भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

१२३४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


तामस तीन प्रकारके प्राणी होते हैं। उनमेंसे ये दैत्यगण प्रायः तमोगुणी और दुर्धर्ष होते हैं। देवताओंके साथ ये सदा लाग-डाँट रखते हैं और संसारका संहार कर देनेके लिये उद्यत होकर तामसिक तपस्याओंके द्वारा मोहवश मेरा भजन करते हैं। मैं जो उन्हें वरदान देता हूँ, उसमें केवल उनकी भक्ति ही कारण है। मैं भक्तिसे भलीभाँति वशमें हो जानेवाला हूँ। तपस्याके अनुसार वर पाकर वे पापात्मा दैत्य जो विष्णुके द्वारा मारे जाते हैं, उसका रहस्य मुझसे सुनो। मैं और विष्णु जो भिन्न प्रतीत होते हैं, उसमें गुणभाग कारण है। वास्तवमें हम दोनों अभिन्न हैं। हममें आराध्य और आराधक आदिका भेद भी सामान्य ही है—हम उनके आराध्य हैं और वे हमारे। श्रीविष्णुके चरणोंके अग्रभागसे निकली हुई गंगाजीको मैं भक्तिपूर्वक मस्तकपर धारण करता हूँ। तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये उद्यत हुए श्रीविष्णुने भी चिरकालतक मेरी उपासना करके दुष्ट दैत्योंका नाश करनेवाला चक्र प्राप्त किया। त्रिभुवनकी उत्पत्तिके कारणभूत श्रीहरिकी मैं भक्तिपूर्वक आराधना करता हूँ। इसी प्रकार श्रीहरि भी मेरी आज्ञा शिरोधार्य करके अजन्मा होते हुए भी जन्म लेकर सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करते हैं। हिरण्यकशिपु दैत्यका वध करनेके लिये नृसिंह-शरीर धारण करनेवाले श्रीहरिको मैंने ही शान्त किया। इसी प्रकार बाणासुरकी रक्षाके लिये त्रिशूल उठानेवाले मुझ शंकरको मनुष्य-अवतारमें स्थित होते हुए भी श्रीहरिने लीलापूर्वक स्तब्ध कर दिया था। मेरी महिमा और प्रभावको बढ़ाते हुए मेरे प्रभु भगवान् विष्णु नित्य मेरी सेवा करते हैं तथा मैं भी अनादि, अनन्त परमात्मा श्रीहरिका ध्यानयोग और समाधिमें चिन्तन करता हूँ। इस प्रकार उनका और मेरा भेद वास्तविक नहीं है। मूढ़ मनुष्य ही हम दोनोंमें भेद और न्यूनता-अधिकताका आरोप करते हैं। मैं ही विष्णुरूप धारण करके दुष्टोंका संहार करता हूँ। वे दैत्य हम दोनोंके प्रभावसे निष्पाप होकर मुक्तिके लिये ब्रह्मर्षियोंके कुलमें जन्म लेते हैं। ब्रह्मचर्यके पश्चात् पाशुपत योगका आश्रय ले पूर्वजन्मके संस्कारसे वे फिर मेरी उपासना करते हैं। मेरे लिंगोंका पूजन करते हैं। सदा एकमात्र मुझमें ही चित्त लगाये हुए मेरे ध्यानमें दृढ़तापूर्वक स्थित रहते हैं। जो सम्पूर्ण जगत्की अधीश्वरी तुम पार्वतीकी भी वन्दना करते हैं, उन्हें देहत्यागके पश्चात् मैं सारूप्य तथा सालोक्य मुक्ति देता हूँ। धर्मशास्त्रके अनुकूल आचारके कारण वे साधुपुरुषों और मुनियोंद्वारा निन्दित नहीं होते। तीर्थयात्राके प्रसंगसे वे ब्राह्मण लोग जब यहाँ आते हैं, तब मैं उन्हें अपने स्थानपर ले आता हूँ और तुम उन भोजनार्थी तपस्वीजनोंको नाना प्रकारके उपहारोंसे तृप्त करती हो। फिर वे सब धर्मोंमें तत्पर होकर श्रीसोमेश्वरदेवकी पूजा करते हैं और शरीरका अन्त होनेपर परम दुर्लभ मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।

ब्राह्मणलोग कहते हैं— चन्द्रदेव ! पार्वतीजीके पूछनेपर भगवान् शिवने यही कहा था। वहीं देवर्षि नारदने दोनोंका वह सब संवाद सुना और कथा-गोष्ठीमें हमारे पूछनेपर वह सब वृत्तान्त बतलाया।

ब्राह्मणोंके यों कहनेपर सोमदेव प्रसन्न होकर अपने लोकको चले गये। और उनकी आज्ञासे वे ब्राह्मण भी सोमेश्वरदेवकी यथावत् पूजा करते हैं। जिस मनुष्यने सोमवारसे लेकर आठ दिनोंतक सोमेश्वरदेवका पूजन किया है, उसने सब प्रकारके दान और सम्पूर्ण महाव्रतोंका अनुष्ठान कर लिया।

  • प्रभासखण्ड * १२३५

सोमवारव्रतकी विधि और महिमा, गन्धर्वसेनाकी रोगनिवृत्ति

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! कैलासके उत्तर निषधपर्वतके शिखरपर स्वयम्प्रभा नामक एक विशाल पुरी है। उसमें धनवाहन नामके एक गन्धर्वराज रहते थे। उनकी स्त्री बड़ी मनोहर थी। उसके साथ रहकर वे वहाँ दिव्य भोगोंका उपभोग करते थे। समयानुसार उनके आठ पुत्र हुए। पुत्रोंके बाद एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम गन्धर्वसेना था। वह पिताकी आज्ञासे बहुत-सी कन्याओंके साथ भाँति-भाँतिके वृक्षों, लताओं, फलों और फूलोंसे सुशोभित सुन्दर उद्यानमें खेला करती थी। एक दिन खेलती हुई उस कन्याको देखकर उसकी माताने पतिसे कहा—'स्वामिन्! बन्धु-बान्धवोंसहित आपका तथा मेरा भी जीवन व्यर्थ है, जिनके घरमें इतनी बड़ी कन्या अभीतक अविवाहिता है।' पत्नीके यों कहनेपर गन्धर्वराजने कहा—'देवि! मैं पुत्रीके लिये सुन्दर वरकी खोज करता हूँ।' यों कहकर धनवाहनने पुत्रीको पुकारा। माता-पिताके बुलानेपर गन्धर्वसेना तुरंत वहाँ आयी और उनके चरणोंमें प्रणाम करके बोली—'पिताजी! क्या आज्ञा है?' धनवाहनने प्रसन्न होकर कहा—'बेटी! तुम्हें जो कोई वर पसंद हो, उसे बताओ। मैं उसी गन्धर्वशिरोमणिके साथ तुम्हारा विवाह कर दूँगा।' पिताके यों कहनेपर कन्याने कहा—'क्या तीनों लोकोंमें मेरे रूपके करोड़वें अंशकी भी बराबरी करनेवाला कोई है?' उसकी यह अद्भुत बात सुनकर पिता-माता भौंचक्के-से रह गये और आपसमें बोले—'पुत्रीने यह अच्छी बात नहीं कही।' गन्धर्वसेना उस विशाल उद्यानमें पूर्ववत् सखियोंके साथ खेलने लगी। वसन्तका समय था, वह झूला झूल रही थी। उसी समय गणनायक शिखण्डी दिव्य विमानपर बैठा हुआ वहाँ आ निकला। उसने आकाशसे ही उस कन्याको देखा। मध्याह्न-संध्याका समय था। वह विमानसे उतरा और उसी उद्यानमें ठहर गया। उसी समय उसने गन्धर्वकन्याके मुखसे यह वचन सुना—'संसारमें कोई देवता अथवा दानव मेरे रूपके करोड़वें अंशके भी बराबर नहीं है।' तब गणनायकने अहंकारमें भरी हुई उस कन्याको शाप दे दिया—'तुम रूपके अभिमानमें गन्धर्वों और देवताओंका तिरस्कार करती हो, अतः तुम्हारे शरीरमें कोढ़ हो जायगी।' यह शाप सुनकर वह कन्या भयभीत हो गयी और साष्टांग प्रणाम करके दयाकी भीख माँगने लगी। उसकी विनयसे गणनायकको दया आ गयी और उसने कहा—'यह तुम्हारे गर्वका फल है, इसलिये गर्व कभी नहीं करना चाहिये। हिमालयके वनमें गोशृंग नामके एक श्रेष्ठ मुनि रहते हैं। वे तुम्हारा उपकार करेंगे।' यों कहकर गणनायक चला गया। गन्धर्वसेना उस सुन्दर वनको छोड़कर पिताके समीप आयी और कुष्ठ होनेका सब कारण कह सुनाया। सुनकर उसके माता-पिता शोकसे सन्तप्त हो उठे और पुत्रीको साथ ले तुरंत ही हिमालय पर्वतपर आये। वहाँ उन्होंने गोशृंग ऋषिके आश्रमको देखा। मुनिवर गोशृंग आश्रमके भीतर बैठे थे। उनका दर्शन करके स्तुति-प्रणाम करनेके अनन्तर वे दोनों गन्धर्व-दम्पति उनके आगे भूमिपर बैठे। मुनिके पूछनेपर गन्धर्वराजने कहा—'मेरी कन्याका शरीर कुष्ठरोगसे पीड़ित है। जिससे उसकी शान्ति हो, वह उपाय करें।'

गोशृंगजी बोले—भारतवर्षमें समुद्रके समीप सर्वदेववन्दित भगवान् सोमनाथ विराजमान हैं। वहाँ जाकर मनुष्योंको एक समय भोजन करते हुए सब रोगोंके नाशके लिये सोमनाथकी पूजा करनी चाहिये। तुम सोमवारव्रतके द्वारा भगवान् शंकरकी आराधना करो। यों करनेसे तुम्हारी पुत्रीका रोग नष्ट हो जायगा।

महर्षिका यह वचन सुनकर गन्धर्वराजने वहाँ

१२३६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

जानेका विचार किया और गोशृंग मुनिसे पूछा—'भगवन्! सोमवारव्रत कैसे करना चाहिये? किस समय उसका अनुष्ठान उचित है?'

गोशृंगजीने कहा—महाप्राज्ञ! पहले ब्रह्मवेलामें उठकर शौच आदिसे निवृत्त हो दन्तधावन करे, फिर स्नान करके स्वधर्मके अनुसार नित्यकर्म करे। उसके बाद सुन्दर समतल एवं शुद्ध स्थानमें उत्तम कलश स्थापित करे, जिसमें आमका पल्लव डाला गया हो और जिसपर चन्दनसे भाँति-भाँतिके चित्र बनाये गये हों। कलशके ऊपर पात्र रखे और उस पात्रमें जटा-मुकुटमण्डित सर्वाभूषण-भूषित श्वेतवस्त्रधारी अर्द्धनारीश्वर शिवकी प्रतिमा स्थापित करे। तत्पश्चात् उमासहित महेश्वरकी श्वेत वस्त्रों और भाँति-भाँतिके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंद्वारा पूजन करे। बिजौरा नीबू अर्पण करे। निम्नांकित मन्त्रसे सब पूजा करनी चाहिये—

ॐ नमः पञ्चवक्त्राय दशबाहुत्रिनेत्रिणे।
देव श्वेतवृषारूढ श्वेताभरणभूषित ॥
उमादेहार्द्धसंयुक्त नमस्ते सर्वमूर्तये ।

'महादेव! आप श्वेत वृषभपर आरूढ़, श्वेत आभूषणोंसे भूषित तथा आधे शरीरमें भगवती उमासे संयुक्त हैं। आपके पाँच मुख, दस भुजाएँ तथा प्रत्येक मुखके साथ तीन-तीन नेत्र हैं। आपको नमस्कार है। आप सर्वस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है।'

