संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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तामस तीन प्रकारके प्राणी होते हैं। उनमेंसे ये दैत्यगण प्रायः तमोगुणी और दुर्धर्ष होते हैं। देवताओंके साथ ये सदा लाग-डाँट रखते हैं और संसारका संहार कर देनेके लिये उद्यत होकर तामसिक तपस्याओंके द्वारा मोहवश मेरा भजन करते हैं। मैं जो उन्हें वरदान देता हूँ, उसमें केवल उनकी भक्ति ही कारण है। मैं भक्तिसे भलीभाँति वशमें हो जानेवाला हूँ। तपस्याके अनुसार वर पाकर वे पापात्मा दैत्य जो विष्णुके द्वारा मारे जाते हैं, उसका रहस्य मुझसे सुनो। मैं और विष्णु जो भिन्न प्रतीत होते हैं, उसमें गुणभाग कारण है। वास्तवमें हम दोनों अभिन्न हैं। हममें आराध्य और आराधक आदिका भेद भी सामान्य ही है—हम उनके आराध्य हैं और वे हमारे। श्रीविष्णुके चरणोंके अग्रभागसे निकली हुई गंगाजीको मैं भक्तिपूर्वक मस्तकपर धारण करता हूँ। तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये उद्यत हुए श्रीविष्णुने भी चिरकालतक मेरी उपासना करके दुष्ट दैत्योंका नाश करनेवाला चक्र प्राप्त किया। त्रिभुवनकी उत्पत्तिके कारणभूत श्रीहरिकी मैं भक्तिपूर्वक आराधना करता हूँ। इसी प्रकार श्रीहरि भी मेरी आज्ञा शिरोधार्य करके अजन्मा होते हुए भी जन्म लेकर सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करते हैं। हिरण्यकशिपु दैत्यका वध करनेके लिये नृसिंह-शरीर धारण करनेवाले श्रीहरिको मैंने ही शान्त किया। इसी प्रकार बाणासुरकी रक्षाके लिये त्रिशूल उठानेवाले मुझ शंकरको मनुष्य-अवतारमें स्थित होते हुए भी श्रीहरिने लीलापूर्वक स्तब्ध कर दिया था। मेरी महिमा और प्रभावको बढ़ाते हुए मेरे प्रभु भगवान् विष्णु नित्य मेरी सेवा करते हैं तथा मैं भी अनादि, अनन्त परमात्मा श्रीहरिका ध्यानयोग और समाधिमें चिन्तन करता हूँ। इस प्रकार उनका और मेरा भेद वास्तविक नहीं है। मूढ़ मनुष्य ही हम दोनोंमें भेद और न्यूनता-अधिकताका आरोप करते हैं। मैं ही विष्णुरूप धारण करके दुष्टोंका संहार करता हूँ। वे दैत्य हम दोनोंके प्रभावसे निष्पाप होकर मुक्तिके लिये ब्रह्मर्षियोंके कुलमें जन्म लेते हैं। ब्रह्मचर्यके पश्चात् पाशुपत योगका आश्रय ले पूर्वजन्मके संस्कारसे वे फिर मेरी उपासना करते हैं। मेरे लिंगोंका पूजन करते हैं। सदा एकमात्र मुझमें ही चित्त लगाये हुए मेरे ध्यानमें दृढ़तापूर्वक स्थित रहते हैं। जो सम्पूर्ण जगत्की अधीश्वरी तुम पार्वतीकी भी वन्दना करते हैं, उन्हें देहत्यागके पश्चात् मैं सारूप्य तथा सालोक्य मुक्ति देता हूँ। धर्मशास्त्रके अनुकूल आचारके कारण वे साधुपुरुषों और मुनियोंद्वारा निन्दित नहीं होते। तीर्थयात्राके प्रसंगसे वे ब्राह्मण लोग जब यहाँ आते हैं, तब मैं उन्हें अपने स्थानपर ले आता हूँ और तुम उन भोजनार्थी तपस्वीजनोंको नाना प्रकारके उपहारोंसे तृप्त करती हो। फिर वे सब धर्मोंमें तत्पर होकर श्रीसोमेश्वरदेवकी पूजा करते हैं और शरीरका अन्त होनेपर परम दुर्लभ मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।
ब्राह्मणलोग कहते हैं— चन्द्रदेव ! पार्वतीजीके पूछनेपर भगवान् शिवने यही कहा था। वहीं देवर्षि नारदने दोनोंका वह सब संवाद सुना और कथा-गोष्ठीमें हमारे पूछनेपर वह सब वृत्तान्त बतलाया।
ब्राह्मणोंके यों कहनेपर सोमदेव प्रसन्न होकर अपने लोकको चले गये। और उनकी आज्ञासे वे ब्राह्मण भी सोमेश्वरदेवकी यथावत् पूजा करते हैं। जिस मनुष्यने सोमवारसे लेकर आठ दिनोंतक सोमेश्वरदेवका पूजन किया है, उसने सब प्रकारके दान और सम्पूर्ण महाव्रतोंका अनुष्ठान कर लिया।