संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1290, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड * १२६१
पूजा करके उक्त आठों तीर्थोंके सेवनका फल पाता है। जो मनुष्य अमावास्याको वहाँ रुद्रके समीप पिण्डदान करता है, उसके पितर ब्रह्माजीके दिन (एक कल्प)-तक तृप्त रहते हैं। दही, दूध, घी, पंचगव्य, कुशोदक, कुंकुम, अगुरु तथा कपूर—इन सबको अघोरमन्त्रसे अभिमन्त्रित करके रातमें इनके द्वारा मेरा ध्यान करते हुए वृषभेश्वरका पूजन करे। यों करनेसे मनुष्य पाँच महापातकोंसे मुक्त हो जाता है। यदि उन्हें दूधसे नहलाये तो पूर्वजन्म और इस जन्मके पापका नाश हो जाता है। जो मनुष्य पंचगव्यसे वृषभेश्वरको स्नान कराता है, वह अपने सब पातकोंको जला देता है। उस लिंगकी पूजाके लिये उद्यत होते ही मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है। जो मानव पूरे कार्तिकभर ब्रह्मेश्वर महालिंगका पूजन करता है, उसे सब प्रकारके पातकोंसे छुटकारा मिल जाता है। इस प्रकार वृषभेश्वर शिवका देवपूजित माहात्म्य बताया गया।
वहाँसे अविनाशी त्र्यम्बकेश्वरलिंगके समीप जाय। त्र्यम्बकेश्वरजी पाँचवें रुद्र माने गये हैं। इनका स्थान कपिलेश्वर लिंगसे ईशानकोणमें सोलह धनुषकी दूरीपर है। ये सबके ऊपर दया करनेवाले तथा सब वांछित फलोंको देनेवाले हैं। इनके दर्शनसे भी पातकोंके सहस्रों टुकड़े हो जाते हैं। जो भक्तिभावसे कामदेव मन्त्रद्वारा इनका विधिवत् पूजन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जो चैत्र शुक्ला चतुर्दशीकी रातमें वहाँ जागरण करता है और पूजा, स्तुति एवं कथा-वार्तामें समय बिताता है, वह मनोवांछित फल पाता है।
इसके बाद छठे रुद्र अघोरेश्वरलिंगके समीप जाय। इनका स्थान त्र्यम्बकेश्वरसे वायव्यकोणमें पाँच धनुषके अन्तरपर है। ये सम्पूर्ण अभीष्टफलोंके दाता तथा कलियुगके पापोंका नाश करनेवाले हैं। जो मानव स्नान-पूजन आदिके क्रममें इनकी आराधना करता है, उसे सुवर्णमय मेरुगिरिके दानका फल प्राप्त होता है। अघोरेश्वरदेवके लिये जो कुछ दिया जाता है, वह सब अक्षय होता है। जो मनुष्य अघोरेश्वरके दक्षिण भागमें श्राद्ध करता है, उसके पितर कल्पपर्यन्त तृप्त रहते हैं।
अघोरेश्वरसे उत्तर कुछ-कुछ वायव्यकोणकी ओर तीस धनुषकी दूरीपर महाकालेश्वरका स्थान है। वह लिंग सब पापोंका नाश करनेवाला है। उसके भीतर मैं कालरूपसे प्रतिष्ठित हूँ। वह कल्पपर्यन्त स्थिर रहनेवाला और मेरा विशेष प्रिय है। जो षडक्षर मन्त्रद्वारा उसकी पूजा करता है, वह उसी क्षण मृत्युको जीत लेता है। जो कृष्णपक्षकी अष्टमीमें रातके समय विधिपूर्वक पूजा करके घृतमिश्रित गुग्गुलका धूप देता है, उसके सहस्रों अपराध भैरवजी क्षमा कर देते हैं। महर्षिलोग उस स्थानपर गोदानकी महिमा बतलाते हैं। वहाँ गोदान करनेवाले पुरुष अपने आगे-पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंका उद्धार कर देते हैं। जो महाकालेश्वरके दक्षिणभागमें रुद्रियका जप करता है, वह मातृकुल और पितृकुल दोनोंको तारता है।
महाकालेश्वरसे अग्निकोणमें बीस धनुष दूर भैरवेश्वरका स्थान है। भैरवेश्वरलिंग सब वांछित फलोंका देनेवाला तथा दरिद्रताका नाश करनेवाला है। पूर्वकालमें चण्ड नामक मेरे पार्षदने एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक उसकी आराधना की थी, इससे उसका नाम चण्डेश्वर हुआ। जो एकाग्रचित्त हो देवाधिदेव चण्डेश्वरका दर्शन और स्पर्श करता है, वह जन्मसे लेकर मृत्युतकके सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। भाद्रपदमासके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी तिथिको उपवास करके जो भैरवेश्वरके समीप जागरण करता है, वह मेरे परम धामको जाता है। भैरवेश्वरके दर्शनसे मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यात्राके उत्तम फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको अपने सब पापोंका नाश करनेके लिये वहाँ तिल, सुवर्ण और वस्त्रका दान करना चाहिये। कल्पके अन्तमें वे रुद्रदेव भैरव (भयानक)