इसी मन्त्रसे पूजन और स्तुति करके रात्रिमें भोजन करे। सोमनाथ महादेवजीका ध्यान करते हुए कुशकी चटाईपर सोये। यों करनेपर अठारह प्रकारके कुष्ठ रोगोंका नाश होता है। दूसरे सोमवारको करंजका दन्तधावन करे और ज्येष्ठा-शक्तिसे संयुक्त शिवका कमलके फूलोंसे पूजन करके विधिपूर्वक मधुर भोजन करे। भगवान्‌को नारंगी चढ़ाये। शेष सब विधि पूर्ववत् करे। दूसरे सोमवारको यों करनेसे लाख गोदानका फल प्राप्त होता है। तीसरे सोमवारको अपामार्गकी दातुन करके शिवजीका पूजन करे। अनारके फलका भोग लगाये तथा चमेलीके फूलोंसे पूजा करे। रातमें अगुरु भोजन करे। उस दिन सिद्धि नामक शक्तिके साथ शिवकी पूजा करनी चाहिये। चौथे सोमवारको गूलरकी दातुन करनेका विधान है। उस दिन सोमासहित गौरीपतिकी पूजा करे। नारियलका फल चढ़ाये और दवनेके पत्तेसे पूजा करे। रातमें चीनी खाय और जागरण करे। पाँचवें सोमवारको विभूतिसहित गणेश्वरकी कुन्दके फूलोंसे पूजा करे। पीपलकी दातुन करे और मुनक्काके साथ अर्घ्य दे। रातको मौक्तिक तंदुल (सफेद मक्का) भोजन करे। यों करनेसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। छठे सोमवारको भद्रासहित स्वरूपनामक शिवका पूजन करे। चमेलीकी दातुन करे और धतूरके फलसे अर्घ्य दे। उस दिन बेलाके फूलोंसे परम भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। रातमें कपूर भोजन करे। सातवें सोमवारको बेलाकी दातुन करे और दीप्ताशक्तिके साथ सर्वज्ञ शिवकी पूजा करे। जँभीरी नीबूका फल अर्पण करे और चमेलीके फूलोंसे पूजा। रातको लौंग खाय। यों करनेसे अनन्त फलकी प्राप्ति होती है। आठवें सोमवारको केलेके फल और मरूआके फूलोंसे अमोघा शक्तिसहित जगदीश्वर शिवका पूजन करे। रातमें दूध पिये। इससे अग्निष्टोम यज्ञका फल प्राप्त होता है। करोड़ बार गंगास्नान करनेसे और सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमें वेदवेत्ता ब्राह्मणको दस हजार स्वर्णमुद्रा दान करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही सोमवारव्रत करनेपर कोटिगुना होकर मिलता है। नवाँ सोमवार प्राप्त होनेपर व्रतका उद्यापन करे। ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित गोल मण्डप और कुण्ड बनाये। चार दरवाजे बनाकर मण्डपके मध्यमें चौकोर वेदीका निर्माण करे। उसपर मण्डल बनाकर बीचमें कमल बनाये। आठों दिशाओंमें पृथक्-पृथक् सुवर्णसहित कलश स्थापित करके पूर्वसे लेकर वामादि शक्तियोंकी भी स्थापना करे। कर्णिकामें परम प्रकाशमय श्रीसोमनाथजीको विराजमान करे।

* प्रभासखण्ड * । १२३७


सोमनाथजीकी सुवर्णमयी प्रतिमा मनोमती नामक शक्तिके सहित स्वर्ण-शय्यापर स्थापित करनी चाहिये। सुवर्ण अथवा रजत आदिके पात्रको शहदसे भरकर उसे स्वर्ण शय्यापर आच्छादित करके रख दे और उसीपर शिव-प्रतिमाका पूजन करे। फिर वस्त्र, आभूषण, ताम्बूल, छत्र, चवँर, दर्पण, दीप, घण्टा, चाँदोवा, शय्या और गद्दा आदि वस्तुएँ सोमनाथकी प्रीतिके उद्देश्यसे पुराणवेत्ता आचार्यको दान करे। वहीं होम कराये। पूजन करके रातमें वहीं जागरण करे। अपने हृदयमें सोमनाथजीका ध्यान करते हुए पंचगव्य पीकर रहे। प्रातःकाल स्नान करके विधिपूर्वक सोमदेवका ध्यान करे। तत्पश्चात् दूध और खाँड़ आदिसे बने हुए अनेक प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंद्वारा नौ ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक भोजन कराये। दो वस्त्र और एक गोदान करके विसर्जन करे। इस प्रकार सोमवारव्रतका पालन करनेवाला पुरुष अक्षय पुण्यका भागी होता है। धन-धान्यसे सम्पन्न तथा स्त्री-पुत्र आदिसे सुशोभित होता है। उसके कुलमें कोई दरिद्र अथवा दुःखी नहीं होता। इस प्रकार विधिपूर्वक व्रत करनेपर मनुष्य देहत्यागके पश्चात् शिवलोकमें जाता है। महाभाग ! जहाँ भगवान् सोमनाथ विराजमान हैं, वहाँ शीघ्र जाओ।

महादेवजी कहते हैं—गोशृंग मुनिके यों कहनेपर गन्धर्वराज धनवाहन अपनी पुत्रीके साथ सब उपहार लेकर प्रभासक्षेत्रमें आये। वे सोमनाथका दर्शन करके आनन्दमें मग्न हो गये। यात्राके क्रमसे सोमनाथजीका पूजन करके उन्होंने कन्यासहित सोमवारव्रत किया। इससे उनके ऊपर सोमनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने उनकी कन्याके रोगोंका नाश करके समस्त कामनाओंकी सिद्धि देनेवाला गन्धर्वदेशका राज्य तथा अपनी भक्ति दी।

महादेवजीसे वरदान पाकर धनवाहन गन्धर्व कृतार्थ हो गये। उन्होंने सोमनाथजीके उत्तर भागमें दण्डपाणिके समीप भक्तिपूर्वक गन्धर्वेश्वर शिवकी स्थापना की। ये वरदासे पश्चिम पाँच धनुषकी दूरीपर स्थित हैं। पंचमी तिथिमें उनकी पूजा करके मनुष्य कभी दुःखी नहीं होता। धनवाहनकी पुत्री गन्धर्वसेनाने भी वहीं गौरीजीके समीप पूर्वभागमें तीन धनुषकी दूरीपर विमलेश्वर नामक शिवलिंगकी प्रतिष्ठा की, जो सब रोगोंका नाश करनेवाला है। तृतीयाको विमलेश्वरकी पूजा करके प्रत्येक स्त्री दुर्भाग्य-दोषसे मुक्त हो जाती, घरमें सम्मानित होती तथा पुत्र एवं संपूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेती है।


सोमनाथकी यात्राविधि

**पार्वती बोलीं—**देव ! अब आप सोमनाथजीकी महिमाका यथावत् वर्णन करें।

**महादेवजीने कहा—**भामिनि ! हेमन्त, शिशिर एवं वसन्त-ऋतुओंमें सोमनाथकी यात्रा करनी चाहिये। अथवा जब कभी भी आपके पास धन हो, मनमें यात्राके लिये उत्साह हो एवं कोई पर्व आया हो, तभी वहाँ यात्रा की जा सकती है। श्रद्धा-भक्ति ही यात्राका मुख्य हेतु है। अपने घरमें कोई नियम लेकर मन-ही-मन भगवान् शिवको प्रणाम करे। फिर विधिपूर्वक श्राद्ध करके अपने ग्रामकी परिक्रमा करे। तत्पश्चात् मौन एवं एकाग्रचित्त हो मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए यात्राके लिये निकले। काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, मात्सर्य और चपलताका त्याग करके मनुष्योंको वहाँकी यात्रा करनी चाहिये। तीर्थयात्रामें यज्ञोंसे भी बढ़कर पुण्य होता है। महादेवि ! सोमनाथजीकी यात्राके सिवा दूसरे किसी उपायद्वारा सुगमतासे स्वर्गलोककी प्राप्ति नहीं होती। जो मनुष्य पवित्र श्रद्धाभावसे युक्त हो सोमेश्वरकी यात्रा करते हैं, वे मनुष्य कलियुगमें धन्य हैं। जैसे

१२३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


समुद्रके समान दूसरा कोई जलाशय नहीं है, उसी प्रकार प्रभासक्षेत्रके सदृश अन्य कोई तीर्थ नहीं है। जिसके हाथ, पैर और मन भलीभाँति वशमें हों, जो विद्या, तप और कीर्तिसे युक्त हो, वह तीर्थके फलका भागी होता है। जो नियमसे रहे, नियमित भोजन करे, स्नान और जपमें तत्पर रहे तथा व्रत एवं उपवास करे, वह तीर्थके फलका पूर्णतः भागी होता है। जो क्रोधरहित, सत्यवादी, दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाला तथा संपूर्ण प्राणियोंके प्रति आत्मभाव रखनेवाला है, वह तीर्थके फलका भागी होता है। जो दरिद्र एवं धनहीन मनुष्य तीर्थयात्रामें तत्पर होते हैं, उन्हें विशेष नियमोंके बिना ही यज्ञफलकी प्राप्ति होती है। सभी वर्णों और आश्रमोंके लोगोंको तीर्थयात्रा फल देनेवाली है। जो दूसरे किसी कार्यसे तीर्थमें जाता है और वहाँ स्नान करता है, उसके लिये मुनियोंने स्नानके आधे फलकी प्राप्ति बतायी है। इस लोकमें पैदल तीर्थयात्रा करनेको उत्तम तप बताया गया है। किसी सवारीसे यात्रा करनेपर तीर्थमें स्नान-मात्रका ही फल मिलता है, यात्राका नहीं। देवि! जो मनुष्य अपने ही धन और अपने ही पैरोंसे तीर्थयात्रा सम्पन्न करते हैं, उन्हें चौगुने पुण्यकी प्राप्ति होती है। १ इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए भिक्षान्न-भोजनपूर्वक जो तीर्थयात्रा करते हैं, वे दसगुना पुण्य-फल पाते हैं। छाता और जूता धारण न करके भिक्षान्न-भोजन एवं इन्द्रियसंयमपूर्वक तीर्थयात्रा करनेवाला ब्राह्मण भयंकर पापोंसे मुक्त हो जाता है। प्रतिग्रह (दान-ग्रहण) न करनेवाले मनुष्यकी यात्रा दसगुना पुण्य देनेवाली होती है। जो ब्राह्मण लोभवश क्षेत्रमें दानकी रुचि रखता है, उस दूषित हृदयवालेके लिये न तो यह लोक सुखद होता है न परलोक ही। यदि शूद्र ब्राह्मणका वेष धारण करके तीर्थमें दान ग्रहण करता है तो वह तत्काल तृण और काष्ठके समान भस्म हो जाता है और नरकमें गिरता है। अतः औरोंकी तो बात ही क्या है, ब्राह्मणोंको भी थोड़ा भी प्रतिग्रह नहीं स्वीकार करना चाहिये।

तीर्थ दो प्रकारके होते हैं—कृत और अकृत। जो स्वकीयभावसे युक्त है अर्थात् जो अपने ही धन एवं पैरोंसे यात्रा करता और अपने हृदयमें उत्तम भाव रखता है, वही इन दोनों प्रकारके तीर्थोंका संपूर्ण फल पाता है। जो मनुष्य दूसरेके अन्नसे जीविका चलाते हुए यात्रा करता है, वह उस तीर्थ-यात्राके संपूर्ण फलका सोलहवाँ भाग पाता है। असमर्थ, अन्ध, पंगु तथा यायावर, २ जो दूसरोंसे अन्न लेनेके लिये विवश हैं, उनका प्रतिग्रह दोषरहित माना गया है। जो तीर्थसेवी मनुष्य ब्राह्मणोंको स्नानकी सुविधा (व्यय आदि) तथा खान-पान आदि देता है, वह तीर्थजनित संपूर्ण फलको पाता है। इष्ट देव, गुरु और माता-पिताको स्वेच्छानुसार पुण्य प्रदान करनेवाला पुरुष आठगुने फलका भागी होता है। स्नान, दान, तप, होम, स्वाध्याय, देवपूजा आदि पुण्य-कर्मका ही सर्वत्र दान होता है; पाप कर्मका नहीं। तीर्थमें जाकर पिता, माता, भाई, सुहृद् तथा गुरु—जिसके उद्देश्यसे भी मनुष्य गोता लगाता है, वह उस तीर्थ-स्नानके पुण्यका द्वादशांश प्राप्त कर लेता है। अतः वेदके बलका भरोसा करके प्रतिग्रह (दान लेने)-में रुचि न रखे। वेद बेचनेवाले पुरुषका स्पर्श कर लेनेपर स्नान करनेका ही विधान है। राजाके दरबारमें तथा विशेषतः तीर्थ और महातीर्थमें रहनेवाले विद्वान्‌को वेद-विक्रय कदापि नहीं करना चाहिये। जो तीर्थसेवी ब्राह्मण देनेपर भी दान न ले, वही वास्तवमें तीर्थ करता और अपने पूर्वजोंको भी पवित्र कर देता है। अन्यत्र किया हुआ पाप


१- तीर्थानुगमनं पद्भ्यां तपः परमिहोच्यते। तदेव कृत्वा यानेन स्नानमात्रं फलं लभेत् ॥
ये चान्ये कुर्वते शक्त्या तीर्थयात्रां तथेश्वरि। स्वकीयद्रव्यपादाभ्यां तेषां पुण्यं चतुर्गुणम् ॥
(स्क० पु०, प्र० ख० २६। २४-२५)

२- जो एक-एक गाँवमें एक रात डेरा डालते हुए सदा विचरता रहता है, उस साधु अथवा मुनिको 'यायावर' कहते हैं।

