संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१२६२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
आकार धारण करके सम्पूर्ण विश्वका संहार करते हैं, इसलिये भैरव कहलाते हैं।
भैरवेश्वरसे अग्निकोणमें दस धनुषकी दूरीपर मृत्युंजयेश्वरलिंग स्थित है। सागरादित्यसे पश्चिम चार धनुषपर वह स्थान है। वह लिंग दर्शन और स्पर्श करनेपर सब प्राणियोंके पापोंका नाश करनेवाला है। मेरे पार्षद नन्दीने उस महालिंगकी स्थापना करके नित्य पूजनमें तत्पर हो लाख करोड़ महामृत्युंजयका जप किया है। इससे प्रसन्न होकर मैंने उसे अपने गणोंका आधिपत्य और सामीप्य मुक्ति प्रदान की है। मृत्युंजयमन्त्रसे प्रसन्न होकर वहाँ मेरे स्वरूपभूत रुद्र प्रकट हुए, इसलिये उनका नाम मृत्युंजयेश्वर हुआ। जो मनुष्य भक्तिभावसे मृत्युंजयेश्वरका पूजन अथवा दर्शन करता है, उसके सात जन्मोंका पाप वे नष्ट कर देते हैं।
मृत्युंजयेश्वरसे उत्तर दिशामें तीन धनुषपर कामेश्वरलिंग स्थित है, जिसके दर्शन और पूजनसे सात जन्मोंका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है और सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होती है। जो मानव कामेश्वरलिंगका पूजन करेंगे, वे उत्तम गतिको प्राप्त होंगे। इस लिंगके प्रसादसे उनके सब मनोरथोंकी सिद्धि होगी। जो चैत्र शुक्ला त्रयोदशीको कामेश्वरजीका पूजन करता है, वह मनुष्योंमें पुत्र और सौभाग्यसे सम्पन्न एवं पूर्णकाम होता है।
कामेश्वरसे वायव्यकोणमें सात धनुष दूर योगेश्वरलिंग है। वहाँ मेरे असंख्य पार्षदोंने योगनिष्ठ होकर सहस्रों वर्षोंतक घोर तपस्या की थी। तब मैंने प्रसन्न होकर उन्हें सालोक्य मुक्ति प्रदान की थी। उनके षडंगयोगसे सन्तुष्ट होकर शिवलिंगका प्रादुर्भाव हुआ था। इसलिये उसका नाम योगेश्वर हुआ। जो मानव विधिपूर्वक भक्तिभावसे उसकी पूजा करता है, उसे योगसिद्धि प्राप्त होती है। जो प्रभासक्षेत्रमें स्थित इन ग्यारह रुद्रोंको नहीं जानता, वह उस क्षेत्रके बीचमें रहकर भी नहींके समान है। उसे पशु माना गया है। इन ग्यारह रुद्रोंमेंसे सबका अथवा एकमात्र सोमेश्वरका पूजन करके जो शतरुद्रियका जप करता है, उसे सब रुद्रोंके पूजनका फल प्राप्त हो जाता है। पार्वती! ग्यारह रुद्रोंका यह गुप्त माहात्म्य तुम्हें बताया गया।
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चन्द्रेश्वर, चक्रपाणि, दण्डपाणि तथा साम्बादित्यकी महिमा
**महादेवजी कहते हैं—**सोमेश्वरसे वायव्यकोणमें साठ धनुषकी दूरीपर चन्द्रेश्वरलिंग है। वह दिव्य लिंग सब पातकोंका नाश करनेवाला है। चन्द्रेश्वरका दर्शन करके मनुष्य सात जन्मोंके समस्त पापोंसे मुक्त एवं कृतकृत्य हो जाता है। प्राचीन कालमें यह पृथ्वी दैत्योंके भारसे पीड़ित हो गौका रूप धारण करके प्रभासक्षेत्रमें आयी और उसने भक्तिभावसे उत्तम शिवलिंगकी स्थापना की। इससे मैं प्रसन्न हुआ और उससे बोला—'भूदेवी! भगवान् विष्णुके हाथसे मारे जाकर सब दैत्य नष्ट हो जायेंगे और तुम्हारा भार उतर जायगा। तुमने जो यह परम सुन्दर शिवलिंग स्थापित किया है, यह संसारमें धरित्रीश्वरके नामसे विख्यात होगा। मैं इस लिंगमें सदैव निवास करूँगा। भादोंके कृष्णपक्षकी तृतीयाको जो मनुष्य इस शिवलिंगका पूजन करेगा, वह निश्चय ही अश्वमेध यज्ञका फल पायेगा। केवल इस लिंगके पूजनसे सब तीर्थोंमें स्नानका और सब प्रकारके दानोंका फल मिल जायगा। इसके चारों ओर सोलह धनुषतक इसीका क्षेत्र होगा और यह क्षेत्र समस्त प्राणियोंको मोक्ष प्रदान करेगा। इस क्षेत्रमें मरनेवाले प्राणी उत्तम गतिको प्राप्त होंगे।'
यों कहकर मैं वहाँसे अन्तर्धान हो गया। तदनन्तर वाराहकल्पमें किसी समय दक्षके शापसे चन्द्रमा राजयक्ष्मासे पीड़ित हो क्षीण होने लगे। तब वे समुद्रके निकट प्रभासक्षेत्रमें आये और इस पृथ्वीश्वरलिंगका दर्शन करके इसके प्रभावको
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जानकर इसीकी आराधनामें तत्पर हो गये। इसके माहात्म्यसे चन्द्रमाका पापजनित रोग दूर हुआ। तबसे इसका नाम 'चन्द्रेश्वर' हो गया।
तदनन्तर जहाँ चक्रधर विष्णु तथा दण्डपाणि गणेश दोनों एक स्थानपर स्थित हैं, वहाँकी यात्रा करे। जो मानव भक्तिभावसे क्रमशः उन दोनोंका पूजन करता है, वह पापसे मुक्त हो मेरे लोकमें जाता है। जो माघमासकी चतुर्दशी और कृष्णपक्षकी अष्टमीको गन्ध, पुष्प, धूप आदि उपचारोंसे दण्डनायककी पूजा करता है, उसे कभी विघ्न नहीं प्राप्त होता। जो एकादशी तिथिको निराहार रहकर चक्रपाणिका पूजन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है।
इस प्रकार यहाँ संक्षेपसे चक्रपाणि और दण्डपाणिका माहात्म्य बताया गया।
इन दोनोंके उत्तर और बालरूपधारी ब्रह्मासे वायव्यकोणमें साम्बके द्वारा स्थापित देवश्रेष्ठ साम्बादित्यका स्थान है। प्रभासक्षेत्रमें जो साम्बनामक पुर है, वही सूर्यनारायणका द्वितीय स्थान है। वहाँ भगवान् सूर्य बारह स्वरूपोंमें विभक्त हो सदा सबके कल्याणके लिये निवास करते हैं और भक्तोंद्वारा दी हुई पूजाको ग्रहण करते हैं। जो मनुष्य वहाँ बारह नामोंवाले सूर्यदेवकी स्तुति करेगा, उसकी सात जन्मोंकी दरिद्रता नष्ट हो जायगी। आदित्य, सविता, सूर्य, मिहिर, अर्क, प्रतापन, मार्तण्ड, भास्कर, भानु, चित्रभानु, दिवाकर तथा रवि—ये सूर्यदेवके सामान्य नाम हैं। विष्णु, धाता, भग, पूषा, मैत्र, इन्द्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान्, अंशुमान्, त्वष्टा तथा पर्जन्य—ये बारह स्वरूपोंके विशेष नाम हैं। ये सभी क्रमशः बारह महीनोंमें सूर्यमण्डलमें तपते हैं। चैत्रमें विष्णु, वैशाखमें अर्यमा, ज्येष्ठमें विवस्वान्, आषाढ़में अंशुमान्, श्रावणमें पर्जन्य, भाद्रपदमें वरुण, आश्विनमें इन्द्र, कार्तिकमें धाता, अगहनमें मित्र, पौषमें पूषा, माघमें भग और फाल्गुनमें त्वष्टा तपते हैं। इस प्रकार प्रभासक्षेत्रमें द्वादश मूर्तिवाले सूर्यदेव विराजमान हैं। माघशुक्ला पंचमीको एकभक्तव्रत, षष्ठीको नक्तव्रत और सप्तमीको साम्बादित्यके समीप उपवास-व्रत करके व्रती मनुष्य लाल-चन्दन मिश्रित कनेरके फूलोंसे सूर्यनारायणके लिये अर्घ्य और धूप देकर पूजा करे। शक्तिके अनुसार ब्राह्मण-भोजन भी कराये। जो इस प्रकार साम्बादित्यका पूजन करता है, वह उस लोकमें समस्त मनोवांछित फलोंको पा लेता है।
बालरूपधारी ब्रह्माकी महिमा, ब्रह्माजीकी आयुका मान तथा त्रिदेवोंकी एकता
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! साम्बादित्यसे उत्तर दिशामें कपालेश्वर विराजमान हैं। उनका दर्शन करनेसे मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है और पूर्वजन्मके पातकोंसे मुक्त हो जाता है।
उससे उत्तर कोटीश्वरलिंग है, जो सबके पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ कोटि ऋषियोंने सिद्धि प्राप्त की है, इसलिये उनका नाम कोटीश्वर है। जो मानव भक्तिभावसे कोटीश्वरका पूजन करता है, उसे एक करोड़ मन्त्र-जपका फल प्राप्त होता है। कोटीश्वरके निकट वेदवेत्ता ब्राह्मणको सुवर्ण देना चाहिये।
सोमेश्वर, दैत्यसूदन, बालरूपधारी ब्रह्मा, अर्कस्थल, सूर्य तथा शशिभूषण—ये छः प्रभासक्षेत्रके श्रेष्ठ देवता हैं। इनके दर्शनमात्रसे मनुष्य कृतार्थ हो जाता है और जन्मसे लेकर मृत्युतकके भयंकर पापोंसे छूट जाता है।
पार्वतीजीने पूछा—भगवन्! अन्य सब स्थानोंमें तो वृद्धरूपी ब्रह्मा हैं, यहाँ वे बालरूपी कैसे हुए?
