संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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तभीतक दुःख, शोक और भयके समुद्रमें डूबे रहते हैं, जबतक कि ब्रह्माजीके प्रति उनकी भक्ति नहीं होती। जीवका चित्त जैसे विषयोंमें लगा है, यदि उसी प्रकार ब्रह्माजीमें भी लग जाय, तो कौन बन्धनसे मुक्त न होगा। सोमनाथसे ईशानकोणमें और साम्बादित्यसे अग्निकोणमें ब्रह्माजीका उत्तम स्थान है। वहाँ बालरूपधारी ब्रह्माजी विराजमान हैं। जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, सब लोकोंके स्रष्टा और महान् तेजस्वी हैं, वे ही इस प्रभासक्षेत्रमें आठ वर्षकी आयुमें आये हैं। उन्होंने ही सोमनाथ-लिंगकी स्थापना करके ब्राह्मणोंको बहुत-सी दक्षिणा दी। प्रभासक्षेत्रमें रहते हुए बालरूपधारी ब्रह्माजीके बयालीस वर्ष बीत गये हैं। इस प्रकार उनकी आयुका एक परार्ध व्यतीत हो गया।
पार्वतीजीने कहा— प्रभो! ब्रह्माजीके दिन, मास और वर्षका परिमाण बताइये।
महादेवजीने कहा— देवि! ब्रह्माजीकी जो परम आयु है, उसका एक परार्ध बीत गया है। अब दूसरा परार्ध चल रहा है। आठ वर्षकी आयुमें यहाँ आये थे, इसीलिये उन्हें बालरूपी कहते हैं। प्रभासक्षेत्रको छोड़कर अन्य सब तीर्थोंमें वे वृद्धरूपी ही हैं। प्रथम कल्पमें इनका नाम स्वयम्भू था। दूसरेमें पद्मभू, तीसरेमें विश्वकर्ता और चौथेमें बालरूपी कहे गये हैं। जो मनुष्य प्रतिदिन इन नामोंको स्मरण करता है, वह दीर्घायु होता है। चन्द्र, सूर्य आदि सभी ग्रह, देवता, असुर, दानव तथा समस्त त्रिलोकी—ये सब ब्रह्माजीकी रात आनेपर नष्ट हो जाते हैं। फिर दिन आनेपर जब ब्रह्माजी जगते हैं, तब पूर्ववत् सृष्टि करने लगते हैं।
पलक गिरनेमें जितना समय लगता है, उसके एक चौथाई भागको त्रुटि कहते हैं। दो त्रुटिका एक निमेष होता है। पंद्रह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है। तीस काष्ठाओंकी एक कला, तीस कलाओंका मुहूर्त और पंद्रह मुहूर्तोंका एक दिन होता है। दिनके बराबर ही रातका भी मान है। दिन तथा रात दोनोंको एक 'अहोरात्र' कहते हैं। पंद्रह दिन-रातोंका पक्ष और दो पक्षोंका मास होता है। छः मासोंका एक अयन और दो अयनोंका एक वर्ष होता है। तैंतालीस लाख बीस हजार सौर वर्षोंका एक चतुर्युग होता है। इकहत्तर चतुर्युगोंका मन्वन्तर कहा गया है। यही संक्षेपसे इन्द्र देवताकी आयु बतायी गयी है। ब्रह्माजीके एक दिनमें चौदह मनु और चौदह इन्द्र नष्ट होते हैं। विश्ववक्ता, विपश्चित्, स्वचिति, शिवि, विभु, मनोभुव, ओजस्वी, बलि, अद्भुत, शान्ति, वृषा, शतधामा, दिवस्पति, शुचि—ये चौदह इन्द्र हैं। ब्रह्माजीका दिन जितना बड़ा होता है, उनकी रात भी उतनी ही होती है। यह कल्पका मान बताया गया। पहला श्वेत कल्प है। दूसरे कल्पका नाम नीललोहित, तीसरेका वामदेव, चौथेका रथन्तर, पाँचवेंका रौरव, छठेका प्राण, सातवेंका बृहत्कल्प, आठवेंका कन्दर्प, नवेंका सद्यःकल्प, दसवेंका ईशान, ग्यारहवेंका ध्यान, बारहवेंका शाश्वत, तेरहवेंका उदान, चौदहवेंका गरुड, पंद्रहवेंका कूर्म, सोलहवेंका नारसिंह, सत्रहवेंका समाधि, अठारहवेंका आत्रेय, उन्नीसवेंका सोम, बीसवेंका भावन, इक्कीसवेंका तत्पुरुष, बाइसवेंका वैकुण्ठ, तेइसवेंका अर्चित, चौबीसवेंका रुद्र, पचीसवेंका लक्ष्मी, छब्बीसवेंका सारस्वत, सत्ताईसवेंका वैराज, अट्ठाइसवेंका गौरी-कल्प, उन्तीसवेंका माहेश्वरकल्प और तीसवेंका नाम पितृकल्प है। यही ब्रह्माजीकी अमावास्या है। ब्रह्माजीके महीनेके ये तीस कल्प बताये गये। व्यतीत हुए सभी कल्पोंके नाम बताये जा चुके हैं। इस समय वाराहकल्प चल रहा है। यही ब्रह्माजीकी प्रतिपदा है, जिसमें भगवान् वाराहने रसातलसे पृथ्वीका उद्धार किया। तीस कल्पोंका ब्रह्माजीका एक मास माना गया है। ऐसे बारह मासोंका एक वर्ष होता है। ऐसे वर्षमानसे जब ब्रह्माजी आठ वर्षके थे, तब सोमदेव उन्हें प्रभासक्षेत्रमें ले आये और उन्हींके द्वारा सोमनाथकी प्रतिष्ठाका कार्य सम्पन्न हुआ। इस प्रकार प्रभासक्षेत्रमें