  • प्रभासखण्ड * १२३९

तीर्थमें क्षीण हो जाता है, परन्तु तीर्थमें किया गया पाप अन्य स्थानोंमें कभी नष्ट नहीं होता है। तीर्थसेवन करनेवाला जो ब्राह्मण अत्यन्त क्लेशग्रस्त होनेपर भी किसीसे दान नहीं लेता, सत्य बोलता और चित्त-वृत्तियोंको रोककर ध्यानस्थ रहता है, उसीके लिये तीर्थ उपकारक होता है। सत्ययुगमें पुष्कर, त्रेतामें नैमिषारण्य, द्वापरमें कुरुक्षेत्र तथा कलियुगमें प्रभासक्षेत्र मुख्य माना गया है। एक मनुष्य सहस्र युगोंतक एक पैरसे खड़ा होकर तपस्या करता है और दूसरा केवल प्रभास-तीर्थकी यात्रा करता है; दोनोंका फल समान है। प्रभास-तीर्थमें पहुँचकर मनुष्य सवारी छोड़ दे और अपने ही चरणोंसे पैदल चले। नाचते, हँसते, गाते और कीर्तन करते हुए सोमेश्वरदेवके समीप जाय; वहाँ सबसे पहले जटाजूटधारी भगवान् शिवका दर्शन करे। सोमनाथके सम्मुख स्थित हुए उस पुरुषको देखकर पितर सदैव संतुष्ट होते हैं, पितामह हर्षध्वनि करते हैं और कहते हैं—'हमारे वंशका सुपुत्र हमें तारनेके लिये प्रस्थित हुआ है।' सोमनाथजीके समीप जाकर पहले क्षौर कराये, तीर्थमें उपवास करे। गंगाके समान कोई तीर्थ नहीं है, कृष्णके समान दूसरी गति नहीं है, गायत्रीके सदृश दूसरा जपनीय मन्त्र नहीं है, व्याहृति-होमके समान होम नहीं है, जलके भीतर अघमर्षण-जपके समान दूसरा कोई पापनाशक कर्म नहीं है; तथा तीर्थमें उपवास करनेसे बढ़कर और कोई ऐसा उपाय नहीं है, जो पापियोंके सब पापोंको शान्त करनेवाला तथा सत्पुरुषोंको उनके अभीष्ट मनोरथोंको देनेवाला हो। देवस्थानमें उपवास करनेका विशेष विधान है। उपवास ही ब्राह्मणका श्रेष्ठ तप कहा गया है। छठे समय भोजन करना शूद्रोंके लिये महान् तप है। वर्णसंकरोंके लिये एक दिनका उपवास ही श्रेष्ठ तप है। यदि शूद्र छठे कालसे अधिक उपवास करे अर्थात् वह तीन दिनसे अधिक समयतक बिना भोजन किये तप करता रहे तो राष्ट्रकी हानि होती है तथा राजाके लिये महान् उपद्रव प्राप्त होता है। शूद्रको चाहिये कि वह कुशा न उखाड़े, कपिला गौका दूध न पिये, पीपलके पत्तेपर भोजन न करे, ॐकारका उच्चारण न करे, यज्ञका पुरोडाश न खाय, यज्ञोपवीत न पहने और वेद न पढ़े। शूद्रके कर्म केवल देवता-आदिको नमस्कार करनेमात्रसे सिद्ध हो जाते हैं (मन्त्रयुक्त प्रार्थनाकी आवश्यकता नहीं रहती)। शूद्रके लिये जिन कर्मोंका निषेध किया गया है, उन्हें यदि वह करता है तो वह अपने पितरोंके साथ नरकमें डूबता है। जिसने अपनी ग्यारह इन्द्रियोंको वशमें कर लिया है, वही तीर्थका फल पाता है; दूसरे अजितेन्द्रिय मनुष्य केवल क्लेशके भागी होते हैं। जो मानव तीर्थमें पितरोंका श्राद्ध और स्नान करता है तथा सब प्राणियोंके हितमें संलग्न रहता है, वह तीर्थके पूर्ण फलको पाता है। जो पाखण्डी, लोभी और परस्त्रीपरायण होकर तीर्थयात्रा करता है, वह केवल पापका भागी होता है।

महादेवि! यों जानकर मनुष्य विधिपूर्वक तीर्थयात्रा करे। पहले तीर्थमें उपवास करके श्रद्धायुक्त हो दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करे, उसके बाद वहाँ भोजन करे। ब्राह्मणको उस दिन कहीं भी पराया अन्न नहीं खाना चाहिये। भोजन देनेवालेको सौगुना पुण्य मिलता है; अतः व्रती, तीर्थयात्री एवं विशेषतः विधवाको चाहिये कि वह तीर्थमें उपवास करे और यथासंभव दूसरेको अन्न दे। पराया अन्न भोजन करनेपर जिसका अन्न खाया जाता है, उसीको पुण्य-फल प्राप्त होता है।

अब मैं विधवा स्त्रीके लिये तीर्थयात्राकी विधि बतलाता हूँ। विधवाको उचित है कि वह रोली, चन्दन, पान, पुष्पमाला, रंगीन वस्त्र, शय्या आदि बिछावन, अशिष्ट मनुष्योंसे वार्तालाप, दुबारा भोजन, पुरुषकी ओर देखना और हँसना छोड़ दे। जोर-जोरसे बोलना, जूते पहनना, नृत्य और गीतको त्याग दे। केश रखना, आँखोंमें काजल लगाना, उबटन लगवाना, कुलटा स्त्रियोंसे

१२४० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

बात करना और पण्डिताई दिखाना छोड़ दे।* यति, ब्रह्मचारी और विधवा-ये नित्य स्नान और श्वेत वस्त्र धारण करें।

सत्ययुगमें तप उत्तम है, त्रेतामें ध्यान, द्वापरमें यज्ञ और कलियुगमें केवल दान श्रेष्ठ धर्म है। मुनिलोग प्रभासमें पहुँचकर कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि तप करते हैं और दूसरे लोग कलियुगमें प्रभासक्षेत्रमें जाकर ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक दान देते हैं; किंतु वे उस दानसे ही तपस्याका फल पा लेते हैं। धान्य, रत्न, गुड, सुवर्ण, तिल, रुई, शक्कर, घी, नमक और चाँदी - ये दस पर्वत कहे गये हैं (अर्थात् धान्य-पर्वत, रत्नमय पर्वत आदि रूपसे इन वस्तुओंके पर्वत (ढेरी)-का दान करना चाहिये)। गुड़, घी, दही, मधु, जल, रुई, तिल, कम्बल, रत्न तथा नमक-ये दस प्रकारकी वस्तुएँ धेनु मानी गयी हैं (इनकी धेनुका दान किया जाता है) इन दानोंमेंसे कोई-न-कोई एक दान विभिन्न तीर्थोंमें अवश्य करना चाहिये। महादेवि ! सरस्वती समुद्रसंगममें विद्वान् ब्राह्मणके लिये गृहस्थोपयोगी वस्तु एवं सर्वस्व दान करना चाहिये। बहुत हो या थोड़ा, ब्राह्मणोंको प्रिय वस्तुओंका ही दान करना चाहिये। जिस तीर्थमें शिवलिंग तथा निर्मल जलवाला जलाशय हो, वहाँ पहले अग्निहोत्र करके विशिष्ट दान देना चाहिये। प्रत्येक तीर्थमें देवताओं और पितरोंका तर्पण, श्राद्ध, दक्षिणासहित दान तथा गोदान करना चाहिये। यह आवश्यक विधि है। देवताओंको स्नान कराकर चन्दन लगाये और उनकी पूजा करे। पृथ्वीका भी भक्तिपूर्वक पूजन और लेपन करे। देवमन्दिरमें चूना लगाकर उसे सफेद करे। यदि मन्दिर पुराना हो गया हो तो उसका जीर्णोद्धार करे। देवसेवाके लिये फुलवाड़ी लगाये। निर्मल जलका कुआँ बनवाये तथा वन-उपवनका निर्माण कराये। ब्राह्मणोंको प्रचुर दान दे और देव-पूजन करे। सर्वत्र देवयात्राके लिये यह विधि नियत की गयी है। प्रसिद्ध तीर्थमें महादान और मध्यममें मध्यम श्रेणीका दान करे। गोदान तो सभी तीर्थोंमें करनेयोग्य है। इस प्रकार भक्तिपूर्वक दान करके मनुष्य अपने जन्मका फल पा लेता है।

पार्वतीजीने पूछा- प्रभो! जो मनुष्य प्रभासक्षेत्रमें आकर भी भक्ति, दान, स्नान और मन्त्रसे विहीन हैं, उन्हें क्या फल मिलता है? यह बतायें।

महादेवजीने कहा- देवि ! धनी हों या निर्धन, मन्त्रज्ञ हों या मन्त्ररहित, जो प्रभासमें मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे सभी शिवलोकको जाते हैं। प्रिये ! जो मन्त्रहीन और निर्धन मनुष्य वहाँ देह-त्याग करते हैं, उन्हें मैं एक बड़ा भारी विमान देता हूँ। वे स्नान-दानके अनुरूप परम पदको प्राप्त होते हैं। कोई स्नानके प्रभावसे, कोई दानसे, कोई सोमेश्वरलिंगके प्रभावसे, कोई लिंगपूजासे, कोई ध्यानके प्रभावसे, कोई योगकी महिमासे, कोई मन्त्र-जपसे, कोई तपसे, कोई तीर्थसंन्याससे तथा कोई भक्तिभावके अनुसार वहाँ परमपदको प्राप्त होते हैं। ये तथा और भी बहुत-से उत्तम, मध्यम और अधम श्रेणीके लोग सूर्यसदृश तेजस्वी विमानोंद्वारा शिवलोकमें जाते हैं।

पहले प्रणवका उच्चारण करके तीर्थके पवित्र जलका स्पर्श करे। तदनन्तर भीतर प्रवेश करके मन्त्रपाठपूर्वक स्नान करे। मन्त्र इस प्रकार है-

ॐ नमो देवदेवाय शितिकण्ठाय दण्डिने।
रुद्राय वामहस्ताय चक्रिणे वेधसे नमः ॥


* विधवा चैव या नारी तस्या यात्राविधिं ब्रुवे। कुंकुमं चन्दनं चैव ताम्बूलं च रजस्तथा ॥
रक्तवस्त्राणि सर्वाणि शय्याद्यास्तरणानि च। अशिष्टैः सह संभाशां द्विवारं भोजनं तथा ॥
पुंसां प्रदर्शनं चैव हासं चैव विवर्जयेत्। सशब्दोपानहौ चैव नृत्यगीतं च वर्जयेत् ॥
धारणं चैव केशानामञ्जनं च विलेपनम्। असतीजनसंसर्गं पाण्डित्यं च परित्यजेत् ॥
(स्क० पु०, प्रभा० ख० २६। ७८-८१)

* प्रभासखण्ड * १२४१

सरस्वती च सावित्री देवमाता विभावरी।
सन्निधाने भवत्वत्र तीर्थे पापप्रणाशने॥
जो सच्चिदानन्दस्वरूप, देवताओंके भी देवता, कण्ठमें नीला चिह्न धारण करनेवाले, दण्डधारी, सुन्दर हाथवाले, चक्रधारी तथा विश्वके उत्पादक हैं, उन भगवान् रुद्रको नमस्कार है, नमस्कार है। इस पापनाशक तीर्थमें आकर सरस्वती, सावित्री तथा देवमाता विभावरी निवास करें, हमें अपना सामीप्य दें।
सभी तीर्थोंके लिये यह मन्त्र बताया गया है। इसका उच्चारण करके विधिपूर्वक नमस्कार एवं स्नान करे। उस दिन उपवास भी करे। वर्षमें एक बार उस तिथिपर अवश्य उपवास करना चाहिये।


समुद्रमें स्नानकी विधि और महिमा

महादेवजी कहते हैं—सोमनाथके दक्षिणभागमें त्रिभुवनविख्यात पद्मक नामक तीर्थ है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। पहले सोमेश्वरके समीप क्षौर कराकर मन-ही-मन मेरा चिन्तन करते हुए उस तीर्थमें अपने केश डाल दे। उसके बाद पुनः स्नान करे। मनुष्य जो कुछ भी पाप करता है, वह सब केशोंमें स्थित होता है; अतः केशोंको अवश्य ही तीर्थमें फेंक देना चाहिये। सौभाग्यवती स्त्रियोंको चाहिये कि वे सब केशोंको हाथसे पकड़कर अग्रभागकी ओरसे दो अंगुल कटवा दें (उनके लिये मुण्डनकी विधि नहीं है)। मुण्डन और स्नानके पश्चात् देवताओं और पितरोंका तर्पण करे। सभी तीर्थोंमें मुण्डन और उपवासकी विधि है। जो पर्वका दिन छोड़कर और किसी समय प्रभासक्षेत्रमें बिना मन्त्रके स्नान करता है, वह उसका पुण्य-फल नहीं पाता। बिना मन्त्रके, बिना पर्वके और बिना क्षौरकर्म किये समुद्र-जलका स्पर्श नहीं करना चाहिये। निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करके सागरके जलका स्पर्श करना उचित है—