महादेवजीने कहा—देवि! मनुष्य इस संसारमें
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तभीतक दुःख, शोक और भयके समुद्रमें डूबे रहते हैं, जबतक कि ब्रह्माजीके प्रति उनकी भक्ति नहीं होती। जीवका चित्त जैसे विषयोंमें लगा है, यदि उसी प्रकार ब्रह्माजीमें भी लग जाय, तो कौन बन्धनसे मुक्त न होगा। सोमनाथसे ईशानकोणमें और साम्बादित्यसे अग्निकोणमें ब्रह्माजीका उत्तम स्थान है। वहाँ बालरूपधारी ब्रह्माजी विराजमान हैं। जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, सब लोकोंके स्रष्टा और महान् तेजस्वी हैं, वे ही इस प्रभासक्षेत्रमें आठ वर्षकी आयुमें आये हैं। उन्होंने ही सोमनाथ-लिंगकी स्थापना करके ब्राह्मणोंको बहुत-सी दक्षिणा दी। प्रभासक्षेत्रमें रहते हुए बालरूपधारी ब्रह्माजीके बयालीस वर्ष बीत गये हैं। इस प्रकार उनकी आयुका एक परार्ध व्यतीत हो गया।
पार्वतीजीने कहा— प्रभो! ब्रह्माजीके दिन, मास और वर्षका परिमाण बताइये।
महादेवजीने कहा— देवि! ब्रह्माजीकी जो परम आयु है, उसका एक परार्ध बीत गया है। अब दूसरा परार्ध चल रहा है। आठ वर्षकी आयुमें यहाँ आये थे, इसीलिये उन्हें बालरूपी कहते हैं। प्रभासक्षेत्रको छोड़कर अन्य सब तीर्थोंमें वे वृद्धरूपी ही हैं। प्रथम कल्पमें इनका नाम स्वयम्भू था। दूसरेमें पद्मभू, तीसरेमें विश्वकर्ता और चौथेमें बालरूपी कहे गये हैं। जो मनुष्य प्रतिदिन इन नामोंको स्मरण करता है, वह दीर्घायु होता है। चन्द्र, सूर्य आदि सभी ग्रह, देवता, असुर, दानव तथा समस्त त्रिलोकी—ये सब ब्रह्माजीकी रात आनेपर नष्ट हो जाते हैं। फिर दिन आनेपर जब ब्रह्माजी जगते हैं, तब पूर्ववत् सृष्टि करने लगते हैं।
पलक गिरनेमें जितना समय लगता है, उसके एक चौथाई भागको त्रुटि कहते हैं। दो त्रुटिका एक निमेष होता है। पंद्रह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है। तीस काष्ठाओंकी एक कला, तीस कलाओंका मुहूर्त और पंद्रह मुहूर्तोंका एक दिन होता है। दिनके बराबर ही रातका भी मान है। दिन तथा रात दोनोंको एक 'अहोरात्र' कहते हैं। पंद्रह दिन-रातोंका पक्ष और दो पक्षोंका मास होता है। छः मासोंका एक अयन और दो अयनोंका एक वर्ष होता है। तैंतालीस लाख बीस हजार सौर वर्षोंका एक चतुर्युग होता है। इकहत्तर चतुर्युगोंका मन्वन्तर कहा गया है। यही संक्षेपसे इन्द्र देवताकी आयु बतायी गयी है। ब्रह्माजीके एक दिनमें चौदह मनु और चौदह इन्द्र नष्ट होते हैं। विश्ववक्ता, विपश्चित्, स्वचिति, शिवि, विभु, मनोभुव, ओजस्वी, बलि, अद्भुत, शान्ति, वृषा, शतधामा, दिवस्पति, शुचि—ये चौदह इन्द्र हैं। ब्रह्माजीका दिन जितना बड़ा होता है, उनकी रात भी उतनी ही होती है। यह कल्पका मान बताया गया। पहला श्वेत कल्प है। दूसरे कल्पका नाम नीललोहित, तीसरेका वामदेव, चौथेका रथन्तर, पाँचवेंका रौरव, छठेका प्राण, सातवेंका बृहत्कल्प, आठवेंका कन्दर्प, नवेंका सद्यःकल्प, दसवेंका ईशान, ग्यारहवेंका ध्यान, बारहवेंका शाश्वत, तेरहवेंका उदान, चौदहवेंका गरुड, पंद्रहवेंका कूर्म, सोलहवेंका नारसिंह, सत्रहवेंका समाधि, अठारहवेंका आत्रेय, उन्नीसवेंका सोम, बीसवेंका भावन, इक्कीसवेंका तत्पुरुष, बाइसवेंका वैकुण्ठ, तेइसवेंका अर्चित, चौबीसवेंका रुद्र, पचीसवेंका लक्ष्मी, छब्बीसवेंका सारस्वत, सत्ताईसवेंका वैराज, अट्ठाइसवेंका गौरी-कल्प, उन्तीसवेंका माहेश्वरकल्प और तीसवेंका नाम पितृकल्प है। यही ब्रह्माजीकी अमावास्या है। ब्रह्माजीके महीनेके ये तीस कल्प बताये गये। व्यतीत हुए सभी कल्पोंके नाम बताये जा चुके हैं। इस समय वाराहकल्प चल रहा है। यही ब्रह्माजीकी प्रतिपदा है, जिसमें भगवान् वाराहने रसातलसे पृथ्वीका उद्धार किया। तीस कल्पोंका ब्रह्माजीका एक मास माना गया है। ऐसे बारह मासोंका एक वर्ष होता है। ऐसे वर्षमानसे जब ब्रह्माजी आठ वर्षके थे, तब सोमदेव उन्हें प्रभासक्षेत्रमें ले आये और उन्हींके द्वारा सोमनाथकी प्रतिष्ठाका कार्य सम्पन्न हुआ। इस प्रकार प्रभासक्षेत्रमें
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निवास करते हुए ब्रह्माजीका एक परार्ध व्यतीत हो गया और अब दूसरा चल रहा है। इस तरह बचपनसे ही उनका इस क्षेत्रमें निवास होता है। मनीषी पुरुषोंके द्वारा वे बारंबार वन्दनीय हैं। यात्राका उत्तम फल चाहनेवाले पुरुषोंको पहले उन्हींकी पूजा करनी चाहिये। जो भक्तिपूर्वक ब्रह्माजीकी पूजा करता है, वह निश्चय ही मेरा पूजन करता है। जो उनसे द्वेष करता है, वह मुझीसे द्वेष करता है और जो उनका पुजारी है, वह मेरा ही पूजक है। ब्रह्माजीकी पूजा करनेवाले पुरुषोंके द्वारा मैं और भगवान् विष्णु दोनों ही पूजित होते हैं। विष्णु सत्त्वगुणी हैं, ब्रह्माजी रजोगुणी हैं और मैं तमोगुणसे युक्त हूँ। ब्रह्माजी वायु, रुद्रदेव अग्नि तथा भगवान् विष्णु जलरूप हैं। मैं सामवेदका आश्रय हूँ। ब्रह्माजी ऋग्वेद धारण करते हैं तथा भगवान् विष्णु यजुर्वेदके स्वरूप एवं अथर्वकी कलाके आधार हैं। मुझे दक्षिणाग्नि, विष्णुको गार्हपत्याग्नि तथा ब्रह्माजीको आहवनीयाग्नि जानना चाहिये। ब्रह्माजी नाभिमें, विष्णु हृदयमें तथा सब भूतोंका आधारभूत मैं चक्र (मूलाधारसे लेकर ब्रह्मरन्ध्रतक)-में स्थित हूँ। हम लोगोंके रूपमें शक्तिविशेषसे साक्षात् परब्रह्म परमात्मा ही स्थित हैं। ॐकार परब्रह्म है और गायत्री उत्तम प्रकृति है। इन दोनोंको जानकर मनुष्य पुरुषयोनिसे वियुक्त नहीं होता। पार्वती! इस प्रकार जो द्वैतरहित परब्रह्मको जानता है, वह सब कुछ जानता है। जो भेददर्शी है, वह नहीं जानता। परब्रह्म तो वास्तवमें एकरूप ही है, तथापि कार्यरूपसे वह पृथक्-सा प्रतीत होता है। जो उससे द्वेष करता है, वह ब्रह्मद्वेषी कहलाता है। मेरे दाहिने अंगमें ब्रह्मा और बायें अंगमें विष्णु विराजमान हैं; जो इन दोनोंसे द्वेष करता है, वह मेरा ही द्वेषी है। सुन्दरि! ऐसा जानकर मनमें भेदभाव न रखते हुए ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्रकी एकरूपसे ही पूजा करनी चाहिये।
ब्राह्मणोंकी महिमा, क्षेत्रवासी ब्राह्मणोंके भेद
महादेवजी कहते हैं—देवि! पृथ्वीपर जो ब्राह्मण हैं, वे मेरे प्रत्यक्ष स्वरूप हैं। स्वर्गके देवता तो परोक्ष हैं, ब्राह्मण ही प्रत्यक्ष देवता हैं। ब्राह्मण मुझे प्रिय हैं। जो भक्तिभावसे उनकी पूजा करता है, वह सदा मेरी ही पूजा करता है। जो भक्तिद्वारा उन्हें संतुष्ट करता है, वह मुझे संतुष्ट कर लेता है। जो ब्राह्मण हैं, वह मैं हूँ। उनके साथ जिसका वैर है, वह मेरा भी वैरी है। प्रिये! पृथ्वीपर जितने भी ब्राह्मण हैं, उनमेंसे जिन्होंने वेदव्रतका पालन किया है, वे तो पूज्य हैं ही; जिन्होंने वेदोक्त व्रतोंका पालन नहीं किया है, वे भी पूजनीय हैं। ब्राह्मण जातिसे ही पवित्र हैं, वेदाभ्याससे उनकी पवित्रता और भी बढ़ जाती है। अतः हव्य और कव्य (यज्ञ और श्राद्ध)-में कहीं भी ब्राह्मण निन्दाके योग्य नहीं हैं। काने, कुबड़े, कोढ़ी, रोगी तथा दरिद्र ब्राह्मणोंका भी विद्वान् पुरुष अपमान न करे; क्योंकि वे मेरे स्वरूप कहे गये हैं। बहुत-से अज्ञानी मनुष्य इस बातको नहीं जानते। जो मेरे स्वरूपभूत ब्राह्मणोंको मारते हैं, उनसे शास्त्रविपरीत कर्म करवाते हैं, जहाँ नहीं भेजना चाहिये, वहाँ उन्हें भेजते हैं तथा उनसे दासता (सेवा-टहल) कराते हैं, वे जब मरते हैं, तब यमदूत उनके माथेपर आरा रखकर उससे उन्हें चीरते हैं—ठीक वैसे ही, जैसे बढ़ई लकड़ी चीरते हैं। जो ब्राह्मणको अंगभंग करता और उनके प्राण लेता है, उसे ब्रह्महत्यारा जानना चाहिये; उसके उद्धारके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है। वह पचास करोड़ नरकोंमेंसे प्रत्येकमें क्रमशः सहस्रों वर्षोंतक बहुत पीड़ित किया जाता है। इसलिये मानवोंको चाहिये कि वे ब्राह्मणोंको
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सदा नमस्कार करें, अन्न-पान देकर सदैव उनकी पूजामें संलग्न रहें। सभी ब्राह्मण सब प्रकारके दान लेनेके अधिकारी हैं। दूसरा कोई दान लेनेमें समर्थ नहीं है। यदि लोभवश कोई दान ग्रहण करता है तो वह अधम गतिको प्राप्त होता है। तपस्यासे पवित्र हुआ ब्राह्मण पापरहित होता है। अतः प्रतिग्रह लेकर वह कष्टमें नहीं पड़ता और न उसे कोई पाप लगता है। जो हृदयमें सदा पवित्रभाव रखते हुए नित्य-निरन्तर ध्यानमें लगा रहता है, उस ब्राह्मणको दोषका सम्पर्क नहीं प्राप्त होता। ब्राह्मण जन्मसे ही महान् है। लोक और लोकेश्वर भी ब्राह्मणोंके पूजक हैं। ब्राह्मण यदि कुपित हों तो अपराधीको नष्ट कर सकते हैं, उसे अपने तेजसे जला सकते हैं। ये ही स्वर्गलोकमें पहुँचानेवाले सनातन देवदेव हैं। ब्राह्मण पूजनीय हैं, वन्दनीय हैं; उन्हींमें सब कुछ प्रतिष्ठित है। वे ही इन सब लोकोंका परस्पर पालन करते हैं। अपने स्वाध्याय और तपको प्रकट न करनेवाले ब्राह्मण उत्तम व्रतवाले हैं। जो विद्या और व्रतमें स्नात हैं, दूसरेके आश्रित न रहकर जीवन-निर्वाह करते हैं, वे ब्राह्मण कुपित होनेपर कालसर्प बन जाते हैं; अतः उनका पूजन करना चाहिये, उन्हें कुपित नहीं करना चाहिये। अध्यात्मस्वरूपका चिन्तन करनेवाले ब्राह्मण ही सब प्राणियोंकी गति हैं। ब्राह्मण यदि विपत्तिमें पड़ा हो तो उसकी सब उपायोंसे रक्षा करे। ये ब्राह्मण मनुष्योंद्वारा सर्वत्र पूजा पाने योग्य हैं। फिर जो अपने चित्तको संयममें रखनेवाले तथा विशेषतः पुण्यक्षेत्रके निवासी हैं, उनके विषयमें तो कहना ही क्या है। जो द्विज विधिपूर्वक क्षेत्र-संन्यास तथा वृत्तिभेदके क्रम जानते हैं, वे क्षेत्रके पूर्ण फलके भागी होते हैं। प्राजापत्य, महीपाल, कपोत, ग्रन्थिक, कुटिक, वेताल, पद्म, हंस, धृतराष्ट्र, वक, कंक, गोपाल, त्रुटिक, प्रवर, गुटिक तथा दण्डिक—ये क्षेत्रवासी ब्राह्मणोंके भेद हैं।
