संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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आकार धारण करके सम्पूर्ण विश्वका संहार करते हैं, इसलिये भैरव कहलाते हैं।
भैरवेश्वरसे अग्निकोणमें दस धनुषकी दूरीपर मृत्युंजयेश्वरलिंग स्थित है। सागरादित्यसे पश्चिम चार धनुषपर वह स्थान है। वह लिंग दर्शन और स्पर्श करनेपर सब प्राणियोंके पापोंका नाश करनेवाला है। मेरे पार्षद नन्दीने उस महालिंगकी स्थापना करके नित्य पूजनमें तत्पर हो लाख करोड़ महामृत्युंजयका जप किया है। इससे प्रसन्न होकर मैंने उसे अपने गणोंका आधिपत्य और सामीप्य मुक्ति प्रदान की है। मृत्युंजयमन्त्रसे प्रसन्न होकर वहाँ मेरे स्वरूपभूत रुद्र प्रकट हुए, इसलिये उनका नाम मृत्युंजयेश्वर हुआ। जो मनुष्य भक्तिभावसे मृत्युंजयेश्वरका पूजन अथवा दर्शन करता है, उसके सात जन्मोंका पाप वे नष्ट कर देते हैं।
मृत्युंजयेश्वरसे उत्तर दिशामें तीन धनुषपर कामेश्वरलिंग स्थित है, जिसके दर्शन और पूजनसे सात जन्मोंका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है और सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होती है। जो मानव कामेश्वरलिंगका पूजन करेंगे, वे उत्तम गतिको प्राप्त होंगे। इस लिंगके प्रसादसे उनके सब मनोरथोंकी सिद्धि होगी। जो चैत्र शुक्ला त्रयोदशीको कामेश्वरजीका पूजन करता है, वह मनुष्योंमें पुत्र और सौभाग्यसे सम्पन्न एवं पूर्णकाम होता है।
कामेश्वरसे वायव्यकोणमें सात धनुष दूर योगेश्वरलिंग है। वहाँ मेरे असंख्य पार्षदोंने योगनिष्ठ होकर सहस्रों वर्षोंतक घोर तपस्या की थी। तब मैंने प्रसन्न होकर उन्हें सालोक्य मुक्ति प्रदान की थी। उनके षडंगयोगसे सन्तुष्ट होकर शिवलिंगका प्रादुर्भाव हुआ था। इसलिये उसका नाम योगेश्वर हुआ। जो मानव विधिपूर्वक भक्तिभावसे उसकी पूजा करता है, उसे योगसिद्धि प्राप्त होती है। जो प्रभासक्षेत्रमें स्थित इन ग्यारह रुद्रोंको नहीं जानता, वह उस क्षेत्रके बीचमें रहकर भी नहींके समान है। उसे पशु माना गया है। इन ग्यारह रुद्रोंमेंसे सबका अथवा एकमात्र सोमेश्वरका पूजन करके जो शतरुद्रियका जप करता है, उसे सब रुद्रोंके पूजनका फल प्राप्त हो जाता है। पार्वती! ग्यारह रुद्रोंका यह गुप्त माहात्म्य तुम्हें बताया गया।
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चन्द्रेश्वर, चक्रपाणि, दण्डपाणि तथा साम्बादित्यकी महिमा
**महादेवजी कहते हैं—**सोमेश्वरसे वायव्यकोणमें साठ धनुषकी दूरीपर चन्द्रेश्वरलिंग है। वह दिव्य लिंग सब पातकोंका नाश करनेवाला है। चन्द्रेश्वरका दर्शन करके मनुष्य सात जन्मोंके समस्त पापोंसे मुक्त एवं कृतकृत्य हो जाता है। प्राचीन कालमें यह पृथ्वी दैत्योंके भारसे पीड़ित हो गौका रूप धारण करके प्रभासक्षेत्रमें आयी और उसने भक्तिभावसे उत्तम शिवलिंगकी स्थापना की। इससे मैं प्रसन्न हुआ और उससे बोला—'भूदेवी! भगवान् विष्णुके हाथसे मारे जाकर सब दैत्य नष्ट हो जायेंगे और तुम्हारा भार उतर जायगा। तुमने जो यह परम सुन्दर शिवलिंग स्थापित किया है, यह संसारमें धरित्रीश्वरके नामसे विख्यात होगा। मैं इस लिंगमें सदैव निवास करूँगा। भादोंके कृष्णपक्षकी तृतीयाको जो मनुष्य इस शिवलिंगका पूजन करेगा, वह निश्चय ही अश्वमेध यज्ञका फल पायेगा। केवल इस लिंगके पूजनसे सब तीर्थोंमें स्नानका और सब प्रकारके दानोंका फल मिल जायगा। इसके चारों ओर सोलह धनुषतक इसीका क्षेत्र होगा और यह क्षेत्र समस्त प्राणियोंको मोक्ष प्रदान करेगा। इस क्षेत्रमें मरनेवाले प्राणी उत्तम गतिको प्राप्त होंगे।'
यों कहकर मैं वहाँसे अन्तर्धान हो गया। तदनन्तर वाराहकल्पमें किसी समय दक्षके शापसे चन्द्रमा राजयक्ष्मासे पीड़ित हो क्षीण होने लगे। तब वे समुद्रके निकट प्रभासक्षेत्रमें आये और इस पृथ्वीश्वरलिंगका दर्शन करके इसके प्रभावको