ॐ नमो विष्णुगुप्ताय विष्णुरूपाय ते नमः।
सान्निध्ये भव देवेश सागरे लवणाम्भसि॥

'समुद्रदेव! तुम भगवान् विष्णुसे सुरक्षित हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम साक्षात् विष्णुके स्वरूप हो, तुम्हें नमस्कार है। देवेश्वर! विष्णो! आप इस क्षीरसागरके जलमें मेरे समीप स्थित हों।'

यों कहकर तीर्थसेवी मानव नदीपति समुद्रके जलमें स्नान करे। फिर श्रद्धायुक्त होकर तिलमिश्रित जलसे देवता, मनुष्य और पितरोंका तर्पण करे। सहस्रों जन्मोंमें मनुष्य जो पाप करता है, उसे एक बार समुद्रके जलमें नहाकर नष्ट कर देता है। ब्रह्माजीने समुद्रसे कहा है—'सागर! जबतक लोकमें तुम्हारी स्थिति रहेगी, जबतक आकाशमें सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र बने रहेंगे, तबतक पूर्वज तुम्हारे खारे जलके अमृतसे तृप्त होंगे। जो मनुष्य शुद्धचित्त होकर प्रतिमास तुम्हारे जलमें स्नान करेगा, उसे प्रतिदिन पुण्डरीक यज्ञका फल मिलेगा। श्रीसोमनाथ तथा समुद्रके बीचकी भूमिमें जिनकी मृत्यु होगी, वे पापी रहे हों तो भी निष्पाप होकर स्वर्गलोकमें जायँगे। महादेवि! समुद्रके भीतर पाँच करोड़ शिवलिंग हैं, जिन्हें समुद्रने इस मन्वन्तरमें अदृश्य कर दिया है। इसी प्रकार वहाँ अग्निकुण्ड तथा पद्म-सरोवर भी हैं, जो इस मन्वन्तरमें समुद्रजलसे आवृत हो गये हैं। दक्षिण ओर चक्र तथा मैनाकके मध्यभागमें सौ धनुष लंबा-चौड़ा सुवर्णमय कुण्ड है; सोमनाथसे दक्षिण सौ धनुषकी दूरीपर वह स्थान है। उत्तर मानससे पूर्व जहाँ कृतस्मरदेव हैं; वहाँतक उसकी सीमा है; यह गुप्त स्थान है।'

१२४२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सोमनाथके दर्शन-पूजनकी महिमा और पंचस्रोता सरस्वतीका आविर्भाव तथा माहात्म्य; बडवानलका समुद्रमें वास

महादेवजी कहते हैं—देवि! इस प्रकार विधिपूर्वक स्नान करके समुद्रको अर्घ्य दे; गन्ध, पुष्प, वस्त्र और चन्दन आदिसे उनकी पूजा करे; तत्पश्चात् तर्पण करके भगवान् कपर्दीके समीप जाय। उनकी भी पुष्प, धूप, गन्ध तथा वस्त्रद्वारा भक्तिपूर्वक पूजा करे। 'गणानां त्वां' इत्यादि मन्त्र पढ़कर उन्हें अर्घ्य निवेदन करे। शूद्रोंको अष्टाक्षर मन्त्र (गं गणपतये नमः)-का उच्चारण करके अर्घ्य देना चाहिये। तदनन्तर सोमनाथजीके समीप जाय। उन्हें विधिसे स्नान कराकर शतरुद्रियका जप (पाठ) करे। रुद्रपंचांगोंका तथा अन्यान्य रुद्रसंहिताओंका भी जप करना चाहिये। दूध, दही, घी, मधु तथा इक्षुरससे सोमेश्वरको नहलाकर उनके अंगोंमें कुंकुमका लेप करे। उसमें कपूर, खस और कस्तूरीको भी मिलाये रखना चाहिये। इसके बाद सुगन्धयुक्त चन्दन और फूलोंसे पूजा करे। नाना प्रकारके धूप निवेदन करके उन्हें वस्त्रसे आवेष्टित करे। तत्पश्चात् उत्तम नैवेद्य अर्पण करे और इच्छानुसार स्तुति करे। साष्टांग प्रणाम करके गीतवाद्य आदिका आयोजन करे। धर्म-कथा सुने और भगवान्‌की परिक्रमा करे। तदनन्तर ब्राह्मणों, तपस्वियों, दीनों, अन्धों, कंगालों तथा भिक्षुओंको अपनी शक्तिके अनुसार दान दे। उस दिन उपवास करना चाहिये। जिस दिन पहले-पहल मनुष्य सोमनाथका दर्शन करे; उस तिथिको एक वर्षतक भक्तिपूर्वक उपवास करे। यों करके मनुष्य अपने जन्मका फल पा लेता है। पिता और माताके कुलका उद्धार कर देता है। सोमनाथका दर्शन करनेसे सब पापोंका नाश हो जाता है; अतः सात जन्मोंतक कभी दुःख, दारिद्र्य और दुर्भाग्यकी प्राप्ति नहीं होती। सोमनाथके प्रति भक्ति बढ़ती है। पहले दूधसे स्नान कराकर फिर जलसे स्नान कराना चाहिये। जो मनुष्य मध्याह्नकालमें और सन्ध्याके समय सोमेश्वर शिवकी आरतीका दर्शन करते हैं, वे फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेते।

पार्वतीजीने पूछा—भगवन्! प्रभासक्षेत्रमें सरस्वती नदी कहाँसे आयी है।

महादेवजीने कहा—देवि! सुनो। हरिणी, वज्रिणी, न्यंकु, कपिला तथा सरस्वती—इन पाँच स्रोतोंसे युक्त सरस्वती नदी इस क्षेत्रमें प्रवाहित होती है। एक समय देवाधिदेव भगवान् विष्णुने सरस्वतीसे कहा—'कल्याणि! तुम पश्चिम दिशामें क्षारसमुद्रके समीप जाओ और बडवानलको वहीं ले जाकर डाल दो। इससे सब देवता निर्भय हो जायँगे।' तब सरस्वती बोलीं—'मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ। मेरे पिता विद्यमान हैं, मैं उनकी आज्ञाकारिणी पुत्री हूँ। ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करनेवाली कुमारी हूँ। पिताकी आज्ञाके बिना एक पग भी कहीं नहीं जाऊँगी।'

तब भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीके समीप जाकर कहा—'देवेश्वर! आप देवताओंका यह कार्य सिद्ध कीजिये।' उनके यों कहनेपर ब्रह्माजी अपनी कुमारी कन्यासे बोले—'देवि! तुम भयसे व्याकुल हुए उन सब देवताओंकी रक्षा करो।'

सरस्वती बोलीं—पिताजी! आपकी आज्ञासे मैं निश्चय ही वहाँ जानेके लिये उद्यत हूँ। परंतु यह भयंकर बडवानल मेरे शरीरको जला देगा। इसके सिवा इस समय भूतलपर कलियुग आया है। अतः कलियुगके पापाचारी मनुष्य मेरा स्पर्श करेंगे।

ब्रह्माजीने कहा—बेटी! यदि तुम पापी जनोंसे भरी हुई इस पृथ्वीका स्पर्श करना नहीं चाहतीं, तो पातालमें स्थित होकर इस बडवानलको समुद्रमें ले जाओ। जब बडवानलका ताप अधिक हो जाय, तब पृथ्वी फोड़कर प्रत्यक्ष हो जाना

  • प्रभासखण्ड * १२४३

और पूर्ववाहिनी होकर प्राची सरस्वतीके नामसे विख्यात होना।

महादेवजी कहते हैं—ब्रह्माजीका यह आदेश पाकर सरस्वती अपने तेजसे सम्पूर्ण जगत्‌को प्रकाशित करती हुई चलीं। उस समय अपने पीछे-पीछे आती हुई गंगाजीसे सरस्वतीने कहा—'सखी! अब मैं पुनः कहाँ तुम्हारा दर्शन करूँगी?' गंगाजीने स्नेहभरी वाणीमें उत्तर दिया—'सुव्रते! पश्चिम जाती हुई तुम जब-जब पूर्वदिशाकी ओर मुँह करके देखोगी, तब-तब मुझे अपने समीप खड़ी हुई पाओगी। वहाँ मैं सब देवताओंके साथ तुम्हें दर्शन दूँगी।' तब उन्होंने गंगाजीसे विदा लेकर कहा—'भद्रे! अब तुम अपने स्थानको जाओ, मुझे पुनः तुम्हारा दर्शन प्राप्त हो।' इसी प्रकार सरस्वतीने यमुना, गायत्री और सावित्री आदि सखियोंको भी विदा किया। तदनन्तर हिमालय पर्वतपर आकर वे एक पाकड़के वृक्षसे नदीरूपमें प्रकट हुई और पृथ्वीपर उतरीं। उस समय पुण्यसलिला सरस्वतीदेवीकी ब्रह्मर्षिगण स्तुति कर रहे थे। बडवानलको लेकर वह नदी बड़े वेगसे चली और पृथ्वी फोड़कर पातालमें प्रवेश कर गयी। कहीं-कहीं मर्त्यलोकमें भी प्रत्यक्ष हो जाती थी। इस प्रकार पातालमार्गसे समुद्रके निकट गयी। खदिरामोद नामक वनमें पहुँचकर सरस्वतीने समुद्रको देखा और बडवानलको लेकर उसके समीप जानेका विचार किया। जब वह दक्षिणकी ओर मुख करके प्रस्थित हुई, उसी समय वेदोंके पारंगत विद्वान् चार महर्षि प्रभासक्षेत्रमें आये। उनके नाम इस प्रकार हैं—हिरण्य, वज्र, न्यंकु और कपिल। वे चारों तपस्वी थे। उन्होंने अलग-अलग स्नान करनेके लिये सरस्वतीका आवाहन किया। इतनेमें ही समुद्र भी सहसा सरस्वतीके सम्मुख उपस्थित हुआ। तब सरस्वतीने पाँच धाराओंमें विभक्त होकर उन सबको सन्तुष्ट किया। इससे इस पृथ्वीपर उसके पाँच नाम विख्यात हुए—हरिणी, वज्रिणी, न्यंकु, कपिला और सरस्वती। यह पंचस्रोता सरस्वती अपने भीतर जलपान और स्नान करनेसे मनुष्योंके पाँच महापातकोंका नाश करती है। एक सप्ताहतक वहाँ उपवास, जप, होम, स्नान और जलपान करनेसे वह सब पापोंका नाश कर देती है। सरस्वती अपने भीतर आचमन और स्नान करनेपर मनुष्योंकी घोर ब्रह्महत्याका तथा कपिला मदिरापानरूप महापातकका नाश करती है। न्यंकु नदीमें स्नान करके पुरुष चोरीके महापातकसे मुक्त हो जाता है। वज्रिणी नदीका जल पीनेसे गुरुपत्नीगमनरूप महापातकका नाश होता है। हरिणी नदी सात दिनोंतक स्नान करनेसे संसर्गजनित महापातकका अपहरण करनेवाली है। इस तरह पाँच धाराओंमें विभक्त सरस्वती नदी सब पातकोंका निश्चय ही नाश कर देती है। तदनन्तर पुनः बडवानलको लेकर सरस्वती समुद्रके समीप स्थित हुईं। बडवानलने उठती हुई तरंगोंसे युक्त समुद्रको देखकर सरस्वतीसे पूछा—'भद्रे! यह क्या है? क्षारसमुद्र मुझसे डरता क्यों है?' सरस्वतीने हँसकर कहा—'अग्ने! तुमसे कौन भयभीत न होगा।' बडवानल बोला—'भद्रे! मैं तुम्हें वर दूँगा, इच्छानुसार वर माँगो।' तब सरस्वतीने भगवान् विष्णुका स्मरण किया। भगवान्‌ने हृदयमें प्रकट होकर उसे दर्शन दिया। सरस्वतीने पूछा—'भगवन्! बडवानल मुझे वरदान देता है; बताइये, मैं इससे क्या माँगूँ?' हृदयस्थित भगवान्‌ने कहा—'कल्याणी! तुम उससे कहो कि वह अपना मुँह सूईके समान बना ले।' तब सरस्वतीदेवीने उससे कहा—'बडवानल! तुम सुईके समान मुँह बनाकर समुद्रका जल पीते रहो।' उसके यों कहनेपर बडवानलने सूईके छिद्रके समान अपना मुँह कर लिया। जैसे घटीसूचक पात्रमें धीरे-धीरे जल प्रवेश करता है, उसी प्रकार वह भी जल पीने लगा।

