भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1286

* प्रभासखण्ड * १२५७


जो मनुष्य एकादशी तिथिको वहाँ गीत, नृत्य, वाद्य तथा दृश्य-अभिनय आदिके द्वारा रातमें जागरण करता है, वह भगवान् विष्णुके उस परम धाममें जाता है, जहाँसे पुनः इस संसारमें आना नहीं होता। जिनकी निद्रा दैत्यसूदनके समीप जागरणमें बीत जाती है। वे स्वप्नमें भी यममार्ग, यमपुरी, यमदूत तथा असिपत्रवन आदि नरकोंका दर्शन नहीं करते। जो एकादशीको उपवास करके द्वादशीके दिन वहाँ नैवेद्य, तुलसीपत्र भक्षण करता है, उसकी कोटि-कोटि हत्याओंका नाश हो जाता है। पार्वती! सब पातकोंका नाश करनेवाले चक्रतीर्थमें स्नान करके भगवान् दैत्यसूदनकी सेवाके लिये पीले वस्त्र, गौ तथा सुवर्णका दान करना चाहिये।


योगेश्वरी देवीकी महिमा

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! दैत्योंका संहार करनेके पश्चात् भगवान् विष्णुने जहाँ अपने चक्रको धोया, वहीं आठ करोड़ तीर्थोंको लाकर स्थापित किया। उसमें सुदर्शनको शुद्ध करके उन्होंने उस तीर्थका चक्रतीर्थ नाम रख दिया। चक्रतीर्थमें कुल आठ करोड़, असी हजार तीर्थ हैं। जो मानव एकाग्रचित्त होकर वहाँ स्नान करता है, वह सब तीर्थोंमें स्नान करनेका पूरा फल पा लेता है। एकादशीको या विशेषतः चन्द्रमा और सूर्यके ग्रहणके अवसरपर जो उसमें स्नान करता है, वह कोटि यज्ञोंका फल पाता है। पूर्व कल्पमें इसका नाम कोटितीर्थ था। दूसरे कल्पमें श्रीनिधान, तीसरेमें शतधार और चौथेमें चक्रतीर्थके नामसे इसकी प्रसिद्धि हुई। उस वैष्णव क्षेत्रका प्रमाण आधा कोस बताया गया है। उसमें ब्रह्महत्या नहीं प्रवेश कर पाती। उस क्षेत्रमें जाकर जो मासोपवासी, अग्निहोत्री, पतिव्रता स्त्री एवं स्वाध्यायपरायण तथा यज्ञशील मानव चान्द्रायण आदि तप, तिल-जलसे पितरोंका तर्पण, श्राद्ध, एकरात्रव्रत, द्विरात्रव्रत, त्रिरात्रव्रत, कृच्छ्र, सान्तपन, मासोपवास या अन्य कोई पुण्य-कर्म करते हैं, वह अन्य क्षेत्रोंकी अपेक्षा कोटिगुना पुण्यदायक होता है।

चक्रतीर्थसे पूर्व दिशामें महादेवी योगेश्वरीका स्थान है। पूर्वकालमें महिषासुर नामक एक बड़ा भयंकर दैत्य हो गया है। वह इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला था और तीनों लोकोंको अपने वशमें करके सुखसे रहता था। एक समय ब्रह्माजीने एक मनोमयी कन्या उत्पन्न की। वह पृथ्वीपर अप्रतिम सुन्दरी थी। उस रूपवती कन्याने बड़ी घोर तपस्या की। एक दिन देवर्षि नारदजीने उस कन्याको देखा और महिषासुरके समीप गये। महिषासुरने मुनिका बड़ा स्वागत-सत्कार किया और कुशल-मंगल पूछते हुए कहा—'नारदजी! यहाँ पधारनेका क्या कारण है? बताइये।' मुनि बोले—'महादैत्य ! जम्बूद्वीपमें एक अनुपम सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई है। उसके जैसा रूप मैंने स्वर्ग, मर्त्यलोक और पातालमें भी न तो देखा है और न सुना ही है।'

मुनिकी यह बात सुनकर महिषासुर बड़ी भारी सेनाके साथ प्रभासक्षेत्रमें गया, जहाँ वह कन्या तप करती थी। वहाँ उस असुरने उससे इस प्रकार प्रार्थना की—'भीरु ! तुम मेरी स्त्री हो जाओ। यह तपस्या तुम्हारी जवानीके विरुद्ध है।' उसकी बात सुनकर वह तपस्विनी हँस पड़ी। हँसते समय उसके मुखसे सहस्रों भयंकर स्त्रियाँ हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये निकलीं। उन सबने महिषासुरकी सारी सेनाका संहार कर डाला। यह देख वह दैत्य कुपित हो अपने तीखे सींग हिलाता हुआ शीघ्र ही उस देवीके सम्मुख गया। उसके साथ बड़ा