्मण शूद्रके समान माना गया है। बिना स्नान किये भोजन करनेवाला विष्ठा भोजन करता है। बिना जप किये खानेवाला पीब और रक्त खाता है। बिना हवन किये आहार करनेवाला कीड़े खाता है और देवता, अतिथि आदिको दिये बिना भोजन करनेवाला पुरुष मानो मदिरा पीता है। राजाका अन्न तेज हर लेता है। शूद्रका अन्न ब्रह्मतेजको नष्ट कर देता है। सुनारका अन्न आयु और चमारका अन्न यश ले लेता है। कारीगरका अन्न सन्तानका नाश करता है। धोबीका अन्न बलको क्षीण करता है। किसी समूह या संस्थाका अन्न तथा वेश्याका अन्न स्वर्ग आदि पुण्यलोकोंसे भ्रष्ट कर देता है। वैद्यका अन्न पीब, व्यभिचारिणी स्त्रीका अन्न वीर्य, अधिक व्याज लेनेवालेका विष्ठा और हथियार बेचनेवालेका अन्न मलके समान त्याज्य है। ब्राह्मण मांस, लाख और नमक बेचनेसे तत्काल पतित हो जाता है और दूध बेचनेसे तीन दिनमें शूद्रके समान हो जाता है। रसको रससे बदलना चाहिये, | किंतु रस देकर नमक नहीं लेना चाहिये। पके अन्नको कच्चे अन्नसे बदला जा सकता है। तिलको उसीके बराबर धान्यसे बदलना चाहिये। जो ब्राह्मण तिलोंसे भोजन, उबटन और दानसे भिन्न कोई दूसरा व्यापार आदि कर्म करता है, वह कीड़ा होकर अपने पितरोंके साथ कुत्तेकी विष्ठामें डूबता है। पूआ, सुवर्ण, गौ, घोड़ा, पृथ्वी और तिलका दान लेनेवाला ब्राह्मण यदि विद्वान् न हो तो वह उसे ग्रहण करके काष्ठकी भाँति जल जाता है। दानमें लिया हुआ सुवर्ण आयुका तथा रत्न अपने शरीर, पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, दौहित्र तथा कुलमें होनेवाले अन्य पुरुषोंका नाश कर देता है। पाँच योजनके भीतर भी यदि अपने गुरुका आगमन सुनायी पड़े तो उनकी उपेक्षा न करे। मनुष्य सदा सत्पात्रको ही दान दे। जो कहीं दान दिया जाता हुआ देखकर लोभवश उसे माँगने लगे तो विद्वान् पुरुष उसे दान न दे; क्योंकि लोलुपता या चपलता अच्छी नहीं होती। यदि ब्राह्मण रसका विक्रय त्याग दे तो उसे सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। मांसका त्याग करनेसे सन्तानकी आयु बढ़ती है। चीर और वल्कल धारण करनेसे वस्त्र और आभूषण प्राप्त होते हैं, सच बोलनेसे मनुष्य स्वर्गमें क्रीड़ा करता है। अहिंसाधर्मके पालनसे आरोग्य और दान देनेसे यशकी प्राप्ति होती है। ब्राह्मणकी सेवा करनेसे राज्य तथा द्विजत्व प्राप्त होते हैं। देवताओंकी सेवासे मनुष्य दिव्य रूप पाता है। अन्नदानसे सम्पूर्ण अभीष्ट भोगोंकी प्राप्ति होती है। |
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* ज्योतिषका एक योग जो उस समय होता है, जब कृष्ण त्रयोदशीके दिन चन्द्रमा मघा नक्षत्रमें और सूर्य हस्त नक्षत्रमें हो—यह योग श्राद्धके लिये अच्छा माना जाता है।