महादेवजी कहते हैं—तदनन्तर सरस्वतीने समुद्रको बुलाकर कहा—'तुम सब देवताओंके आदि तथा प्राणियोंके प्राण हो, भगवान् विष्णुकी आज्ञासे यहाँ आकर इस बडवानलको ग्रहण

१२४४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करो।' समुद्रने कहा—'देवि! लाओ, बडवानलको मुझे दे दो।' तब सरस्वतीने बडवानलसे कहा—'जैसे अग्निदेव घीकी आहुति ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार तुम भी जल भक्षण करो।' यों कहकर उसने वह बडवानल समुद्रको समर्पित कर दिया। इसके बाद सरस्वती पुनः नदी होकर नारदेश्वरके मार्गसे समुद्रमें मिल गयी। वह स्वरूपसे ही परम पवित्र थी, फिर प्रभासक्षेत्र और समुद्रके सम्पर्कसे अत्यन्त पुण्यमयी हो गयी। महाबली बडवानल समुद्रमें रहकर अपने मुखसे उसका जल पीने लगा। उसके उच्छ्वासकी वायुसे उठा हुआ जल ज्वारके रूपमें समुद्रसे बाहरतक दौड़ जाता है। इस प्रकार समस्त पातकोंका नाश करनेवाली सरस्वती ब्रह्मलोकसे उत्तम प्रभासक्षेत्रमें आयी है। समुद्रके समीप सोमनाथके दक्षिण एवं आग्नेय दिशामें सरस्वतीकी स्थिति है। पहले अग्नितीर्थमें स्नान करके मनुष्य विधिपूर्वक सरस्वतीका पूजन करे। वहाँ ब्राह्मणदम्पतिको भोजन कराकर उन्हें पहननेके लिये वस्त्र दे। उसके बाद कपर्दीश्वरकी पूजा करे। पार्वती! इस प्रकार यह सरस्वती नदीके प्रकट होनेका वृत्तान्त तुमसे कहा गया है।


सरस्वती नदीकी महिमा तथा वहाँ स्नान, दान और श्राद्धका माहात्म्य

महादेवजी कहते हैं—प्रभासक्षेत्रमें सरस्वती नदी स्वर्गलोककी सीढ़ीके समान स्थित हैं। प्राची सरस्वती सर्वत्र दुर्लभ हैं; परंतु प्रभास, कुरुक्षेत्र और पुष्करमें उनका दर्शन विशेष दुर्लभ है। अग्नितीर्थके समीप सरस्वती बहती हैं। जो पहले उनका पूजन करता है, वह तीर्थके फलका भागी होता है। सागर तीर्थ भी पापोंका नाश और पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है। उसके दर्शनसे ही महायज्ञका फल होता है। अग्नितीर्थमें स्नान करके क्रमशः सरस्वती-कपर्दीश्वर, केदारेश्वर, भीमेश्वर तथा सोमेश्वरदेवका विधिपूर्वक पूजन करके बालरूपधारी ब्रह्माजीकी पूजा करे। इस प्रकार शैवी यात्रा बतायी गयी है।

जो मनुष्य भोजन करके या बिना भोजन किये, दिनमें अथवा रातमें चन्द्रभागा, गंगा और सरस्वती—इन तीन नदियोंका जल पीते हैं, वे देवताके समान हैं। जहाँ प्राची सरस्वती बहती हैं, वहाँ काल, अग्नि और यमराजका भय नहीं है। जैसे कामदा गौएँ हर समय फल देनेवाली होती हैं, वैसे ही प्राची सरस्वती भी हैं। जहाँ चिन्तामणिके समान प्राची सरस्वती हैं, वहाँ स्वर्ग और मोक्ष दोनों सुलभ हैं। अठासी हजार ऊर्ध्वरेता मुनि जहाँ संन्यास आश्रममें स्थित हैं, उस सरस्वतीसे बढ़कर और कौन-सा तीर्थ है। पार्वती! प्रभास नामक महाक्षेत्रमें सरस्वतीके उत्तर तटपर जो अपने शरीरका त्याग करता है, वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जो मनुष्य इस तीर्थमें श्राद्ध करेंगे, वे अपनी इक्कीस पीढ़ियोंके साथ स्वर्गलोकमें चले जायँगे। यहाँ कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको सदा ही स्नानकी विधि है। यहाँ श्राद्ध करनेसे पितरोंको अक्षय तृप्ति मिलती है। जो यहाँ अधिक अन्न दान करते हैं, वे मोक्ष मार्गको प्राप्त होते हैं। जो पुरुष ब्राह्मणको यहाँ सुन्दर दही देता है, वह गोलोकमें जाकर उत्तम भोग भोगता है। जो भक्तिपूर्वक श्रेष्ठ ब्राह्मणको ऊनी चद्दर दान करता है, उसे उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है। जो भक्तिपूर्वक इस तीर्थमें स्नान करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो ब्रह्मलोकमें पूजित होता है।

  • प्रभासखण्ड * | १२४५

'कपर्दी' की अग्रपूजाका हेतु और महिमा

पार्वतीजीने पूछा—भगवान्! आपने जो यह कहा है कि पहले 'कपर्दी' का दर्शन करे, इसका क्या कारण है? क्योंकि वह तो आपका सेवक है। स्वामीके पश्चात् ही सेवकका पूजन हो, यह सनातन धर्म है।

महादेवजी कहते हैं—प्रभासक्षेत्रमें सोमेश्वर देवके रूपमें जो लिंगरूपधारी सदाशिव विराजमान हैं, वे इन्द्रियातीत पुरुषोंद्वारा चिन्तन करने योग्य हैं। उनके वामभागमें वाराहरूपधारी भगवान् विष्णु और दक्षिणभागमें प्रजापति ब्रह्माजी विराजमान हैं। द्वापरकी सन्धिमें कलियुग प्राप्त होनेपर स्त्री, म्लेच्छ, शूद्र तथा अन्य पापाचारी मनुष्य भी भगवान् सोमनाथका दर्शन करके शीघ्र ही स्वर्गलोकको चले जाते थे। बालक और वृद्ध सभी उत्तम गतिको प्राप्त होते थे। यह देख इन्द्र आदि देवता मेरी शरणमें आये और हाथ जोड़कर बोले—'भगवान्! आपके प्रसादसे यह सम्पूर्ण स्वर्ग मनुष्योंसे भर गया है, अतः अब हमारे रहनेके लिये कोई दूसरा स्थान दीजिये। जिनके लिये भयंकर कुम्भीपाक सजाया गया, रौरव तथा शाल्मलि आदि नरकोंका निर्माण किया गया, उन्हें स्वर्गमें स्थित देखकर यमराजने अपना व्यापार ही छोड़ दिया है।'

मैंने कहा—देवताओ! मैंने चन्द्रमाकी भक्तिसे संतुष्ट होकर उनसे यह प्रतिज्ञा की है कि प्रभासक्षेत्रमें सदा मेरा निवास होगा। मैं अपनी कही हुई बात किसी प्रकार पलट नहीं सकता। जो लोग वहाँ मेरा दर्शन करेंगे, वे निश्चय ही स्वर्गलोकमें जायँगे।

पार्वती! यह सुनकर देवता भयसे व्याकुल हो गये और तुम्हें वहाँ खड़ी देख हाथ जोड़कर बोले—'माता! तुम्हीं हमें आश्रय दो।' यों कहकर वे तुम्हारी स्तुति करने लगे।

देवता बोले—देवेश्वरी! तुम्हें नमस्कार है। जगदम्बा! तुम्हें नमस्कार है। कमलके समान नेत्रोंवाली देवी! तुम्हें नमस्कार है। सुवर्णके सदृश गौर आकृति धारण करनेवाली गौरी! तुम्हें नमस्कार है। जगत्की सृष्टि और संहार करनेवाली महेश्वरि! तुम्हें नमस्कार है। शंकर प्रिये! तुम्हें नमस्कार है। कालका भी नाश करनेवाली कालरात्रि! तुम्हें नमस्कार है। गिरिराजकुमारी! तुम्हें नमस्कार है। आर्ये! भद्रे! विशालाक्षि! त्रिलोकसुन्दरि! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हीं रति, धृति, श्री, स्वाहा, स्वधा, सती, दुर्गा, मति, मेधा, पृथ्वी तथा सर्वस्वरूपा हो। तुमने इस सम्पूर्ण चराचर त्रिलोकीको व्याप्त कर रखा है। नदियों, पर्वत-शिखरों, समुद्रों, गुफाओं, वनों, मन्दिरों तथा मुनियोंके आश्रमोंमें भी तुम विराज रही हो। देवि! तीनों लोकोंमें ऐसा कोई स्थान मैं नहीं देखता, जहाँ तुम विद्यमान न हो। विशाल नेत्रोंवाली शिवे! हमारी यह प्रार्थना सुनकर महान् भयसे हमें बचाओ।

पार्वती! इन्द्र आदि देवताओंके इस प्रकार स्तवन करनेपर तुम करुणाके वशीभूत हो हाथ मलने लगीं। इससे गजराजके-से मुखवाला एक मनोहर कुमार प्रकट हुआ, जिसके चार भुजाएँ थीं। तब तुमने देवताओंसे कहा—'देवगण! मैंने तुम्हारे हितके लिये इस बालकको उत्पन्न किया है। यह मनुष्योंके समक्ष सब प्रकारके विघ्न उपस्थित करेगा, जिससे मोहग्रस्त होकर वे सोमनाथका दर्शन नहीं करेंगे और अपने पापोंके कारण नरकमें जायँगे।'

इसके बाद गजाननने तुमसे विनयपूर्वक पूछा—'माँ! मुझे आज्ञा दो, मैं तुम्हारी क्या सेवा करूँ?' तुमने कहा—'बेटा! तुम प्रभासक्षेत्रमें जाओ, जहाँ सोमेश्वरलिंगके रूपमें महादेवजी सदैव निवास करते हैं। वहाँ रहकर सोमनाथकी रक्षा करो, जिससे मनुष्योंको उनका दर्शन न होने

१२४६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पाये।' तुम्हारे इस आदेशसे गजानन वहाँ गये और सदा वहीं स्थित रहकर मनुष्योंके सम्मुख विघ्न उपस्थित करते हैं। जब किसी मनुष्यको वे सोमनाथके प्रति आते देखते हैं, तब उसके मार्गमें स्त्री, पुत्र, गृह, क्षेत्र, धन, धान्य आदिका महान् मोह लाकर रखते हैं और इस प्रकार उसके सामने बड़ा भारी विघ्न डालते हैं, जिससे वे मानव सोमेश्वर शिवका दर्शन नहीं कर पाते। अथवा गलगण्ड आदि रोग पैदा कर देते हैं, जिससे पीड़ित होकर मनुष्य सोमेश्वरके दर्शनसे वंचित रह जाता है। वे गजानन ही लोकपूजित कपर्दी हैं। अतः सोमेश्वरकी प्राप्तिके लिये प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक कपर्दीकी पूजा करनी चाहिये। उन प्रभासक्षेत्रके रक्षक गणेशका निम्नांकित स्तोत्रद्वारा स्तवन करना चाहिये। महादेवि! मैं कपर्दीका वह विघ्ननाशक स्तोत्र कहता हूँ, सावधान होकर सुनो— | करनेवाले तथा हविष्यके प्रेमी हैं एवं पूजित न होनेपर जो मनुष्योंके सब कार्योंमें विघ्न डालते हैं, उन महाभयंकर पार्वतीनन्दन गणेशको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनके गण्डस्थलसे मदकी धारा बहती है, नेत्र भयंकर हैं और मुख हाथीके समान है, जिनकी कान्ति सदा एक-सी रहती है, जो ध्रुव, निश्चल और शान्त हैं, उन विनायकको मैं प्रणाम करता हूँ। भगवन्! आप सबसे पहले प्रकट हुए हैं, आपने प्राचीन देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये हाथीका रूप धारण करके समस्त दानवोंको भयभीत किया और अपनेको ऋषियों तथा देवताओंका स्वामी सिद्ध कर दिखाया। ॐ विघ्नराजको नमस्कार है, कपर्दीको नमस्कार है। अत्यन्त भयंकर दाढ़वाले प्रभासक्षेत्रनिवासी गणेशको नमस्कार है। सोमनाथकी यात्राके निर्विघ्नतापूर्वक पूर्ण होनेके लिये कपर्दीको नमस्कार करके मैं सिद्धि-बुद्धि-प्रियतम मंगलकारी विघ्नराजकी स्तुति करता हूँ। जो महागणपति शूरवीर, किसीसे भी पराजित न होनेवाले, जयकी वृद्धि करनेवाले, एक-दो तथा चार दाँतवाले, चार भुजावाले, त्रिनेत्रधारी, हाथमें त्रिशूल रखनेवाले, लाल नेत्रोंवाले, वरदायक, अजेय, शंकुकर्ण, प्रचण्ड, दण्डनायक, लोहदण्डधारी, मुखसे हविष्य ग्रहण | इस प्रकार पूर्वकालमें देवताओंने शिवपुत्र गणेशका स्तवन करके अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये रक्तचन्दनमिश्रित जल और लाल फूलोंसे उनका पूजन किया। जो चतुर्थीको लाल वस्त्र धारण करके एक या दोनों समय पूर्वोक्तरूपसे गणेशजीकी पूजा करता है और नियमसे रहते हुए नियमित भोजन करता है, वह सबको अपने वशमें कर लेता है। सम्पूर्ण तीर्थों और समस्त यज्ञोंसे जो फल प्राप्त होता है, उसीको गणेशजीकी स्तुति करके मनुष्य पा लेता है। उसे कभी विघ्नका भय नहीं होता और वह अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण करनेवाला होता है। जो प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह छः महीनेमें ही इसका फल पाता है। वर्षभरमें उसे सिद्धि प्राप्ति होती है और भगवान् सोमनाथ कृपापूर्वक उसे दर्शन देते हैं।


