संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* प्रभासखण्ड * १२५५
| कलकलेश्वरके समीप ही नकुलीश तथा दो परम पुण्यमय लिंग हैं। जो मनुष्य भादोंमासके शुक्लपक्षकी चतुर्दशीको उपवास करके उनके समीप जागरण करता है और नकुलीश तथा उन दोनों लिंगोंकी पृथक्-पृथक् पूजा करता है, वह मुझ महेश्वरके परम धामको जाता है।<br><br>महादेवि ! वहाँसे दक्षिण थोड़ी ही दूरपर उतंककेश्वर लिंग है, जिसे महात्मा उतंकने स्वयं ही भक्तिपूर्वक स्थापित किया है। जो उसका दर्शन, स्पर्श और भक्तिभावसे विधिवत् पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। उस स्थानसे अग्निकोणमें पाँच धनुषकी दूरीपर वैश्वानरेश्वर देव विराजमान हैं। प्राचीन कालमें वहाँ किसी तोतेने मन्दिरके भीतर सुन्दर घोंसला बना रखा था। उसमें अपनी स्त्रीके साथ रहकर उसने दीर्घकालतक तपस्या की। घोंसलेमें आने जानेके कारण वे दोनों दम्पति प्रतिदिन वैश्वानरेश्वरकी परिक्रमा कर लेते थे। दीर्घकालके पश्चात् उन दोनोंकी मृत्यु हो गयी। उसीके प्रभावसे वे दोनों इस पृथ्वीपर अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण रखनेवाले ब्राह्मण-दम्पति हुए। स्त्रीका नाम लोपामुद्रा और पुरुषका नाम अगस्त्य हुआ। उन दोनोंने परम सिद्धि प्राप्त की। अपने पूर्व शरीरके वृत्तान्तको याद करके महात्मा अगस्त्यने कहा है कि 'जो मनुष्य वह्नीश्वरकी | परिक्रमा करके उनका दर्शन करता है, वह निश्चय ही सिद्धिको प्राप्त होता है। जो मानव श्रद्धापूर्वक अग्नीश्वरको घृतसे नहलाकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करता है और श्रेष्ठ ब्राह्मणको सुवर्ण देता है, वह अग्निलोकमें जाकर अनन्त कालतक आनन्द भोगता है।'<br><br>वैश्वानरेश्वरसे पश्चिम सात धनुषकी दूरीपर लकुलीश्वर विराजमान हैं। जो मनुष्य सदा उनका पूजन करता है, विशेषतः कार्तिककी पूर्णिमाको और उत्तरायण आरम्भ होनेके दिन उनकी आराधना करता और बुद्धिमान् ब्राह्मणको विद्यादान देता है, वह सात जन्मोंतक धनाढ्य ब्राह्मणोंके उत्तम कुलमें जन्म ले बुद्धिमान् तथा लक्ष्मीवान् होता है।<br><br>उस स्थानसे पूर्व दिशामें दैत्यसूदनके पश्चिम पाँच धनुषके अन्तरपर गौतमेश्वर लिंग प्रतिष्ठित है, जो संपूर्ण इच्छित फलोंको देनेवाला है। मद्रदेशके राजा शल्यने उसकी आराधना की थी। जो मनुष्य चैत्र शुक्ला चतुर्दशीके दिन गौतमेश्वरको दूधसे स्नान कराता है और चन्दन, जल तथा फूलोंसे विधिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। गौतमेश्वरके दर्शनसे मन, वाणी और क्रिया द्वारा किये हुए सब पाप नष्ट हो जाते हैं। |
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वैष्णवक्षेत्रमें भगवान् दैत्यसूदनकी महिमा
| महादेवजी कहते हैं— महादेवि! गौतमेश्वरके स्थानसे देवेश्वर भगवान् दैत्यसूदनके समीप जाना चाहिये, जो प्रभासक्षेत्रमें निवास करनेवाले सब प्राणियोंके पापोंका नाश करते हैं। भगवान् दैत्यसूदन सबके कार्योंकी सिद्धि करनेवाले हैं। भयंकर भवसागरमें पड़े हुए प्राणियोंको पार उतारनेके लिये वे सुदृढ़ जहाजकी भाँति स्थित हैं। पार्वती ! वटवृक्ष, कल्पवृक्ष, वैदूर्यपर्वत, भगवान् दैत्यसूदन तथा महामुनि मार्कण्डेय—इनका सात कल्पोंतक क्षय अथवा विनाश नहीं होता। | दैत्यसूदनसे बढ़कर दूसरा कोई देवता इस पृथ्वीपर नहीं है। उनका क्षेत्र यवाकार है, वह सब पातकोंका नाश करनेवाला, ऋषि-मुनियोंसे सेवित तथा यक्ष, विद्याधर और नागगणका आश्रय है। उस वैष्णवक्षेत्रकी सीमा इस प्रकार है—पूर्वमें यमेश्वरतक, पश्चिममें सोमेश्वरतक, उत्तरमें विशालाक्षीतक और दक्षिणमें समुद्रतक वह फैला हुआ है। जो मनुष्य इस क्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे सब स्वर्गलोकमें जाते हैं। वहाँ जो कुछ दान, होम, जप और तप किया जाता |