संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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उत्तम-अधम जन्म, व्यर्थ और सफल दान, सुपात्रके लक्षण, विद्धा एकादशीके दोष तथा द्रव्याभावमें श्राद्धकी विधि
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! चार प्रकारके जन्म और सोलह प्रकारके दान व्यर्थ हैं तथा चार प्रकारके जन्म उत्तम और सोलह प्रकारके दान महादान हैं। अब इनका विवरण सुनो। (१) कुपुत्रोंका जन्म व्यर्थ है। (२) जो धर्मसे बहिष्कृत हैं, (३) जो परदेशमें जाते हैं तथा (४) जो सदा परस्त्रियोंमें आसक्त रहते हैं, उनका जन्म भी व्यर्थ है। १. जो दूसरेके यहाँ भोजन करते हैं और (२) परस्त्री-लम्पट हैं, उनको दिया हुआ दान व्यर्थ है। (३) एक बार देनेसे इन्कार करके फिर जो दान दिया जाता है, वह भी व्यर्थ है। (४) आरूढ़-पतित (संन्यासी होकर फिर गृहस्थ होनेवाले)-को दिया हुआ दान तथा (५) अन्यायोपार्जित धनका दान भी व्यर्थ है। (६) ब्रह्महत्यारे, (७) पतित, (८) चोर, (९) गुरुको प्रसन्न न रखनेवाले (१०) कृतघ्न, (११) ग्राम-पुरोहित, (१२) अधम ब्राह्मण, (१३) शूद्रा स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मण, (१४) वेदविक्रेता, (१५) जिसकी स्त्रीका किसी जार पुरुषसे सम्बन्ध हो तथा (१६) जो स्त्रीके अधीन रहता हो, ऐसे ब्राह्मणोंको दिये हुए दान असफल होते हैं। इस तरह ये सोलह प्रकारके दान व्यर्थ हैं।
अब जिनका जन्म उत्तम है, उनका परिचय सुनो। (१) जो अपने माता-पिताके उत्तम पुत्र हैं, (२) सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं, (३) परदेशमें नहीं जाते और (४) परायी स्त्रियोंसे विमुख हैं—इन चार प्रकारके मानवोंका जन्म श्रेष्ठ है। (१) गौ, (२) सुवर्ण, (३) चाँदी, (४) रत्न, (५) विद्या, (६) तिल, (७) कन्या, (८) हाथी, (९) घोड़ा, (१०) शय्या, (११) वस्त्र, (१२) भूमि, (१३) अन्न, (१४) दूध, (१५) छत्र तथा (१६) आवश्यक सामग्रियों-सहित गृह—इन सोलह प्रकारकी वस्तुओंके दानको महादान कहते हैं।
इसलिये शठता छोड़कर श्रद्धा और विधिके साथ उत्तम देशमें, उत्तम कालमें और उत्तम पात्रको न्यायोपार्जित धनका दान देना चाहिये। जो वेदाध्ययनसे सम्पन्न, योगनिष्ठ, शान्त, पुराणका ज्ञाता, पापसे डरनेवाला, स्त्रियोंके प्रति क्षमाभाव रखनेवाला, धर्मात्मा, गौओंको आश्रय देनेवाला तथा सदाचारसे युक्त हो, उसीको दानका उत्तम पात्र कहते हैं। सत्य, इन्द्रियसंयम, तप, शौच, सन्तोष, ईर्ष्याका न होना, सरलता, ज्ञान, मनःसंयम, दया और दान—ये सद्गुण ही सुपात्रके लक्षण हैं।* जो ऐसे श्रेष्ठ पात्रको समान बछड़ेवाली, चाँदीके खुर और सोनेके सींगवाली, सर्वगुणसम्पन्न एक गाय भी दान करता है, वह मेरे लोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो मानव ऐसी गायको दानमें देता है, वह उत्तम गतिको प्राप्त होता है। उसके ऊपर मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ। जो गाय क्रोध करनेवाली, दुष्ट, दुर्बल, रोगिणी तथा मूल्य न देकर लायी गयी हो, उसका दान नहीं करना चाहिये। जो अतिथियोंका प्रेमी, मनको वशमें रखनेवाला, अग्निहोत्री तथा धनके अभावसे कष्ट पानेवाला श्रोत्रिय ब्राह्मण हो, उसे दी हुई एक गाय भी अधिक गुणवाली होती है। जो ज्ञान-दुर्बल ब्राह्मण गायको बेचता है, वह गोदान लेनेका अधिकारी नहीं है, उसे ब्राह्मण नहीं मानना चाहिये। गाय, घर, शरण तथा कन्या—ये वस्तुएँ अनेक पुरुषोंको नहीं देनी चाहिये—इनमेंसे एक वस्तु एक ही व्यक्तिको देनी चाहिये।
* सत्यं दमस्तपः शौचं सन्तोषोऽनैर्ष्यमार्जवम्। ज्ञानं शमो दया दानमेतत्पात्रस्य लक्षणम्॥
(स्क० पु०, प्र० ख० २०२। १८। १९)