केदारलिंगकी महिमा, राजा शशिविन्दुके पूर्वजन्मका वृत्तान्त

महादेवजी कहते हैं—महादेवि! कपर्दीका पूजन करनेके पश्चात् मनुष्य केदारलिंगके समीप जाय। कपर्दीसे अग्निकोणमें भीमेश्वरके समीप केदारेश्वरनामक स्वयम्भू-लिंग स्थित है। वह कल्पपर्यन्त स्थिर रहनेवाला लिंग मुझे बहुत ही प्रिय है। उस महाप्रकाशमय लिंगको वृद्धिलिंग | भी कहते हैं। देवि! स्वयं मैंने भी उनकी पूजा की है। जो चतुर्दशी (शिवरात्रि)-को वहाँ निराहार रहकर जागरण करता है, उसे सनातन लोक प्राप्त होते हैं। प्राचीन युगमें केदारेश्वरका नाम रुद्रेश्वर था। इस कलियुगमें म्लेच्छोंके स्पर्शके भयसे केदारजी समुद्रके समीप इसी लिंगमें लीन

  • प्रभासखण्ड * | १२४७ ---|--- हो गये, इसीलिये इसका नाम 'केदार' हो गया। जो मनुष्य आहारको जीतकर माघमासमें रुद्रेशके दक्षिणभागमें दस धनुषकी दूरीपर समुद्रमें स्थित पद्मकेतुनामक महाकुण्डमें नहाकर विधिपूर्वक रुद्रेश्वरकी पूजा करेगा, उसे केदार-यात्राका पूर्ण फल प्राप्त होगा। उनके पूजनसे ब्रह्महत्या आदि महापापोंका नाश होता है।<br><br>प्राचीन कालमें शशिविन्दु नामसे विख्यात एक चक्रवर्ती राजा थे। उनकी पतिव्रता स्त्री उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी। राजाके पास एक सुन्दर सुवर्णमय आकाशगामी विमान था, जिसके द्वारा वे अपनी इच्छाके अनुसार सम्पूर्ण लोकोंमें घूमते रहते थे। एक समय फाल्गुन कृष्णपक्षकी चतुर्दशीका पर्व आनेपर राजा शशिविन्दु उत्तम प्रभासक्षेत्रमें आये। वहाँ उन्होंने बहुतसे महर्षियोंको देखा, जो जपमें और होममें तत्पर हो रात्रिमें जागरण करनेके लिये श्रीसोमनाथजीके सम्मुख बैठे हुए थे। राजाने भी सोमनाथका दर्शन और प्रणाम करके विधिपूर्वक पूजन किया और क्रमशः भक्तिभावसे उन सभी ऋषि-मुनियोंका स्वागत-सत्कार करके वे केदारलिंगके पास चले आये। वहाँ विचित्र पुष्पमालाओं, नैवेद्यों तथा मनोहर वस्त्राभूषणोंसे केदारेश्वरकी पूजा की और वहीं एकाग्रचित्त हो जागरण किया। तब वे सब मुनि कौतूहलवश राजाके समीप गये और इस प्रकार बोले—'राजन्! तुम सोमेश्वर देवको छोड़कर केदारजीके आगे जो जागरण और पूजन करते हो, इसका क्या कारण है?'<br><br>राजाने कहा—विप्रवरो! आपलोग सुनें, यह मेरे पूर्वजन्मका वृत्तान्त है। पहले जन्ममें मैं ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाला शूद्र था। मेरी जन्मभूमि सौराष्ट्र देशमें थी। एक समय वहाँ भयंकर अनावृष्टि हुई। उस समय मैं भूखसे व्याकुल होकर प्रभासक्षेत्रमें चला आया। वहाँ आनेपर हरिणीके मूलभागमें स्थित एक सुन्दर सरोवरपर मेरी दृष्टि पड़ी जो रामसरोवरके नामसे प्रसिद्ध | है। वह तड़ाग कमलसमूहसे सुशोभित था। मैं थका माँदा तो था ही। उस सरोवरको देखकर मैंने उसमें स्नान किया तथा देवताओं और पितरोंका तर्पण करके उसके स्वच्छ जलको पीया। तत्पश्चात् मेरी स्त्रीने कहा—'इन कमल-पुष्पोंको ले लीजिये। यहाँसे निकट ही एक सुन्दर स्थान दिखायी देता है। वहाँ चलकर इन फूलोंको बेचेंगे, जिससे कुछ भोजनकी व्यवस्था हो सकेगी।' पत्नीके यों कहनेपर मैं जलके भीतर उतरा और बहुत-से कमलके फूल लेकर नगरकी ओर चला। वहाँ पहुँचकर सड़कों, चौराहों और तिमुहानियोंपर घूमता रहा; परंतु किसीने भी मेरे फूल नहीं लिये। इतनेमें दिन डूब गया और मैं अपनी पत्नीके साथ एक मन्दिरमें आकर सो रहा। वहाँ स्त्रीसहित मुझे भूख अधिक पीड़ा देने लगी। इतनेमें ही मैंने देखा किसी देवालयमें होम और जागरण हो रहा है। तब मैं भी उठकर वहाँ गया और रुद्रेश्वरनामक वृद्धिलिंगका दर्शन किया। उस समय वहाँ अनंगवती नामक एक वेश्या शिवरात्रि-व्रतमें संलग्न हो नृत्य, गीत और उत्सव आदिके द्वारा भगवान्के सामने जागरण कर रही थी। मैंने एक मनुष्यसे पूछा—'भाई! यहाँ रात्रिमें जागरण किसलिये होता है? यह नाच, गान और उत्सवमें लगी हुई कौन स्त्री दिखायी दे रही है?' उसने बताया—'आज शिवधर्मोत्तरपुराणमें प्रतिपादित शिवरात्रि है। यह धर्मपरायणा स्त्री अनंगवती नामकी वेश्या है, जो कल्याणमय शिवरात्रि-व्रत करके जागरण कर रही है। जो कोई मनुष्य शिवरात्रि-व्रत करता है, उसे दुःख-दारिद्र्य और बन्धनकी प्राप्ति नहीं होती। दुष्ट ग्रह, अरिष्टयोग, रोग अथवा भय भी उसके पास नहीं आता। वह उत्तम कुलमें उत्पन्न हो सुख और सौभाग्यसे युक्त होता है। तेजस्वी यशस्वी तथा पूर्णतः कल्याणका भागी होता है।'<br><br>उस मनुष्यकी बात सुनकर मेरे मनमें वह

१२४८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

व्रत करनेका निश्चित विचार हुआ। मैंने सोचा 'अन्नका अभाव होनेके कारण उपवास तो मुझे विवश होकर करना ही है। अतः क्षार समुद्र पद्मकतीर्थमें स्नान करके इन कमलके फूलोंसे भगवान् महेश्वरकी पूजा करूँ।' तब मैंने स्त्रीसहित स्नान करके भक्तिभावसे कमलके फूलोंद्वारा भगवान् रुद्रेश्वरका पूजन किया। पत्नीके साथ रातभर वहाँ जागता रहा। सबेरा होनेपर वेश्याने मुझसे कहा—'अपने फूलोंका मूल्य तीन भर सोना ले लो।' परंतु मैंने सात्त्विकभावका आश्रय लेकर उसका दिया हुआ मूल्य स्वीकार नहीं किया। भिक्षा माँगकर जीवननिर्वाह करने लगा। दीर्घकालके पश्चात् मेरी मृत्यु हुई। उस समय यह मेरी प्राणप्यारी पत्नी मेरे शरीरको लेकर चिताकी आगमें प्रवेश कर गयी। उस पूजन और जागरणके प्रभावसे मैं पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण रखनेवाले चक्रवर्ती राजा हुआ। एक बार संयोगवश यह व्रत किया था, जिसका यह महान् फल प्राप्त हुआ। अब मैं भक्तिभावसे यथावत् सामग्रीके साथ जो इस व्रतका पालन करता हूँ, इसका भविष्यमें क्या फल होगा—यह मैं नहीं जानता।

यह सुनकर उन ब्राह्मणोंके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। उन्होंने 'साधु-साधु' कहकर राजाकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने स्वयं भी उस स्वयम्भू-लिंगका पूजन किया। राजा शशिविन्दु उस केदारलिंगके प्रसादसे देवदुर्लभ उत्तम सिद्धिको प्राप्त हुए। अनंगवती वेश्या शिवरात्रि-व्रत तथा केदार लिंगके प्रभावसे रम्भा नामक अप्सरा हुई। इसलिये जो विद्वान् पुरुष धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी इच्छा रखता हो, उसे प्रयत्नपूर्वक उक्त शिवलिंगका पूजन करना चाहिये।

~~ ० ~~

श्वेतकेत्वीश्वर आदि विभिन्न शिवलिंगोंका माहात्म्य

महादेवजी कहते हैं—महादेवि! पूर्वकालमें जब स्वायम्भुव मन्वन्तरका त्रेतायुग चल रहा था, उस समय श्वेतकेतु नामके एक राजर्षि थे। वे बड़े भारी तपस्वी थे। उन्होंने प्रभासक्षेत्रमें आकर समुद्रके तटपर शिवलिंगकी स्थापना करके महान् तप प्रारम्भ किया। तपस्या और नियमका पालन करते हुए उनके चौदह वर्ष बीत गये। तब मैंने उन्हें दर्शन देकर कहा—'सुव्रत! वर माँगो।' श्वेतकेतु बोले—'प्रभो! मुझे अपनी अविचल भक्ति दीजिये और इस स्थानपर सदा निवास कीजिये।' 'एवमस्तु' कहकर मैं वहाँसे अन्तर्धान हो गया। कुछ कालके पश्चात् राजा श्वेतकेतुने उस लिंगकी आराधना करके महान् अभ्युदययुक्त स्थान प्राप्त किया। इसलिये उस शिवलिंगका नाम श्वेतकेत्वीश्वर हो गया। तदनन्तर कलियुग आनेपर पवनपुत्र भीमसेन अपने भाइयोंके साथ तीर्थयात्राके प्रसंगसे प्रभास-क्षेत्रमें आये। उन्होंने रात्रिमें जागरण करके समुद्रके समीप श्वेतकेत्वीश्वर लिंगका पूजन किया। तबसे उसका नाम भीमेश्वरलिंग हुआ। श्वेतकेत्वीश्वरलिंगका एक बार दर्शनमात्र कर लेनेसे अन्य जन्मोंके किये हुए तथा इस जन्मके भी बहुत-से पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। भीमेश्वरसे पूर्व और सोमनाथसे अग्निकोणमें सरस्वतीद्वारा स्थापित महाप्रभावशाली रवेश्वरलिंग है। मनुष्यको चाहिये कि वह सरस्वती देवी तथा भैरवेश्वरलिंगका विधिपूर्वक पूजन करे। जो महानवमीको विधिवत् स्नान करके सरस्वती देवीका पूजन करता वह वाणीजनित समस्त दोषोंसे मुक्त हो जाता है। जो अघोर-मन्त्रसे दूधके द्वारा उस लिंगको नहलाकर उसकी पूजा करता है, वह यात्राके उत्तम फलको पाता है।

वहाँसे चण्डीश्वरदेवके पास जाय, वह स्थान सोमनाथके दक्षिण सात धनुषकी दूरीपर स्थित है।

  • प्रभासखण्ड * | १२४९ ---|---

पूर्वकालमें चण्डीदेवीने भगवान् दण्डपाणिकी स्थापना की थी। तत्पश्चात् मेरे गण चण्डने उस लिंगकी आराधना की और वहाँ बड़ी कठोर तपस्या की। इस कारण पृथ्वीपर वह चण्डेश्वर लिंगके नामसे विख्यात हुआ। चण्डेश्वरको दूध, दही, मधु, घृत तथा ईखके रससे स्नान कराये और उनके श्रीअंगमें कुंकुमका लेप करे। फिर कपूर, खस और कस्तूरी मिलाया हुआ सुगन्धित चन्दन लगाये। तदनन्तर फूलोंसे उनका पूजन करे। इसके बाद धूप तथा अगुरु निवेदन करके अपने वैभवके अनुसार वस्त्रोंसे पूजन करे। उत्तम नैवेद्य लगाके दीपमाला जलाकर रखे और ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा दे। यों करनेसे पितर कल्पपर्यन्त तृप्त रहते हैं।

