संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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जानेका विचार किया और गोशृंग मुनिसे पूछा—'भगवन्! सोमवारव्रत कैसे करना चाहिये? किस समय उसका अनुष्ठान उचित है?'
गोशृंगजीने कहा—महाप्राज्ञ! पहले ब्रह्मवेलामें उठकर शौच आदिसे निवृत्त हो दन्तधावन करे, फिर स्नान करके स्वधर्मके अनुसार नित्यकर्म करे। उसके बाद सुन्दर समतल एवं शुद्ध स्थानमें उत्तम कलश स्थापित करे, जिसमें आमका पल्लव डाला गया हो और जिसपर चन्दनसे भाँति-भाँतिके चित्र बनाये गये हों। कलशके ऊपर पात्र रखे और उस पात्रमें जटा-मुकुटमण्डित सर्वाभूषण-भूषित श्वेतवस्त्रधारी अर्द्धनारीश्वर शिवकी प्रतिमा स्थापित करे। तत्पश्चात् उमासहित महेश्वरकी श्वेत वस्त्रों और भाँति-भाँतिके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंद्वारा पूजन करे। बिजौरा नीबू अर्पण करे। निम्नांकित मन्त्रसे सब पूजा करनी चाहिये—
ॐ नमः पञ्चवक्त्राय दशबाहुत्रिनेत्रिणे।
देव श्वेतवृषारूढ श्वेताभरणभूषित ॥
उमादेहार्द्धसंयुक्त नमस्ते सर्वमूर्तये ।
'महादेव! आप श्वेत वृषभपर आरूढ़, श्वेत आभूषणोंसे भूषित तथा आधे शरीरमें भगवती उमासे संयुक्त हैं। आपके पाँच मुख, दस भुजाएँ तथा प्रत्येक मुखके साथ तीन-तीन नेत्र हैं। आपको नमस्कार है। आप सर्वस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है।'
इसी मन्त्रसे पूजन और स्तुति करके रात्रिमें भोजन करे। सोमनाथ महादेवजीका ध्यान करते हुए कुशकी चटाईपर सोये। यों करनेपर अठारह प्रकारके कुष्ठ रोगोंका नाश होता है। दूसरे सोमवारको करंजका दन्तधावन करे और ज्येष्ठा-शक्तिसे संयुक्त शिवका कमलके फूलोंसे पूजन करके विधिपूर्वक मधुर भोजन करे। भगवान्को नारंगी चढ़ाये। शेष सब विधि पूर्ववत् करे। दूसरे सोमवारको यों करनेसे लाख गोदानका फल प्राप्त होता है। तीसरे सोमवारको अपामार्गकी दातुन करके शिवजीका पूजन करे। अनारके फलका भोग लगाये तथा चमेलीके फूलोंसे पूजा करे। रातमें अगुरु भोजन करे। उस दिन सिद्धि नामक शक्तिके साथ शिवकी पूजा करनी चाहिये। चौथे सोमवारको गूलरकी दातुन करनेका विधान है। उस दिन सोमासहित गौरीपतिकी पूजा करे। नारियलका फल चढ़ाये और दवनेके पत्तेसे पूजा करे। रातमें चीनी खाय और जागरण करे। पाँचवें सोमवारको विभूतिसहित गणेश्वरकी कुन्दके फूलोंसे पूजा करे। पीपलकी दातुन करे और मुनक्काके साथ अर्घ्य दे। रातको मौक्तिक तंदुल (सफेद मक्का) भोजन करे। यों करनेसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। छठे सोमवारको भद्रासहित स्वरूपनामक शिवका पूजन करे। चमेलीकी दातुन करे और धतूरके फलसे अर्घ्य दे। उस दिन बेलाके फूलोंसे परम भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। रातमें कपूर भोजन करे। सातवें सोमवारको बेलाकी दातुन करे और दीप्ताशक्तिके साथ सर्वज्ञ शिवकी पूजा करे। जँभीरी नीबूका फल अर्पण करे और चमेलीके फूलोंसे पूजा। रातको लौंग खाय। यों करनेसे अनन्त फलकी प्राप्ति होती है। आठवें सोमवारको केलेके फल और मरूआके फूलोंसे अमोघा शक्तिसहित जगदीश्वर शिवका पूजन करे। रातमें दूध पिये। इससे अग्निष्टोम यज्ञका फल प्राप्त होता है। करोड़ बार गंगास्नान करनेसे और सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमें वेदवेत्ता ब्राह्मणको दस हजार स्वर्णमुद्रा दान करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही सोमवारव्रत करनेपर कोटिगुना होकर मिलता है। नवाँ सोमवार प्राप्त होनेपर व्रतका उद्यापन करे। ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित गोल मण्डप और कुण्ड बनाये। चार दरवाजे बनाकर मण्डपके मध्यमें चौकोर वेदीका निर्माण करे। उसपर मण्डल बनाकर बीचमें कमल बनाये। आठों दिशाओंमें पृथक्-पृथक् सुवर्णसहित कलश स्थापित करके पूर्वसे लेकर वामादि शक्तियोंकी भी स्थापना करे। कर्णिकामें परम प्रकाशमय श्रीसोमनाथजीको विराजमान करे।