संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड * | १२६३ ---|---
जानकर इसीकी आराधनामें तत्पर हो गये। इसके माहात्म्यसे चन्द्रमाका पापजनित रोग दूर हुआ। तबसे इसका नाम 'चन्द्रेश्वर' हो गया।
तदनन्तर जहाँ चक्रधर विष्णु तथा दण्डपाणि गणेश दोनों एक स्थानपर स्थित हैं, वहाँकी यात्रा करे। जो मानव भक्तिभावसे क्रमशः उन दोनोंका पूजन करता है, वह पापसे मुक्त हो मेरे लोकमें जाता है। जो माघमासकी चतुर्दशी और कृष्णपक्षकी अष्टमीको गन्ध, पुष्प, धूप आदि उपचारोंसे दण्डनायककी पूजा करता है, उसे कभी विघ्न नहीं प्राप्त होता। जो एकादशी तिथिको निराहार रहकर चक्रपाणिका पूजन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है।
इस प्रकार यहाँ संक्षेपसे चक्रपाणि और दण्डपाणिका माहात्म्य बताया गया।
इन दोनोंके उत्तर और बालरूपधारी ब्रह्मासे वायव्यकोणमें साम्बके द्वारा स्थापित देवश्रेष्ठ साम्बादित्यका स्थान है। प्रभासक्षेत्रमें जो साम्बनामक पुर है, वही सूर्यनारायणका द्वितीय स्थान है। वहाँ भगवान् सूर्य बारह स्वरूपोंमें विभक्त हो सदा सबके कल्याणके लिये निवास करते हैं और भक्तोंद्वारा दी हुई पूजाको ग्रहण करते हैं। जो मनुष्य वहाँ बारह नामोंवाले सूर्यदेवकी स्तुति करेगा, उसकी सात जन्मोंकी दरिद्रता नष्ट हो जायगी। आदित्य, सविता, सूर्य, मिहिर, अर्क, प्रतापन, मार्तण्ड, भास्कर, भानु, चित्रभानु, दिवाकर तथा रवि—ये सूर्यदेवके सामान्य नाम हैं। विष्णु, धाता, भग, पूषा, मैत्र, इन्द्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान्, अंशुमान्, त्वष्टा तथा पर्जन्य—ये बारह स्वरूपोंके विशेष नाम हैं। ये सभी क्रमशः बारह महीनोंमें सूर्यमण्डलमें तपते हैं। चैत्रमें विष्णु, वैशाखमें अर्यमा, ज्येष्ठमें विवस्वान्, आषाढ़में अंशुमान्, श्रावणमें पर्जन्य, भाद्रपदमें वरुण, आश्विनमें इन्द्र, कार्तिकमें धाता, अगहनमें मित्र, पौषमें पूषा, माघमें भग और फाल्गुनमें त्वष्टा तपते हैं। इस प्रकार प्रभासक्षेत्रमें द्वादश मूर्तिवाले सूर्यदेव विराजमान हैं। माघशुक्ला पंचमीको एकभक्तव्रत, षष्ठीको नक्तव्रत और सप्तमीको साम्बादित्यके समीप उपवास-व्रत करके व्रती मनुष्य लाल-चन्दन मिश्रित कनेरके फूलोंसे सूर्यनारायणके लिये अर्घ्य और धूप देकर पूजा करे। शक्तिके अनुसार ब्राह्मण-भोजन भी कराये। जो इस प्रकार साम्बादित्यका पूजन करता है, वह उस लोकमें समस्त मनोवांछित फलोंको पा लेता है।
बालरूपधारी ब्रह्माकी महिमा, ब्रह्माजीकी आयुका मान तथा त्रिदेवोंकी एकता
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! साम्बादित्यसे उत्तर दिशामें कपालेश्वर विराजमान हैं। उनका दर्शन करनेसे मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है और पूर्वजन्मके पातकोंसे मुक्त हो जाता है।
उससे उत्तर कोटीश्वरलिंग है, जो सबके पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ कोटि ऋषियोंने सिद्धि प्राप्त की है, इसलिये उनका नाम कोटीश्वर है। जो मानव भक्तिभावसे कोटीश्वरका पूजन करता है, उसे एक करोड़ मन्त्र-जपका फल प्राप्त होता है। कोटीश्वरके निकट वेदवेत्ता ब्राह्मणको सुवर्ण देना चाहिये।
सोमेश्वर, दैत्यसूदन, बालरूपधारी ब्रह्मा, अर्कस्थल, सूर्य तथा शशिभूषण—ये छः प्रभासक्षेत्रके श्रेष्ठ देवता हैं। इनके दर्शनमात्रसे मनुष्य कृतार्थ हो जाता है और जन्मसे लेकर मृत्युतकके भयंकर पापोंसे छूट जाता है।
पार्वतीजीने पूछा—भगवन्! अन्य सब स्थानोंमें तो वृद्धरूपी ब्रह्मा हैं, यहाँ वे बालरूपी कैसे हुए?
महादेवजीने कहा—देवि! मनुष्य इस संसारमें