पार्वती! सोमनाथसे पश्चिम सात धनुषकी दूरीपर आदित्येश्वर नामक शिवलिंगके समीप जाय, जिसकी स्थापना साक्षात् भगवान् सूर्यने की है और जो समस्त पातकोंका नाश करनेवाला है। त्रेतायुगमें महात्मा समुद्रने दस हजार वर्षोंतक रत्नोंद्वारा आदित्येश्वरका पूजन किया था। इससे पृथ्वीपर इनका नाम रत्नेश्वर प्रसिद्ध हुआ। रत्नेश्वरको पंचामृतसे नहलाकर पंचरत्नोंद्वारा उनकी पूजा की जाती है। इसके बाद भाँति-भाँतिके उपचारोंसे विधिपूर्वक उनकी अर्चना करनी चाहिये। यों करनेपर मनुष्य मेरुपर्वतके दानका फल पाता है। उसे सब तीर्थोंके सेवनका फल मिल जाता है और वह अपने पितृकुल और मातृकुल दोनोंका उद्धार कर देता है। रत्नेश्वरका दर्शन करके मनुष्य अपने सब पाप धो डालता है। जो विधिपूर्वक रत्नेश्वर लिंगकी पूजा करके शतरुद्रियका जप करता है, वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता।

महादेवि! वहाँसे परम उत्तम अंगारेश्वरके समीप जाय, जिसकी स्थापना भूमिपुत्र मंगलने की है। वह स्थान सोमनाथसे ईशानकोणमें है। पूर्वकालमें मंगलने प्रभासक्षेत्रमें आकर बाल्यावस्थासे ही तपस्याद्वारा मेरी आराधना की। तब मैंने सन्तुष्ट होकर उन्हें वर माँगनेके लिये कहा। मंगल बोले—'सर्वेश्वर! मुझे ग्रहका पद प्रदान कीजिये।' मैंने 'तथास्तु' कहकर मंगलको यह बताया कि 'जो मनुष्य वहाँ आकर भक्तिपूर्वक तुम्हारी पूजा करेगा, उसे कभी तुम्हारे द्वारा दी हुई पीड़ा नहीं भोगनी पड़ेगी।' यों कहकर मैं वही अन्तर्हित हो गया। मंगलदेव ग्रहोंके मध्यमें विमानपर विराज रहे हैं।

अंगारेश्वरसे उत्तर दिशामें महाप्रभावशाली बुधेश्वर विद्यमान हैं। उनका स्थान वहाँसे अधिक दूर नहीं, दो ही धनुषके अन्तरपर है। वे दर्शनमात्रसे ही सब पाप हर लेते हैं। देवेश्वरि! बुधने पूर्वकालमें वहाँ बड़ी भारी तपस्या की और निर्मल शिवलिंग स्थापित किया। इससे सन्तुष्ट होकर मैंने बुधको ग्रहत्व प्रदान किया है। बुधवार और अष्टमीके योगमें बुधद्वारा स्थापित शिवलिंगकी विधिवत् पूजा करके मनुष्य राजसूय यज्ञका फल पाता है। बुधेश्वरके प्रसादसे उसके कुलमें दुःख और दुर्भाग्य प्रवेश नहीं करते।

उमा-मन्दिरके पूर्वभागमें सिद्धेश्वरसे आग्नेय कोणमें बृहस्पतिद्वारा स्थापित महालिंग है। बृहस्पतिजीने भक्तिभावसे उसकी आराधना करके मुझ देवेश्वर शिवको सन्तुष्ट किया। इससे उन्होंने सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्राप्त कर लिये। मुझसे ज्ञान पाकर वे देवताओंके पूजनीय गुरु हो गये और ग्रहके पदपर प्रतिष्ठित हो इस समय स्वर्गलोकमें आनन्द भोगते हैं। बृहस्पतीश्वरका भक्तिभावसे दर्शन करके मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। उसे बृहस्पतिकी ओरसे पीड़ा नहीं प्राप्त होती। शुक्लपक्षकी चतुर्दशी तथा गुरुवारके योगमें पंचोपचारसे विधिपूर्वक उक्त लिंगकी पूजा करके मानव परम पदको प्राप्त कर लेता है।

तदनन्तर विभूतिश्वरसे पश्चिम थोड़ी ही दूरपर शुक्राचार्यके द्वारा स्थापित शिवलिंग है; जहाँ शुक्रने शुक्रेश्वर शिवके प्रभावसे मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त की थी। जो मनुष्य स्थिरचित्त होकर उस शिवलिंगकी आराधना करता है और एक लाख मृत्युंजय मन्त्रको जपता है, वह अपने

१२५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सभी मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है। शुक्रेश्वरका दर्शन और स्पर्श करके मनुष्य जन्मसे लेकर मृत्युतकके सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है। सुगन्धित पुष्पोंद्वारा उनकी पूजा करनेसे शुक्रकी पीड़ा नहीं प्राप्त होती।

बुधेश्वरसे पश्चिम और अजादेवीसे अग्निकोणमें समीप ही पाँच धनुषकी दूरीपर शनैश्चरेश्वरका स्थान है। छायानन्दन शनैश्चरने अत्यन्त कठिन तपस्या करके उस लिंगमें मुझ अनादि, अनन्त शिवको उतारा है। उन्होंने भक्ति तथा मेरे प्रसादसे ग्रहका पद प्राप्त किया है। शनैश्चरके दिन शमीके पत्तोंसे शनैश्चरेश्वरका पूजन करके तिल, उड़द, गुड़ और भातसे ब्राह्मणको तृप्त करे। उसे काले रंगका बैल दान करे। तत्पश्चात् सब प्रकारकी पीड़ाओंका निवारण करनेके लिये अनेकानेक स्तोत्रोंद्वारा शनैश्चरेश्वर देवकी स्तुति करनी चाहिये। जो मनुष्य प्रतिदिन भक्तिभावसे शनैश्चरेश्वरका स्मरण करता है, उसके ऊपर सूर्यनन्दन शनैश्चर प्रसन्न होते हैं।

शनैश्चरेश्वरसे वायव्यकोणमें राहुद्वारा स्थापित शिवलिंग है, जहाँ विप्रचित्तिके पुत्र राहुने एक सहस्र वर्षतक तपस्या की है। जो उनके द्वारा स्थापित शिवका भक्तिपूर्वक पूजन और दर्शन करता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है।

राहीश्वरसे उत्तर और अंगारेश्वरसे दक्षिण एक ही धनुषके अन्तरपर महाप्रकाशमय केतुलिंग है। वह सब पापोंका नाश करनेवाला है। केतुने मुझ शिवके प्रति भक्ति रखकर देवताओंके मानसे सौ वर्षोंतक वहाँ उग्र तपस्या की थी। इससे संतुष्ट होकर मैंने उन्हें ग्रहत्व प्रदान किया। भयंकर ग्रहपीड़ा होनेपर पुष्प, गन्ध, धूप तथा भाँति-भाँतिके शुभ नैवेद्योंद्वारा केत्वीश्वरकी पूजा करके उन्हें प्रसन्न करना चाहिये। इससे सब पीड़ा शान्त हो जाती है। जो पूर्वोक्त चौदह देवस्थानोंको भक्तिभावसे जानता है, वह क्षेत्रके फलका भागी होता है।

o

प्रभासक्षेत्रकी त्रिविध शक्तियों तथा दूतीशक्तियोंके दर्शन-पूजनका माहात्म्य

महादेवजी कहते हैं—सोमेश्वरसे ईशानकोणमें वरारोहा देवीसे पूर्वभागमें परम उत्तम सर्वेश्वर देव विराजमान हैं। उनके समीप भक्तिपूर्वक जाकर मनुष्य अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त करता है। सर्वेश्वरकी स्थापना सिद्धोंने की है। जो मानव भक्तिपूर्वक उनका दर्शन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो सिद्धलोकमें जाता है। काम, क्रोध, भय, लोभ, राग, मात्सर्य, ईर्ष्या, दम्भ, आलस्य, निद्रा, मोह, अहंकार—ये सिद्धिमें विघ्न डालनेवाले दोष हैं। सिद्धेश्वरके पूजनसे इन सब दोषोंका नाश हो जाता है। यों जानकर प्रयत्नपूर्वक वहाँकी यात्रा करे।

सिद्धेश्वरके पूर्वभागमें थोड़ी ही दूरपर कपिलेश्वर लिंग प्रतिष्ठित है, जिसके दर्शनमात्रसे सब पापोंका नाश हो जाता है। प्राचीन कालमें कपिल नामसे प्रसिद्ध एक राजर्षि हो गये हैं। उन्होंने वहाँ बड़ी भारी तपस्या करके उत्तम सिद्धि प्राप्त की और शिवलिंगकी स्थापना करके मेरी समीपता पायी है। उस लिंगमें मैं सब लोगोंके हितके लिये सदा निवास करता हूँ। जो शुक्लपक्षकी चतुर्दशी तिथिमें सात बार सोमेश-कपिलेश्वरका दर्शन करता है, वह गोदानका फल पाता है। जो वहाँ तिलमयी धेनु दान करता है, वह एक-एक तिलकी संख्याके बराबर युगोंतक स्वर्गलोकमें निवास करता है।

दण्डपाणीश्वरसे निकट ही गन्धर्वेश्वर नामसे प्रसिद्ध उत्तम शिवलिंग है। गन्धर्वराज धनवाहनने वहाँ कठोर तपस्या करके उस शिवलिंगको स्थापित किया है। उसकी पुत्री गन्धर्वसेनाने भी वहाँ शिवलिंगकी स्थापना की है। जो मनुष्य

  • प्रभासखण्ड * १२५१

पवित्र होकर यत्नपूर्वक गन्धर्वेश्वरका पूजन और दर्शन करता है, वह गन्धर्वलोकमें जाता है। जो उत्तरायण आनेपर अग्नितीर्थमें स्नान करके गन्धर्वपूजित उस शिवलिंगका पूजन करता है, वह मोक्षको प्राप्त होता है। इस माहात्म्यका श्रवण और अभिनन्दन करके भी मनुष्य महान् भयसे मुक्त हो जाता है।

गन्धर्वेश्वरके पूर्वभागमें गौरीजीके समीप विमलेश्वर नामक लिंग प्रतिष्ठित है। जिसका शरीर क्षयरोगसे आक्रान्त है, वह भक्तिपूर्वक विमलेश्वरका दर्शन करके सब दुःखोंका अन्त कर देता और निर्मल पदको प्राप्त होता है। वहीं रोगग्रस्त गन्धर्वसेना रोगसे मुक्त हो विमल स्वरूपको प्राप्त हुई थी, इसलिये पृथ्वीपर वह लिंग विमलेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ।

ब्रह्माजीके स्थानसे नैर्ऋत्यकोणमें सोलह धनुषकी दूरीपर धनदेश्वर लिंग है। यह राहुलिंगसे वायव्यकोणमें स्थित है। कुबेरने वहाँ बड़ी भारी तपस्या करके धनदका पद प्राप्त किया है। वे विधिपूर्वक शिवलिंगकी स्थापना और पूजा करके अलकापुरीके स्वामी हुए हैं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक धनदेश्वरका दर्शन करके पंचोपचारसे उनकी पूजा करता है, उसके कुलमें दरिद्रताका कभी नाम भी नहीं सुना जाता।

मेरी तीन शक्तियाँ हैं—इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति। पहले जो चौदह और पाँच शिवलिंग बताये गये हैं, उनमेंसे यथाशक्ति चार, तीन या एककी पूजा करके फिर पूर्वोक्त तीन शक्तियोंका पूजन करना चाहिये। सोमेश्वरसे ईशानकोणमें जो वरारोहा देवी कही गयी हैं, वे चन्द्रमाकी अमा नामक कला हैं। वे ही भगवती उमाकी भी कला मानी गयी हैं। उन्हींको मेरी इच्छाशक्ति जानना चाहिये। वरारोहा देवी भूमण्डलके समस्त प्राणियोंका हित करनेके लिये प्रभासक्षेत्रमें विराजमान हैं।

सोमेश्वरसे वायव्यकोणमें साठ धनुषकी दूरीपर क्रियाशक्तिरूपा दूसरी महादेवी स्थित हैं। वहीं योगिनीवन्दित पीठ है। उसी स्थानपर पातालको जानेवाला एक बहुत बड़ा विवर है। पहले उन महादेवीका नाम भैरवी था। फिर इस वैवस्वत मन्वन्तरके अट्ठाईसवें चतुर्युगमें राजा आजापालके द्वारा आराधित होनेके कारण वे अजापालेश्वरीक नामसे विख्यात हुई हैं। जो मनुष्य लौकिक सुखभोगकी इच्छा रखता है, उसे गन्ध, धूप, अलंकार, वस्त्र तथा अन्य उपचारोंद्वारा उन महादेवीका पूजन करना चाहिये।