अहिंसा, गुरु-शुश्रूषा, स्वाध्याय, शौच, संयम, सत्य तथा अस्तेय (चोरीका अभाव)—यह प्राजापत्योंका व्रत कहा गया है। शान्ति-पुष्टि आदि कर्मोंद्वारा जो इस मही (पृथ्वी)-का पालन करते हैं, वे महीपाल हैं। जो धरतीपर गिरे हुए अन्नके दानोंको कपोतकी भाँति चुनते हैं और इस तरह उञ्छवृत्तिसे जीविका चलाते हैं, वे साधु पुरुष कपोत कहलाते हैं। जो घर बनाकर रहते हैं, वे सद्ग्रन्थ या ग्रन्थिक हैं। जो सहसा घर त्याग देते हैं, वे शिवाराधनमें तत्पर रहनेवाले साधक कुटिक कहे गये हैं। जिनका तीर्थसेवनमें अनुराग है तथा जो पत्नीके साथ रहते हुए जो कुछ मिल जाय उसीपर संतोष करते हैं, वे महान् साहस (धैर्य)-से युक्त साधक वेताल कहलाते हैं। जो इन्द्रियोंको संयममें रखते हैं, परंतु कामनाओंमें आसक्त हैं, राज्य और धनकी इच्छासे साधनरत हो रहे हैं, वे 'पद्म' कहलाते हैं और सदा भिक्षासे ही जीवन-निर्वाह करते हैं। जो ज्ञानयोगसे युक्त हैं, जिनके केवल व्यवहारमें ही द्वैत है, वे साधक 'हंस' कहे गये हैं। जिन्होंने ब्रह्मचर्य, सत्त्वगुण तथा निर्लोभता आदि गुणोंसे सम्पूर्ण जगत्को जीत लिया है और जो सबका धारण-पोषण करते हैं, वे 'धृतराष्ट्र' माने गये हैं। जो सदा एकमात्र स्वार्थमें ही स्थित होकर ज्ञान, व्रत अथवा धर्मका आचरण करते हैं, उन्हें 'वक' कहते हैं। जो उत्कृष्ट सिद्धि प्राप्त करनेके लिये जलाशयका आश्रय ले कमलकी नाल और सिंघाड़ा आदि खाकर रहते हैं, वे साधक 'कंक' माने गये हैं। जो गौओंके साथ चलते, गोशालामें निवास करते तथा पंचगव्य रसका सेवन करते हैं, वे साधक 'गोपाल' माने गये हैं। जो कृच्छ्र और चान्द्रायण आदि व्रतोंके द्वारा अपने शरीरको क्षीण करते हैं तथा त्रुटिकाल (आधे निमेष)-में ही भोजन कर लेते हैं, वे साधक त्रुटिक माने गये हैं। जो कुशकी पत्नी बनाकर मठमें स्थापित करते और गृहस्थ-धर्मका पालन करते हुए भिक्षावृत्तिसे जीवन-निर्वाह करते हैं, वे साधक 'प्रवर' या 'मठर' कहलाते हैं। जो
- प्रभासखण्ड * १२६७
ब्राह्मण कन्द अथवा मूल-फलकी एक-एक ग्रासकी आठ गुटिकाएँ बनाकर उन्हींका आहार करते हैं, वे 'गुटिक' कहलाते हैं। जो रातमें वीरासनसे बैठकर अपने शरीरको ही दण्ड देनेमें संलग्न हैं, वे 'दण्डी' कहे गये हैं। प्रभासक्षेत्रमें रहनेवाले जो ब्राह्मण इस प्रकारकी वृत्तियोंसे जीविका चलाते हैं, उनके द्वारा बालरूपधारी भगवान् ब्रह्मा सदैव पूजनीय हैं। जो महापातकी हैं और जिन्हें ब्राह्मणोंने अपनी पंक्तिसे बाहर कर दिया है, वे बालरूपधारी ब्रह्माजीका स्पर्श न करें। जो दीर्घजीवी होना चाहता है, वह ब्रह्मचारी, शान्त और जितेन्द्रिय ब्राह्मणका कभी अपमान न करे।
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ब्रह्माजीके प्रति भक्तिके भेद, रथयात्रा, ब्रह्माके एक सौ आठ नाम तथा कार्तिकपूर्णिमाको उनके दर्शनका माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—भक्तिके तीन भेद हैं—लौकिकी, वैदिकी और आध्यात्मिकी। गन्ध, माला, शीतल जल, घी, गुग्गुल, धूप, काला, अगुरु, सुगन्धित पदार्थ, सुवर्ण, रत्न आदि आभूषण, विचित्र हार, न्यास, स्तोत्र, ऊँची-ऊँची पताका, नृत्य-वाद्य, गान, सब प्रकारकी वस्तुओंके उपहार तथा भक्ष्य, भोज्य, अन्न, पान आदि सामग्रियोंसे मनुष्योंद्वारा जो ब्रह्माजीकी पूजा की जाती है, वह लौकिकी भक्ति मानी गयी है। वेदमन्त्र और हविष्यभागके द्वारा जो यज्ञक्रिया की जाती है, वह वैदिकी भक्ति है। अमावास्या और पूर्णिमाको किया जानेवाला अग्निहोत्र, संस्रवप्राशन, दक्षिणादान, पुरोडाश, इष्टि, धृति, सोमपान, सब प्रकारके यज्ञकर्म, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेदके मन्त्रोंका जप तथा संहिताभागका स्वाध्याय—ये सब कर्म जो ब्राह्मणोंद्वारा किये जाते हैं, वे वैदिकी भक्तिके अन्तर्गत हैं। जो प्रतिदिन इन्द्रियसंयमपूर्वक प्राणायाम एवं ध्यानमें संलग्न रहता है, भिक्षान्नसे जीवननिर्वाह करता है, व्रतके पालनमें स्थित रहता है, समस्त इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे समेटकर उन्हें हृदयमें स्थापित करके प्रजापति ब्रह्माजीका ध्यान करता है, वह आध्यात्मिकी भक्तिसे युक्त 'ब्रह्मभक्त' कहलाता है। ब्रह्माजीका ध्यान इस प्रकार करे—हृदयकमलकी कर्णिकाके आसनपर ब्रह्माजी विराजमान हैं, उनके शरीरका वर्ण लाल है, नेत्र बड़े सुन्दर हैं, मुख दिव्य तेजसे प्रकाशित है, उनके चार भुजाएँ हैं और हाथोंमें वरद एवं अभयकी मुद्राएँ हैं।'
जो ममता और अहंकारसे रहित, अनासक्त, परिग्रहशून्य, चारों पुरुषार्थोंके प्रति भी स्नेह न रखनेवाले, ढेला, पत्थर और सुवर्णको समान दृष्टिसे देखनेवाले, समस्त प्राणियोंके हितके लिये धर्मानुष्ठानमें तत्पर, सांख्ययोगकी विधिके ज्ञाता, धर्मके विषयमें संशयरहित तथा प्रतिदिन ब्रह्माजीकी पूजामें संलग्न रहनेवाले हैं, वे ही ब्राह्मण प्रभासक्षेत्रके श्रेष्ठ निवासी हैं।
गायत्री उत्तम मन्त्र है। जो पूर्णिमामें उपवास करके गायत्रीके अक्षरतत्त्वोंद्वारा ब्रह्माजीकी पूजा करता है, वह परम पदको प्राप्त होता है। यदि ब्राह्मण भयंकर संसार-सागरके पार उतरना चाहे तो प्रभासमें पूरे कार्तिकमासभर ब्रह्माजीके पूजनमें तत्पर रहे। जिनके दर्शनमात्रसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है, प्रभासक्षेत्रमें उन बालरूपधारी ब्रह्माजीकी कौन विद्वान् पूजा नहीं करेगा? जिनके एक दिनका अन्त होते ही देवता, असुर और मनुष्य आदि सब प्राणी विनाशको प्राप्त होते हैं, उनका पूजन कौन नहीं करेगा। रुद्र और विष्णुके रूपमें भी वे लोकनाथ ब्रह्माजी ही पूजित होते हैं। जो पूर्णिमाको उपवास करके जगत्पति ब्रह्माका विधिपूर्वक पूजन करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। कार्तिककी पूर्णिमाको सावित्रीसहित चतुर्मुख ब्रह्माजीको गाजे-बाजेके साथ नगरमें घुमाये। तत्पश्चात् उन्हें विश्राम-स्थानपर स्थापित करे। फिर ब्राह्मणोंको
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भोजन कराकर शाण्डिलेयकी पूजा करे। उसके बाद मंगलमय वाद्योंकी ध्वनिके साथ ब्रह्माजीको पुनः रथपर बिठाये। रथके आगे शाण्डिली-पुत्रकी विधिवत् पूजा करके ब्राह्मणोंसे पुण्याहवाचन कराये। रथपर चढ़ानेके बाद रातमें जागरण करे। ब्रह्माजीके दाहिने पार्श्वमें सावित्रीदेवीको स्थापित करे और भोजनको बायें पार्श्वमें। ब्रह्माजीके आगे एक कमल रख दे, फिर वाद्यों और शंखोंकी तुमुल ध्वनिके साथ समूचे नगरकी प्रदक्षिणा करते हुए रथको घुमाये और अपने स्थानपर आकर ब्रह्माजीकी आरती करके फिर उन्हें यथास्थान विराजमान करे। जो इस प्रकार यात्रा करता है, जो उस यात्राको देखता है अथवा ब्रह्माजीके रथको खींचता है, वह ब्रह्मधाममें जाता है। जो ब्रह्माजीके रथके पीछे दीप धारण करता है, वह पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका महान् फल पाता है। राजाको चाहिये कि वह ब्रह्माजीकी रथयात्रा अवश्य कराये। प्रतिपदाको ब्राह्मणभोजन कराना चाहिये और उन ब्राह्मणोंका नवीन वस्त्र, गन्ध, माला और अनुलेपन आदिके द्वारा पूजन करना चाहिये। जो कार्तिककी अमावास्याको ब्रह्माजीके मन्दिरमें दीप जलाता है, वह परम पदको प्राप्त होता है। सभी उत्सवोंके अवसरपर इन जगत्पति ब्रह्माजीकी पूजा करनी चाहिये।
पार्वती! अब मैं ब्रह्माजीके एक सौ आठ नाम कहता हूँ; उनका अष्टोत्तरशतनामस्तोत्र परम दिव्य, गोपनीय तथा पापनाशक है। वेदोंके ज्ञाता महात्मा ब्राह्मणको इसका उपदेश देना चाहिये। पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने पूछा—'देवदेव पितामह! आप किन-किन स्थानोंमें किस-किस नामसे निवास करते हैं? यह स्मरण करके बताइये।'
ब्रह्माजीने कहा—मैं पुष्करमें सुरश्रेष्ठ, गयामें प्रपितामह, कान्यकुब्जमें वेदगर्भ, भृगुकच्छमें चतुर्मुख, कौबेरीमें सृष्टिकर्ता, नन्दिपुरीमें बृहस्पति, प्रभासमें बालरूपी, वाराणसीमें सुरप्रिय, द्वारावतीमें चक्रदेव, वैदिशमें भुवनाधिप, पौण्ड्रकमें पुण्डरीकाक्ष, हस्तिनापुरमें पीताक्ष, जयन्तीमें विजय, पुरुषोत्तममें जयन्त, वाडमें पद्महस्त, तमोलिप्तमें तमोनुद, आहिच्छत्रीमें जनानन्द, कांचीपुरीमें जनप्रिय, कर्नाटकमें ब्रह्मा, ऋषिकुण्डमें मुनि, श्रीकण्ठमें श्रीनिवास, कामरूपमें शुभंकर, उड्डीयानमें देवकर्ता, जालन्धरमें स्रष्टा, मल्लिकामें विष्णु, महेन्द्रपर्वतपर भार्गव, गोमदमें स्थविराकार, उज्जयिनीमें पितामह, कौशाम्बीमें महादेव, अयोध्यामें राघव, चित्रकूटमें विरंचि, विन्ध्याचलमें वाराह, हरिद्वारमें सुरश्रेष्ठ, हिमवान् पर्वतपर शंकर, देहिकामें स्रुचाहस्त, अर्बुदमें पद्महस्त, वृन्दावनमें पद्मनेत्र, नैमिषारण्यमें कुशहस्त, गोपक्षेत्रमें गोविन्द, यमुनातटपर सुरेन्द्र, भागीरथीमें पद्मतनु, जनस्थलमें जनानन्द, कोंकणमें मध्वक्ष, काम्पिल्यमें कनकप्रभ, खेटकमें अन्नदाता, क्रतुस्थलमें शम्भु, लंकामें पौलस्त्य, काश्मीरमें हंसवाहन, अर्बुदमें वसिष्ठ, उत्पलावनमें नारद, मेधकर्मे श्रुतिदाता, प्रयागमें यजुष्पति, शिवलिंगमें सामवेद, मार्कण्डस्थानमें मधुप्रिय, गोमन्तमें नारायण, विदर्भमें द्विजप्रिय, अंकुलकमें ब्रह्मगर्भ, ब्रह्मवाहमें सुतप्रिय, इन्द्रप्रस्थमें दुरधर्ष, पम्पामें सुदर्शन, विरजामें महारूप, राष्ट्रवर्धनमें सुरूप, कदम्बकमें जनाध्यक्ष, समस्थलमें देवाध्यक्ष, रुद्रपीठमें गंगाधर, सुपीठमें जलद, त्र्यम्बकमें त्रिपुरारि, श्रीशैलमें त्रिलोचन, प्लक्षपुरमें महादेव, कपालमें वेधनाशन, शृंगवेरपुरमें शौरि, निमिषक्षेत्रमें चक्रधारक, नन्दिपुरीमें विरूपाक्ष, प्लक्षपादपमें गौतम, हस्तिनाथमें माल्यवान्, वाचिकमें द्विजेन्द्र, इन्द्रपुरीमें दिवानाथ, भूतिकामें पुरन्दर, चन्द्रामें हंसबाहु, चम्पामें गरुडप्रिय, महोदयमें महायक्ष, पूतक वनमें सुयज्ञ, सिद्धेश्वरमें शुक्लवर्ण, विभामें पद्मबोधक, देवदारुवनमें लिंगी, उदकमें उमापति, मातृस्थानमें विनायक, अलकामें धनाधिप, त्रिकूटमें गोविन्द, पातालमें वासुकि, कोविदारमें युगाध्यक्ष, स्त्रीराज्यमें सुरप्रिय, पूर्णगिरिमें सुभोग, शाल्मलिमें तक्षक, अमरमें पापहा, अम्बिकामें सुदर्शन, नरवापीमें महावीर, कान्तारमें दुर्गनाशन, पद्मावतीमें पद्मगृह तथा गगनमें मृगलाञ्छन नामसे
