संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1262, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* प्रभासखण्ड * १२३३
ऐसा कहकर सोमेश्वर शिव वहीं अन्तर्धान हो गये। चन्द्रमाको यक्ष्मारोगसे छुटकारा मिला। उन्होंने विश्वकर्माको बुलाकर सोमनाथके लिये एक मन्दिर बनवाया, जो शुद्ध स्फटिक तथा गोदुग्धके समान उज्ज्वल था। उसके चारों ओर अन्य चौदह मन्दिर बनवाये गये। ब्रह्मा आदि समीपवर्ती देवताओंके लिये भी दस मन्दिर निर्माण किये गये। वैवस्वत मन्वन्तरके दसवें त्रेतामें मण्डप बनवाकर विधिपूर्वक सोमेश्वर शिवकी प्रतिष्ठा करके दीनों और अनाथोंके लिये सैकड़ों और हजारों वापी, कूप, तड़ाग और गृह आदि बनवाये। सब कुछ बनवाकर पृथक्-पृथक् ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक दान दिया। सोमेश्वरके समीप नगर बसाकर चन्द्रमाने ब्राह्मणोंका पूजन किया और कहा—'ब्रह्माजीकी कृपासे मैं यद्यपि आपलोगोंका राजा हूँ, तथापि विनय और भक्तिसे ही कुछ निवेदन करता हूँ। धन, सुवर्ण, रत्न, धान, जौ आदि अन्न, गाय-भैंस आदि पशु, भाँति-भाँतिके वस्त्र, केला और नारियलके फल, पान और सुपारी तथा मनोहर उद्यान आपलोगोंके लिये सब ओर उपस्थित हैं। जम्बूद्वीपके सब मनुष्य आपके अधीन होकर आपकी आज्ञाका पालन करेंगे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा वर्णसंकर लोग भी आपको गुरु मानकर तीर्थयात्रा करेंगे। विप्रवरो! आपलोग यहाँ रहकर पवित्र उपचारोंसे मेरे द्वारा स्थापित सोमनाथजीकी सब समय पूजा करें। आपलोग स्मृतियोंके सदाचारका पालन करनेमें कुशल हैं। यहाँ रहकर सबके व्यवहारोंको देखिये और स्वयं भी श्रुति-स्मृति एवं पुराणोंमें प्रतिपादित धर्मोंका आचरण कीजिये।'
यह सुनकर उन ब्राह्मणोंने कहा—चन्द्रदेव! आप हम ब्राह्मणोंके राजा हैं। आपने हमें सर्वथा उत्तम उपदेश दिया है। हम आपकी सब आज्ञाका पालन करेंगे। परन्तु जो लोग किसीके द्वारा नियुक्त होकर—वेतन लेकर पूजा करते हैं, अथवा शिवनिर्माल्यका सेवन करते हैं, वे पतित हो जाते हैं। अतः ऐसा करनेपर हम भी पतित हो सकते हैं। यह पातित्य श्रुतियों और स्मृतियोंद्वारा निन्दित है। श्रुति और स्मृति दोनों ही शिवजीकी आज्ञाएँ हैं, अतः कौन ऐसा मूढ़ होगा जो प्राणोंके कण्ठतक आ जानेपर भी शिवकी आज्ञाओंका उल्लंघन करेगा। अष्टमूर्ति शिवकी एक मूर्ति अग्निदेव हैं। वे ही देवताओंके मुख हैं। हम अग्निमें यज्ञ कराते हुए सत्स्वरूपसे सम्पूर्ण जगत्को तृप्त करते हैं। यह जगत् भगवान् शिवका रूप है। जगत्में परस्पर भेद होते हुए भी यह जगदीश्वर शिवसे अभिन्न है। अग्निमें विधिपूर्वक दी हुई आहुति सूर्यदेवको प्राप्त होती है। सूर्यसे वृष्टि होती है, वृष्टिसे अन्न होता है और अन्नसे प्रजा जीवन धारण करती है*। हम सदा श्रुति, स्मृति और पुराणोंके अभ्यासमें संलग्न रहनेवाले हैं। उसके अर्थका विचार करनेमें ही तत्पर रहते हैं और उनमें बताये हुए सभी सत्कर्मोंका अनुष्ठान किया करते हैं; अतः हमें शिवलिंग-पूजनके लिये बहुत कम अवसर मिल सकता है। तथापि हम रुद्रका जप और पंच महायज्ञोंका अनुष्ठान करते हुए ही यथासमय और यथावकाश सोमेश्वर लिंगका भी पूजन करते रहेंगे।
एक समय पार्वतीजीने शिवजीसे पूछा—देव! दैत्यलोग आपका प्रसाद पाकर तीनों लोकोंमें उत्पात करते और इन्द्र आदि देवताओंको भी अपने स्थानसे भगा देते हैं। ऐसे दुष्टात्माओंको आप वर क्यों देते हैं और भगवान् विष्णु उन्हें क्यों मारते हैं। उनके द्वारा मारे हुए दैत्योंकी क्या गति होती है?
महादेवजीने कहा—सात्त्विक, राजस और
* अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठति। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः॥ (स्क० पु०, प्रभास० २२।८८-८९)