संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1288, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड * १२५९
भगवान् गरुडध्वजका स्तवन किया।
ऋषि बोले— परमकल्याण ! आपको नमस्कार है। आप कल्याणस्वरूप आत्मयोगीको नमस्कार है। आप जनार्दन, श्रीधर और वेधा (सृष्टिकर्ता) हैं। देव! आपको नमस्कार है। कमल-केसरके समान सुवर्णमय मुकुट धारण करनेवाले केशवको नमस्कार है। आप अत्यन्त सूक्ष्म तथा अतिशय महान् शरीरवाले हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। आपकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है, आपको नमस्कार है। आप ही श्रीहरि तथा हरिवेधा हैं, आपको नमस्कार है। आप ही सम्पूर्ण जगत्के कारणभूत हिरण्यगर्भ हैं, आपको नमस्कार है। आप अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले तथा उन्नत (सर्वोच्च पदमें स्थित) हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। मायाके परदेसे ढके हुए आप जगदाधार परमात्माको नमस्कार है। संसारसागरसे पार उतारनेवाले प्रभो! आप ज्ञाननौका प्रदान करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है। आपकी बुद्धि कभी कुण्ठित नहीं होती, आप धाता एवं संसारकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आपका वासुदेव नाम सब पातकोंका नाश करनेवाला है, इस सत्यके प्रभावसे यह मेघवाहन दैत्य नष्ट हो जाय। भगवान् विष्णुके भक्तोंमें पाप नहीं ठहरता, भगवान् विष्णु स्मरण करते ही सब पापोंका नाश कर देते हैं—यह सत्य है तो यह पापात्मा मेघवाहन दैत्य नष्ट हो जाय। परमेश्वरके जगदाधार वासुदेव नामका भक्तिपूर्वक स्मरण करनेसे सबका कल्याण हो और समस्त संसारके सभी दोष नष्ट हो जायँ।
ऋषियोंके इस प्रकार स्तुति करनेपर आदिनारायण भगवान् श्रीहरिने पादुकापर आरूढ़ हो उन सबको दर्शन दिया और कहा—'आपलोगोंके मनमें कौन-सा कार्य उपस्थित हुआ है? बताइये, मैं उसे पूर्ण करूँगा। आपके द्वारा की हुई इस स्तुतिसे मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ।'
ऋषि बोले— देव! आप सब कुछ जानते हैं, आपसे कुछ भी छिपा नहीं है। इस महाबली दैत्य मेघवाहनका संहार कीजिये, जिससे सारा विश्व निर्भय हो।
उनके यों कहनेपर भगवान् विष्णुने उस दैत्यको युद्धके लिये ललकारा और अपनी पादुकासे उसकी छातीमें प्रहार किया। उसकी चोट खाकर दैत्यके प्राण-पखेरू उड़ गये और वह समुद्रमें गिर पड़ा। उस श्रेष्ठ दैत्यका वध करके भगवान् विष्णु उसी स्थानपर स्थित हो गये। आज भी वे वहीं पादुकाके आसनपर खड़े हैं। जो श्रेष्ठ मनुष्य एकादशी तिथिको भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाकर स्वर्गमें आनन्दित होता है। जिनके हृदयमें भगवान् आदिनारायण विराजमान हैं, उनके लिये कलियुगमें भी सत्ययुग है।
# पाण्डवेश्वरलिंग तथा ग्यारह रुद्रोंका माहात्म्य
**महादेवजी कहते हैं—** आदिनारायणसे तीन धनुष पश्चिम महानदी सन्निहिता विराज रही है। जब जरासन्धके आक्रमणके भयसे बाल, वृद्ध, वणिग्जन तथा अपने परिजनोंसहित सब यादवोंको साथ ले भगवान् श्रीकृष्ण मथुराको सूनी करके चले, तब प्रभासक्षेत्रमें आये। वहाँ उन्होंने रहनेके लिये समुद्रसे स्थान माँगा। इसी समय सूर्यग्रहण लगा। तब भगवान् जनार्दनने यादवोंसे कहा—'मैं परम पवित्र सन्निहित नामक सरोवरको यहाँ लाऊँगा।' उनके इतना कहते ही धरती फोड़कर शुभ जलका प्रवाह प्रकट हुआ। यह देख बलरामजी तथा साम्ब आदि सभी यादवोंने उसमें ग्रहणस्नान किया। उसमें स्नान करनेसे अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है। वहाँ एक-एक आहुति देनेसे कोटि होमका फल होता है। उस स्थानमें रहकर यदि