- प्रभासखण्ड * १२६९
रहता हूँ। मधुसूदन ! जो इन एक सौ आठमेंसे एकमात्र बालरूपी ब्रह्माका भी दर्शन कर लेता है, उसे पूर्वोक्त सभी ब्रह्मविग्रहोंके दर्शनका पुण्य-फल प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण ! जो प्रभासमें इन नामोंद्वारा मेरा स्तवन करता है, वह मेरे धामको पाकर आनन्द भोगता है। मेरे इस स्तोत्रके पाठसे या श्रवणसे मानसिक, वाचिक और शारीरिक सभी पाप छूट जाते हैं। कार्तिककी पूर्णिमाको जब कृत्तिका नक्षत्र हो, तब प्रभासक्षेत्रमें वह तिथि मुझे बहुत प्रिय है। और यदि उसी तिथिमें रोहिणी नक्षत्र आ जाय तो वह पुण्यमयी महा कार्तिकी कहलाती है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। शनैश्चर, रविवार अथवा बृहस्पतिवार तथा कृत्तिका नक्षत्रके योगसे युक्त यदि कार्तिक-मासकी पूर्णिमा हो तो उसमें बालरूपी ब्रह्माजीका दर्शन करके मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। विशाखा नक्षत्रके सूर्य और कृत्तिका नक्षत्रके चन्द्रमा हों तो वह पद्मकयोग प्रभासक्षेत्रमें दुर्लभ है। करोड़ों पापोंसे युक्त मनुष्य भी उक्त योगमें प्रभासक्षेत्रके भीतर यदि बालरूपधारी ब्रह्माजीका दर्शन कर ले तो उसे यमलोक नहीं देखना पड़ता।
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प्रत्यूषेश्वर, अनिलेश्वर, प्रभासेश्वर, रामेश्वर, लक्ष्मणेश्वर, कुण्डेश्वरीदेवी तथा भूतेश्वरका माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—तदनन्तर सोमेश्वरसे ईशानकोणमें पचास धनुषके अन्तरपर प्रत्यूषेश्वर नामक लिंग है। उसके दर्शनसे सात जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है। धर्मराजसे उनकी पत्नी विश्वाने आठ पुत्रोंको जन्म दिया, जो आठ 'वसु' कहलाये। उनके नाम इस प्रकार हैं—आप, भव, सोम, धर, अनल, अनिल, प्रत्यूष और प्रभास। इनमें सातवें वसु प्रत्यूष पुत्रकी इच्छासे प्रभासक्षेत्रमें आये और शिवलिंगकी स्थापना करके मेरा ध्यान करते हुए उन्होंने शान्तचित्तसे दिव्य सौ वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। उनकी भक्तिसे मैं प्रसन्न हुआ और मैंने उन्हें पुत्र दिया। योगियोंमें श्रेष्ठ देवल ही उनके पुत्र हैं। प्रत्यूषके द्वारा स्थापित और पूजित होनेसे उस लिंगका नाम 'प्रत्यूषेश्वर' हुआ। जो सन्तानहीन पुरुष उनकी आराधना करता है, उसके कुलमें कभी सन्ततिका नाश नहीं होता। जो भक्तिभावसे इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए सदा उनकी पूजा करता है, उसका महापाप भी नष्ट हो जाता है। माघ कृष्णा चतुर्दशीकी रात्रिमें वहाँ जागरण करना चाहिये। जागरण करनेसे मनुष्य सब दानों और यज्ञोंका फल पा लेता है।
वहाँसे उत्तर और ईशान दिशामें तीन धनुषकी दूरीपर अनिलेश्वरलिंग है, उनका बड़ा प्रभाव है। वह दर्शनमात्रसे सब पापोंका नाश करनेवाला है। पूर्वोक्त आठ वसुओंमेंसे अनिलने मेरी आराधना करके मेरा प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त किया और शिवलिंगकी स्थापना की। इससे उन्हें मनोजव नामक पुत्र प्राप्त हुआ। अनिलेश्वरका दर्शन करके मनुष्य कभी अन्धा, बहरा, गूँगा, रोगी और निर्धन नहीं होता। जो उस लिंगपर एक फूल भी चढ़ा देता है, वह सदा सुख-सौभाग्यसे सम्पन्न तथा रूपवान् होता है।
गौरी-तपोवनसे पश्चिम सात धनुषकी दूरीपर प्रभासेश्वर नामक महान् शिवलिंग है, जिसकी स्थापना शिवपूजनपरायण आठवें वसु प्रभासने की है। प्रभासने वहाँ सौ वर्षोंतक तपस्या की। इससे सन्तुष्ट होकर मैंने उन्हें मनोवांछित वर दिया। प्रभासके पुत्र विश्वकर्मा हुए। माघमासकी चतुर्दशीको समुद्रसंगममें स्नान करके मनुष्य भूमिशयन और उपवासका नियम ले शतरुद्रियका जप करे तथा पंचामृतसे प्रभासेश्वरको स्नान कराकर विधिपूर्वक
| १२७० | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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उनकी पूजा करे। यों करनेसे वह सब पापोंसे मुक्त और सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न होता है।
प्रभासेश्वरसे ईशानकोणमें साठ धनुषकी दूरीपर पुष्करारण्य है। वहीं ज्येष्ठपुष्कर नामक कुण्ड है। वह समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। पुण्यहीन पुरुषोंके लिये वह दुर्लभ है। पूर्वकालमें परम बुद्धिमान् श्रीरामने वहाँ रामेश्वरलिंगकी स्थापना की थी। उसकी पूजा करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है।
चौबीसवें त्रेतायुगकी बात है, पुरोहित वसिष्ठजीके द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ कराये जानेपर राजा दशरथके चार पुत्र हुए। उनमेंसे श्रीरामचन्द्रजी सीता और लक्ष्मणके साथ वनवासके लिये गये। उसी समय यात्रा-प्रसंगसे वे प्रभासक्षेत्रमें भी आये। ज्येष्ठपुष्करके समीप आकर वे विश्रामके लिये बैठे। सूर्यास्त हो जानेपर उन्होंने पृथ्वीपर पत्ते बिछाये और सो गये। कुछ रात बाकी रहनेपर स्वप्नमें उन्हें अपने पिता दशरथजीका दर्शन हुआ। प्रातःकाल उठकर उन्होंने ब्राह्मणोंसे यह सब बात कही।
तब ब्राह्मणोंने कहा—रघुनन्दन ! पितर आपका अभ्युदय चाहते हैं; जब वे वर देनेको उद्यत होते हैं, तभी स्वप्नमें अपने वंशजोंको दर्शन देते हैं। यह परम पुण्यमय स्थान भगवान् विष्णुका गुप्त तीर्थ है। प्रभासक्षेत्रमें इसकी पुष्कर नामसे प्रसिद्धि है। अतः यहाँ पितरोंका श्राद्ध कीजिये। निश्चय ही राजा दशरथ इस तीर्थमें आपके द्वारा दिया हुआ शुभ पिण्ड प्राप्त करना चाहते हैं। इसीलिये उन्होंने दर्शन दिया है।
उनकी बात सुनकर कमलनयन श्रीरामने श्राद्धके लिये ब्राह्मणोंको निमन्त्रित किया और लक्ष्मणजीसे कहा—'सुमित्रानन्दन ! तुम श्राद्धके लिये फल लेनेको जाओ।' 'बहुत अच्छा' कहकर लक्ष्मणजी गये और अनेक प्रकारके उत्तम फल ले आये। जानकीजीने उन फलोंको शीघ्र ही पकाकर तैयार किया। फिर कुतप काल (मध्याह्नके समय)-में नहा-धोकर पवित्र हो वल्कल धारण किये हुए श्रीरामचन्द्रजी श्राद्धके योग्य ब्राह्मणोंको बुला ले आये। गालव, देवल, रैभ्य, यवक्रीत, पर्वत, भारद्वाज, वसिष्ठ, जाबालि, गौतम, भृगु तथा अन्य बहुत-से वेदज्ञ ब्राह्मण श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा किये जानेवाले श्राद्धको सम्पन्न करनेके लिये आये। इसी समय श्रीरामचन्द्रजीने सीतासे कहा—'विदेहनन्दिनि ! आओ, ब्राह्मणोंके लिये पाद्य और अर्घ्य दो।' यह सुनकर सीताजी वृक्षोंके बीचमें चली गयीं और लताकुंजमें अपनेको छिपाकर श्रीरामचन्द्रजीकी दृष्टिसे ओझल हो गयीं। इधर श्रीरामचन्द्रजी 'सीते ! सीते !' कहकर पुकारने लगे। तब लक्ष्मणजीने ही ब्राह्मणोंको अर्घ्य देनेका कार्य किया। जब ब्राह्मणलोग भोजन कर चुके और पिण्डदानका कार्य समाप्त हो गया, तब जनकनन्दिनी सीता श्रीरामचन्द्रजीके पास आयीं। उन्हें देखकर श्रीरामने पूछा—'श्राद्धकाल उपस्थित होनेपर तुम मुझे छोड़कर कहाँ चली गयी थीं?'
सीताजीने हाथ जोड़कर कहा—प्रभो! आज मैंने आपके पिता, पितामह, प्रपितामह तथा मातामह आदिको भी देखा है। वे पृथक्-पृथक् ब्राह्मणोंके अंगोंमें स्थित थे। अतः उनके सामने जानेमें मुझे लज्जा हुई। श्वशुरवर्गको उपस्थित देखकर मैं लज्जासे ही छिप गयी थी।
यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने पुष्करके समीप ही वहाँसे एक धनुष दक्षिण हटकर रामेश्वरलिंगकी स्थापना की। जो मनुष्य गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक रामेश्वरका पूजन करता है, वह भगवान् विष्णुके उत्तम धाममें जाता है। शुक्ल अथवा मंगलयुक्त चतुर्थी तथा आश्विनमासकी षष्ठीको वहाँ श्राद्ध करनेसे महान् फल होता है। वहाँ पुष्करमें अपने वंशजोंद्वारा तर्पण किये जानेपर पितर और पितामह बारह वर्षोंतक तृप्त रहते हैं और दूसरी किसी भी वस्तुकी इच्छा नहीं करते।
- प्रभासखण्ड * १२७१
रामेश्वरसे तीस धनुष पूर्व दिशामें लक्ष्मणेश्वर-लिंग है। यात्रामें गये हुए लक्ष्मणजीने उस देवपूजित लिंगको स्थापित किया था। जो स्त्री या पुरुष विधिपूर्वक स्नान कराकर भक्तिभावसे लक्ष्मणेश्वरका पूजन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। रामेश्वरसे नैर्ऋत्यकोणमें जानकीश्वर-लिंग है। जो नारी माघमासकी तृतीयाको जानकीश्वरका पूजन करती है, उसके वंशमें दुर्भाग्य, दुःख और शोक नहीं होते।
तदनन्तर वामन स्वामीके नामसे प्रसिद्ध पापहारी विष्णुके समीप जाय। उनका स्थान पुष्करसे नैर्ऋत्यकोणमें बीस धनुषके अन्तरपर है। जिस समय उन्होंने दैत्यराज बलिको बाँधा था, उस समय पहला चरण वहीं (प्रभासक्षेत्रमें) रखा, दूसरा मेरु-शिखरपर रखा और तीसरा आकाशमें जब ऊपरकी ओर वे पैर बढ़ाने लगे तब उनके चरणोंके अग्रभागसे ब्रह्माण्ड फूट गया तथा वहाँसे जल निकल आया। वह जल उनके घुटनेके मार्गसे बहता हुआ इस पृथ्वीपर आया। वही इस पृथ्वीपर विष्णुपदी गंगाके नामसे प्रसिद्ध है। महानदी गंगा पहले प्रभासक्षेत्रके अन्तर्गत पुष्करमें ही आयी। जो मनुष्य विष्णुपदीमें स्नान करके भगवान्के चरणका दर्शन करता है, वह उनके परम धाममें जाता है। जो वहाँ ब्राह्मणको उपानह देता है वह श्रेष्ठ विमानपर चढ़कर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
वहाँसे दक्षिण जानकीश्वरके समीप परम उत्तम पुष्करेश्वरलिंग है, जिसकी पूजा ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार मुनिने सुवर्णमय कमलोंसे की है। वह सब पातकोंका नाश करनेवाला है। जो मनुष्य भक्तिसे गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा उनकी पूजा करता है, उसको पुष्करयात्राका फल मिलता है।
