भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1285
१२५६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

है, वह सात कल्पोंतक अक्षय बना रहता है। जो वहाँ भगवान् विष्णुकी प्रीतिके लिये विधिपूर्वक एक ब्राह्मणको भी भोजन करायेगा, उसे एक करोड़ ब्राह्मण-भोजन करानेका फल होगा। जो मनुष्य वहाँ भक्तिपूर्वक उपवास करता है, उसे एक ही उपवाससे दस हजार उपवासोंका फल मिलता है। जो मानव कार्तिकमासकी द्वादशीको चक्रतीर्थमें स्नान करके इन्द्रियसंयमपूर्वक उपवास एवं विधिवत् भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है।

पार्वतीजीने पूछा— भगवन्! श्रीविष्णुका दैत्य-सूदन नाम किस समय और किस प्रकार हुआ?

महादेवजीने कहा— देवि! भगवान् दैत्यसूदन विष्णुके नाम अनादि और अनन्त हैं। प्रत्येक कल्पमें उनके नये-नये नाम प्रसिद्ध होते हैं। पूर्वकल्पमें उनका नाम श्रियावृत था, दूसरे कल्पमें वामन हुआ, तीसरेमें वे वज्रांग कहलाये, चौथेमें कमलाप्रिय नाम हुआ, पाँचवेंमें दुःखहर्ता, छठेमें पुरुषोत्तम और सातवें कल्पमें वे दैत्यसूदन नामसे प्रसिद्ध हुए।

पूर्वकालमें देवताओं और असुरोंमें बड़ा भारी युद्ध हुआ। उसमें देवकण्टक दानवोंसे पराजित होकर सब देवता क्षीरसागरमें निवास करनेवाले श्रीहरिकी शरणमें गये और प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे।

देवता बोले— देव! जगन्नाथ! आपकी जय हो। आप दैत्यों और असुरोंका मान मर्दन करनेवाले हैं। आपने ही वाराहरूप धारण करके इस पृथ्वीका उद्धार किया था। मत्स्यरूपसे आपने ही समुद्रके जलसे वेदोंका उद्धार किया है। जब क्षीरसागरका मन्थन हो रहा था, उस समय कूर्मरूप धारण करके आपने अपनी पीठपर मन्दराचल उठाया और लक्ष्मीजीका उद्धार किया; आपको नमस्कार है। आप लक्ष्मीपति हैं; लक्ष्मीजीने आपका आश्रय लिया है। देव! आप पीड़ितोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले हैं। आपने वामनरूप धारण करके बलिको बाँधा है और वाराहरूपसे महादैत्य हिरण्याक्षका वध किया है। आपने ही नृसिंहरूपसे हिरण्यकशिपुको आकाशमें धारण करके मारा है। आप ही सम्पूर्ण देवताओंके मूल हैं। प्रभो! महादेव! आपने ही समस्त संसारका उद्धार किया है।

पार्वती! यह स्तोत्र सुनकर कमलनयन भगवान् विष्णुने ब्रह्मा आदि देवताओंसे कहा—‘देवगण! तुम दानवोंका भय छोड़ दो, मैं शीघ्र ही उनका संहार करूँगा?’ यो कहकर श्रीविष्णु देवताओंके साथ वहाँ आये और चक्रद्वारा पृथक्-पृथक् सब दानवोंका संहार आरम्भ किया। यह देख सब दानव भयसे विकल हो भागने लगे। प्रभासक्षेत्रमें आकर उन्होंने समुद्रकी शरण ली। भगवान्ने अपने चक्रसे सब दैत्योंका सफाया कर डाला। उनके मारे जानेपर देवताओं, ब्राह्मणों तथा तपस्वी जनोंका कल्याण हुआ। संसारकी व्याकुलता दूर हुई और सबका चित्त स्वस्थ हुआ। तभीसे भगवान् विष्णुका नाम ‘दैत्यसूदन’ हुआ। उनका दर्शन करके मनुष्य सात जन्मोंतक जड, अन्ध, दरिद्र और दुःखी नहीं होता। श्रवण नक्षत्रमें द्वादशीका योग पुण्यदायक है तथा रोहिणी नक्षत्रमें अष्टमीका संयोग शुभ है। उस समय भगवान् दैत्यसूदनके शयन और उत्थापनका उत्सव होता है। उस अवसरपर दैत्यसूदनके समीप एक-एक उपवासका दस-दस उपवासके बराबर फल होता है। चाण्डाल, श्वपच और पशु-पक्षी भी वहाँ प्राण त्याग करनेपर वैकुण्ठधाममें जाते हैं। कार्तिक और वैशाखमासमें वहाँ श्रद्धापूर्वक एक मासतक उपवास करे। उस समय एक-एक उपवासका कोटि-कोटि उपवासके बराबर फल होता है। विष्णुक्षेत्रका ऐसा ही प्रभाव है। जो वहाँ एक मास या एक पक्षतक दीपदान करता है, उसे कोटिगुने फलकी प्राप्ति होती है। जो आषाढ़ शुक्ला एकादशीको निराहार रहकर भगवान् दैत्यसूदनको पंचामृतसे नहलाकर पूजा करे और नियमपूर्वक उनके समीप रहकर चातुर्मास्य व्यतीत करे, उसके ऊपर भगवान् विष्णु संतुष्ट होते हैं।