संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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भारी युद्ध करके अन्तमें वह महिष पकड़ा गया। देवी सींग पकड़कर उसके ऊपर चढ़ गयी और पैरोंसे दबाकर उसे त्रिशूलसे मार डाला। फिर तलवारसे उसका मस्तक काट लिया। महिषासुरको मारा गया देख इन्द्र आदि देवताओंने प्रसन्नचित्त होकर देवीका स्तवन किया।
देवता बोले— महान् सौभाग्यशालिनी देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम गम्भीर स्वभाववाली हो। तुम्हारी दृष्टि बड़ी भयंकर है। तुम सदा न्यायके पथपर स्थित रहती हो, उत्तम सिद्धोंकी अधीश्वरी हो; तुम्हारे तीन नेत्र हैं और सब ओर मुख हैं। विद्या और अविद्या तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जया (विजयशक्ति) और जपनीय मन्त्रस्वरूपा हो। महिषासुरका मर्दन करनेवाली देवि! तुम सर्वत्र व्यापक, समस्त विद्याओंकी स्वामिनी और विश्वरूपा हो। तुम्हें नमस्कार है। तुम शोकसे परे और ध्रुवस्वरूपा हो। पद्मपत्रके समान विशाल नेत्रोंवाली देवि! तुम शुद्ध सत्त्वगुणोंमें स्थित हो, व्रतपरायण हो; तुम्हीं प्रचण्ड रूप धारण करनेवाली विभावरी (रात्रि) हो, तुम्हें नमस्कार है। ऋद्धि-सिद्धि देनेवाली देवि! तुम कालमृत्यु (प्रलयताण्डव) करनेवाली हो। धृति (धैर्य) तुम्हें विशेष प्रिय है। तुम्हीं शांकरी, ब्राह्मणी और ब्राह्मी हो। सम्पूर्ण देवताओंसे वन्दित देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारे हाथोंमें घण्टा और शूल शोभा पाते हैं। तुम महामहिष दानवका मर्दन करनेवाली हो, तुम्हारा रूप बड़ा भयंकर और नेत्र भयानक हैं। महामाये! तुम अमृतस्वरूपा और कल्याणमयी हो, तुम्हें नमस्कार है। सर्वत्र व्याप्त रहकर सब कुछ देनेवाली देवि! समस्त सात्त्विक वस्तुओंका उदय तुम्हींसे होता है। तुम्हीं विद्या, पुराण और शिल्पकलाकी जननी हो। सब भूतोंको धारण करनेवाली हो। सम्पूर्ण देव-रहस्योंका आश्रय तथा समस्त सत्त्वगुणी प्राणियोंको शरण देनेवाली हो। शुभे! तुम्हीं विद्या-अविद्या, प्रिया तथा अप्रिया हो।
देवताओंके इस प्रकार स्तवन करनेपर देवीने मुसकराते हुए कहा—'उत्तम वर माँगो।'
देवता बोले— देवि! जो श्रेष्ठ मानव यहाँ इस स्तोत्रके द्वारा तुम्हारा स्तवन करें, वे पूर्णकाम हों। इस क्षेत्रमें तुम सदा निवास करो।
'एवमस्तु' कहकर देवीने देवताओं और महर्षियोंको विदा किया और स्वयं वहीं रहने लगीं। जो मनुष्य आश्विन शुक्ला नवमीको उपवास करके भक्ति-भावसे योगेश्वरीदेवीका दर्शन करता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है। जो मानव प्रातःकाल उठकर इस स्तोत्रको पढ़ता है, उसे जीवनभर भयका सामना नहीं करना पड़ता। आश्विन शुक्ला अष्टमी यदि मूल नक्षत्रसे युक्त हो तो महाष्टमी मानी गयी है। वह तीनों लोकोंमें अत्यन्त दुर्लभ है। उस दिन जगदम्बाका पूजन करके मनुष्य अपने शत्रुओंपर विजय पाता है।
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आदिनारायणका माहात्म्य
**महादेवजी कहते हैं—**पार्वती! योगेश्वरीसे पूर्व दिशामें आदिनारायण भगवान् विष्णु विराजमान हैं। ये पादुकापर खड़े हैं तथा सब दैत्योंका विनाश करनेवाले हैं। पहले सत्ययुगमें मेघवाहन नामसे प्रसिद्ध एक दैत्य हो गया है; उसे ब्रह्माजीने वरदान दिया था कि 'जब भगवान् विष्णु युद्धभूमिमें तुम्हें पादुकासे मारेंगे, तभी तुम्हारी मृत्यु होगी, अन्यथा नहीं।' इस प्रकार वर पाकर वह दैत्य देवता, असुर और मनुष्योंसहित समस्त भूमण्डलको संताप देने लगा। कोटि युगोंतक सबको नाना प्रकारके कष्ट देकर वह दक्षिण समुद्रके तटपर आया और वहाँ ऋषियोंके आश्रमोंका विध्वंस करने लगा। तब ऋषियोंने उसे अजेय समझकर