पुष्करसे वायव्यकोणमें तीस धनुषपर और भूतेश्वरसे नैर्ऋत्यकोणमें कुण्डेश्वरी देवीका स्थान है। वे देवी दरिद्रता और पापका नाश करनेवाली हैं। उनसे नैर्ऋत्यकोणमें पंद्रह धनुषकी दूरीपर शंखोदक कुण्ड है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है। जो पुरुष अथवा सदाचारिणी स्त्री शंखावर्ता नामसे विख्यात देवीकी पूजा करती है, उसके सब मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। कलियुगमें शंखावर्ता देवी कुण्डेश्वरी नामसे प्रसिद्ध हैं। प्राचीन कालमें भगवान् विष्णुने जब शंख नामक दैत्यको मारा, उस समय उसके शंखाकार शरीरको इसी तीर्थके जलसे धोकर पवित्र किया और मेघके समान गम्भीर ध्वनिवाले उस शंखको वहीं बजाया। उसके गम्भीर नादसे देवी वहाँ आयीं और कुण्डके समीप स्थित होकर कारण पूछने लगीं। इसीसे उनका नाम 'कुण्डेश्वरी' हुआ। जो स्त्री या पुरुष माघमासकी तृतीयाको कुण्डेश्वरी देवीका पूजन करता है, उसे गौरी-पदकी प्राप्ति होती है। यात्राके फलकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंको वहाँ ब्राह्मण-दम्पतिको भोजन कराना चाहिये।
कुण्डेश्वरीसे ईशानकोणमें बीस धनुषके अन्तरपर भूतनाथेश्वर शिव हैं। वह आदि-अन्तरहित लिंग कल्पपर्यन्त रहनेवाला है। पहले त्रेतायुगमें उसका नाम वीरभद्रेश्वर था। फिर कलियुगमें भूतेश्वर हुआ। जब द्वापर और कलियुगकी सन्धिक़ा समय चल रहा था, उस समय उस लिंगके प्रभावसे करोड़ों भूतप्राणी परमसिद्धि (मुक्ति)-को प्राप्त हुए थे। इसीसे भूतलपर वह 'भूतेश्वर' नामसे विख्यात हुआ। जो कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको रात्रिमें भूतेश्वर शिवका पूजन करके दक्षिण दिशामें जा जितेन्द्रिय, निर्भय एवं ध्यानपरायण होकर अघोरमन्त्रका जप करता है, उसको पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है। वहाँपर पितरोंकी प्रेतयोनिसे मुक्तिके लिये तिल, सुवर्ण और पिण्डका दान करना चाहिये।
$\sim\sim\circ\sim\sim$
१२७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
गोप्य़ादित्यकी स्थापना और महिमा तथा नीलसे हानि
भूतेशसे वायव्यकोणमें तीस धनुषकी दूरीपर गोप्यादित्यका स्थान है। पूर्वकालमें महातेजस्वी श्रीकृष्ण जब छप्पन कोटि यादवोंके सात प्रभासक्षेत्रमें आये, उस समय सोलह हजार गोपियाँ भी वहाँ आ गयीं। उनमेंसे जो सर्वश्रेष्ठ सोलह गोपियाँ बतायी गयी हैं, उनके नाम बताता हूँ; सुनो—लम्बिनी, चन्द्रिका, कान्ता, अक्रूरा, शान्ता, महोदया, भीषणी, नन्दिनी, अशोका, सुपर्णा, विमला, अक्षया, शुभदा, शोभना और पुण्या—ये हंस (श्रीकृष्णचन्द्र)-की कलाएँ मानी गयी हैं। परमात्मा श्रीकृष्ण ही हंस हैं और उनकी ये शक्तियाँ हैं। श्रीकृष्ण चन्द्रस्वरूप हैं और ये गोपियाँ उनकी कलाएँ हैं। उपर्युक्त पंद्रह कलाओंके सिवा, मालिनी उनकी सोलहवीं कला है। जो पुरुष इस प्रकार जानता है, उसे वैष्णव जानना चाहिये।
उन सोलह हजार गोपियोंने भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञा ले उस क्षेत्रमें निवास करनेवाले नारद आदि मुनियोंके सहयोगसे विधिपूर्वक भगवान् सूर्यकी स्थापना की और नाना प्रकारके दान दिये। महर्षियोंने वहाँ भगवान् सूर्यका नाम गोप्यादित्य रखा। इस प्रकार सूर्यदेवकी प्रतिष्ठा हो जानेपर वे सब गोपियाँ कृतार्थ हुईं और महान् यश पाकर श्रीकृष्णके साथ द्वारकाको गयीं। प्रभासक्षेत्रमें गोपियोंद्वारा स्थापित जो गोप्यादित्य हैं, उनका दर्शनमात्र करके मनुष्य दुःखशोकसे मुक्त हो जाता है। जो मानव माघमासकी सप्तमीको उपवास करके गोप्यादित्यकी पूजा करता है, वह अपने पितरोंको सात बार तृप्त कर लेता है। वह अपने समस्त रोगोंका नाश करता है और दुश्चेष्टापरायण दुर्जय शत्रुओंको भी जीत लेता है। सप्तमीको तैलका स्पर्श न करे, नीले रंगका वस्त्र न पहने, आँवला लगाकर स्नान न करे और कहीं किसीके साथ विवाद भी न करे। नीलके रँगे हुए वस्त्र धारण करके द्विज जो भी स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय तथा पितृतर्पण आदि कर्म करता है, वे तथा इसके पञ्च महायज्ञ भी उस नील सूत्रके कारण नष्ट हो जाते हैं। यदि ब्राह्मण नीलका रँगा वस्त्र अपने अंगोंमें धारण कर ले तो दिन-रात उपवास करके पंचगव्य पीनेसे शुद्ध होता है। यदि किसी ब्राह्मणके रोमकूपोंमें नीलके रसका (नीलमिश्रित जलका) प्रवेश हो जाय तो वह पतित हो जाता है और तीन कृच्छ्र-व्रत करनेपर उसकी शुद्धि होती है। यदि ब्राह्मण भूलसे भी नील-वृक्षोंके बीचसे निकल जाय तो वह दिन-रात उपवास करके पंचगव्य पीनेपर शुद्ध होता है। यदि ब्राह्मणके शरीरमें नीलकी लकड़ी गड़ जाय और रक्त दिखायी देने लगे तो उसे चान्द्रायण व्रत करना चाहिये। देवि! जो अनजानमें नीलका दाँतौन कर लेता है, वह दो बार कृच्छ्र-व्रत करनेपर उस पापसे शुद्ध होता है।*
पार्वती! कुरुजांगल (कुरुक्षेत्र)-में एक लाख गोदान करनेसे जो पुण्य होता है, वह सब गोप्यादित्यके दर्शनमात्रसे प्राप्त हो जाता है।
* नीलरक्तेन वस्त्रेण यत्कर्म कुरुते द्विजः। स्नानं दानं जपो होमः स्वाध्यायः पितृतर्पणम्॥
नश्यन्त्यस्य महायज्ञा नीलसूत्रस्य कारणात्। नीलरक्तं यदा वस्त्रं विप्रस्त्वङ्गेषु धारयेत्॥
अहोरात्रोषितो भूत्वा पञ्चगव्येन शुद्ध्यति। रोमकूपे यदा गच्छेदद्रसं नीलस्य कस्यचित्॥
पतितस्तु भवेद् विप्रस्त्रिभिः कृच्छ्रैर्विशुद्ध्यति। नीलमध्ये यदा गच्छेदप्रमादाद् ब्राह्मणः क्वचित्॥
अहोरात्रोषितो भूत्वा पञ्चगव्येन शुद्ध्यति। नीलदारु यदा भिन्द्याद् ब्राह्मणानां शरीरके॥
शोणितं दृश्यते चैव द्विजश्चान्द्रायणं चरेत्। कुर्यादज्ञानतो यस्तु नीलं वै दन्तधावनम्॥
कृत्वा कृच्छ्रद्वयं देवि तस्मात् पापाद् विशुद्ध्यति। (स्क० पु०, प्र० खं० ११५। ३१-३७)
| * प्रभासखण्ड * | १२७३ |
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रामेश्वर, चित्रांगदेश्वर तथा रावणेश्वरकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—तदनन्तर परशुरामजीके द्वारा स्थापित रामेश्वरलिंगका दर्शन करे। वह स्थान गोपीश्वरसे वायव्यकोणमें तीस धनुषकी दूरीपर है। जिस समय जमदग्निपुत्र परशुरामजीने पिताकी आज्ञासे अपनी माताका वध किया और पिताके अनुग्रहसे वह पुनः जीवित हो गयी, उस समय प्रभासक्षेत्रमें आकर उन्होंने अद्भुत तपस्या की। वे मेरे विग्रहकी स्थापना करके एक सौ पचास वर्षतक आराधनामें संलग्न रहे। इससे सन्तुष्ट होकर मैंने उन्हें मनोवांछित वर दिया और उनके द्वारा स्थापित शिवलिंगमें निवास किया। इससे महर्षि परशुराम कृतार्थ हुए। तदनन्तर भूमण्डलके सम्पूर्ण क्षत्रियोंका इक्कीस बार संहार करके वे माता-पिताके ऋणसे उऋण हुए। जो मनुष्य उनके द्वारा स्थापित शिवलिंगका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो मेरे धाममें जाता है।
रामेश्वरसे बीस धनुषके अन्तरपर नैर्ऋत्यकोणमें चित्रांगदेश्वरलिंग है। गन्धर्वोंके स्वामी चित्रांगदने उस क्षेत्रको परम पवित्र जानकर वहाँ शिवलिंग स्थापित किया और बड़ी भारी तपस्या करके मेरी आराधना की। जो पुरुष भाव-भक्तिसे युक्त हो उस लिंगकी पूजा करता है, वह गन्धर्वलोकमें जाता और गन्धर्वोंके साथ आनन्द भोगता है। शुक्लपक्षकी चतुर्दशीको जो विधिपूर्वक उस शिवलिंगको स्नान कराकर भाँति-भाँतिके पुष्प, चन्दन और धूप आदिके द्वारा उसकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण मनोवांछित फलको प्राप्त कर लेता है।
उस स्थानसे दक्षिण और नैर्ऋत्यमें सोलह धनुषके अन्तरपर रावणेश्वरलिंग है, जिसकी स्थापना रावणने की है। वहाँ उसने भक्तिपूर्वक उपवास करके मेरी आराधना की और गीत, वाद्य आदिका आयोजन करके जागरण किया। पंद्रह दिनोंतक इस प्रकार मेरी अर्चना करनेपर आकाशवाणी हुई—'महाबाहु दशग्रीव! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। मेरे प्रसादसे तीनों लोक तुम्हारे अधीन होंगे। मैं प्रतिदिन तुम्हारे द्वारा स्थापित शिवलिंगमें निवास करूँगा। राक्षसराज! जो मानव भक्तिपूर्वक रावणेश्वर लिंगकी पूजा करेंगे, वे शत्रुओंसे अजय होंगे। मेरी कृपासे उन्हें परमसिद्धि प्राप्त होगी।'
यों कहकर मेरी आकाशवाणी मौन हो गयी। रावणने भी सन्तुष्ट होकर बार-बार मेरा पूजन किया और तीनों लोकोंपर विजय पानेकी इच्छा रखकर वह पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो अभीष्ट स्थानको चला गया।
रावणेश्वरसे पश्चिम पाँच धनुष दूर सौभाग्यदायिनी गौरीका निवास है, जहाँपर सौभाग्यकी इच्छा रखनेवाली अरुन्धतीदेवीने गौरीजीकी आराधनामें तत्पर हो घोर तपस्या की थी। गौरीदेवीके प्रसादसे उन्हें उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई। जो माघ शुक्ला तृतीयाको भक्तिपूर्वक गौरीजीका पूजन करता है, वह सात जन्मोंतक सौभाग्यशाली होता है।
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पौलोमीश्वर, शाण्डिल्येश्वर, क्षेमेश्वर तथा सागरादित्यका माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—रावणेश्वरसे वायव्यकोणमें तीस धनुषकी दूरीपर पौलोमीश्वरलिंग है। उसकी स्थापना पुलोमपुत्री शचीने की थी। जिस समय तारकासुरने देवताओंका राज्य छीन लिया और स्वयं इन्द्रपदपर अधिकार जमा लिया तथा उसके भयसे व्याकुल इन्द्रदेव कहीं भाग गये, उस समय उनकी पत्नी शचीने शोकसे दुर्बल होकर मेरी आराधना की। इससे सन्तुष्ट होकर मैंने शचीसे कहा—'देवि! मेरा पुत्र तारकासुरका वध करेगा। तुम निश्चिन्त होकर जाओ। जो
| १२७४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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मानव इस पौलोमीश्वरलिंगका पूजन करेगा, वह मेरा पार्षद होकर मेरे समीप पहुँच जायगा।' यह सुनकर पतिव्रता इन्द्राणी देवराज इन्द्रके समीप चली गयीं।