प्रभासक्षेत्रके मध्यभागमें दरिद्रताका विनाश करनेवाली तीसरी अजादेवी हैं, जिन्हें ज्ञानसक्ति माना गया है। उनका स्थान राहीश्वरसे दक्षिणभागमें है। अघासुरके साथ जब मेरा भयंकर युद्ध चल रहा था, उस समय मेरे क्रोधसे अजा नामकी देवी प्रकट हुईं। उनके साथ करोड़ों देवियाँ और थीं। वे सिंहपर सवार थीं। उनका रूप बड़ा सुन्दर था। उन्होंने ढाल और तलवार लेकर बड़े-बड़े दैत्योंका संहार किया। उनके भयसे बहुत-से दैत्य समुद्रकी ओर भागे। देवी सिंहवाहिनी और उनके गणोंने उन सबका पीछा किया। वे दैत्य इधर-उधर भागते हुए महासागरके समीप प्रभासक्षेत्रमें आ पहुँचे। वहाँ कुछ तो मार डाले गये और कुछ पातालमें समा गये। सब दैत्योंको मारा गया देख तथा इस क्षेत्रको परम पवित्र जानकर सिंहवाहिनी देवी यहीं सोमेश्वरके ईशानकोणमें और गौरीश्वरसे उत्तर दिशामें स्थित हुईं। जो स्त्री या पुरुष वहाँ उनका दर्शन करते हैं, वे सात जन्मोंतक पूर्णतः सौभाग्यशाली होते हैं। जो मानव वहाँ गीत, वाद्य तथा नृत्य करता है, उसके वंशमें देवीके प्रसादसे कोई दुर्भाग्यवान् नहीं होता। जो स्त्री वहाँ लाल रंगकी बत्तीसे युक्त, दीपकको घीसे जलाकर देवीको अर्पण करती है, उस बत्तीमें जितने सूत होते हैं, उतने जन्मोंतक वह सौभाग्य प्राप्त करती है। जो तृतीयाको इस माहात्म्यका पाठ करता है अथवा जो भक्तिपूर्वक इसे सुनता है, वह सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है।

१२५२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

प्रभासक्षेत्रमें तीन दूती शक्तियाँ हैं—पहलीका नाम मंगला देवी है, दूसरीको विशालाक्षी देवी कहते हैं और तीसरी चत्वर देवीके नामसे प्रसिद्ध हैं। प्रभासक्षेत्रकी यात्राका पूरा-पूरा फल चाहनेवाले मनुष्यको क्रमशः इन तीनों शक्तियोंका पूजन करना चाहिये। मंगलादेवी ब्रह्माजीकी शक्ति कही गयी हैं, विशालाक्षी विष्णुशक्ति मानी गयी हैं तथा चत्वरप्रिया देवी मेरी शक्ति हैं। पहले मंगला देवीकी पूजा करनी चाहिये। वे अजादेवीके उत्तरभागमें निवास करती हैं। राह्लीशके दक्षिणभागमें थोड़ी ही दूरपर उनका स्थान है। सोमनाथकी प्रतिष्ठाके लिये जब सोमने यज्ञ प्रारम्भ किया, उस समय उसे देखनेके लिये वहाँ आये हुए ब्रह्मादि देवताओंका उसी देवीने मंगल किया था। इसीलिये उसका नाम मंगला हुआ। जो नारी तृतीयाको मंगला देवीकी पूजा करेगी, उसके अमंगल और दुःख पूर्णतः नष्ट हो जायेंगे। भगवान् दैत्यसूदनसे पूर्वभागमें वैष्णवी क्षेत्र दूती महादेवी विशालाक्षी हैं। योगेश्वरीसे ईशानकोणमें सौ धनुषकी दूरीपर उसका स्थान है। जो लोग महान् दुर्भाग्यकी आगमें जल रहे हैं, उनका दाह शान्त करनेके लिये विशालाक्षी देवी ओषधिके समान हैं। चाक्षुष मन्वन्तरमें जब सब दैत्य भगवान् विष्णुकी मार खाकर दक्षिण दिशामें भाग गये, उस समय उनको मारना दुष्कर जानकर भगवान् विष्णुने अत्यन्त प्रभावशालिनी भैरवी शक्ति महामायाका स्मरण किया। उनके स्मरण करते ही अत्यन्त प्रकाशमयी महामाया वहाँ आ गयी। भगवान् विष्णुके दर्शनसे उसके नेत्र आनन्दसे खिल उठे। उसने बड़ी-बड़ी आँखें करके भगवान्‌को देखा। इससे उसका नाम विशालाक्षी हुआ। इस कल्पमें उसे ललितोमा कहते हैं। जो माघमासमें तृतीया तिथिको विधिपूर्वक उसका पूजन करता है, उसके वंशमें कोई भी सन्तानहीन नहीं होता। जो मानव भक्तिभावसे उसका दर्शन करता है, वह दीर्घकालतक नीरोग, सुखी और सौभाग्यशाली होता है।

ललितासे उत्तर दिशामें दस धनुषकी दूरीपर तीसरी शक्ति चत्वरप्रियाका निवास है। मेरी प्रेरणासे वह इस क्षेत्रकी रक्षामें संलग्न रहती है। चबूतरों, चौराहों, पुराने घरों, बगीचों तथा महलोंकी अटारियोंपर एवं मार्गमें वह रातको घूमती रहती है। जो स्त्री अथवा पुरुष महानवमीके दिन नाना प्रकारके उपहारों और फूलोंसे उस कल्याणमयी देवीकी विधिपूर्वक पूजा करता है, उसके ऊपर प्रसन्न हो वह सम्पूर्ण लोक प्रदान करती है। यात्राके उत्तम फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको वहाँ भोजन देना चाहिये।

o

भैरवेश्वर आदि विविध लिंगोंका माहात्म्य

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! योगेश्वरीसे दक्षिण थोड़ी ही दूरपर उत्तम भैरवेश्वरका स्थान है। प्राचीन कालमें देवीने जब दैत्योंके विनाशके लिये उद्योग किया, तब मेरे स्वरूपभूत भैरवको बुलाकर दूतके कार्यपर नियुक्त किया। इसलिये उस समय उनका नाम 'शिवदूती' हुआ। उसके बाद वे ही योगेश्वरी नामसे विख्यात हुईं। उन्होंने भैरवको दूत बनाया था, इसलिये उनके द्वारा स्थापित शिवलिंगका भैरवेश्वर नाम हुआ। जो मनुष्य कार्तिककी पूर्णिमाको उस शिवलिंगकी पूजा करता है अथवा जो छः महीनेतक निरन्तर उसकी पूजामें संलग्न रहता है, वह मनोवांछित फलको प्राप्त कर लेता है।

भैरवेश्वरसे पूर्वदिशामें पाँच धनुषकी दूरीपर लक्ष्मीश्वर नामसे प्रसिद्ध शिवलिंग है, जो दरिद्रताका नाश करनेवाला है। जो श्रीपंचमीको विधिपूर्वक भक्तिभावसे लक्ष्मीश्वरका पूजन करता है, उसको लक्ष्मी कभी नहीं छोड़तीं। लक्ष्मीश्वरसे उत्तर

  • प्रभासखण्ड * १२५३

और विशालाक्षीसे दक्षिण वाडवद्वारा स्थापित अत्यन्त प्रभावशाली वाडवेश्वरलिंग विराजमान है। उसको दधिसे स्नान कराकर विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। जो मानव वहाँ वेदज्ञ ब्राह्मणको दहीका दान करता है, वह तेजस्वी लोकोंमें जाता और यात्राका उत्तम फल पाता है। विशालाक्षीसे उत्तर थोड़ी ही दूरपर देवताओं और गन्धर्वोंसे पूजित अध्यैश्वरलिंग प्रतिष्ठित है। जो पंचामृतसे स्नान कराकर अध्यैश्वरका पूजन करता है, वह सात जन्मोंतक विद्वान्, शास्त्रवक्ता और सब संदेहोंका निवारण करनेवाला होता है।

महादेवि! दैत्यसूदनके पश्चिमभागमें सात धनुषकी दूरीपर कामेश्वर नामक महान् लिंग है, वह सब पापोंको हरनेवाला तथा संपूर्ण अभीष्ट फलोंको देनेवाला है। इस प्रकार पंचवक्त्रलिंग बताये गये। सोमेश्वरसे पूर्व साठ धनुषकी दूरीपर अर्थेश्वरलिंग है। जो मनुष्य उसे पंचामृतसे नहलाकर विधिपूर्वक पूजन करता है, वह सात जन्मोंतक पूर्ण विद्या पाता है और शास्त्रोंका उत्तम वक्ता होता है। जो पुत्रहीना स्त्री वहाँ नारियल चढ़ाती है, वह शीघ्र ही सबल एवं सुन्दर पुत्र पाती है। जो नारी वहाँ लाल बत्तीसे युक्त दीपकको घीसे जलाकर अर्पण करती है, उसके दीपककी बत्तीमें जितने तार होते हैं, उतने जन्मोंतक वह सदैव सौभाग्यवती होती है। जो पराभक्तिके साथ वहाँ नृत्य करती है, वह दीर्घकालतक आरोग्य, सुख और सौभाग्यसे युक्त होती है। वहाँ स्वच्छ जलसे भरा हुआ एक महान् कुण्ड है। जो मनुष्य उसमें स्नान करता है, वह सब पातकोंसे छूट जाता है। जो भक्तिपूर्वक पितरोंके उद्देश्यसे वहाँ श्राद्ध करता है, वह पुण्यात्मा अपने पितरोंके साथ परमपदको प्राप्त होता है। इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके वहाँ श्राद्ध करना चाहिये। रात्रिमें गीत, वाद्य और नृत्य आदिके आयोजनद्वारा वहाँ जागरण करना उचित है। वहाँ ब्राह्मण-दम्पतिको पहननेके लिये वस्त्र और दक्षिणा देनी चाहिये।

देवि ! प्रभासक्षेत्रमें जो यह तपोवन है, यह गौरी तपोवनके नामसे विख्यात है। यह सब ओर पचास-पचास धनुषतक फैला हुआ है। इसके मध्यभागमें सतीदेवी एक पैरसे खड़ी होकर तपस्यामें लगी थीं। उस स्थानसे चार धनुष दूर ईशानकोणमें गौरीश्वरलिंग है, जो पापभयको दूर करनेवाला है। जो मनुष्य सदा ही—विशेषतः कृष्णपक्षकी अष्टमीको श्रद्धापूर्वक गौरीश्वरका पूजन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। यहाँ सब पापोंकी शान्तिके लिये गोदान और अन्नदान श्रेष्ठ कहा गया है। गौरीश्वरलिंगके दर्शनसे गोघाती, ब्रह्महत्यारे तथा अन्यान्य पापी भी सब पापोंसे छूट जाते हैं। गौरीतपोवनसे अग्निकोणमें बीस धनुष दूर वरुणजीके द्वारा स्थापित वरुणेश्वरलिंग है। उनका दर्शन करनेसे मनुष्य सब तीर्थोंका फल पा लेता है। अष्टमी और चतुर्दशीको यदि उन्हें दहीसे नहलाया जाय तो वह ब्राह्मण चारों वेदोंका ज्ञाता है। पार्वती ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, गूँगे, बहरे, बालक, स्त्री और नपुंसक भी वरुणेश्वरका दर्शन करके धर्मपरायण हो स्वर्गलोकमें चले जाते हैं। जो उस स्थानमें स्नान, जप, होम और पूजन करता है, उसका वह सब शुभकर्म अक्षय हो जाता है।

वरुणेश्वरसे दक्षिण तीन धनुषके अन्तरपर ईषेश्वरलिंग है। पतिके दुःखसे घिरी हुई वरुणपत्नी ईषाने उस सिद्धिदायक महालिंगकी स्थापना की थी। जो मनुष्य पापनाशक ईषेश्वरका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। ईषेश्वरलिंग स्त्रियोंके लिये सौभाग्यदाता एवं दुःख दुर्भाग्यका नाशक है।

वरुणेश्वरसे नैर्ऋत्यकोणमें तीस धनुष दूर पश्चिम मुखवाला कुमारेश्वरलिंग प्रतिष्ठित है। कुमार कार्तिकेयने बड़ी भारी तपस्या करके यहाँ उस महालिंगकी स्थापना की थी, इसीसे उसका नाम कुमारेश्वर हुआ। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक कुमारेश्वरकी पूजा करता है, उसे एक ही दिनमें छः मासकी