संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1264, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड * १२३५
सोमवारव्रतकी विधि और महिमा, गन्धर्वसेनाकी रोगनिवृत्ति
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! कैलासके उत्तर निषधपर्वतके शिखरपर स्वयम्प्रभा नामक एक विशाल पुरी है। उसमें धनवाहन नामके एक गन्धर्वराज रहते थे। उनकी स्त्री बड़ी मनोहर थी। उसके साथ रहकर वे वहाँ दिव्य भोगोंका उपभोग करते थे। समयानुसार उनके आठ पुत्र हुए। पुत्रोंके बाद एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम गन्धर्वसेना था। वह पिताकी आज्ञासे बहुत-सी कन्याओंके साथ भाँति-भाँतिके वृक्षों, लताओं, फलों और फूलोंसे सुशोभित सुन्दर उद्यानमें खेला करती थी। एक दिन खेलती हुई उस कन्याको देखकर उसकी माताने पतिसे कहा—'स्वामिन्! बन्धु-बान्धवोंसहित आपका तथा मेरा भी जीवन व्यर्थ है, जिनके घरमें इतनी बड़ी कन्या अभीतक अविवाहिता है।' पत्नीके यों कहनेपर गन्धर्वराजने कहा—'देवि! मैं पुत्रीके लिये सुन्दर वरकी खोज करता हूँ।' यों कहकर धनवाहनने पुत्रीको पुकारा। माता-पिताके बुलानेपर गन्धर्वसेना तुरंत वहाँ आयी और उनके चरणोंमें प्रणाम करके बोली—'पिताजी! क्या आज्ञा है?' धनवाहनने प्रसन्न होकर कहा—'बेटी! तुम्हें जो कोई वर पसंद हो, उसे बताओ। मैं उसी गन्धर्वशिरोमणिके साथ तुम्हारा विवाह कर दूँगा।' पिताके यों कहनेपर कन्याने कहा—'क्या तीनों लोकोंमें मेरे रूपके करोड़वें अंशकी भी बराबरी करनेवाला कोई है?' उसकी यह अद्भुत बात सुनकर पिता-माता भौंचक्के-से रह गये और आपसमें बोले—'पुत्रीने यह अच्छी बात नहीं कही।' गन्धर्वसेना उस विशाल उद्यानमें पूर्ववत् सखियोंके साथ खेलने लगी। वसन्तका समय था, वह झूला झूल रही थी। उसी समय गणनायक शिखण्डी दिव्य विमानपर बैठा हुआ वहाँ आ निकला। उसने आकाशसे ही उस कन्याको देखा। मध्याह्न-संध्याका समय था। वह विमानसे उतरा और उसी उद्यानमें ठहर गया। उसी समय उसने गन्धर्वकन्याके मुखसे यह वचन सुना—'संसारमें कोई देवता अथवा दानव मेरे रूपके करोड़वें अंशके भी बराबर नहीं है।' तब गणनायकने अहंकारमें भरी हुई उस कन्याको शाप दे दिया—'तुम रूपके अभिमानमें गन्धर्वों और देवताओंका तिरस्कार करती हो, अतः तुम्हारे शरीरमें कोढ़ हो जायगी।' यह शाप सुनकर वह कन्या भयभीत हो गयी और साष्टांग प्रणाम करके दयाकी भीख माँगने लगी। उसकी विनयसे गणनायकको दया आ गयी और उसने कहा—'यह तुम्हारे गर्वका फल है, इसलिये गर्व कभी नहीं करना चाहिये। हिमालयके वनमें गोशृंग नामके एक श्रेष्ठ मुनि रहते हैं। वे तुम्हारा उपकार करेंगे।' यों कहकर गणनायक चला गया। गन्धर्वसेना उस सुन्दर वनको छोड़कर पिताके समीप आयी और कुष्ठ होनेका सब कारण कह सुनाया। सुनकर उसके माता-पिता शोकसे सन्तप्त हो उठे और पुत्रीको साथ ले तुरंत ही हिमालय पर्वतपर आये। वहाँ उन्होंने गोशृंग ऋषिके आश्रमको देखा। मुनिवर गोशृंग आश्रमके भीतर बैठे थे। उनका दर्शन करके स्तुति-प्रणाम करनेके अनन्तर वे दोनों गन्धर्व-दम्पति उनके आगे भूमिपर बैठे। मुनिके पूछनेपर गन्धर्वराजने कहा—'मेरी कन्याका शरीर कुष्ठरोगसे पीड़ित है। जिससे उसकी शान्ति हो, वह उपाय करें।'
गोशृंगजी बोले—भारतवर्षमें समुद्रके समीप सर्वदेववन्दित भगवान् सोमनाथ विराजमान हैं। वहाँ जाकर मनुष्योंको एक समय भोजन करते हुए सब रोगोंके नाशके लिये सोमनाथकी पूजा करनी चाहिये। तुम सोमवारव्रतके द्वारा भगवान् शंकरकी आराधना करो। यों करनेसे तुम्हारी पुत्रीका रोग नष्ट हो जायगा।
महर्षिका यह वचन सुनकर गन्धर्वराजने वहाँ