ब्रह्माजीके स्थानसे पश्चिम सोलह धनुषके अन्तरपर शाण्डिल्येश्वरलिंग है। जिसके दर्शनमात्रसे सम्पूर्ण पापोंका नाश हो जाता है। ब्रह्मर्षि शाण्डिल्य ब्रह्माजीके सारथि माने गये हैं। वे तपस्वी महातेजस्वी, ज्ञाननिष्ठ और जितेन्द्रिय हैं। उन्होंने प्रभासक्षेत्रमें आकर बड़ी उग्र तपस्या की। सोमनाथके उत्तर एक महालिंग स्थापित करके उसकी सौ वर्षोंतक पूजा की। तत्पश्चात् मनोवांछित वस्तुको पाकर वे कृतकृत्य हो गये। मेरे प्रसादसे उन्हें अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त हुईं। शाण्डिल्येश्वर शिवका दर्शन करके मनुष्य तत्काल पापरहित हो जाता है।
शाण्डिल्येश्वरसे उत्तर और कपालेश्वरसे अग्निकोणमें पंद्रह धनुषपर सर्वपापनाशक क्षेमेश्वरलिंग है। राजा क्षेममूर्त्तिने भक्तिपूर्ण हृदयसे उसकी स्थापना की है। जो क्षेमेश्वरका दर्शन करता है, वह क्षेमको प्राप्त होता और उसका प्रत्येक कार्य क्षेमपूर्वक सिद्ध होता है।
पार्वती! वहाँसे परम उत्तम सागरादित्य दर्शन करनेके लिये जाना चाहिये। वह स्थान भैरवेश्वर तथा मृत्युंजय रुद्रसे पश्चिम और कामेश्वरलिंगसे दक्षिण एवं अग्निकोणमें थोड़ी ही दूरपर है। सूर्यवंशमें उत्पन्न महात्मा राजा सगरने प्रभासक्षेत्रको उत्तम तीर्थ जानकर वहीं भगवान् सूर्यकी स्थापना की और उसी स्थानपर तपस्या करके उन्होंने सूर्यदेवको प्रसन्न किया। दस हजार योजन विस्तृत और अठासी हजार योजन लम्बा समुद्र सगरके पुत्रोंकी ही कीर्ति है, इसीलिये उसका नाम सागर है। आज भी राजा सगरकी कीर्ति-कथा गायी जाती है और पुराणोंमें उनके सुयशकी गाथा प्रसिद्ध है। सागरादित्यका दर्शन करके मनुष्य जड, अन्ध, दरिद्र और दुःखी नहीं होता। उसे प्रियजनोंसे वियोग तथा रोग भी नहीं होते और वह कभी पापका आचरण नहीं करता। माघमासके शुक्लपक्षमें षष्ठी तिथिको उपवास करके जितेन्द्रिय मनुष्य रातमें उनके आगे शयन करे। फिर सप्तमीको सबेरे उठकर भक्तिभावसे सूर्यदेवकी पूजा करे और ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक भोजन कराये। यों करनेवाले मानव सूर्यनारायणके भक्तोंको प्राप्त होनेवाली उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं। जो पुरुष दूर्वाके अंकुरोंसे भी भक्तिपूर्वक सूर्यदेवकी पूजा करते हैं, उन्हें वे सब यज्ञोंसे भी दुर्लभ फल देते हैं; इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके सूर्यनारायणकी आराधना करनी चाहिये। वे सबके आत्मा, समस्त लोकोंके स्वामी, देवताओंके भी देवता और प्रजाजनोंके पालक हैं। सूर्यदेव ही त्रिलोकीके मूल कारण तथा परम देवता हैं। जितेन्द्रिय मनुष्यको चाहिये कि वह विधिसे भगवान् सूर्यकी पूजा करके समस्त पातकोंका नाश करनेवाले इस स्तोत्रका पाठ करे। इस स्तोत्रमें सूर्यदेवके गुह्य, पवित्र एवं शुभ नाम हैं। विकर्तन, विवस्वान्, मार्तण्ड, भास्कर, रवि, लोकप्रकाशक, श्रीमान्, लोकचक्षु, ग्रहेश्वर, लोकसाक्षी, त्रिलोकेश्वर, कर्ता, हर्ता, तमिस्रहा, तपन, तापन, शुचि, सप्ताश्ववाहन, गभस्तिहस्त, ब्रह्मा तथा सर्वदेवनमस्कृत—इस प्रकार इक्कीस नामोंका जो स्तोत्र है, इससे सन्तुष्ट होकर भगवान् सूर्य शरीरको आरोग्य देते हैं, धन बढ़ाते हैं तथा यशकी प्राप्ति कराते हैं। जो सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों सन्ध्याओंके समय पवित्र होकर इससे सूर्यदेवकी स्तुति करता है अथवा जो इसे सुनता तथा पढ़ता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और अन्तमें सूर्यलोकको प्राप्त होता है।
* प्रभासखण्ड * १२७५
अक्षमालेश्वर, पाशुपतेश्वर, ध्रुवेश्वर तथा सिद्धि लक्ष्मीकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—सागरादित्यसे ईशानकोणमें पचास धनुषके अन्तरपर अक्षमालेश्वरलिंग है, जो दर्शन और स्पर्श करनेसे सब प्राणियोंके पापका नाश करनेवाला है। भादोंमें ऋषिपंचमीको अक्षमालेश्वरके समीप जाकर मनुष्य नरकके भयसे मुक्त हो जाता है। वहाँ गोदान, अन्नदान और जलदानको श्रेष्ठ बताया गया है। उक्त दान करनेसे मनुष्योंके सब पापोंका नाश होता है तथा परलोकमें उन्हें अनन्त सुखकी प्राप्ति होती है।
उग्रसेनेश्वरसे पूर्वभागमें तथा गोप्यादित्यसे अग्निकोणमें कुछ दक्षिणकी ओर पाशुपतेश्वरलिंग विद्यमान है, जो दर्शनमात्रसे समस्त पापोंका नाशक और सम्पूर्ण अभीष्ट फलोंको देनेवाला है। इस युगमें उसका सन्तोषेश्वर नाम कहा गया है। वह सम्पूर्ण सिद्धियोंका स्थान, शिवभक्तोंका आश्रय तथा पाप-रोगोंका औषध है। पार्वती! पाशुपतेश्वरलिंगके समीप वामदेव, सावणि, अघोर तथा कपिल—ये चार महर्षि सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं। उस शिवलिंगके समीप श्रीमुख नामका एक वन है, जो लक्ष्मी देवीका स्थान है। वहाँ योगी और सिद्ध पुरुष निवास करते हैं। वहाँ उत्तम शिवभक्तोंका वास है। प्रभासक्षेत्रमें वह मन्दिर मुझे सदैव रुचिकर है। उसमें सदा ही मेरा निवास रहता है। वहाँ जो शिवभक्त मेरे ध्यानमें संलग्न रहते हैं, वे सब मेरे पुत्र हैं और पवित्र होकर उत्तम सिद्धिको प्राप्त होते हैं। यह पाशुपतेश्वरलिंग परब्रह्मस्वरूप है। इसका एक नाम अनादीश्वर भी है। यहाँ निवास करनेवाले ब्राह्मणोंको सिद्धि और मुक्ति भी प्राप्त होती है और इसी शरीरसे वे छः महीनेमें सिद्ध हो जाते हैं। इस लिंगका प्राकट्य संसार-बन्धनसे छुटकारा दिलानेके लिये हुआ है। यह सब लोगोंके लिये दुर्लभ मोक्ष एवं परमपद है। इस लिंगमें शिवतत्त्वका सम्पूर्ण ज्ञान प्रतिष्ठित है। जो माघमासमें निरन्तर भक्तिपूर्वक इनकी पूजा करता है, वह सब यज्ञों और दानोंका फल पाता है। 'अग्निः' इत्यादि मन्त्रसे वहाँ भस्म लेकर अपने अंगोंमें लगानी चाहिये। यदि संचित अग्निमेंसे भस्म लेनी हो तो उस घरके निवासियोंसे लेनी चाहिये। पूरा मन्त्र इस प्रकार है—
अग्निरिति भस्म, वायुरिति भस्म, जलमिति भस्म, स्थलमिति भस्म, सर्वं ह वा इदं भस्माभवत्।
'अग्नि, वायु, जल और स्थल—सभी भस्म हैं। यह जो कुछ भी दिखायी देता है, सबको भस्म होना है।'
जिसने शिवकी दीक्षा नहीं ली है, वह इस शिवलिंगका स्पर्श न करे। ब्राह्मणोंसे भस्म लेनी चाहिये, शूद्रोंसे नहीं। शूद्रोंका पाशुपत-व्रतमें अधिकार नहीं है। मैं प्रत्येक युगमें ब्राह्मणोंका शरीर धारण करके प्रकट होता हूँ।
राजा उत्तानपादके ध्रुव नामका एक पुत्र था, जो महात्मा, ज्ञानी, सर्वज्ञ तथा प्रियदर्शन था। उसने एक समय प्रभासक्षेत्रमें आकर सहस्रों वर्षोंतक बड़ी कठोर तपस्या की। वह शिवलिंगकी स्थापना करके प्रतिदिन भक्तिपूर्वक उसकी पूजा तथा स्तुति करता था। वह स्तुति इस प्रकार है—
ध्रुव बोले—जो सच्चिदानन्दस्वरूप तथा समस्त कारणोंके भी कारण हैं, उन भगवान् महेश्वरको नमस्कार है। भयंकर संसार-सागरसे पार होनेके लिये सुदृढ़ सेतु हैं, केवल ध्यानके द्वारा जिनका कुछ चिन्तन किया जाता है तथा जो सम्पूर्ण योगशक्तियोंसे युक्त हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। सिद्ध और चारण जिसके स्वच्छ सलिलका सेवन करते हैं, जो बड़ी-बड़ी लहरोंके कारण अत्यन्त भयंकर जान पड़ती है, आकाशसे वेगपूर्वक गिरती हुई उस गंगाको जिन्होंने चंचल फूलोंकी मालाके समान अपने मस्तकपर धारण
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कर लिया, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जिन्होंने दैत्य, दानव, विद्याधर तथा नागगणोंको भी, जो इस पृथ्वीपर फल-मूलका आहार करते हुए तपस्यामें संलग्न रहे हैं, अपने परमपदकी प्राप्ति करायी है, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। यह सम्पूर्ण जगत् सदा जिनके अधीन रहता है, जो अपनी आठ मूर्तियोंद्वारा समस्त लोकोंका पालन करते हैं तथा जो परम कारण-तत्त्वोंके भी कारण हैं, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जिन वरदायक परमेश्वरके चरणोंमें भक्तिपूर्वक प्रणाम करके तथा अमृतमयी वाणीसे जिनकी स्तुति करके उत्तम हृदयवाले भगवान् सूर्य अपनी दिव्य दीप्ति तथा किरणोंके द्वारा जगत्का अन्धकार दूर करते हैं, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ।
जो मनुष्य अपने मनको वशमें रखकर साक्षात् ध्रुवजीके द्वारा रचित इस रुचिर अर्थवाले स्तोत्रका पाठ करता है, वह कभी मोहमें नहीं पड़ता। उसके कर्म सदैव शुद्ध और पवित्र होते हैं तथा वह अनादिसिद्ध शिवलोकमें जाता है। पार्वती! शुद्ध चित्तवाले महात्मा ध्रुवके इस प्रकार स्तुति करनेपर मैं बहुत प्रसन्न हुआ और इस प्रकार बोला—‘वत्स ध्रुव! तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुमसे बहुत सन्तुष्ट हूँ। अब तुम परम शुद्ध हो गये। मैं तुम्हें दिव्यदृष्टि देता हूँ। तुम मुझे प्रत्यक्ष देखो।’
ध्रुवजीने कहा—देव! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे निर्मल भक्ति दीजिये और इस शिवलिंगमें सदा निवास कीजिये।
मैंने कहा—ध्रुव! तुमने जो माँगा है, वह सब मैंने तुम्हें दे दिया; साथ ही तुम्हें वह ध्रुव स्थान भी दिया, जिसे भगवान् विष्णुका परम पद कहते हैं। जो श्रावणकी अमावास्या तथा आश्विनकी पूर्णिमाको ध्रुवेश्वरकी पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है।
सोमेश्वरसे ईशानकोणमें थोड़ी ही दूरपर क्षेत्रपीठकी अधिष्ठात्री देवी वैष्णवी शक्ति है, जो सिद्धलक्ष्मीके नामसे विख्यात है। ब्रह्माण्डमें यह पहला पीठ है। इस पीठमें निवास करनेवाली भगवती महालक्ष्मी समस्त पापोंका नाश करनेवाली तथा सम्पूर्ण अभीष्ट फलों और शुभको देनेवाली हैं। जो मनुष्य श्रीपंचमीके दिन गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक इनकी पूजा करता है, उसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। तृतीया, अष्टमी तथा चतुर्दशीको जो विधिपूर्वक लक्ष्मीदेवीकी पूजा करता है, उसके हाथमें सिद्धि आ जाती है।
