संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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नहीं है। सांख्यवादी जिन्हें प्रधान और पुरुष कहते हैं, योगी जिनका परम प्रधान एवं परम पुरुषरूपसे चिन्तन करते हैं, उन ज्ञेयस्वरूप सदाशिवको नमस्कार है। विद्वान् पुरुष जिन्हें देवता, असुर और मनुष्योंकी सृष्टि तथा संहारका कारण मानते हैं, उन सर्वात्माको नमस्कार है। जो अविनाशी, अनादि, अनन्त, नित्य, सनातन, ध्रुव, कलातीत एवं परम ब्रह्मस्वरूप हैं, उन योगात्मा शिवको नमस्कार है। जो आदिदेव महेश्वर पवित्र वस्तुओंमें सबसे अधिक पवित्र हैं तथा दर्शनमात्रसे ही पवित्र कर देते हैं, उन तीर्थात्मा शिवको नमस्कार है। जिनसे सबकी उत्पत्ति होती है, जिनमें सबका लय होता है तथा जो सम्पूर्ण जगत्का पालन करते हैं, उन सर्वात्माको नमस्कार है। ब्राह्मणलोग पूर्ण दक्षिणायुक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञोंके द्वारा जिनका यजन करते हैं, उन यज्ञात्माको नमस्कार है।
पार्वती! इस प्रकार जब चन्द्रमाने दिन-रात मेरा स्तवन किया, तब मैंने प्रसन्न होकर कहा—'वत्स! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे पूर्णतः सन्तुष्ट हूँ। तुम अपनी इच्छाके अनुसार वर माँगो।'
चन्द्रमाने कहा—प्रभो आप इस शिवलिंगमें सदैव निवास कीजिये। जो लोग अत्यन्त भक्तिपूर्वक यहाँ आपका दर्शन करें, उन्हें आपके प्रसादसे उत्तम सिद्धि प्राप्त हो।
मैंने कहा—चन्द्रदेव! इस लिंगमें मेरा निवास तो पहलेसे ही है, अब तुम्हारी निरन्तर भक्तिके कारण मैं इसमें विशेष रूपसे उमासहित निवास करूँगा। इस क्षेत्रमें मेरे प्रसादसे तुमने अपनी प्रभा प्राप्त की है, इस कारण इसका नाम प्रभास होगा। सोम! तुमने मेरे इस शुभ लिंगकी प्रतिष्ठा की है, इसलिये यहाँ मेरा नाम 'सोमनाथ' प्रसिद्ध होगा। जो मनुष्य मेरी भक्तिमें तत्पर हो यहाँ मेरा दर्शन करेंगे, उन्हें मेरे प्रभावसे रोग, दरिद्रता, दुर्गति तथा इष्टजनोंका वियोग नहीं होगा। मेरे दर्शनकी इच्छा रखनेवाले जो लोग भक्तिभावसे यहाँकी यात्रा करेंगे, उन्हें पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होगा। निशाकर! एक पुरुष तो जीवनभर ब्रह्मचारी रहे और दूसरा एक बार यहाँ मेरा दर्शन करे, उन दोनोंके लिये समान फल बतलाया गया है। एक मनुष्य ब्राह्मणको सब प्रकारके दान देता है और एक यहाँ आकर मेरा दर्शन करता है, उन दोनोंके लिये समान फल बताया गया है। सोमवारको चन्द्रग्रहण प्राप्त होनेपर जो भक्तिपूर्वक मेरा दर्शन करता है, उसे पूर्वोक्त सभी पुण्यकर्मोंका फल प्राप्त होता है। सरस्वती, समुद्र, सोमवार, सोमग्रहण और सोमनाथजीका दर्शन—इन पाँच सकारोंका योग दुर्लभ है। चार मासतक विधिपूर्वक शिवकी पूजा करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वही कार्तिककी पूर्णिमामें पूजन करनेपर यहाँ एक ही दिनमें प्राप्त हो जाता है। वही पुण्य चैत्रकी पूर्णिमाको दूना बताया गया है। फाल्गुन और आषाढ़की पूर्णिमाके दिन दर्शन-पूजनका भी यही पुण्य है। जो मनुष्य जीवनपर्यन्त प्रति माघमासमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराता है और जो एक बार इस शिवलिंगका दर्शन करता है, उन दोनोंको समान फल प्राप्त होता है; इसमें संशय नहीं है। नागकेशर, चम्पा, श्वेतकमल और धतूरके फूल शिवकी पूजाके लिये उत्तम माने गये हैं। केतकी, अतिमुक्त (मरुआ), कुन्द, जूही, सिरस, शाल और जामुनके फूलोंको शिवकी पूजामें त्याग देना चाहिये। धतूर और कदम्बके फूल रातमें शिवके ऊपर चढ़ाने चाहिये। शेष जो फूल बताये गये हैं, उनका उपयोग दिनको करना चाहिये। मल्लिका अर्थात् बेलाका फूल दिन और रात दोनोंमें चढ़ाना चाहिये। जिसमें कीड़े और केश आदि पड़ गये हों, जो रातके तोड़े हुए होनेसे बासी हो गये हों, जो अपने-आप टूटकर गिरे हुए अथवा कुचल गये हों—ऐसे फूलोंको त्याग देना चाहिये। तुलसी, कमल, गान्धार और दवनासे सोमनाथकी सदा पूजा करे। ऐसा करनेवाला मनुष्य यहाँकी यात्राका पूरा फल पाता है और स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है।