महाकाली देवी, पुष्करावर्तका नदी, कंकालभैरव तथा चित्रादित्यकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—वहीं पातालविवरसे युक्त एक महापीठ है, जहाँ महाकाली देवी निवास करती हैं। वे सब दुःखोंकी शान्ति तथा समस्त शत्रुओंका नाश करनेवाली हैं कृष्णपक्षकी अष्टमीको आधी रातमें गन्ध-पुष्प आदि उपचारोंसे विधिपूर्वक पूजा करनेपर वे समस्त दुःखोंका निवारण करती हैं। जो स्त्री शुद्धचित्त होकर एक वर्षतक प्रत्येक शुक्लपक्षकी तृतीयाको विधिपूर्वक देवीकी पूजा करती है, वह सात जन्मोंतक क्षुधा, दुर्भाग्य और दीनताका कष्ट नहीं भोगती।
ब्रह्मकुण्डसे उत्तरमें थोड़ी ही दूरपर पुष्करावर्तका नदी है। पूर्वकालमें जब महात्मा सोमका यज्ञ प्रारम्भ हुआ, उस समय उनका निमन्त्रण पाकर सोमनाथकी प्रतिष्ठा करानेके लिये सब देवताओंके साथ ब्रह्माजी भी प्रभासक्षेत्रमें आये और इस प्रकार बोले—‘मैं जबतक यहाँ रहूँ तबतक त्रिपुष्कर तीर्थमें ही मुझे तीनों समयोंकी सन्ध्या करनी चाहिये।’ इसी समय जब लग्नकाल
- प्रभासखण्ड * १२७७
उपस्थित हुआ, तब वेदचिन्तक ब्राह्मणोंने बताया, यही प्रतिष्ठाके लिये सबसे उत्तम समय है। उस समय ब्रह्माजीको पुष्कर तीर्थकी ओर प्रस्थान करते देख निशानाथ चन्द्रमाने कहा—'भगवन्! ज्योतिषियोंने प्रतिष्ठाके लिये यही शुभ मुहूर्त बताया है। यह मुहूर्त बीतने न पाये, इसका ध्यान रखना चाहिये।' तब ब्रह्माजीने मन-ही-मन पुष्कर तीर्थोंका चिन्तन किया। उनके स्मरण करते ही वे तीनों नदीके तटपर प्रकट हुए। उस समय नदीमें ज्येष्ठ, मध्य और कनिष्ठ—तीन भँवरें उठीं। उन तीनों आवर्तोंको देखकर लोकपितामह ब्रह्माजीने कहा—'आजसे यह सुन्दर नदी पुष्करावर्तका नामसे प्रसिद्ध होगी। जो मनुष्य इसमें स्नान करके भक्तिपूर्वक पितरोंका तर्पण करेगा, उसे तीनों पुष्करमें स्नानके समान पुण्य प्राप्त होगा। जो मानव श्रावण शुक्ला तृतीयाको उसमें पितरोंका तर्पण करता है, उसके वे पितर दस हजार कल्पोंतक तृप्त रहते हैं।'
वहीं कंकालभैरव नामक क्षेत्रपाल हैं, जिन्हें उस क्षेत्रकी रक्षाके लिये भैरवजीने नियुक्त किया है। जो श्रावण शुक्ला पंचमी तथा आश्विन शुक्ला अष्टमीको कंकालभैरवका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, उस महात्माके उस क्षेत्रमें निवासके लिये वे सब विघ्नोंका निवारण करते हैं और उसकी पुत्रकी भाँति रक्षा करते हैं। उस स्थानके दक्षिण भागमें ब्रह्मकुण्डके समीप दरिद्रताका नाश करनेवाले चित्रादित्य विराजमान हैं। प्राचीनकालमें इस पृथ्वीपर मित्र नामके एक धर्मात्मा कायस्थ निवास करते थे, जो सदा सब प्राणियोंके हितमें तत्पर रहते थे। उनके दो सन्तानें हुईं—एक पुत्र और एक कन्या। पुत्रका नाम चित्र और कन्याका नाम चित्रा हुआ। चित्रा बड़ी सुन्दरी और सुशीला थी। इन दोनोंके जन्म लेते ही उनके पिता मित्रकी मृत्यु हो गयी। मित्रकी पत्नीने पतिके साथ चितामें प्रवेश किया। तदनन्तर इन दोनों अनाथ बालकोंका ऋषियोंने पालन किया। वे महान् वनमें ही बड़े हुए और बचपनसे ही व्रतपरायण रहे। एक बार प्रभासक्षेत्रमें आकर उन दोनोंने महादेव सूर्यकी स्थापना की और वे बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न हो गये। धर्मात्मा चित्रने धूप, माला, चन्दन आदि उपचारोंसे सूर्यदेवका पूजन किया और वसिष्ठजीके द्वारा बताये हुए अड़सठ नामोंद्वारा उनका स्तवन किया।
**चित्र बोले—**जो आदिदेव जगन्नाथ पापनाशक तथा रोग-निवारण करनेवाले हैं, उन आकाशके स्वामी भगवान् भास्करको मैं सिरसे प्रणाम करके उनकी स्तुति करता हूँ। उनके सहस्रों नेत्र, सहस्रों रश्मियाँ तथा सहस्रों किरणमय आयुध हैं। अनेक गुह्य नामोंद्वारा उनका स्तवन किया जाता है। उन प्रातःकाल गंगासागर-संगमपर निवास करनेवाले मुण्डीर स्वामीको मैं नमस्कार करता हूँ। मध्याह्नकालमें यमुनातटवर्ती भगवान् कालप्रियको और सूर्यास्तके समय चन्द्रभागा नदीके तटपर विराजमान श्रीमूलस्थानको मैं प्रणाम करता हूँ, जहाँ उपवास करके श्रीसाम्बजीको स्वतः सिद्धि प्राप्त हुई है। काशीमें लोहिताक्ष, गोभिलाक्षमें बृहन्मुख, प्रयागमें प्रतिष्ठान, महाद्युतिमें वृद्धादित्य, कोट्यक्षमें द्वादशादित्य, चतुर्घटमें गंगादित्य, नैमिषारण्यमें गोलस्थ, भद्रपुटमें भद्र, जयामें विजयादित्य, प्रभासमें स्वर्णवेतस, कुरुक्षेत्रमें सामन्त, इलावृतमें त्रिमन्त्र, महेन्द्रमें क्रमणादित्य, हिरण्यमें सिद्धेश्वर, कौशाम्बीमें पद्मबोध, ब्रह्मबाहुमें दिवाकर, केदारमें चण्डकान्ति, नित्यमें तिमिरापह, गंगामार्गमें हरद्वार, भूप्रदीपनमें आदित्य, सरस्वती-तटपर हंस, पृथूदकमें विश्वामित्र, उज्जयिनीमें नरद्वीप, सिद्धापुरीमें अमितद्युति, कुन्तीकुमारमें सूर्य, पंचनदीमें विभावसु, मथुरामें विमलादित्य, संज्ञिकमें संज्ञादित्य, श्रीकण्ठमें मार्तण्ड, दशार्णमें दण्डक, गोधनमें गोपति, मरुस्थलमें कर्णदेव, देवपुरमें पुष्प, लोहितमें केशवादित्य, वैदिशमें शार्दूल, शोणमें अरुणवासी, वर्द्धमानमें साम्बादित्य, कामरूपमें शुभंकर, कान्यकुब्जमें मिहिर, पुण्यवर्द्धनमें मन्दार, गान्धारमें क्षोभणादित्य, लंकामें अमरद्युति, चम्पामें कर्णादित्य, प्रबोधमें शुभदर्शी, द्वारावतीमें
१२७८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
पार्वत्य, हिमवन्तमें हिमापह, लौहित्यमें महातेज, अमलांगमें धूर्जटि, रोहिकमें कुमार, पद्ममें पद्मसम्भव, लाटामें धर्मादित्य, अर्बुदमें स्थविर, कौवेरीमें सुखप्रद, कोसलमें गोपति, कोंकणमें पद्मदेव, विन्ध्यपर्वतपर तापन, काश्मीरमें त्वष्टा, चरित्रमें रत्नसम्भव, पुष्करमें हेमगर्भ, गभस्तिकमें सूर्य, प्रकाशामें मुज्जाल, तीर्थग्राममें प्रभाकर, काम्पिल्यमें इल्लकादित्य, धन्यकमें धन्यवासी, नर्मदा-तटपर अनल तथा सर्वत्र गगनाधिप नामसे प्रसिद्ध सूर्यदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। ये भगवान् भास्करके अड़सठ नाम हैं। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर पवित्र हो भक्तिभावसे इन नामोंको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
महादेवजी कहते हैं—शुद्धचित्तवाले चित्रके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् सूर्यने प्रसन्न होकर कहा—'वत्स! तुम्हारा भला हो। तुम कोई वर माँगो।'
चित्रने कहा—उष्णरश्मे! सब कार्योंमें मेरी रुचि हो और मुझे कुशलता प्राप्त हो।
'एवमस्तु' कहकर भगवान् सूर्यने उनकी इच्छाका अनुमोदन किया। तबसे चित्र सर्वार्थ-कुशल हुए। धर्मराजको जब यह बात मालूम हुई, तब उन्होंने सोचा, यदि यह मेरा लेखक हो जाता तो बड़ा अच्छा होता। एक दिन चित्र क्षारसमुद्रके भीतर अग्नितीर्थमें स्नान करनेके लिये गये। उसमें प्रवेश करते ही यमदूत उन्हें शरीरसहित यमपुरी उठा ले गये। वहाँ वे चित्रगुप्त नामसे प्रसिद्ध हुए। चित्रगुप्तजी सम्पूर्ण विश्वके शुभाशुभ चरित्रोंको लिखते रहते हैं। इसीलिये उनके द्वारा स्थापित सूर्यदेवका नाम चित्रादित्य हुआ। जो मनुष्य सप्तमीको उपवास करके उनकी पूजा करता है, उसे सात जन्मोंतक दरिद्रता और दुःखोंकी प्राप्ति नहीं होती।
## लोमशेश्वर, चित्रपथा नदी, रूपकुण्ड, रत्नेश्वर तथा वैनतेयेश्वरका माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—वहाँसे लोमशेश्वरका दर्शन करनेके लिये जाय। वह स्थान दुःखान्धकारिणीसे पूर्व भागमें सात धनुषकी दूरीपर है। महर्षि लोमशने उस लिंगकी स्थापना की है। लोमशेश्वरके प्रसादसे ही लोमशजी दीर्घायु हुए। जो भक्तिभावसे लोमशेश्वरकी पूजा करता है, वह दीर्घायु और सुखी होता है। उसके शरीरमें रोग और घाव नहीं होते। लोमशेश्वरके पश्चिमभागमें पाँच धनुषके अन्तरपर तृणविन्द्वीश्वर लिंग प्रतिष्ठित है। मुनीश्वर तृणविन्दु एक-एक मासपर कुशके अग्रभागसे एक विन्दुजल लेकर पीते और तपस्या करते थे। इस प्रकार अनेक वर्षोंतक प्रभासक्षेत्रमें मेरी आराधना करके वे परम सिद्धिको प्राप्त हो गये।
वहाँसे परम उत्तम चित्रपथा नदीके समीप जाय। वह ब्रह्मकुण्ड और चित्रादित्यके बीचमें होकर बहती है। जिस समय यमदूत चित्रको शरीरसहित उठा ले गये, उस समय यह समाचार पाकर उनकी बहिन चित्राको बड़ा दुःख हुआ। तब वह चित्रा नदीके रूपमें परिणत हो अपने भाईकी खोज करनेके लिये समुद्रमें समा गयी। ब्राह्मणोंने उसका नाम चित्रपथा रख दिया। जो मनुष्य चित्रपथामें स्नान करके चित्रादित्यका दर्शन करता है, वह सूर्यदेवके परमधाममें जाता है। कलियुगमें चित्रपथा नदी अन्तर्धान हो गयी है। केवल वर्षाकालमें उसका दर्शन होता है। भोजन करके या बिना भोजन किये, रातमें या दिनमें, पर्वके समय अथवा बिना पर्वके, मनुष्य पवित्र हो या अपवित्र—जब, जहाँ, जिस अवस्थामें चित्रपथा नदीका दर्शन करे, वही उसका पुण्यकाल है। उसका दर्शन ही पुण्यपर्व है। कोई समयविशेष उसकी महत्ताका कारण नहीं होता। स्वर्गवासी पितर उस नदीका दर्शन करके हर्षसे गाने और हँसने लगते हैं कि 'हमारे वंशका कोई यहाँ
* प्रभासखण्ड * । १२७९
आकर श्राद्ध करेगा और हमें एक कल्पतकके लिये तृप्त कर देगा।' यों जानकर सब पापोंके नाश और पितरोंकी तृप्तिके लिये वहाँ स्नान और श्राद्ध करना चाहिये।
महादेवी! ब्रह्मकुण्डके उत्तरभागमें रूपकुण्ड है। वहाँ स्नान करके मनुष्य चोरीके पापसे छूट जाता है। उसमें स्नान करनेके प्रभावसे उसके वंशमें सात जन्मोंतक कोई चोर और क्रूर नहीं होता। जो शस्त्रसे मारे गये हों अथवा पापी रहे हों, ऐसे पूर्वजोंकी मुक्तिके लिये वहाँ शिवरात्रिको विशेषरूपसे पिण्डदान आदि कार्य करने चाहिये।
वहीं उत्तम रत्नेश्वरलिंग है, जिसकी स्थापना साक्षात् भगवान् विष्णुने की है। जो रत्नकुण्डमें स्नान करके रत्नेश्वरकी पूजा करता है, वह सात जन्मोंतक लक्ष्मीवान्, बुद्धिमान् तथा गाय, बैल आदि पशुओंसे सम्पन्न होता है। जो श्रवण नक्षत्र और द्वादशीके योगमें विधिवत् उपवास करके भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह मनोवांछित फलको पाता है। पार्वती! वह स्थान मुझे विशेष प्रिय है। मैं वहाँ सदा निवास करता हूँ और प्रलयकालमें भी उसका त्याग नहीं करता। वह सुदर्शन नामक वैष्णव क्षेत्र कहा गया है। उसका विस्तार सब ओर छत्तीस-छत्तीस धनुषतक है। इस सीमाके भीतर जो कोई अधम प्राणी भी कालवश मृत्युको प्राप्त होते हैं, उन्हें परमपदकी प्राप्ति होती है। जो लोग वहाँ भगवान् विष्णुकी प्रीतिके लिये सोनेका गरुड़ और पीताम्बर दान करते हैं, उन्हें यात्राका उत्तम फल प्राप्त होता है।
रत्नेश्वरसे उत्तरमें तीन धनुष दूर विनतानन्दन गरुड़के द्वारा स्थापित वैनतेयेश्वर लिंग है। जो मनुष्य पंचमीके दिन भक्तिपूर्वक गरुड़ेश्वरकी पूजा करता है, उसे सात जन्मोंतक सर्पजनित विषका भय नहीं प्राप्त होता। जो वैनतेयेश्वरको पंचामृतसे स्नान कराकर विधिवत् उनका पूजन करता है, वह स्वर्गलोकमें आनन्द भोगता है।
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रैवन्त और अनन्तेश्वरकी महिमा, सावित्रीकी कथा, सावित्री-व्रतकी महिमा तथा ब्रह्मा-सावित्रीके पूजनका महत्त्व
महादेवजी कहते हैं—महादेवि! तदनन्तर सावित्रीसे नैर्ऋत्यकोणमें स्थित अश्वारूढ़ राजभट्टारक रैवन्तकका दर्शन करनेके लिये जाय। उनके दर्शनसे मनुष्य सब आपत्तियोंसे छूट जाता है। जो रविवारयुक्त सप्तमी तिथिमें उनकी पूजा करता है, उसके वंशमें कोई भी मनुष्य दरिद्र नहीं होता; इसलिये यत्नपूर्वक उन्हींकी पूजा करे।
उससे दक्षिण अनन्तद्वारा स्थापित अनन्तेश्वर लिंग है। वह स्थान लक्ष्मणेश्वरसे पूर्व दिशामें है। वह सब पापोंका नाशक और बड़े भारी विषका विनाशक है। सिद्ध और गन्धर्व ही उसकी पूजा करते हैं। वह उपासकको मनोवांछित फल देनेवाला है। विशेषतः कृष्णपक्षकी अष्टमीमें जो अनन्तेश्वरकी पूजा करता है, वह घोर पातकोंसे मुक्त होकर नागलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
पार्वती! मद्रदेशमें अश्वपति नामसे प्रसिद्ध एक धर्मात्मा राजा थे, जो सब प्राणियोंके हितमें तत्पर, क्षमावान्, सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय थे। परंतु उनके कोई सन्तान नहीं थी। एक समय राजा अश्वपतिने प्रभासक्षेत्रकी यात्रा की। यहाँके तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए वे सावित्रीस्थलपर आये। वहाँ उन्होंने सावित्री-व्रतका अनुष्ठान किया। इससे उनके ऊपर ब्रह्माजीकी प्रिय पत्नी भूर्भुवःस्वःस्वरूपा सावित्री देवी प्रसन्न हुईं और मूर्तिमती होकर उनके नेत्रोंके समक्ष प्रकट हुईं। उनके हाथमें कमण्डलु शोभा पा रहा था और मुख एवं नेत्र प्रसन्नतासे खिले हुए थे।
सावित्री बोलीं— राजन्! वर माँगो।
१२८० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
राजाने कहा—देवि! मुझे संतान दो।
सावित्री बोलीं—राजन्! तुम्हें एक पुत्री प्राप्त होगी।
इतना कहकर सावित्रीदेवी अन्तर्धान हो गयीं। तदनन्तर कुछ कालके बाद राजा अश्वपतिके यहाँ एक दिव्यरूपधारिणी कन्या उत्पन्न हुई। सावित्रीकी पूजासे सावित्रीने ही प्रसन्न होकर वह कन्या दी थी, इसलिये ब्राह्मणोंने उसका नाम सावित्री रख दिया। वह राजकन्या मूर्तिमती लक्ष्मीकी भाँति बढ़ने लगी। उसे देखकर लोग यही कहते थे कि यह कोई देवकन्या ही पृथ्वीपर उतर आयी है। एक दिन उस देवरूपिणी कन्याको देखकर मन्त्रियोंसे परामर्श करके राजाने कहा—'बेटी! तुम्हारे विवाहका समय आ पहुँचा है, परंतु अबतक तुम्हारा किसीने वरण नहीं किया। मैं जब विचार करके देखता हूँ, तब यहाँ तुम्हारे योग्य कोई वर नहीं दिखायी देता। अतः देवता आदिके द्वारा मैं निन्दनीय न होऊँ, ऐसा कोई प्रयत्न करना आवश्यक है। मैंने धर्मशास्त्रोंमें यह बात सुनी है कि जो कन्या पिताके घरमें विवाह संस्कारके पहले ही अपनेको रजस्वला देखती है, उसके पिताको ब्रह्महत्याका पाप लगता है। अतः मैं तुम्हें बूढ़े मन्त्रियोंके साथ तीर्थयात्राके लिये भेजता हूँ, तुम स्वयं पतिका वरण करो।'
'जो आज्ञा' कहकर सावित्रीने पिताकी बात मान ली और यात्राके लिये निकली। वह राजर्षियोंके सुन्दर तपोवनोंमें गयी। वृद्ध महर्षियोंके चरणोंमें मस्तक झुकाया और समस्त आश्रमों एवं तीर्थोंमें घूम-फिरकर पुनः घरपर लौट आयी। वहाँ उसने अपने सामने आसनपर विराजमान देवर्षि नारदको देखा और प्रणाम करके पितासे कहा—'शास्वदेशमें एक धर्मात्मा क्षत्रिय राज्य करते थे। उनका नाम द्युमत्सेन है। वे दैववश अन्धे हो गये। उनका सामन्त रुक्मी पहलेसे ही उनसे वैर रखता था। उसने यह अवसर देखकर राजाका राज्य छीन लिया। राजा द्युमत्सेन अपनी पत्नीके साथ वनमें चले गये। उनकी पत्नीकी गोदमें एक छोटा-सा बालक भी था। राजाका वह पुत्र वनमें ही बड़ा हुआ है। वह परम धर्मात्मा है। उसका नाम सत्यवान् है। सत्यवान् ही मेरे मनके अनुरूप पति है। मैं उन्हींको प्राप्त करना चाहती हूँ।'
नारदजीने कहा—राजन्! सावित्री अभी बच्ची है, तभी इसने गुणवान् सत्यवान्का वरण किया है। उसके पिता सत्य बोलते हैं। उसकी माता सत्य भाषण करती है और वह स्वयं भी सत्य बोलता है। इसीलिये मुनियोंने उस राजकुमारका नाम सत्यवान् रखा है। सत्यवान्को अश्व बड़े प्रिय हैं। वह मिट्टीके अश्व बनाया करता है और अश्वके ही चित्र भी बनाता है, अतः उसका दूसरा नाम चित्राश्व है; किंतु उसे स्वीकार करके सावित्रीने बहुत बड़ा कष्ट मोल ले लिया है। द्युमत्सेनका वह पुत्र शिक्षा, दान और गुणोंमें देवताओंके समान है। उशीनरराज शिबिके समान सत्यवादी और ब्राह्मणभक्त है। ययातिके समान उदार, चन्द्रमाके समान सुन्दर, अश्विनीकुमारोंके समान रूपवान् तथा अतिशय बलवान् है। परंतु उसमें एक दोष है। आजसे एक वर्ष पूर्ण होनेपर उसकी आयु समाप्त हो जायगी और वह अपना शरीर त्याग देगा।
नारदजीकी यह बात सुनकर राजाने कन्यासे कहा—बेटी सावित्री! जाओ, किसी दूसरे श्रेष्ठ पतिका वरण करो। यह सत्यवान् तो एक ही वर्षमें शरीर त्याग देगा।
सावित्री बोली—पिताजी! राजालोग एक बार ही कोई बात कहते हैं। विद्वान् पुरुष भी एक ही बोली बोलते हैं और कन्याओंका दान भी एक ही बार किया जाता है। ये तीनों बातें एक-एक बार ही होती हैं। सत्यवान् दीर्घायु हों या अल्पायु, गुणवान् हों या गुणहीन—उन्हें एक बार मैंने वरण कर लिया, अब वे मेरे पति हो गये; अतः दूसरे किसीका वरण नहीं करूँगी। पहले मनसे निश्चय करके ही वाणीद्वारा किसी बातको
- प्रभासखण्ड * १२८१
कहा जाता है और फिर उसे कार्यरूपमें परिणत किया जाता है। मैंने भी यही किया है। इस विषयमें मेरा मन ही प्रमाण है।
नारदजीने कहा—राजन्! यदि सावित्रीकी यही इच्छा है तो आप भी इस सम्बन्धको स्वीकार करें और शीघ्र ही इसे कर डालें। आपकी पुत्रीके विवाहमें कोई विघ्न नहीं पड़ना चाहिये।
यों कहकर नारदजी स्वर्गको चले गये। राजाने उत्तम मुहूर्तमें वेदोंके पारगामी ब्राह्मणोंके द्वारा कन्याका सब वैवाहिक कार्य सम्पन्न कराया। सावित्री भी मनोवांछित पतिको पाकर बहुत प्रसन्न हुई। इस प्रकार उस आश्रममें निवास करते हुए उन तीनोंका कुछ समय व्यतीत हुआ। सावित्री दिन-रात चिन्तित रहती थी। नारदजीने जो बात कही थी, वह सावित्रीको भूलती नहीं थी। उसने मन-ही-मन हिसाब लगाकर यह जान लिया कि आजसे चौथे दिन मेरे पतिकी मृत्यु होनेवाली है। तत्पश्चात् उसने त्रिरात्रि-व्रत प्रारम्भ किया। उसे पूर्ण करके सावित्रीने स्नान किया और देवता-पितरोंका तर्पण करके उसने सास-ससुरके चरणोंमें प्रणाम किया। तदनन्तर सत्यवान् हाथमें फरसा लेकर वनको चले। सावित्री भी उनके पीछे-पीछे गयी। सत्यवान्ने शीघ्रतापूर्वक फल, फूल, समिधा और कुशा एकत्र करके सूखे काष्ठका एक बोझ बाँधा। तत्पश्चात् वे बरगदकी शाखाका सहारा लेकर बोले—'प्रिये! मेरे सिरमें बड़ी पीड़ा हो रही है। मैं क्षणभर तुम्हारी गोदमें मस्तक रखकर सोना चाहता हूँ।'
सावित्री बोली—महाबाहो! आइये, विश्राम कीजिये। थोड़ी देर बाद हमलोग आश्रमपर चलेंगे।
तदनन्तर सावित्रीकी गोदमें मस्तक रखकर सत्यवान् ज्यों-ही पृथ्वीपर सोये त्यों-ही सावित्रीने एक पुरुषको देखा, जो काले और पीले रंगके दिखायी पड़ते थे। मस्तकपर किरीट और अंगोंमें पीताम्बर धारण किये वे साक्षात् सूर्यकी भाँति शोभा पा रहे थे। सावित्रीने उन्हें प्रणाम करके मधुर वाणीमें पूछा—'तुम कौन हो? दूर ही रहो; पति-भक्तिके प्रभावसे मुझे कोई धर्मसे गिरा नहीं सकता। प्रज्वलित अग्निशिखाकी भाँति मेरा कोई स्पर्श भी नहीं कर सकता।'
यमने कहा—पतिव्रते! मैं सबका संयमन करनेवाला यम हूँ। तुम्हारे पतिकी आयु क्षीण हो गयी है। मेरे दूत तुम्हारे समीप आकर इन्हें ले जानेमें असमर्थ हैं, इसलिये मैं स्वयं आया हूँ।
उनके यों कहनेपर सत्यवान्के शरीरसे अँगूठेके बराबर एक पुरुष निकला जो पाशमें बँधा हुआ था। सावित्रीने उसे देखा और स्वयं भी यमराजके पीछे-पीछे चलना प्रारम्भ किया। पातिव्रत्यके प्रभावसे उसे वहाँ जानेमें कोई श्रम नहीं होता था। उस समय यमराजने उससे कहा—'सावित्री! तू बहुत दूर चली आयी, अब लौट जा। इस मार्गपर कोई जीवित पुरुष नहीं चलता।'
सावित्री बोली—भगवन्! मुझे चलनेमें न तो परिश्रम होता है और न ग्लानि ही। एकमात्र पतिको छोड़कर स्त्रीके लिये दूसरा कोई अवलम्ब नहीं है।
इस प्रकार और भी बहुत-सी धर्मयुक्त मधुर बातें सुनकर सूर्यनन्दन यम सावित्रीपर बहुत प्रसन्न हुए और बोले—'देवि! तुम्हारा कल्याण हो, तुम कोई वर माँगो।' तब सावित्रीने विनीत होकर पाँच वरदान माँगे—'मेरे महात्मा श्वशुरको नेत्र प्राप्त हों, उनका खोया हुआ राज्य भी मिल जाय, मेरे पति जीवित हों, निरन्तर उनके धर्मकी वृद्धि हो तथा मेरे पुत्रहीन पिताको पुत्रकी प्राप्ति हो।' धर्मराजने वरदान देकर उसे भेजा। पतिको पाकर सावित्रीका मन प्रसन्न हो गया। अब वह स्वस्थचित्त होकर पतिके साथ आश्रमपर गयी। ज्येष्ठकी पूर्णिमाको उसने यह व्रत किया था, जिससे उसके सौभाग्यकी रक्षा हुई।
पार्वतीने पूछा—महेश्वर! सावित्रीने जिस व्रतका पालन किया, वह कैसा है? बतानेकी कृपा करें।